September 29, 2025

Lakshmanakritam

shrIlakShmInArAyaNakavacham:श्रीलक्ष्मीनारायणकवचम्

shrIlakShmInArAyaNakavacham: श्रीलक्ष्मीनारायणकवचम् श्रीगणेशाय नमः ।श्रीभैरव उवाच ।अधुना देवि वक्ष्यामि लक्ष्मीनारायणस्य ते ।कवचं मन्त्रगर्भं च वज्रपञ्जरकाख्यया ॥ १॥ श्रीवज्रपञ्जरं नाम कवचं परमाद्भुतम् ।रहस्यं सर्वदेवानां साधकानां विशेषतः ॥ २॥ यं धृत्वा भगवान् देवः प्रसीदति परः पुमान् ।यस्य धारणमात्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३॥ ईश्वरोऽहं शिवो भीमो वासवोऽपि दिवस्पतिः ।सूर्यस्तेजोनिधिर्देवि चन्द्रर्मास्तारकेश्वरः ॥ ४॥ वायुश्च बलवांल्लोके वरुणो यादसाम्पतिः ।कुबेरोऽपि धनाध्यक्षो धर्मराजो यमः स्मृतः ॥ ५॥ यं धृत्वा सहसा विष्णुः संहरिष्यति दानवान् ।जघान रावणादींश्च किं वक्ष्येऽहमतः परम् ॥ ६॥ कवचस्यास्य सुभगे कथितोऽयं मुनिः शिवः ।त्रिष्टुप् छन्दो देवता च लक्ष्मीनारायणो मतः ॥ ७॥ रमा बीजं परा शक्तिस्तारं कीलकमीश्वरि ।भोगापवर्गसिद्ध्यर्थं shrIlakShmInArAyaNakavacham विनियोग इति स्मृतः ॥ ८॥ ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनारायणकवचस्य शिवः ऋषिः ,त्रिष्टुप् छन्दः , श्रीलक्ष्मीनारायण देवता ,श्रीं बीजं , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकं ,भोगापवर्गसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।अथ ध्यानम् ।पूर्णेन्दुवदनं पीतवसनं कमलासनम् ।लक्ष्म्या श्रितं चतुर्बाहुं लक्ष्मीनारायणं भजे ॥ ९॥ shrIlakShmInArAyaNakavacham: अथ कवचम् ।ॐ वासुदेवोऽवतु मे मस्तकं सशिरोरुहम् ।ह्रीं ललाटं सदा पातु लक्ष्मीविष्णुः समन्ततः ॥ १०॥ ह्सौः नेत्रेऽवताल्लक्ष्मीगोविन्दो जगतां पतिः ।ह्रीं नासां सर्वदा पातु लक्ष्मीदामोदरः प्रभुः ॥ ११॥ श्रीं मुखं सततं पातु देवो लक्ष्मीत्रिविक्रमः ।लक्ष्मी कण्ठं सदा पातु देवो लक्ष्मीजनार्दनः ॥ १२॥ नारायणाय बाहू मे पातु लक्ष्मीगदाग्रजः ।नमः पार्श्वौ सदा पातु लक्ष्मीनन्दैकनन्दनः ॥ १३॥ अं आं इं ईं पातु वक्षो ॐ लक्ष्मीत्रिपुरेश्वरः ।उं ऊं ऋं ॠं पातु कुक्षिं ह्रीं लक्ष्मीगरुडध्वजः ॥ १४॥ लृं लॄं एं ऐं पातु पृष्ठं ह्सौः लक्ष्मीनृसिंहकः ।ओं औं अं अः पातु नाभिं ह्रीं लक्ष्मीविष्टरश्रवः ॥ १५॥ कं खं गं घं गुदं पातु श्रीं लक्ष्मीकैटभान्तकः ।चं छं जं झं पातु शिश्र्नं लक्ष्मी लक्ष्मीश्वरः प्रभुः ॥ १६॥ टं ठं डं ढं कटिं पातु नारायणाय नायकः ।तं थं दं धं पातु चोरू नमो लक्ष्मीजगत्पतिः ॥ १७॥ पं फं बं भं पातु जानू ॐ ह्रीं लक्ष्मीचतुर्भुजः ।यं रं लं वं पातु जङ्घे ह्सौः लक्ष्मीगदाधरः ॥ १८॥ शं षं सं हं पातु गुल्फौ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीरथाङ्गभृत् ।ळं क्षः पादौ सदा पातु मूलं लक्ष्मीसहस्रपात् ॥ १९॥ ङं ञं णं नं मं मे पातु लक्ष्मीशः सकलं वपुः ।इन्द्रो मां पूर्वतः पातु वह्निर्वह्नौ सदावतु ॥ २०॥ यमो मां दक्षिणे पातु नैरृत्यां निरृतिश्च माम् ।वरुणः पश्चिमेऽव्यान्मां वायव्येऽवतु मां मरुत् ॥ २१॥ उत्तरे धनदः shrIlakShmInArAyaNakavacham पायादैशान्यामीश्वरोऽवतु ।वज्रशक्तिदण्डखड्ग पाशयष्टिध्वजाङ्किताः ॥ २२॥ सशूलाः सर्वदा पान्तु दिगीशाः परमार्थदाः ।अनन्तः पात्वधो नित्यमूर्ध्वे ब्रह्मावताच्च माम् ॥ २३॥ दशदिक्षु सदा पातु लक्ष्मीनारायणः प्रभुः ।प्रभाते पातु मां विष्णुर्मध्याह्ने वासुदेवकः ॥ २४॥ दामोदरोऽवतात् सायं निशादौ नरसिंहकः ।सङ्कर्षणोऽर्धरात्रेऽव्यात् प्रभातेऽव्यात् त्रिविक्रमः ॥ २५॥ अनिरुद्धः सर्वकालं विश्वक्सेनश्च सर्वतः ।रणे राजकुले द्युते विवादे शत्रुसङ्कटेॐ ह्रीं ह्सौः ह्रीं श्रीं मूलं लक्ष्मीनारायणोऽवतु ॥ २६॥ ॐॐॐरणराजचौररिपुतः पायाच्च मां केशवःह्रींह्रींह्रींहह्हाह्सौः ह्सह्सौः वह्नेर्वतान्माधवः ।ह्रींह्रींह्रींजलपर्वताग्निभयतः पायादनन्तो विभुःश्रींश्रींश्रींशशशाललं प्रतिदिनं लक्ष्मीधवः पातु माम् ॥ २७॥ इतीदं कवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम् ।लक्ष्मीनारायणस्येष्टं shrIlakShmInArAyaNakavacham चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ २८॥ सर्वसौभाग्यनिलयं सर्वसारस्वतप्रदम् ।लक्ष्मीसंवननं तत्त्वं परमार्थरसायनम् ॥ २९॥ मन्त्रगर्भं जगत्सारं रहस्यं त्रिदिवौकसाम् ।दशवारं पठेद्रात्रौ रतान्ते वैष्णवोत्तमः ॥ ३०॥ स्वप्ने वरप्रदं पश्येल्लक्ष्मीनारायणं सुधीः ।त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं कवचं मन्मुखोदितम् ॥ ३१॥ स याति परमं धाम वैष्णवं वैष्णवेश्वरः ।महाचीनपदस्थोऽपि यः पठेदात्मचिन्तकः ॥ ३२॥ आनन्दपूरितस्तूर्णं लभेद् मोक्षं स साधकः ।गन्धाष्टकेन विलिखेद्रवौ भूर्जे जपन्मनुम् ॥ ३३॥ पीतसूत्रेण संवेष्ट्य सौवर्णेनाथ वेष्टयेत् ।धारयेद्गुटिकां मूर्ध्नि लक्ष्मीनारायणं स्मरन् ॥ ३४॥ रणे रिपुन् विजित्याशु कल्याणी गृहमाविशेत् ।वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ ३५॥ सा बध्नीयान् कण्ठदेशे लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ।गुरुपदेशतो धृत्वा गुरुं ध्यात्वा मनुं जपन् ॥ ३६॥ वर्णलक्षपुरश्चर्या shrIlakShmInArAyaNakavacham फलमाप्नोति साधकः ।बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य पार्वति ॥ ३७॥ विनानेन न सिद्धिः स्यान्मन्त्रस्यास्य महेश्वरि ।सर्वागमरहस्याढ्यं तत्त्वात् तत्त्वं परात् परम् ॥ ३८॥ अभक्ताय न दातव्यं कुचैलाय दुरात्मने ।दीक्षिताय कुलीनाय स्वशिष्याय महात्मने ॥ ३९॥ महाचीनपदस्थाय दातव्यं कवचोत्तमम् ।गुह्यं गोप्यं महादेवि लक्ष्मीनारायणप्रियम् ।वज्रपञ्जरकं वर्म गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीदेवीरहस्येलक्ष्मीनारायणकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lakshmanakritam

ShrImahAlakShmI kavacham: श्रीमहालक्ष्मीकवचम्

ShrImahAlakShmI kavacham: श्रीमहालक्ष्मीकवचम् श्री गणेशाय नमः ।अस्य श्रीमहालक्ष्मीकवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दःमहालक्ष्मीर्देवता महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।इन्द्र उवाच । समस्तकवचानां तु तेजस्वि कवचोत्तमम् ।आत्मरक्षणमारोग्यं सत्यं त्वं ब्रूहि गीष्पते ॥ १॥ श्रीगुरुरुवाच । महालक्ष्म्यास्तु कवचं प्रवक्ष्यामि समासतः ।चतुर्दशसु लोकेषु रहस्यं ब्रह्मणोदितम् ॥ २॥ ब्रह्मोवाच । शिरो मे विष्णुपत्नी च ललाटममृतोद्भवा ।चक्षुषी सुविशालाक्षी श्रवणे सागराम्बुजा ॥ ३॥ घ्राणं पातु वरारोहा जिह्वामाम्नायरूपिणी ।मुखं पातु महालक्ष्मीः कण्ठं वैकुण्ठवासिनी ॥ ४॥ स्कन्धौ मे जानकी पातु भुजौ भार्गवनन्दिनी ।बाहू द्वौ द्रविणी पातु करौ हरिवराङ्गना ॥ ५॥ वक्षः पातु च श्रीर्देवी हृदयं हरिसुन्दरी ।कुक्षिं च वैष्णवी पातु नाभिं भुवनमातृका ॥ ६॥ कटिं च पातु वाराही सक्थिनी देवदेवता ।ऊरू नारायणी पातु जानुनी चन्द्रसोदरी ॥ ७॥ इन्दिरा पातु जंघे मे पादौ भक्तनमस्कृता ।नखान् तेजस्विनी पातु सर्वाङ्गं करुणामयी ॥ ८॥ ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं निर्मितं कवचं श्रियः ।ये पठन्ति महात्मानस्ते च धन्या जगत्त्रये ॥ ९॥ कवचेनावृताङ्गनां ShrImahAlakShmI जनानां जयदा सदा ।मातेव सर्वसुखदा भव त्वममरेश्वरी ॥ १०॥ भूयः सिद्धिमवाप्नोति पूर्वोक्तं ब्रह्मणा स्वयम् ।लक्ष्मीर्हरिप्रिया पद्मा एतन्नामत्रयं स्मरन् ॥ ११॥ नामत्रयमिदं जप्त्वा स याति परमां श्रियम् ।यः पठेत्स च धर्मात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ १२॥ ॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे इन्द्रोपदिष्टं महालक्ष्मीकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lakshmanakritam

ShrIdIpalakShmIstotram: श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रम्

ShrIdIpalakShmIstotram: श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रम् दीपस्त्वमेव जगतां दयिता रुचिस्ते,दीर्घं तमः प्रतिनिवृत्यमितं युवाभ्याम् ।स्तव्यं स्तवप्रियमतः शरणोक्तिवश्यंस्तोतुं भवन्तमभिलष्यति जन्तुरेषः ॥ दीपः पापहरो नॄणां दीप आपन्निवारकःदीपो विधत्ते सुकृतिं दीपस्सम्पत्प्रदायकः ।देवानां तुष्टिदो दीपः पितॄणां प्रीतिदायकःदीपज्योतिः परम्ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ॥ दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ॥ फलश्रुतिःया स्त्री पतिव्रता लोके गृहे दीपं तु पूरयेत् ।दीपप्रदक्षिणं कुर्यात् सा भवेद्वै सुमङ्गला ॥ इति श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Papankusha Ekadashi

Papankusha Ekadashi 2025 Date: पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, जीवन में मिलेंगे सभी सुख

Papankusha Ekadashi: सनातन धर्म में, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की सभी तिथियों का विशेष महत्व होता है, जिसमें एकादशी तिथि भी शामिल है. वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को (Papankusha Ekadashi) पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से साधक के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और सभी दुखों से छुटकारा मिलता है. इस व्रत को करने से सभी पापों से भी छुटकारा मिलता है. पापांकुशा एकादशी 03 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही विधिपूर्वक व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी व्रत करने से साधक के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और सभी दुखों से छुटकारा मिलता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी शुभ माना गया है। एकादशी के दिन महादेव की पूजा करने से जीवन खुशहाल रहता है और बिगड़े काम पूरे होते हैं। अगर आप भी शिव जी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर विशेष चीजें अर्पित करें। इससे शुभ फल की प्राप्ति होगी। पापांकुशा एकादशी 2025 कब है? (Papankusha Ekadashi 2025 Date and Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, साल 2025 में पापांकुशा एकादशी 03 अक्टूबर को मनाई जाएगी. तिथि की शुरुआत: आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 02 अक्टूबर को शाम 07 बजकर 10 मिनट पर होगी. तिथि का समापन: एकादशी तिथि का समापन 03 अक्टूबर को शाम 06 बजकर 32 मिनट पर होगा. व्रत का पारण: व्रत का पारण 04 अक्टूबर को किया जाएगा. एकादशी पर क्यों करें भगवान शिव की पूजा:Why worship Lord Shiva on Ekadashi? पापांकुशा एकादशी Papankusha Ekadashi पर मुख्य रूप से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है. लेकिन, इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना गया है. एकादशी के दिन महादेव की पूजा करने से जीवन खुशहाल रहता है, और साधक के बिगड़े काम पूरे होते हैं. अगर आप भी शिव जी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर विशेष चीजें अर्पित करनी चाहिए. इससे शुभ फल की प्राप्ति होगी. शिवलिंग पर क्या-क्या चढ़ाएं और क्या लाभ मिलेगा:What should be offered to Shivling and what will be the benefit? यदि आप भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता चाहते हैं, तो Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के दिन निम्नलिखित चीजें शिवलिंग पर अर्पित करें: 1. आर्थिक तंगी होगी दूर: कच्चे चावल (Raw Rice) अगर आप लंबे समय से आर्थिक तंगी (Financial Difficulties) का सामना कर रहे हैं, तो Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करें. इसके साथ ही, महादेव से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए कामना करें. धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और आपकी आर्थिक तंगी की समस्या दूर होती है. 2. मिलेगा मनचाहा वर: घी (Ghee) शिवलिंग पर घी अर्पित करना भी बहुत शुभ माना जाता है. एकादशी के दिन महादेव का घी से अभिषेक करने से साधक को मनचाहे वर (Desired Spouse) की प्राप्ति होती है और जीवन में सफलता (Success) मिलती है. 3. जीवन में मिलेंगे सभी सुख: गन्ने का रस (Sugarcane Juice) जीवन में सभी सुखों (All Worldly Comforts) की प्राप्ति के लिए Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के अवसर पर शिवलिंग पर गन्ने के रस से अभिषेक करें. ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को करने से साधक को जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं और उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है. भगवान शिव के मुख्य मंत्र:Main mantras of Lord Shiva शिवलिंग पर अभिषेक और पूजन करते समय आप इन पवित्र मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं: 1. शिव जी का मूल मंत्र: ॐ नमः शिवाय॥ 2. महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ 3. रूद्र मंत्र: ॐ नमो भगवते रूद्राय। 4. रूद्र गायत्री मंत्र: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

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