October 1, 2024

NAVRATRI-दुर्गा सप्तशती चतुर्थ अध्याय चंड-मुंड का वध DURGA SAPTASHATI

दुर्गा सप्तशती का चतुर्थ अध्याय, जिसे “स्तुति और आशीर्वाद” का अध्याय भी कहा जाता है, देवी दुर्गा की महिमा और उनके द्वारा राक्षसों के वध के बाद देवताओं द्वारा की गई स्तुति पर केंद्रित है। इस अध्याय में प्रमुख असुर चंड और मुंड का वध होता है, और देवी चामुंडा के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। इसके बाद देवता देवी की स्तुति करते हैं और देवी उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं। दुर्गा सप्तशती चतुर्थ अध्याय का विस्तृत सार चंड-मुंड का वध (Killing of Chanda and Munda) दुर्गा सप्तशती असुरराज शुंभ और निशुंभ के आदेश से, उनके सेनापति चंड और मुंड देवी दुर्गा पर आक्रमण करने के लिए निकलते हैं। जब चंड और मुंड अपनी विशाल सेना लेकर देवी के पास पहुँचते हैं, तो देवी ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया। इस रौद्र रूप में देवी काली (या चामुंडा) का अवतार लेती हैं और अत्यंत क्रोध में आकर दोनों असुरों का वध कर देती हैं। श्लोक (Slokas related to the Killing of Chanda and Munda): प्रच्छाद्य चा चण्डमुण्डं महागजौ। जगाम दुष्टौ निहन्तुं महाबलौ। अर्थ: “देवी ने चंड और मुंड, जो बड़े गज (हाथी) के समान ताकतवर थे, को ढँक कर उनका संहार कर दिया।” चण्डं च मुण्डं च तया हतौ ततः। सा चामुण्डेति विख्याता भवेद्ध्यतः।। अर्थ: “चंड और मुंड के वध के बाद, देवी का नाम चामुंडा पड़ा, क्योंकि उन्होंने उन दोनों असुरों का वध किया था।” देवताओं द्वारा स्तुति (Praise by the Gods) चंड और मुंड के वध के बाद, सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी की स्तुति करने लगे। उन्होंने देवी की महिमा का गुणगान किया और उन्हें संसार की अधिष्ठात्री शक्तियों में से सबसे महत्वपूर्ण मानकर उनकी स्तुति की। देवी की स्तुति से जुड़े कुछ प्रमुख श्लोक (Important Slokas from the Praise of the Goddess): या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में बुद्धि रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” इस स्तुति में सभी देवताओं ने देवी को नमस्कार किया और कहा कि वे ही संसार के समस्त जीवों की रक्षक हैं। उनकी शक्ति और बुद्धि से ही संसार का संचालन होता है। देवताओं को आशीर्वाद (Blessings to the Gods) देवी की स्तुति से प्रसन्न होकर, उन्होंने देवताओं को आशीर्वाद दिया और उन्हें संकटों से मुक्त किया। उन्होंने कहा कि जब भी कोई असुर या अन्य संकट उत्पन्न होगा, वे स्वयं प्रकट होकर उनकी रक्षा करेंगी। इसके साथ ही, देवी ने यह भी कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करेगा, वह सभी संकटों से मुक्त होगा। वेदाहं सम्प्रतीतानि, वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ अर्थ: “मैं भूत, वर्तमान और भविष्य की सभी घटनाओं को जानती हूं, लेकिन मुझे कोई नहीं जान सकता।” चतुर्थ अध्याय के प्रमुख बिंदु (Key Takeaways from Fourth Chapter) चतुर्थ अध्याय का महत्व (Importance of Fourth Chapter) चतुर्थ अध्याय के मुख्य मंत्र (Main Mantras from Fourth Chapter) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह महामंत्र देवी चामुंडा की शक्ति का आह्वान करता है और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। यह मंत्र देवी की शक्ति को समर्पित है और उनकी सर्वव्यापी ऊर्जा का गुणगान करता है। चतुर्थ अध्याय से प्राप्त शिक्षा (Lessons from the Fourth Chapter) दुर्गा सप्तशती

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NAVRATRI-दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय धूम्रलोचन का अत्याचार Durga Saptashati

दुर्गा सप्तशती का तृतीय अध्याय देवी दुर्गा के अद्वितीय पराक्रम और उनके द्वारा असुरों के सेनापति धूम्रलोचन के वध का वर्णन करता है। यह अध्याय दिखाता है कि देवी दुर्गा केवल युद्ध कौशल में निपुण नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं सत्य और धर्म की अधिष्ठात्री हैं। इस अध्याय में असुरों द्वारा पुनः देवताओं पर आक्रमण का प्रयास किया जाता है, लेकिन देवी दुर्गा उन्हें अपनी महाशक्ति से नष्ट कर देती हैं। दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय का विस्तृत सार धूम्रलोचन का अत्याचार (Dhumralochan’s Attack) महिषासुर के वध के बाद, असुरों के शेष बचे अनुयायी और सेनापति अत्यंत क्रोधित थे। उनमें से एक असुर सेनापति धूम्रलोचन था। उसे असुरराज शुंभ और निशुंभ ने देवी दुर्गा को पराजित करने का आदेश दिया। धूम्रलोचन अपने विशाल सेना के साथ देवी पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा। उसने देवी को बंदी बनाने का प्रयास किया, लेकिन देवी दुर्गा की शक्ति के आगे वह असफल रहा। धूम्रलोचन और देवी का सामना (Dhumralochan Faces Devi Durga) जब धूम्रलोचन ने देवी से युद्ध करना चाहा, तो देवी दुर्गा ने अपनी दृष्टि मात्र से ही उसे भस्म कर दिया। यह देवी के “तृतीय नेत्र” की शक्ति थी, जो अत्यंत क्रोध में खुलकर प्रकट हुई थी। धूम्रलोचन के वध के बाद, उसकी सेना ने देवी पर आक्रमण किया, लेकिन देवी के वाहन सिंह ने असुरों की पूरी सेना को नष्ट कर दिया। श्लोक और मंत्र (Mantras and Shlokas from Third Chapter) तृतीय अध्याय में कई महत्वपूर्ण श्लोक और स्तुति प्रस्तुत किए गए हैं, जो देवी दुर्गा की शक्ति और पराक्रम का वर्णन करते हैं। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि। महिषासुरं वदेत्याहं पुनः शत्रून् जहि॥ अर्थ: “हे देवी, हमें रूप, विजय, यश और शत्रुओं का नाश प्रदान करें। महिषासुर के बाद अब शत्रुओं को नष्ट करें।” या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” धूम्रलोचन का वध (Dhumralochan’s Death by Goddess Durga) धूम्रलोचन जब देवी के सामने आता है, तो वह अत्यंत घमंड में होता है। वह देवी को बंदी बनाना चाहता है, लेकिन देवी की महाशक्ति के सामने वह असहाय हो जाता है। देवी ने मात्र एक दृष्टि से ही धूम्रलोचन का वध कर दिया। इस घटना ने सभी असुरों में भय फैला दिया और उन्हें अहसास हो गया कि देवी से पार पाना असंभव है। ततस्तं धूम्रलोचनं बलं चाशेषमर्दयत्। क्रोधसंवर्तया दृष्ट्या सा चासौ साग्निना हता।। अर्थ: “फिर देवी ने अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टि से धूम्रलोचन और उसकी सेना का संहार किया, और वे सब भस्म हो गए।” असुरों की सेना का नाश (Destruction of Dhumralochan’s Army) धूम्रलोचन के वध के बाद, उसकी सेना ने देवी पर हमला किया। लेकिन देवी दुर्गा के वाहन सिंह ने उन असुरों को मारकर नष्ट कर दिया। देवी ने अपने सिंह के साथ युद्ध में अद्वितीय कौशल दिखाया और असुरों की पूरी सेना का संहार कर दिया। देवी सिंह समारूढा शङ्खचक्रगदाधरा। असुराणां क्षयं कर्तुं देवी समुपकल्पिता।। अर्थ: “देवी दुर्गा अपने सिंह पर सवार होकर, शंख, चक्र, गदा आदि अस्त्रों से सुसज्जित होकर असुरों का विनाश करने के लिए तैयार हो गईं।” तृतीय अध्याय के प्रमुख बिंदु (Key Takeaways from Third Chapter) तृतीय अध्याय का महत्व (Importance of Third Chapter) दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय के मुख्य मंत्र (Main Mantras from Third Chapter) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह महामंत्र देवी दुर्गा की शक्तियों को आह्वान करता है और भक्तों को भयमुक्त एवं शक्तिशाली बनाता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” तृतीय अध्याय से प्राप्त शिक्षा (Lessons from the Third Chapter) दुर्गा सप्तशती

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Karwa Chauth 2024 Date: करवा चौथ कब है? 21 मिनट के लिए लगेगी भद्रा, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, चांद निकलने का समय

Karwa Chauth 2024:करवा चौथ हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह व्रत पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाता है। करवा चौथ विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है, लेकिन अब यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुका है। Karwa Chauth 2024 करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले “सारगी” खाती हैं और दिन भर निर्जला उपवास रखती हैं। व्रत का समापन रात में चंद्रमा को देखकर और अर्घ्य देकर किया जाता है। इस व्रत का खास महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसे वैवाहिक जीवन के प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। Karwa Chauth 2024:करवा चौथ 2024 की तारीख साल 2024 में करवा चौथ 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह दिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है। चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 20 अक्टूबर 2024 को सुबह 9:30 बजे होगा और इसका समापन 21 अक्टूबर 2024 को सुबह 9:59 बजे होगा। इसलिए, 20 अक्टूबर को करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा। भद्रा काल का प्रभाव ज्योतिषीय दृष्टि से, चतुर्थी तिथि पर भद्रा का समय विशेष ध्यान देने योग्य होता है। भद्रा को शुभ कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है, और इसके दौरान पूजा करना वर्जित होता है। इस साल करवा चौथ पर भद्रा का समय भी आ रहा है, जो 21 मिनट का रहेगा। भद्रा काल शाम 6:08 बजे से 6:29 बजे तक रहेगा। इस दौरान पूजा करना वर्जित होगा। Karwa Chauth 2024 इसलिए, महिलाओं को इस समय के बाद ही पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भद्रा समाप्त होते ही पूजा शुरू की जा सकती है। Puja Muhurat:पूजा का शुभ मुहूर्त करवा चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त भद्रा के समाप्त होने के बाद शुरू होगा। इस साल Karwa Chauth 2024 करवा चौथ की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय शाम 6:29 बजे से रात 7:45 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा करेंगी और करवा चौथ की कथा सुनेंगी। पूजा में भगवान गणेश और माता पार्वती की आराधना के साथ-साथ करवा माता को विशेष रूप से पूजा जाता है। करवा एक मिट्टी का पात्र होता है, जिसे जल से भरकर पूजा में रखा जाता है और अंत में चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए उपयोग किया जाता है। Diwali 2024: 31 अक्टूबर या 01 नवंबर, कब है दिवाली? यहां दूर होगी असमंजस की स्थिति Karwa Chauth 2024 Date:चंद्रमा निकलने का समय करवा चौथ के व्रत का समापन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद होता है। Karwa Chauth 2024 इस दिन महिलाएं चंद्रमा के दर्शन के बाद ही अपना व्रत तोड़ती हैं। साल 2024 में चंद्रमा के उदय होने का समय रात 8:11 बजे रहेगा। इसके बाद महिलाएं चंद्रमा को जल अर्पित करके अपने व्रत का समापन करेंगी और फिर पति के हाथों से जल ग्रहण करके व्रत तोड़ेंगी। Karwa Chauth 2024 Puja Vidhi:करवा चौथ की पूजा विधि उपसंहार करवा चौथ Karwa Chauth 2024 विवाहित महिलाओं के लिए एक विशेष त्यौहार है, जो उनके पति के प्रति उनके प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। 2024 में करवा चौथ 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, और पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:29 बजे से रात 7:45 बजे तक रहेगा। चंद्रमा का उदय रात 8:11 बजे होगा, और इस समय के बाद महिलाएं अपना व्रत खोलेंगी। भद्रा काल के दौरान पूजा नहीं करनी चाहिए, इसलिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Diwali 2024: 31 अक्टूबर या 01 नवंबर, कब है दिवाली? यहां दूर होगी असमंजस की स्थिति

Diwali 2024:दिवाली 2024 का इंतजार हर कोई कर रहा है, क्योंकि यह हिंदू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस साल एक सवाल जो लोगों के मन में है, वह है कि दिवाली 2024 में 31 अक्टूबर को मनाई जाएगी या 1 नवंबर को। इस प्रकार की असमंजस की स्थिति अक्सर पंचांग और तिथियों के भिन्न-भिन्न गणना के कारण उत्पन्न होती है, लेकिन आइए इसे स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास करते हैं। Diwali 2024 Subh Muhurat:दिवाली का शुभ मुहूर्त 01 नवंबर को मां लक्ष्मी की पूजा (Diwali 2024 Shubh Muhurat) करने का शुभ मुहूर्त संध्याकाल 05 बजकर 36 मिनट से लेकर 06 बजकर 16 मिनट तक है। इस दौरान आप मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं। Diwali ka Importance:दिवाली का महत्व दिवाली, जिसे “दीपावली” के नाम से भी जाना जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन भगवान राम के अयोध्या लौटने और रावण पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में दीप जलाए जाते हैं। साथ ही, माता लक्ष्मी की पूजा भी इस दिन की जाती है, जो धन, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती हैं। दिवाली का मुख्य दिन लक्ष्मी पूजा का होता है, जो अमावस्या की रात को आता है। Kab hai diwali 2024:31 अक्टूबर या 1 नवंबर, कब है दिवाली? diwali 2024 में दिवाली को लेकर कुछ संशय इसलिए है क्योंकि पंचांगों में तिथियों को लेकर मतभेद है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर 2024 को रात में 1:40 बजे से शुरू होगी और 1 नवंबर 2024 को रात में 1:06 बजे समाप्त होगी। इस कारण कुछ लोग 31 अक्टूबर को दिवाली मनाने की बात कर रहे हैं, जबकि अन्य 1 नवंबर को लक्ष्मी पूजा का दिन मान रहे हैं। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब अमावस्या तिथि दो दिनों में फैली होती है। ऐसे में यह निर्णय लिया जाता है कि किस दिन अमावस्या का अधिक प्रभाव है और पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा है। ज्यादातर जगहों पर, दिवाली उस दिन मनाई जाती है जब सूर्यास्त के समय अमावस्या होती है। इस हिसाब से Diwali 2024 1 नवंबर को लक्ष्मी पूजा के लिए अधिक मान्यता दी जा रही है। Kis din Manaye Diwali:किस दिन मनाएं दिवाली? धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषियों की राय के अनुसार, 1 नवंबर 2024 को दिवाली Diwali 2024 मनाना अधिक उपयुक्त होगा। इस दिन अमावस्या तिथि पूरे दिन रहेगी, और शाम को लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त भी मिलेगा। हालांकि, 31 अक्टूबर को भी कुछ लोग दीपावली मना सकते हैं, लेकिन मुख्य पूजा और अनुष्ठान 1 नवंबर को ही किए जाएंगे। Diwali 2024 puja vidhi:दिवाली की पूजा विधि दिवाली के दिन शाम को मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। घरों को दीपों से सजाया जाता है, ताकि मां लक्ष्मी का वास हो और समृद्धि का आशीर्वाद मिले। इस दिन विशेष रूप से साफ-सफाई का महत्व होता है, क्योंकि इसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय लक्ष्मी स्तोत्र, गणेश वंदना और विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जाता है। उपसंहार दिवाली 2024 में कुछ भ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न हो रही है क्योंकि अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर और 1 नवंबर दोनों दिन पड़ रही है। लेकिन ज्योतिषीय गणना और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर 1 नवंबर 2024 को दिवाली मनाना सबसे सही रहेगा। इस दिन अमावस्या का पूरा प्रभाव रहेगा, और लक्ष्मी पूजा का सही मुहूर्त भी उपलब्ध होगा। diwali mai puja kaise kare:ऐसे करें पूजा Diwali me kya karna chahiye:करें ये कार्य Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Shardiya Navratri 2024 Date: कब से शुरू हो रही शारदीय नवरात्रि? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और महत्व

Shardiya Navratri 2024 Date: शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। इन दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत पूजा करने का विधान है। जानें सही तिथि Shardiya Navratri 2024:शारदीय नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक प्रमुख त्यौहार है, जो देवी दुर्गा की आराधना के लिए समर्पित है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसे पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि 2024 की तारीख 3 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक है। यह त्यौहार 9 दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। Shardiya Navratri 2024:शारदीय नवरात्रि का महत्व शारदीय नवरात्रि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत बड़ा है। यह पर्व शक्ति की देवी दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। नवरात्रि का अर्थ होता है ‘नौ रातें’, और इन नौ रातों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, क्योंकि इसी समय मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध किया था। इन नौ दिनों में साधक विशेष व्रत, उपवास और ध्यान के माध्यम से आत्मशुद्धि करते हैं और देवी की कृपा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि की तिथियाँ 2024 2024 में शारदीय नवरात्रि 3 अक्टूबर से शुरू होगी और 11 अक्टूबर को समाप्त होगी। इस दौरान हर दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाएगी। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि व्रत और पूजा विधि नवरात्रि के दौरान भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं। यह उपवास शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान भक्त सिर्फ फलाहार और दूध का सेवन करते हैं और अनाज, प्याज, लहसुन से परहेज करते हैं। प्रत्येक दिन की पूजा में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है और मां दुर्गा की आरती की जाती है। पूजा के अंत में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जिसमें छोटी बच्चियों को देवी का रूप मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराकर आशीर्वाद लिया जाता है। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि के अंतिम दिन और दशहरा शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के उपरांत दशमी के दिन दशहरा या विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन भगवान राम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। इस दिन रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। Shardiya Navratri 2024:किस पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा धरती पर ही वास करती हैं। ऐसे में वह किसी न किसी वाहन में सवार होकर आती हैं और वापसी भी इसी तरह करती हैं। श्लोक शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे।गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ देवी भागवत पुराण के इस श्लोक के अनुसार, वार के अनुसार देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन का निर्णय लिया जाता है। अगर नवरात्रि सोमवार या रविवार को होती है, तो मां हाथी में , मंगलवार या शनिवार को घोड़ा।शुक्रवार को मां डोली और गुरुवार को डोली में आती हैं। इसके साथ ही बुधवार के दिन आती है, तो नौका में सवार होकर आती हैं। बता दें कि इस बार शारदीय नवरात्रि गुरुवार के दिन शुरू हो रही है। इसलिए मां का आगमन डोली से हो रहा है। मान्यता है कि मां का डोली से आना सुख-समृद्धि लेकर आता है। समापन शारदीय नवरात्रि 2024 का समय देवी दुर्गा की आराधना, साधना और आत्मचिंतन का महत्वपूर्ण समय होगा। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में शुद्धता, सत्य और धर्म का मार्ग अपनाकर हम किसी भी प्रकार की बुराई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

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