May 28, 2023

कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा | कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, कार्तिक संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कहलाता है। इसे करवा चतुर्थी भी कहते हैं । इस दिन ‘पिंग’ गणेश की पूजा की जाती है । सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन अपने पति के लम्बी उम्र के लिये व्रत रखती है। गणेश जी को करवा अर्पित करती हैं। यह व्रत स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य प्रदान करती है। इस व्रत से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा महसूस करे, तो गणेश चतुर्थी का व्रत करें । इससे कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है । कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा  पार्वती जी कहती है कि हे भाग्यशाली! लम्बोदर! भाषणकर्ताओं में श्रेष्ठ! कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को किस नाम वाले गणेश जी की पूजा किस भांति करनी चाहिए। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अपनी माता की बात सुनकर गणेश जी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का नाम संकटा है। उस दिन पिंग नामक गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। पूजन पूर्वोक्त विधि से करना उचित हैं। भोजन एक बार करना चाहिए। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिए। मैं इस व्रत का महात्म्य कह रहा हूँ, सावधानी पूर्वक श्रवण कीजिये। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को घी और उड़द मिलाकर हवन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि वृत्रासुर दैत्य ने त्रिभुवन को जीत करके सम्पूर्ण देवों को परतंत्र कर दिया। उसने देवताओं को उनके लोकों से निष्काषित कर दिया। परिणामस्वरूप देवता लोग दसों दिशाओं में भाग गए। तब सभी देव इंद्र के नेतृत्व में भगवान विष्णु के शरणागत हुए। देवों की बात सुनकर विष्णु ने कहा कि समुद्री द्वीप में बसने के कारण वे निरापद होकर बलशाली हो गए हैं। पितामह ब्रह्मा जी से किसी देवों के द्वारा न मरने का उन्होंने वर प्राप्त कर लिया हैं। अतः आप लोग अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करे। वे मुनि समुद्र को पी जाएंगे। तब दैत्य लोग अपने पिता के पास चले जाएंगे। आप लोग सुख पूर्वक स्वर्ग में निवास करने लगेंगे। अतः आप लोगों का कार्य अगस्त्य मुनि की सहायता से पूरा होगा। ऐसा सुनकर सब देवगण अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये और स्तुति के द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि हे देवताओं! डरने की कोई बात नहीं हैं, आप लोगों को मनोरथ अवशय ही पूरा होगा। मुनि की बात से सब देवता अपने अपने लोक को चले गए। इधर मुनि को चिंता हुई कि एक लाख योजन इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पी सकूंगा? तब गणेश जी का स्मरण करके संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक संपन्न किया। तीन महीने तक व्रत करने के बाद गणेश जी उन पर प्रसन्न हुए। उसी व्रत के प्रभाव से अगस्त्य जी ने समुद्र को सहज ही पान करके सूखा डाला। गणेश जी की इस बात से पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुई। कृष्ण जी कहते है कि हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी चतुर्थी का व्रत कीजिये। इसके करने से आप शीघ्र ही सब शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा जायेंगे। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार युधिष्ठिर ने गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं को जीतकर अखंड राज्य प्राप्त कर लिया। कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजन विधि प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें। संध्या होने पर दुबारा स्नान कर स्वच्छ हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में लड्डू अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। घी और उड़द मिला कर हवन करें। तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर खुद मौन रह कर भोजन करें। स्त्रियाँ चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात् अपने पति की आरती और पूजा करें।

कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा | कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी Read More »

आस्था का केंद्र ही नहीं धरोहर भी है गोला का शिव मंदिर

गोला गोकर्णनाथ। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ के पौराणिक शिव मंदिर के महात्म्य और प्रसंग पुराणों और लोक कथाओं में मिलते हैं। यह पूरे तराई क्षेत्र का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर प्रदेश की अनमोल धरोहर तो है ही, यहां होने वाले धार्मिक आयोजन और मेले सांस्कृतिक विरासत भी हैं। मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में वर्णन है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए और रमणीक स्थल देखकर यही रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र को चिंता हुई और वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर समझ गए कि यही शिव हैं। वे जैसे ही उनके निकट गए तो आहट पाकर मृग भागने लगा। कथा के अनुसार देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए तो सींग तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्ण नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सींग का दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा टुकड़ा देवराज इंद्र अपने साथ ले गए, जिसे उन्होंने अमरावती में स्थापित किया।यहां के महत्व का वर्णन शिव पुराण वामन, पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है। पौराणिक शिव मंदिर से जुड़ी एक किवदंती भी लोक मान्यता का रूप ले चुकी है कि भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि उन्हें रास्ते में कहीं भी रखा, तो वह उस स्थान से नहीं जाएंगे। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन शर्त के अनुसार रावण भगवान शिव को लेकर लंका के लिए चला। जब रावण गोला गोकर्णनाथ के पास पहुंचा तो उसे लघुशंका का आभास हुआ। रावण एक चरवाहे को इस हिदायत के साथ शिवलिंग देकर लघुशंका के लिए चला गया कि वह शिवलिंग भूमि पर नहीं रखेगा। काफी देर तक वापस ना आने पर चरवाहे ने भगवान शिवलिंग को भूमि पर रख दिया।वापस लौटे रावण ने शिवलिंग उठाने की कोशिश की मगर नहीं उठा सका। इस पर गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि गोला के पौराणिक शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग में रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।भूतल से नौ फिट की गहराई में स्थापित है शिवलिंग – पौराणिक शिव मंदिर परिसर में प्रवेश द्वार सहित चारों दिशा में द्वार हैं। वहीं, मंदिर के तीन द्वार हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भूतल से नौ फीट की गहराई में है। शिवभक्त दंडवत करके ही दर्शन पाते हैं। पौराणिक शिव मंदिर के निकट गोकर्ण तीर्थ 5300 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में है। जिसका 2016 में आवास विकास योजना के तहत एक करोड़ 10 लाख रुपए की लागत से जीर्णोद्धार कराया गया था। वहीं वर्ष 2014 में शिव सेवार्थ समिति द्वारा शिव भक्तों के सहयोग से तीर्थ के मध्य विशालकाय भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई थी।डेढ़ शताब्दी पहले जूना अखाड़ा के नागा साधु करते थे मंदिर की देखभाल – पौराणिक शिव मंदिर कमेटी अध्यक्ष जनार्दन गिरी ने बताया कि करीब डेढ़ सदी पहले जूना अखाड़ा के नागा पंथ शिव मंदिर की देखरेख करता था, जो हाथियों पर आसीन होकर यहां आते थे। जूना अखाड़ा के नागा पंथ ने ही गोस्वामी समाज को मंदिर की देखरेख का जिम्मा दिया था।मंदिर निर्माण सर्वप्रथम किसने कराया, इसके प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, पूर्वज बताते थे कि यहां एक गोल गुंबद का छोटा मंदिर हुआ करता था। जिसे शिव भक्तों ने जीर्णोद्धार करा कर भव्य रुप दिया। वर्तमान में शिव मंदिर का जो स्वरूप है उसका जीर्णोद्धार बरेली के शिवभक्त परिवार के डॉ. संजय अग्रवाल. डा.ॅ रेनू अग्रवाल, डॉ. हिमांशु अग्रवाल, डॉ. प्रियंका अग्रवाल ने कराया है।

आस्था का केंद्र ही नहीं धरोहर भी है गोला का शिव मंदिर Read More »

छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन

सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस समय भक्त भगवान शिव के दर्शन करने लिए शिवनगरी जाते हैं। कोई कांवड़ यात्रा में शामिल होकर तो कोई अन्य माध्यमों से भोलेनाथ का आर्शीवाद लेने के लिए उनकी शरण में जाता है। यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। गोला के गोकर्णनाथ के बारे में कहा जाता है कि सतयुग में लंका का राजा रावण भगवान शिव को यहां लाया था। नवरात्रि में मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें, मुरादे होंगी पूरी गोला गोकर्णनाथ के बारे में प्राचीन कथा जैसा की प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। रावण की तपस्या से खुश होकर भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने कहा कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। यह सुनकर सभी देवता परेशान हो गए और ब्रह्माजी के पास गए और कहा कि अगर शिव रावण के साथ लंका चले तो सृष्टि का कार्य कैसे होगा? इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव को सोच समझकर वरदान देने के लिए कहा। इस पर शिवजी ने रावण से कहा कि यदि तुम मुझे लंका ले जाना चाहते हो तो ले चलो लेकिन मेरी एक शर्त रहेगी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि जहां भी मुझे भूमि स्पर्श हो जाएगी, मैं वही स्थापित हो जाउंगा। इस बात पर रावण सहमत हो गया। भगवान ने एक शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर जा रहा था। इसी दौरान भगवान शिव ने रावण को लघुशंका की इच्छा जगा दी। काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद रावण ने एक चरवाहे को शिवलिंग पकड़ाकर लघुशंका करने लगा। इसी समय भगवान ने अपना वजन बढ़ा दिया और इससे चरवाहे ने रावण को आवाज लगाकर कहा कि वह अब इस शिवलिंग को उठाए नहीं रह सकता है। रावण लघुशंका करने में व्यस्त होने के कारण सुन नहीं पाया। इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस आया और वह चरवाहे का मारने के लिए दौड़ा तो चरवाहे कुएं में गिर गया। इसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। इससे क्रोधित होकर रावण ने अंगुठे से शिवलिंग को जोर से दबा दिया, आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगुठे का निशान है। रावण निराश होकर वापस लंका चला गया। इसके बाद भगवान शिव ने चरवाहे की आत्मा को बुलाकर कहा कि आज के बाद लोग तुम्हें भूतनाथ के नाम से जानेंगे और मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे दर्शन करने पर भक्तों को विशेष पूण्यलाभ मिलेगा। इसके बाद से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के लिए गोला के गोकर्णनाथ आते हैं। सावन के महीने में भगवान शिव दर्शनों को आने वाले लाखों भक्त शिवलिंग के दर्शनों के बाद बाबा भूतनाथ के भी दर्शन अवश्य करते हैं। लखीमपुर खीरी जिले की गोला तहसील में स्थित गोकर्णनाथ लखीमपुर और शाहजहांपुर के रूट पर है। लखीमपुर से मंदिर की दूरी 35 किलोमीटर है। गोला के लिए बस और ट्रेन आसानी से उपलब्ध हैं।

छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन Read More »