June 20, 2023

शिव पार्वती विवाह की कथा

शिव विवाह कथा को भारत की आध्यात्मिक कथाओं में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शिव विवाह में पार्वती के पिता शिव का वंश जानना चाहते थे। फिर शिव ने क्या जवाब दिया? कथा में बताया गया है कि शिव मौन बैठे रहे। पार्वती के पिता ने सोचा कि ये अपने कुल वंश के बारे में भी नहीं जानते। पढ़िए आगे की कथा भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ… हे भरद्वाजजी, त्रेता युग में एक बार भगवान शिव जी और उनकी धर्मपत्ना सती की कथा श्रवण की इच्छा हुई। वह दोनों कैलास से नीचे उतरे तथा अगत्स्य ऋषि के आश्रम में आए। अगत्स्य ऋषि ने शिव जी और सती का सम्मान करके पूजा की। शिव जी ने सोचा यह सन्त कितने सरल हैं। मैं इनके पास कथा श्रवण हेतु आया हूं, और यह वक्ता बनकर कथा कहेंगे। नियमानुसार तो श्रोता को वक्ता की पूजा करनी चाहिए। किन्तु धन्य है इस सन्त को कि वक्ता होने पर भी ये श्रोता की पूजा करते हैं। शिव जो ने अगत्स्यजी के भाव का सच्चा अर्थ किया। किन्तु शिव जी की पूजा करके अगत्स्यजी जब सतीकी पूजा करने लगे तब सती ने इसका गलत अर्थ किया। उन्होंने सोचा हम आए और अगत्स्यजा लगे बस करने हमारी पूजा। जो आदमी खुद घबरा गया वह कथा क्या कहेगा?  दक्ष की बेटी बुद्धिमान बाप की कन्या है। सती में बुद्धि तत्व अधिक काम कर रहा था, अतः उन्होंने पूजा का गलत अर्थ किया। सती में यदि सच्चा राम प्रेम होता तो वह कभा ऐसा विचार नहीं करती। भगवान शिव की शादी में आए हर तरह के प्राणी जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे। उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो शिव का विवाह था, इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। यह एक शाही शादी थी, एक राजकुमारी की शादी हो रही थी, इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था। भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे। सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र अवस्थाओं में लग रहे थे। भगवान शिव ने धारण किया मौन फिर पार्वती के पिता पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे। समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीची जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।’ नारद मुनि ने इशारे से बात समझानी चाही फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे – टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूं? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, ‘वर के माता-पिता नहीं हैं।’ राजा ने पूछा, ‘क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?’ नारद

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नर और नारायण की कहानी जानना जरूरी है

परमेश्वर सदाशिव (शिव, शंकर, रुद्र या महेश नहीं) के तीन प्रकट रूपों में से प्रथम भगवान विष्णु के 24 अवतार माने गए हैं, उनमें से ही दो अवतार हैं- नर और नारायण। हम जिन्हें नारायण कहते हैं वे विष्णु के अवतार हैं। उनका भजन भी आपने सुना होगा- श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि। तेरी लीला सबसे न्यारी न्यारी, हरि हरि। नर और नारायण की कहानी को जानना जरूरी है। यहां उनके जीवन की कहानी नहीं बल्कि संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। इन्हीं दो भाइयों के कारण धर्म और सत्य का भारत में विस्तार हुआ। अधिकतर हिन्दू इनकी कथा को नहीं जानते और वे यह मानते हैं कि ये विष्णु ही है। अवतार का अर्थ किसी में विष्णु का अवतरण होना। भगवान राम भी विष्णु के अवतार थे लेकिन वे स्वयं विष्‍णु नहीं थे। वे भी ‍ब्रह्मा और वशिष्ठ की अनुशंसा पर विष्णु के अवतार घोषित किए गए थे। अर्थात राम एक माध्यम थे और विष्णु ने उनमें उतरकर लीला रची थी। अवतार का अर्थ किसी में किसी दूसरे का अवतरण होना। हालांकि कुछ अवतारों में विष्णु स्वयं प्रकट हैं। 24 अवतारों का क्रम निम्न है-1.आदि परषु, 2.चार सनतकुमार, 3.वराह, 4.नारद, 5.नर और नारायण, 6.कपिल, 7दत्तात्रेय, 8.याज्ञ, 9.ऋषभ, 10.पृथु, 11.मतस्य, 12.कच्छप, 13.धनवंतरी, 14.मोहिनी, 15.नृसिंह, 16.हयग्रीव, 17.वामन, 18.परशुराम, 19.व्यास, 20.राम, 21.बलराम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि। भगवान ब्रह्मा के पुत्र धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से श्रीहरि विष्णु ने नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। जन्म लेते ही वे बदरीवन में तपस्या करने के लिए चले गए। उसी बदरीवन में आज बद्रीकाश्रम बना है। वहीं नर और नारायण नामक दो पहाड़ है। वहीं पास में केदारनाथ का पवित्र शिवलिंग है जिसे नर और नारायण ने मिलकर ही स्थापित किया था। यह लगभग 8 हजार ईसा पूर्व की बात है। नर और नारायण की तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार हुआ। आज भी केदानाथ और बद्रीकाश्रम में भगवान नर-नारायण निरन्तर तपस्या में रत रहते हैं। इन्होंने ही द्वापर में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतार लेकर लीला रची थी। लीला का अर्थ नाटक नहीं होता। उनकी तपस्या को देखकर देवराज इंद्र ने दी जब चुनौती… एक बार नर और नारायण की तपस्या को देखकर देवराज इंद्र ने सोचा कि ये तप के द्वारा मेरे इंद्रासन को लेना चाहते हैं। ऐसे सोचकर इंद्र ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव, वसंत तथा अप्सराओं को भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, ‘तुम लोग  मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।’ यहां बजरंगबली भगवान शिव को अपने कंधे पर लाए थे भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। नर नारायण ने कहा- ‘तुम इन स्त्रियों में से किसी एक को मांगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो, वह स्वर्ग के लिए भूषण स्वरूप होगी।’ उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र चकित और भयभीत हो गए। इंद्र को श्री नर और नारायण के प्रति अपनी दुर्भावना और दुष्कृति पर विशेष पश्चाताप हुआ। महाभारत के अनुसार केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम के दो भाइयों ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी। केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की कथा शिव पुराण में तब आती है जब नर और नारायण शिव की अराधना कर रहे होते हैं। भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें। नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो। नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए। दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है। महाभारत अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

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