April 2026

Akshaya Tritiya

Akshaya Tritiya 2026 Date And Time : अक्षय तृतीया 19 या 20 अप्रैल ? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और सोना खरीदने का सटीक समय….

Akshaya Tritiya 2026 Mein Kab Hai: सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में अनेकों व्रत और त्योहार मनाये जाते हैं, लेकिन कुछ विशेष दिन ऐसे होते हैं जिनका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व बहुत अधिक होता है। इन्हीं पवित्र और अत्यंत शुभ दिनों में से एक सबसे पावन पर्व Akshaya Tritiya का माना जाता है। इस पर्व को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को बहुत ही हर्षोल्लास और असीम श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ ही होता है ‘जिसका कभी क्षय या नाश न हो’। माना जाता है कि इस शुभ अवसर पर किए गए किसी भी अच्छे कार्य, पूजा-पाठ और दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता और वह इंसान के जीवन में हमेशा बढ़ता ही रहता है। एक सच्चे मार्गदर्शक और आपके आध्यात्मिक साथी के रूप में, आज हम साल 2026 की तारीख को लेकर चल रहे सभी कन्फ्यूजन को दूर करेंगे और साथ ही इस दिन के गहरे रहस्यों, शुभ मुहूर्तों और पूजा की सटीक विधि पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे। Akshaya Tritiya 2026 Date And Time : अक्षय तृतीया 19 या 20 अप्रैल…. सही तारीख को लेकर कन्फ्यूजन: 19 या 20 अप्रैल : Confusion about the correct date: 19th or 20th April? अक्सर हिंदू पंचांग और अंग्रेजी कैलेंडर के बीच तिथियों के तालमेल को लेकर लोगों में थोड़ी दुविधा हो जाती है। इस साल Akshaya Tritiya की सही तारीख को लेकर भी भक्तों में कुछ ऐसा ही कन्फ्यूजन देखने को मिल रहा है। पंचांग की सटीक और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 19 अप्रैल 2026 को सुबह 10:45 बजे से प्रारंभ हो जाएगी। यह शुभ तिथि अगले दिन यानी 20 अप्रैल 2026 को सुबह 7:49 बजे तक विद्यमान रहेगी। हिंदू सनातन धर्म की मान्यताओं में ‘उदया तिथि’ (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, जिसके अनुसार वर्ष 2026 में Akshaya Tritiya का यह महापर्व मुख्य रूप से 20 अप्रैल को माना जाना चाहिए। वहीं, दूसरी ओर कुछ पंचांगों और जानकारों का यह भी कहना है कि चूंकि 19 अप्रैल को दोपहर के समय तृतीया तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए इसी दिन यह पर्व मनाया जाएगा। ऐसे में आप अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंडित जी के दिशा-निर्देशों के अनुसार इन दोनों में से किसी भी दिन अपनी पूजा-अर्चना और शुभ कार्यों की शुरुआत कर सकते हैं। अबूझ मुहूर्त और तीन महायोगों का शुभ संगम:Abujha Muhurta and auspicious confluence of three Mahayoga आखिर Akshaya Tritiya को अबूझ मुहूर्त क्यों कहा जाता है ? हिंदू धर्म में अमूमन किसी भी नए और शुभ काम को शुरू करने से पहले पंचांग देखकर एक शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। लेकिन इस दिन को ‘अबूझ मुहूर्त’ या स्वयं सिद्ध मुहूर्त की शानदार उपाधि दी गई है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि इस पूरे दिन में किसी भी शुभ कार्य, जैसे नया व्यापार शुरू करना, शादी-विवाह, गृह प्रवेश या कोई नई संपत्ति खरीदना आदि के लिए अलग से विशेष मुहूर्त निकलवाने की जरूरत बिल्कुल नहीं पड़ती। Akshaya Tritiya आप बिना ज्यादा सोचे-विचारे बेझिझक कोई भी शुभ कार्य संपन्न कर सकते हैं। इस बार का पर्व और भी ज्यादा चमत्कारी तथा खास होने वाला है क्योंकि इस दिन ब्रह्मांड में कई अत्यंत शुभ योग एक साथ बन रहे हैं। Akshaya Tritiya ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस बार रोहिणी नक्षत्र के साथ-साथ ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘अमृत सिद्धि योग’ का भी एक बहुत ही दुर्लभ और पावन संगम हो रहा है। इन महान योगों के बनने से इस दिन किए गए किसी भी नए कार्य के पूर्ण रूप से सफल होने की संभावना कई गुना अधिक बढ़ जाती है। धार्मिक महत्व : Religious importance परशुराम अवतार से लेकर कुबेर की तपस्या तक जब भी हम Akshaya Tritiya की बात करते हैं, तो इसके पीछे छिपे पौराणिक और धार्मिक कारण इसके महत्व को और भी ज्यादा बढ़ा देते हैं। हमारे पवित्र धर्मग्रंथों के अनुसार: भगवान परशुराम का अवतार: ऐसी गहरी मान्यता है कि इसी पावन तिथि के दिन भगवान श्री हरि विष्णु ने पृथ्वी से पापियों और दुष्टों का नाश करने के लिए भगवान परशुराम के रूप में अपना छठा अवतार लिया था। युगों का आरंभ: यह दिन समय के चक्र में भी एक बहुत बड़ी और रहस्यमयी भूमिका निभाता है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि इसी परम पवित्र दिन से ‘सतयुग’ और ‘त्रेतायुग’ जैसे महान युगों का शुभारंभ हुआ था। धनपति कुबेर को मिला खजाना: एक और अत्यंत रोचक कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान कुबेर ने महादेव (भगवान शिव) की बहुत ही कठोर और सच्ची तपस्या की थी। Akshaya Tritiya कुबेर की उस अटूट तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें देवताओं के खजाने का कोषाध्यक्ष (धन का देवता) बनने का विशेष आशीर्वाद प्रदान किया था। सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त और इसका महत्व:Auspicious time to buy gold and its importance इस दिन बाज़ारों में रौनक सचमुच देखते ही बनती है। विशेष रूप से, इस Akshaya Tritiya पर सोना खरीदने का भी बहुत गहरा महत्व और एक पुरानी परंपरा रही है। सोना केवल एक कीमती आभूषण या धातु नहीं है, बल्कि इसे साक्षात धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। लोगों का यह अटूट विश्वास है कि इस दिन खरीदा गया सोना कभी घटता नहीं है, बल्कि समय के साथ हमेशा बढ़ता रहता है और घर में अपार सुख, सकारात्मक ऊर्जा तथा समृद्धि लेकर आता है। यही कारण है कि लोग इस दिन अपने भविष्य की आर्थिक स्थिरता के लिए निवेश के रूप में सोना, चांदी या धातु के अन्य बर्तन खरीदना बहुत शुभ मानते हैं। अगर आप भी इस बार सोने की खरीदारी करने का पूरा मन बना रहे हैं, तो इसके लिए एक विशेष और फलदायी समय तय किया गया है। 19 अप्रैल को सुबह 10:49 बजे से सोना खरीदने का उत्तम समय शुरू हो जाएगा और यह खरीदारी का विशेष मुहूर्त 20 अप्रैल की सुबह 5:51 बजे तक रहेगा। आप इस शुभ अवधि के दौरान अपनी क्षमता के अनुसार सोने के आभूषण या सिक्के बेझिझक खरीद सकते हैं। पूजा का सटीक समय और संपूर्ण विधि : Exact time and

Akshaya Tritiya 2026 Date And Time : अक्षय तृतीया 19 या 20 अप्रैल ? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और सोना खरीदने का सटीक समय…. Read More »

Vallabhacharya Jayanti

Vallabhacharya Jayanti 2026 Date And Time: पुष्टिमार्ग के संस्थापक का अद्भुत इतिहास, जन्म कथा और पूजा विधि….

Vallabhacharya Jayanti 2026 Mein Kab Hai: भारत की पवित्र और रूहानी भूमि पर सदियों से अनेक महान संतों, ऋषियों और दार्शनिकों ने जन्म लिया है, जिन्होंने भटके हुए समाज को ईश्वर भक्ति का एक नया, सरल और सटीक मार्ग दिखाया। इन्हीं महान और दिव्य विभूतियों में से एक अत्यंत आदरणीय नाम श्री वल्लभाचार्य जी का है । हिंदू धर्म, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों के बीच Vallabhacharya Jayanti का पर्व बहुत ही अपार श्रद्धा, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है । श्री वल्लभाचार्य जी ने ही भक्ति रस से भरे ‘पुष्टिमार्ग’ और ‘शुद्ध अद्वैत दर्शन’ की स्थापना की थी । उनके गहरे आध्यात्मिक विचारों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की निस्वार्थ और प्रेममयी भक्ति ही मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र साधन है । अगर आप भी श्री कृष्ण के अनन्य भक्त हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा पाना चाहते हैं…  साल 2026 में तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and Timings) व्रत और त्योहारों की सही जानकारी होना सबसे ज्यादा जरूरी होता है ताकि हम पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न कर सकें। हिंदू पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) के दिन यह पावन पर्व मनाया जाता है । Vallabhacharya Jayanti जिस दिन वरूथिनी एकादशी होती है, उसी शुभ दिन पर यह जयंती भी मनाई जाती है । वर्ष 2026 में श्री वल्लभाचार्य जी की 547वीं जयंती 13 अप्रैल 2026, दिन सोमवार को पूरे देशभर में बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाएगी । Vallabhacharya Jayanti 2026 :इस पावन दिन के प्रमुख समय और मुहूर्त इस प्रकार हैं: एकादशी तिथि का आरंभ: 13 अप्रैल 2026 को रात 01:16 बजे से हो जाएगा । एकादशी तिथि का समापन: 14 अप्रैल 2026 को रात 01:08 बजे तक रहेगा । अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:33 बजे से लेकर दोपहर 12:24 बजे तक पूजा का सबसे उत्तम समय रहेगा । विजय मुहूर्त: दोपहर 02:06 बजे से 02:56 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है । एक चमत्कारिक जन्म कथा: अग्नि देवता का अवतार महान दार्शनिक संत वल्लभाचार्य जी का जन्म वर्ष 1479 ईस्वी में एक साधारण तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम इल्लम्मागारू (यल्लम्मा) था । उनकी जन्म कथा किसी रोंगटे खड़े कर देने वाले रहस्य और चमत्कार से कम नहीं है। कथाओं के अनुसार, उस समय समाज में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष चरम पर था और उनके माता-पिता बहुत सारे कष्ट सहते हुए यात्रा कर रहे थे । Vallabhacharya Jayanti जब वे वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास चंपारण्य (चंपारण) नामक घने जंगल से गुजर रहे थे, तभी शाम के समय उनकी माता को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई । माता इल्लम्मागारू ने जंगल में एक बहुत बड़े और विशालकाय शमी के पेड़ के नीचे एक आठ महीने के शिशु को जन्म दिया । शिशु में कोई हलचल या जीवन का संकेत न देखकर माता-पिता को लगा कि बालक मृत पैदा हुआ है । Vallabhacharya Jayanti भारी मन और गहरे दुख के साथ लक्ष्मण भट्ट जी ने उस बालक को कपड़े में लपेटा, उसी पेड़ के नीचे एक गड्ढे में रखा और भारी मन से नगर की ओर चले गए । उसी रात नगर में विश्राम करते समय माता इल्लम्मागारू के स्वप्न में स्वयं भगवान श्रीनाथ जी (श्री कृष्ण) प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि जिस नवजात बालक को उन्होंने मृत समझकर जंगल में छोड़ दिया है, Vallabhacharya Jayanti वह साक्षात उनका ही अंश है और उन्होंने ही माता की कोख से जन्म लिया है । जब वे दोनों पति-पत्नी घबराकर दौड़ते हुए उस पेड़ के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वह नन्हा बालक बिल्कुल सुरक्षित है और उसके चारों ओर प्रज्वलित अग्नि का एक मजबूत सुरक्षा घेरा बना हुआ है । Vallabhacharya Jayanti माता-पिता ने प्रसन्न होकर उसे सीने से लगा लिया और बालक का नाम ‘वल्लभ’ रखा । इसी अत्यंत अद्भुत और दिव्य घटना के कारण उन्हें अग्नि देवता का अवतार भी माना जाता है । पुष्टिमार्ग की स्थापना और श्रीनाथ जी से मिलन बड़े होकर इस बालक ने धर्म और आध्यात्म की दुनिया में एक बहुत बड़ी क्रांति ला दी। इसी उपलक्ष्य में लोग हर साल Vallabhacharya Jayanti मनाते हैं । उन्होंने वेदांत दर्शन को बहुत ही गहराई से समझा और ‘पुष्टिमार्ग’ (कृपा का मार्ग) की स्थापना की । Vallabhacharya Jayanti उन्होंने कठोर तपस्या और संन्यास जीवन को पूरी तरह से नकारते हुए यह दावा किया कि कोई भी आम इंसान केवल भगवान कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण और निस्वार्थ भक्ति दिखाकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है । इन महान दार्शनिक के जीवन से जुड़ी एक और रोमांचक कहानी गोवर्धन पर्वत के इर्द-गिर्द घूमती है । कहा जाता है कि जब वल्लभ अपनी यात्रा पर थे, तो उन्हें गोवर्धन पर्वत के पास कुछ रहस्यमयी हलचल का आभास हुआ । वहां पहुंचने पर उन्हें भगवान श्री कृष्ण की एक अत्यंत मनमोहक मूर्ति मिली, जिसे उन्होंने अपने सीने से लगा लिया । Vallabhacharya Jayanti धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए थे और उन्हें श्रीनाथ जी के रूप में पूजने का अवसर वल्लभाचार्य जी को ही प्राप्त हुआ था । बचपन की मेधा और ‘आचार्य’ की महान उपाधि वल्लभाचार्य जी बचपन से ही अत्यंत मेधावी और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । मात्र 7 वर्ष की छोटी सी आयु में ही उन्होंने वेदों और छह भारतीय दार्शनिक प्रणालियों का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया था । Vallabhacharya Jayanti इसके अलावा उन्होंने आदि शंकराचार्य, रामानुज, माधव और निम्बार्क के दर्शन को भी गहराई से पढ़ा था । जब वे केवल 11 साल के थे, तब उन्होंने विजयनगर साम्राज्य में राजा कृष्णदेव राय के दरबार में द्वैतवाद और अद्वैतवाद पर चल रही एक बहुत बड़ी दार्शनिक बहस में हिस्सा लिया । पूरे 27 दिनों तक चली इस लंबी और कठिन शास्त्रार्थ (बहस) में उन्होंने सभी विद्वानों को अपने तर्कों से पराजित कर दिया । उनकी इस अद्भुत प्रतिभा से राजा कृष्णदेव राय इतने अधिक प्रसन्न हुए कि उन्होंने युवा वल्लभ का ‘कनकाभिषेक’ (सोने के बर्तनों से अभिषेक) किया । उसी ऐतिहासिक आंदोलन के बाद उन्हें ‘आचार्य’ तथा ‘जगद्गुरु’ (दुनिया के पूर्वज) की

Vallabhacharya Jayanti 2026 Date And Time: पुष्टिमार्ग के संस्थापक का अद्भुत इतिहास, जन्म कथा और पूजा विधि…. Read More »

Varuthini Ekadashi

Varuthini Ekadashi 2026 Date And Time : वरुथिनी एकादशी संपूर्ण पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व और व्रत के अचूक नियम….

Varuthini Ekadashi 2026 Mein Kab Hai: सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति में व्रतों का अपना एक अलग और बहुत ही गहरा आध्यात्मिक स्थान है। हम सभी जानते हैं कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक वर्ष में कुल 24 एकादशियां आती हैं, और हर एकादशी का अपना-अपना एक विशेष धार्मिक महत्व होता है। भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए ये एकादशियां सबसे ज्यादा पवित्र मानी जाती हैं। इन्हीं अत्यंत शक्तिशाली और फलदायी व्रतों में से एक है वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली Varuthini Ekadashi, जिसे इंसान के सभी पापों को जड़ से नष्ट करने और आत्मा को पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए सबसे उत्तम मार्ग माना गया है। आज के इस विस्तृत, सौ प्रतिशत मौलिक (Original) और इंसानी भावनाओं से लिखे गए इस ज्ञानवर्धक ब्लॉग पोस्ट में, हम आपको इस चमत्कारिक व्रत से जुड़ी हर एक छोटी-बड़ी बात, इसके अचूक नियम और शुभ मुहूर्त के बारे में बहुत ही आसान और स्पष्ट शब्दों में गहराई से बताएंगे। Varuthini Ekadashi 2026 Date And Time : संपूर्ण पूजा विधि, शुभ मुहूर्त…. व्रत का अपार और चमत्कारिक महत्व (Religious Significance) विष्णु पुराण और हमारे सदियों पुराने प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्रों में इस विशिष्ट एकादशी की अपार महिमा का बहुत ही सुंदर और रोंगटे खड़े कर देने वाले तरीके से गुणगान किया गया है। ऐसी बहुत ही गहरी और अटूट मान्यता है कि जो भी व्यक्ति अपने साफ मन और पूरी श्रद्धा के साथ Varuthini Ekadashi का व्रत रखता है, उसे अपने जीवन में राजसुख, हर प्रकार की सुख-समृद्धि और एक स्वस्थ व लंबी आयु (दीर्घायु) का आशीर्वाद सीधे भगवान विष्णु के श्री चरणों से प्राप्त होता है। यह कोई साधारण उपवास बिल्कुल भी नहीं है; बड़े-बड़े सिद्ध मुनियों और धार्मिक जानकारों का यह साफ तौर पर मानना है कि यह व्रत दस हजार वर्षों तक किए गए कठोर तप, महादान और बड़े-बड़े यज्ञों के बराबर पुण्य फल देने वाला एक अत्यंत जादुई और रूहानी व्रत माना गया है। Varuthini Ekadashi अगर आप जीवन के हर कदम पर आने वाली रुकावटों, अचानक आने वाली आर्थिक तंगी और गहरे मानसिक कष्टों से हमेशा के लिए मुक्ति पाना चाहते हैं, तो यह पावन व्रत आपके लिए एक अचूक उपाय की तरह काम करेगा। Varuthini Ekadashi विशेष रूप से हमारी माताओं और बहनों के लिए यह एकादशी परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और घर में धन-धान्य की अपार वृद्धि का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। सही तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त (Dates and Abhijit Muhurat 2026) हिंदू धर्म में किसी भी व्रत, त्योहार या पूजा का पूरा फल इंसान को तभी मिलता है जब उसे एकदम सही तिथि और सटीक मुहूर्त में पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जाए। साल 2026 के फ्यूचर पंचांग की एकदम सटीक और गहरी ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 13 अप्रैल 2026 को रात के ठीक बाद (पूर्वाह्न) 01:16 बजे से हो जाएगी। वहीं, इस अत्यंत पावन तिथि का समापन अगले दिन यानी 14 अप्रैल 2026 को पूर्वाह्न 01:08 बजे होगा। चूंकि हमारे सनातन धर्म में किसी भी व्रत को तय करने के लिए ‘उदया तिथि’ (यानी सूर्योदय के समय मौजूद रहने वाली पवित्र तिथि) का सबसे ज्यादा मान और महत्व होता है, इसलिए Varuthini Ekadashi का यह मुख्य और महान व्रत 13 अप्रैल 2026 को ही पूरे हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ रखा जाएगा। अभिजीत मुहूर्त का दुर्लभ और जादुई संयोग:Rare and magical coincidence of Abhijeet Muhurta: इस साल 13 अप्रैल को व्रत वाले दिन ‘अभिजीत मुहूर्त’ का एक बहुत ही शानदार, दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस एकादशी की शक्ति कई गुना अधिक बढ़ गई है। Varuthini Ekadashi यह जादुई अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:56 बजे से शुरू होकर दोपहर 12:47 बजे तक रहेगा। आप अपनी विशेष पूजा-अर्चना, नए और महत्वपूर्ण कार्यों का संकल्प, तथा भगवान की आरती इसी शुभ समय के बीच में बड़ी ही आसानी से कर सकते हैं। भगवान लक्ष्मी-नारायण की संपूर्ण पूजा विधि (Complete Puja Rituals) सनातन शास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि Varuthini Ekadashi के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के लक्ष्मी-नारायण स्वरूप (यानी माता लक्ष्मी के साथ श्री हरि) की आराधना और विशेष पूजा की जाती है। अगर आप इस दिन किसी बड़े मंदिर में न जाकर घर पर ही रहकर भगवान की उपासना कर रहे हैं, तो इन आसान लेकिन बेहद अचूक पूजा नियमों का पालन आपको जरूर करना चाहिए: पवित्र स्नान और सूर्य अर्घ्य: व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह जल्दी उठकर) में साफ पानी से स्नान करें और धुले हुए नए या एकदम स्वच्छ कपड़े पहनें। इसके तुरंत बाद सूर्य देव को जल का अर्घ्य देकर अपने दिन की अत्यंत सकारात्मक शुरुआत करें। चौकी और मूर्ति स्थापना: अपने घर के शांत पूजा कक्ष में एक साफ लकड़ी की चौकी रखें। Varuthini Ekadashi उस चौकी पर पीले या लाल रंग का एक नया और सुंदर कपड़ा बिछाएं तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मनमोहक मूर्ति (या तस्वीर) को पूरे आदर के साथ वहां स्थापित करें। दिव्य पंचामृत अभिषेक: भगवान की उस पवित्र प्रतिमा को शुद्ध जल, गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शुद्ध शहद, और चीनी से बना हुआ) से स्नान कराएं। श्रृंगार और विशेष चढ़ावा: श्री हरि विष्णु जी को पीला रंग बहुत अधिक प्रिय है और यह उनकी आभा का प्रतीक है। इसलिए भगवान को पीले फूल (जैसे गेंदा या कमल का फूल), पीले रंग के सुंदर वस्त्र, केले का फल और किसी खास पीली

Varuthini Ekadashi 2026 Date And Time : वरुथिनी एकादशी संपूर्ण पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व और व्रत के अचूक नियम…. Read More »