April 29, 2023

रामायण की कहानी हनुमान जी का जन्म

रामभक्त हनुमान को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मारुति नंदन, पवनपुत्र व संकटमोचन आदि। माना जाता है कि वह भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार थे और उनके जन्म का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। इस कहानी में हम हनुमान जी के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक प्रचलित कथा बता रहे हैं। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से हुआ था केसरीनंदन हनुमान का जन्म हनुमान जी के जन्म की कथा बहुत रोचक है। वे माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र थे। माना जाता है हनुमान जी जन्म कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि देवतागण, नक्षत्र और सारे भगवान के आशीर्वाद से पृथ्वी से पाप का विनाश करने के लिए हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र शिव का अंश होगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि जब बजरंगबली का जन्म हुआ था, उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था। यह संयोग दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था। बात सतयुग की है, जब माता अंजनी एक जंगल में बैठकर पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा कर रही थीं। वह हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके आराधना में लीन थी, तभी उनकी सामने रखी कटोरी में एक फल आकर गिरा। माता अंजनी ने जब उस फल को देखा, तो उन्होंने उसे प्रसाद समझ कर सेवन कर लिया। दरअसल, जब माता अंजनी जंगल में पूजा कर रही थी, तब वहां से दूर अयोध्या में राजा दशरथ भी पुत्र प्राप्ति के लिए शिव-यज्ञ करवा रहे थे। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के जन्म स्थान का वर्णन वाल्मीकि रामायण मे किष्किंधाकांड में सबसे पहले हनुमान जी के जन्म और उनके जन्म स्थान का वर्णन मिलता है. प्रसंग यह है कि जब सारे वानर माता सीता की खोज में समुद्र के किनारे पहुंचते हैं तो लंका जाने के लिए समुद्र कौन पार करेगा इसको लेकर सभी संशय में पड़ जाते हैं. जाम्बवंत जी हनुमान जी को समुद्र पार कर लंका जाने के लिए उत्साहित करते हैं और हनुमान जी को उनके दिव्य जन्म की कथा सुनाते हैं. वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार महावीर हनुमान जी की माता अंजना पहले स्वर्ग में पुंजकस्थली नामक अप्सरा थी, जिन्हें एक शाप (लोकश्रुतिओं के अनुसार ये शाप दुर्वासा ऋषि ने दिया था) की वजह से धरती पर एक वानरी के रुप में जन्म लेना पड़ता है. जो कभी भी अपना रुप एक इंसान की तरह कर सकती थीं

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काली की रचना कैसे हुई शिव शंकर भगवान की कथा

प्राचीन काल में राक्षस अपनी तपस्या के बल पर ऐसी शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनके सामने टिकना देवताओं के लिए भी मुश्किल हो जाता था। राक्षस अपनी शक्तियों का प्रयोग करके आतंक और भय फैलाते थे। ऐसी ही एक घटना रक्तबीज नाम से राक्षस से जुड़ी है। रक्तबीज का अंत मां काली के हाथों हुआ, लेकिन इस दौरान गलती से मां काली का पांव भगवान शिव के ऊपर आ गया था। आइये, जानते हैं उस घटना के बारे में एक बार रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे एक वरदान हासिल कर लिया। रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि उसका खून जहां भी गिरेगा, वहां से उसी के समान राक्षस पैदा हो जाएगा। रक्तबीज को अपने इस गुण पर बहुत अभिमान था, इसलिए उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। घमंड में चूर रक्तबीज ने देवताओं को युद्ध के लिए ललकारा। देवता रक्तबीज से लड़ने के लिए आ गए, लेकिन जहां भी रक्त बीज का रक्त गिरता, वहां से एक और रक्त बीज पैदा हो जाता। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे रक्तबीज पैदा हो गए, जिन्हें हराने का कोई रास्ता देवताओं को दिखाई नहीं दे रहा था। दुर्गा अथवा पार्वती के प्रचंड अवतार को ही कहा निकाली कहते हैं। असुरों से युद्ध करते समय दुर्गा ने सोचा कि चंद और मुंड नाम के असुरों को मारने के लिए हिंसक और विनाशक रूप धारण करना चाहिए। गुस्से में आकर दुर्गा ने अपने तीसरे नेत्र से तेज बिजली निकाल दी। इस बिजली से नारी की एक काली आकृति प्रकट हुई। उसकी आंखें सुलग रही थी और बाल बिखरे हुए थे। उसकी लाल जीव चमक रही थी। हीरे या सोने के गहनों के बजाय वह मनुष्य  की खोपड़ी की माला पहने हुए थी। उसके तीन हाथों में त्रिशूल तलवार और मनुष्य की खोपड़ी थी। चौथे हाथ से वह आशीर्वाद दे रही थी।  पूरी तरह से रक्त पिपासु दिख रही वह देवी असुरों को मारने चल पड़ी। उसने चंद और मुंड को मार डाला। इस तरह उसका नाम चामुंडा पड़ गया।  इसके बाद शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने काली के विनाश को रोकने के लिए अपने आप को उसके पैरों पर गिरा दीया। शिव को अपने पैरों के नीचे गिरा दे काली को अपनी गलती महसूस हुई और उसने मारकाट बंद कर दी।

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शिव और पार्वती का विवाह

भगवान शिव की पत्‍नी मां पार्वती हैं और इन दोनों का जन्म जन्मांतरोंं का संबंध है. पुराणों में इनके विवाह की कई तरह की कथाएं हैं. लोकमान्‍यताओं के अनुसार, शिवजी ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था. जहां के लोग कहते हैं कि आज भी वहां अग्नि की अखंड ज्योति जल रही है. वो ज्‍योति कभी बुझती नहीं हैं. बताया जाता है कि, शिव-पार्वती उसी ज्योति के सामने विवाह बंधन में बंधे थे. हिमालय के राजा हिमवंत और उनकी पत्नी मेनादेवी शिव जी के भक्त थे। उनकी इच्छा एक ऐसी पुत्री पाने की थी जिसका विवाह में शिव जी के साथ कर सके। मेनादेवी ने शिवजी की पत्नी गौरीदेवी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। कई दिनों तक वह बिना खाए पिए तप करती रही। गौरीदेवी ने प्रसन्न होकर मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लेने का वचन दे दिया। गौरीदेवी ने आग में कूदकर अपनी जान दे दी। इसके बाद उन्होंने मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लिया, जिसका नाम पार्वती रखा गया। पार्वती ने जब बोलना शुरू किया तो उनके मुंह में पहला शब्द शिव ही निकला। बड़ी होकर वह बहुत सुंदर युवती बनी। इस बीच शिवजी ने अपनी पत्नी की मृत्यु से दुखी होकर लंबा ध्यान शुरू कर दिया था। हिमवंत को आशंका हो रही थी की शायद शिवजी गहन ध्यान मैं होने के कारण पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार ना करें। उन्होंने समस्या के समाधान के लिए नारद को बुलाया। नारद ने उनसे कहा कि पार्वती तपस्या के जरिए शिव जी का हृदय जीत सकती थी। हिमवंत ने पार्वती को शिव जी के पास ही भेज दिया। पार्वती ने दिन-रात उनकी पूजा और सेवा की। शिवजी पार्वती की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने युवा ब्राह्मण का रूप धारण किया और पार्वती के पास जाकर कहने लगे कि भिकारी की तरह रहने वाले शिवजी से विवाह करना सही नहीं होगा। पार्वती यह सुनकर बहुत क्रोधित हुई। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे शिव को छोड़कर और किसी के साथ विवाह नहीं करेंगी। उनके उत्तर से संतुष्ट होकर शिव अपने असली रूप में आ गए और पार्वती से विवाह करने को तैयार हो गए। हिमवंत ने धूमधाम से दोनों का विवाह कर दिया।

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