June 15, 2023

भगवान श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा पढ़ने और सुनने से मिलता है कई गुना पुण्य फल

महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम राम चन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ राम चन्द्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरूप अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था।

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हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा

महाबली हनुमान के नाम लेने से ही सभी कष्ट दूर हो जाते है। संकटमोचन हनुमान का सुमिरन करने से न सिर्फ भय, बल्कि सभी प्रकार के संकट भी छू-मंतर हो जाते है। बजरंगबली की महिमा से तो हम सभी भली-भांति परिचित है, लेकिन क्या आप हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा जानते है? हनुमान जी भगवान शिव के 11 वें रुद्र के रूप में जाने जाते है। आपको बता दें, रामचरितमानस में बजरंगबली के जन्म के बारे में वर्णन किया गया है। माना जाता है की हनुमान जी का जन्म ऋषियों-मुनियों द्वारा दिए गए वरदान से हुआ था, ऐसे में आइये विस्तार से जानते है हनुमान जी के धरती पर अवतरित होने की कथा। ऋषियों द्वारा वरदान प्राप्ति पवनसुत हनुमान का जन्म मंगलवार के दिन चैत्र माह की पूर्णिमा को हुआ था। हनुमान जी के पिता का नाम वानरराज केसरी था, वहीं माता का नाम अंजनी था। वेद पुराणों में ऐसा बताया जाता है की जब एक बार वानरराज केसरी प्रभास नामक तीर्थ स्थान पर गए, तब उन्होंने देखा की वहां समुद्र के किनारे बैठ कुछ ऋषि गण पूजन कर रहे है। वे सभी शांति से पूजा-पाठ कर ही रहे थे, की इतनी देर में वहां एक विशाल हाथी आ पहुंचा। वह हाथी उपद्रव मचाने लगा जिसके कारण ऋषियों के पूजा में खलल पड़ गया। राजा केसरी पर्वत पर बैठकर यह पूरा दृश्य देख रहे थे और यह देखकर वह तुरंत ऋषियों की मदद के लिए वहां पहुंचे। वानरराज ने उस उपद्रवी हाथी के दांत तोड़ कर उसे मौत के घाट उतार दिया। जिसके बाद वहां मौजूद समस्त ऋषि गण वानरराज केसरी से बहुत अधिक प्रसन्न हुए। उनके कार्य से प्रसन्न होकर ऋषियों ने उन्हें रूप बदलने वाले, वायु के समान तेज और बुद्धिवान पुत्र होने का वरदान दिया। भगवान शिव रूप में लिया था जन्म एक और कथा के अनुसार बताया जाता है की जब माता अंजनी सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए रुकी तो अचानक से बहुत तेज हवा चलने लगी। जब माता अंजनी ने अपने आस पास देखा तो उन्हें अहसास हुआ की यह सामान्य हवा नहीं है बल्कि कोई अपनी मायावी शक्तियों से हवा को उनकी ओर प्रवाहित कर रहा है। उन्होंने यह पता लगाने के लिए अपने चारों ओर देखा पर उन्हें वहां कोई भी नज़र नहीं आया, इसके बाद माता अंजनी क्रोधित हो गयी और उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा की आखिर ऐसा कौन व्यक्ति है जो एक पतिव्रता स्त्री का अपमान करने का दुस्साहस कर रहा है? उनके यह कहने के बाद वहां पवन देव प्रकट हुए और माता अंजनी से क्षमा मांगने लगे। पवन देव ने कहा- “मुझे क्षमा कर दीजिये, लेकिन आपके पति को ऋषि गणों ने मेरे समान पुत्र होने का वरदान दिया था इसी कारण मुझे यहां प्रकट होना पड़ा। मेरे अंश के माध्यम से अब आपको एक पराक्रमी और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। मेरे स्पर्श से भगवान रूद्र बालक के रूप में प्रविष्ट हुए है जो की आपके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।” इसी प्रकार भगवान शिव के रूद्र अवतार ने माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया और यही कारण है की हनुमान जी को अंजनी पुत्र और केसरी नंदन के नाम से भी जाना जाता है।

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