August 23, 2025

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ShrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम्

shrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम् मूलाधारे सुयोन्याख्ये चिदग्निवरमण्डले ।समासीनं पराशक्तिविग्रहं गणनायकम् ॥ १॥ रक्तोत्पलसमप्रख्यं नीलमेघसमप्रभम् ।रत्नप्रभालसद्दीप्तमुकुटाञ्चितमस्तकम् ॥ २॥ करुणारससुधाधारास्रवदक्षित्रयान्वितम् ।अक्षिकुक्षिमहावक्षः गण्डशूकादिभूषणम् ॥ ३॥ पाशाङ्कुशेक्षुकोदण्डपञ्चबाणलसत्करम् ।नीलकान्तिघनीभूतनीलवाणीसुपार्श्वकम् ॥ ४॥ सुत्रिकोणाख्यनीलाङ्गरसास्वादनतत्परम् ।पत्न्यालिङ्गतवामाङ्गं सप्तमातृनिषेवितम् ॥ ५॥ ब्रह्मविष्णुमहेन्द्रादिसम्प्रपूजितपादुकम् ।महद्द्वयपदोवाच्यपादुकामन्त्रसारकम् ॥ ६॥ नवावरणयज्ञाख्य वरिवस्याविधिप्रियम् ।पञ्चावरणयज्ञाख्य विधिसम्पूज्यपादुकम् ॥ ७॥ अखण्डकोटिब्रह्माण्डामण्डलेश्वरमव्ययम् ।रदनाक्षरसम्पूर्णमन्त्रराजस्वरूपिणम् ॥ ८॥ गिरिव्याहृतिवर्णात्ममन्त्रतत्वप्रदर्शकम् ।अरुणारुणतनुच्छायमहाकामकलात्मकम् ॥ ९॥ महागोप्यमहाविद्या प्रकाशितकलेवरम् ।चिच्छिवं चिद्भवं शान्तं त्रिगुणादिविवर्जितम् ॥ १०॥ अष्टोत्तरशताभिख्यकलान्यासविधिप्रियम् ।चिदाकारमहाद्वीपमध्यवाससुविग्रहम् ॥ ११॥ चिदब्धिमथनोत्पन्नचित्सारघनविग्रहम् ।वाचामगोचरं शान्तं शुद्धचैतन्यरूपिणम् ॥ १२॥ मूलकन्दस्थचिद्देशनवताण्डवपण्डितम् ।षडम्बुरुहसंस्थायिपरचिव्द्योमभासुरम् ॥ १३॥ अकारादिक्षकारान्तवर्णलक्षितचित्सुखम् ।अकाराक्षरनिर्दिष्टप्रकाशमयविग्रहम् ॥ १४॥ हकाराख्यविमर्शात्मप्रभादीप्तजगत्त्रयम् ।महाहंसजपध्यानविधिज्ञातस्वरूपकम् ॥ १५॥ सदोदितमहाप्रज्ञाकारं संसारतारकम् ।मोक्षलक्ष्मीप्रदातारं कालातीतमहाप्रभुम् ॥ १६॥ नामरूपादिसम्भिन्ननित्यपूर्णचिदुत्तमम् ।प्रत्यग्भूतमहाप्रज्ञागात्रगोचरविग्रहम् ॥ १७॥ महाकुण्डलिनीरूपं षट्च्क्रनगरेश्वरम् ।अप्राकृतमहादिव्यचैतन्यात्मस्वरूपिणम् ॥ १८॥ नादबिन्दुकलातीतं कार्यकारणवर्जितम् ।षडम्बुरुहचक्रान्तः स्फुरत्सौदामिनीप्रभम् ॥ १९॥ तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थपरिबोधनपण्डितम् ।ब्रह्मादिकीटपर्यन्तव्याप्तसंवित्सुधारसम् ॥ २०॥ इच्छाज्ञानक्रियानन्दसर्वतन्त्र स्वतन्त्रिणम् ।हृदयग्रन्थिभिद्विद्यादर्शनोत्सुकमानसम् ॥ २१॥ पञ्चकृत्यपरेशानं महात्रैपुरविग्रहम् ।श्रीचक्रराजमध्यस्थशून्यग्राममहेश्वरम् ॥ २२॥ ब्रह्मविद्यास्वरूपश्रीललितारूपधारिणम् ।वशिन्याद्यावृतं साध्यं अद्वयानन्दवर्धनम् ॥ २३॥ आदिशङ्कररूपेशदक्षिणामूर्तिपूजितम् ।असंस्पृष्टमहाप्रज्ञाभिख्याद्वैतस्थितिप्रभम् ॥ २४॥ एवं सञ्चितयेद्देवं उच्छिष्टगणनायकम् ।नीलतारासमेतं तु सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥ २५॥

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Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः

Uchchishta Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः श्री गणेशाय नमः ।देव्युवाच ।पूजान्ते ह्यनया स्तुत्या स्तुवीत गणनायकम् ।नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम् ।गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभवासनं च ॥ १॥ केयुरिणंहारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानि ।सृणिं च हस्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम् ॥ २॥ सृणिंवहन्तं षडक्षरात्मानमनल्पभूषं मुनीश्वरैर्भार्गवपूर्वकैश्च ।संसेवितं देवमनाथकल्पं रूपं मनोज्ञं शरणं प्रपद्ये ॥ ३॥ वेदान्तवेद्यं जगतामधीशं देवादिवन्द्यं सुकृतैकगम्यम् ।स्तम्बेरमास्यं ननु चन्द्रचूडं विनायकं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ४॥ नव चन्द्रचूडं भवाख्यदावानलदह्यमानं भक्तं स्वकीयं परिषिञ्चते यः ।गण्डस्रुताम्भोभिरनन्यतुल्यं वन्दे गणेशं च तमोऽरिनेत्रम् ॥ ५॥ तमालनीलम् शिवस्य मौलाववलोक्य चन्द्रं सुशुण्डया मुग्धतया स्वकीयम् ।भग्नं विषाणं परिभाव्य चित्ते आकृष्टचन्द्रो गणपोऽवतान्नः ॥ ६॥ पितुर्जटाजूटतटे सदैव भागीरथीं तत्र कुतूहलेन । विलोक्य भागीरथींविहर्तुकामः स महीध्रपुत्र्या निवारितः पातु सदा गजास्यः ॥ ७॥ लम्बोदरो देवकुमारसङ्घैः क्रीडन्कुमारं जितवान्निजेन ।करेण चोत्तोल्य ननर्त रम्यं दन्तावलास्यो भयतः स पायात् ॥ ८॥ आगत्य योच्चैर्हरिनाभिपद्मं ददर्श तत्राशु करेण तच्च ।उद्धर्तुमिच्छन्विधिवादवाक्यं मुमोच भूत्वा चतुरो गणेशः ॥ ९॥ विधिचाटुवाक्यंनिरन्तरं संस्कृतदानपट्टे लग्नां तु गुञ्जद्भ्रमरावलीं वै ।तं श्रोत्रतालैरपसारयन्तं स्मरेद्गजास्यं निजहृत्सरोजे ॥ १०॥ विश्वेशमौलिस्थितजह्नुकन्याजलं गृहीत्वा निजपुष्करेण ।हरं सलीलं पितरं स्वकीयं प्रपूजयन्हस्तिमुखः स पायात् ॥ ११॥ स्तम्बेरमास्यं घुसृणाङ्गरागं सिन्दूरपूरारुणकान्तकुम्भम् ।कुचन्दनाश्लिष्टकरं गणेशं ध्यायेत्स्वचित्ते सकलेष्टदं तम् ॥ १२॥ स भीष्ममातुर्निजपुष्करेण जलं समादाय कुचौ स्वमातुः ।प्रक्षालयामास षडास्यपीतौ स्वार्थं मुदेऽसौ कलभाननोऽस्तु ॥ १३॥ सिञ्चाम नागं शिशुभावमाप्तं केनापि सत्कारणतो धरित्र्याम् ।वक्तारमाद्यं नियमादिकानां लोकैकवन्द्यं प्रणमामि विघ्नम् ॥ १४॥ विघ्नं विघ्ननाशनमित्यर्थः आलिङ्गितं चारुरुचा मृगाक्ष्या सम्भोगलोलं मदविह्वलाङ्गम् ।विघ्नौघविध्वंसनसक्तमेकं नमामि कान्तं द्विरदाननं तम् ॥ १५॥ हेरम्ब उद्यद्रविकोटिकान्तः पञ्चाननेनापि विचुम्बितास्यः ।मुनीन्सुरान्भक्तजनांश्च सर्वान्स पातु रथ्यासु सदा गजास्यः ॥ १६॥ द्वैपायनोक्तानि स निश्चयेन स्वदन्तकोट्या निखिलं लिखित्वा । द्वैपायनोक्तं सुविचार्य येनदन्तं पुराणं शुभमिन्दुमौलिस्तपोभिरुग्रं मनसा स्मरामि ॥ १७॥ सुतमिन्दुमौलेस्तमग्र्यरूपं क्रीडातटान्ते जलधाविभास्ये वेलाजले लम्बपतिः प्रभीतः ।विचिन्त्य कस्येति सुरास्तदा तं विश्वेश्वरं वाग्भिरभिष्टुवन्ति ॥ १८॥ वाचां निमित्तं स निमित्तमाद्यं पदं त्रिलोक्यामददत्स्तुतीनाम् ।सर्वैश्च वन्द्यं न च तस्य वन्द्यः स्थाणोः परं रूपमसौ स पायात् ॥ १९॥ इमां स्तुतिं यः पठतीह भक्त्या समाहितप्रीतिरतीव शुद्धः ।संसेव्यते चेन्दिरया नितान्तं दारिद्र्यसङ्घं स विदारयेन्नः ॥ २०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे हरगौरीसंवादेउच्छिष्टगणेशस्तोत्रं समाप्तम् ॥ विनायकलीलास्तुतिः

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Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

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Durva Ashtami

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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