April 16, 2023

आखिर क्यों करते हैं पीपल के पेड़ का पूजन, जानिए पौराणिक कथा

आप सभी जानते ही होंगे शनिवार के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पीपल की पूजा कर रहे होते हैं। इस दिन लोग पीपल को जल देते हैं, दीप दिखाते हैं, काले तिल और गुड़ भी अर्पित करते हैं। लेकिन आपने सोचा है ऐसा क्यों? आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसका कारण। जी दरअसल पीपल को लेकर श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:। अर्थात मैं वृक्षों में पीपल हूं। इससे भी इस वृक्ष की महत्‍ता पता चलती है। स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं का वास है। इसलिए पीपल को पूजनीय पेड़ माना जाता है।’ इसके अलावा यह भी मान्‍यता है क‍ि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और जिन जातकों की कुंडली में शनि दोष होता है। उन्हें इसके कुप्रभाव से मुक्ति मिल जाती है। जी दरअसल इसे लेकर पौराणिक कथाएं भी म‍िलती हैं। इनमे पहली कथा के अनुसार ‘एक समय स्वर्ग पर असुरों ने कब्जा कर लिया था। कैटभ नाम का राक्षस पीपल वृक्ष का रूप धारण करके यज्ञ को नष्ट कर देता था। जब भी कोई ब्राह्मण समिधा के लिए पीपल के पेड़ की टहनियां तोड़ने पेड़ के पास जाता, तो यह राक्षस उसे खा जाता। ऋषियों को समझ ही नहीं आ रहा था क‍ि आख‍िर ब्राह्मण कुमार कहां गायब होते जा रहे हैं। ब्राह्मण कुमारों के वापस न लौटने पर ऋषियों ने शनिदेव से सहायता मांगी। इस पर शनिदेव ब्राह्मण बनकर पीपल के पेड़ के पास गए। कैटभ ने शनि महाराज को पकड़ने की कोशिश की, तो शनिदेव और कैटभ में युद्ध हुआ। शनि ने कैटभ का वध कर दिया। तब शनि महाराज ने ऋषियों को कहा कि आप सभी भयमुक्त होकर शनिवार के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करें, इससे शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।’ वहीं एक अन्‍य पौराण‍िक कथा के अनुसार, ‘ऋषि पिप्लाद के माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। बड़े होने इन्हें पता चला कि शनि की दशा के कारण ही इनके माता-पिता को मृत्यु का सामना करना पड़ा। इससे क्रोधित होकर पिप्लाद ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर घोर तप किया। इससे प्रसन्न होकर जब ब्रह्माजी ने उनसे वर मांगने को कहा, तो पिप्लाद ने ब्रह्मदंड मांगा और पीपल के पेड़ में बैठे शनिदेव पर ब्रह्मदंड से प्रहार किया। इससे शनि के पैर टूट गए। शनिदेव दुखी होकर भगवान शिव को पुकारने लगे। भगवान शिव ने आकर पिप्पलाद का क्रोध शांत किया और शनि की रक्षा की। तभी से शनि पिप्पलाद से भय खाने लगे। पिप्लाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ था और पीपल के पत्तों को खाकर इन्होंने तप किया था इसलिए माना जाता है कि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि का अशुभ प्रभाव दूर होता है।’

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रविवार, पीपल व लक्ष्मी माता का गहरा संबंध, जानने के लिए पढ़ें ये पौराणिक कथा

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ वास्तु शास्त्र के अलावा हमारे हिंदू धर्म में भी पेड़-पौधों को बहुत महत्व प्रदान है। यही कारण है कि इनकी विधि वत पूजा का विधान है। इन्हीं में से एक है पीपल का पेड़ जिसे ब्रह्मा जी का रूप माना जाता है। पौराणिक व धार्मिक मतों के अनुसार पीपल पर जल चढ़ाने से व इनकी पूजा करने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। परंतु क्या आप जानते हैं इसकी पूजा करने समय दिन वार का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। दरअसल शास्त्रों में पीपल के वृक्ष से जुड़ी एक कथा वर्णित है, जिसमें बताया गया है कि सप्ताह का एक ऐसा भी दिन होता है जिस दौरान पीपल के वृक्ष की पूजा करना फलदायी नहीं कष्टकारी साबित होता है। तो अगर आप जानना चाहते हैं कि कौन सा है वो दिन व क्या इसके पीछे की पौराणिक कथा तो आगे की जानकारी को ध्यान से पढ़िए। पीपल के वृक्ष बारे में एक कथा प्रचलित है कि, एक बार माता लक्ष्मी और उनकी छोटी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली, हमें कहीं तो रहने का स्थान दो। तब भगवान विष्णु ने उन्हें पीपल के वृक्ष पर वास करने को कहा। इसलिए पीपल पर जल चढ़ाने से धन-संपदा की परेशानी दूर हो जाती है।  तो वहीं रविवार को पीपल की पूजा नहीं की जाती क्योंकि जब विष्णु भगवान ने माता लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने मना कर दिया था क्योंकि उनकी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। दरिद्रा के विवाह के उपरांत ही वह श्री हरी विष्णु से विवाह कर सकती थी। उन्होंने दरिद्रा से पूछा,” वो कैसा वर पाना चाहती हैं।”तो वह बोली कि,” वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे और उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो। तब श्री विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अब दरिद्रा की शर्तानुसार उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान नही मिला। दरिद्रा उनकी प्रतीक्षा में विलाप करने लगी और यहाँ श्री विष्णु ने दोबारा लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोली,” जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी। धरा पर ऐसा कोई स्थान नहीं है।  जहां कोई धर्म कार्य न होता हो। उन्होंने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा व उसके पति को दे दिया। इसलिए हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। यही वजह है कि इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है। इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं, लेकिन साथ में यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना-छांटना बहुत ही आवश्यक हो तो उसे रविवार को ही काटा-छांटा जा सकता है।

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कौन थे भगवान शिव के प्रथम शिष्य, जानें भगवान शिव से जुड़े 7 अनजान रहस्य

शिव या महादेव सनातन संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि  कई नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भोलेनाथ स्वयंभू है लेकिन भोलेनाथ से जुड़ी की रहस्यमयी कथाएं प्रचलित हैं। आइए आपको भगवान शिव से जुड़े कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताते हैं जो शायद ही लोगों को पता है। भगवान शिव की उत्पत्ति  भगवान शिव स्वयंभू हैं, लेकिन पुराणों में उनकी उत्पत्ति का विवरण मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार जहां भगवान विष्णु ब्रह्माजी की नाभि से उत्पन्न हुए वहीं शिव विष्णु जी के माथे के तेज से उत्पन्न हुए, ऐसा उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव-शंभू हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं।  शिव और शंकर एक ही हैं कुछ पुराणों में भगवान शंकर को शिव इसलिए कहते हैं क्योंकि वे निराकार शिव के समान है। निराकार शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। शंकर को हमेशा योगी के रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए चित्रित किया गया है। अतः शिव और शंकर दो अलग सत्ताएं हैं। मान्यता है कि महेश(नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं और रुद्रदेवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं। भगवान शिव से हुई असुरों की उत्पत्ति  पुराणों के अनुसार जालंधर नामक राक्षस की उत्पत्ति भगवान शंकर के तेज से हुई थी। इसलिए जालंधर को भगवान शिव का एक अंश माना जाता है। अन्य मान्यता के अनुसार भूमा नामक असुर कि उत्पत्ति भगवान भोलेनाथ के पसीने की बूंद से हुई थी। इसके अतिरिक्त कुछ पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि अंधक और खुजा भी भगवान शंकर के पुत्र थे परन्तु धर्म शास्त्रों में इन दोनों का कहीं कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है।  शिव के प्रथम शिष्य पुराणों के अनुसार भगवान शिव के प्रारम्भिक शिष्य सप्तऋषि माने जाते हैं। मान्यता है कि सप्तऋषियों ने भगवान शिव के ज्ञान का प्रचार प्रसार पृथ्वी पर किया था जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि भगवान शिव ने ही गुरु शिष्य की परंपरा का आरंभ किया था। शिव के शिष्यों में बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेंद्र, प्राचेतस मनु, भारद्वाज शामिल थे। शिव की पत्नियां ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की दो पत्नियां थी पहली देवी सती और दूसरी माता पार्वती। लेकिन यदि हिन्दू पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान नीलकंठेश्वर ने एक दो नहीं बल्कि चार विवाह किए थे। उन्होंने यह सभी विवाह आदिशक्ति के साथ ही किए थे।  भगवान शिव ने पहला विवाह माता सती के साथ किया जो कि प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। माता सती के पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान न सह पाने के कारण उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मी आदिशक्ति ने भगवान शिव से दूसरा विवाह किया। हमारे धर्मग्रंथों में भगवान शिव का तीसरी पत्नी देवी उमा को बताया गया है। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली को बताया गया है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया और तीनो लोक की रक्षा की। भगवान शिव क्यों लगाते हैं भस्म  भगवान शिव के भस्म लगाने की पीछे कई मान्यता जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है।  इसी वजह से ‘शव’ से ‘शिव’ नाम बना।  महादेव के मुताबिक शरीर नश्वर है और इसे एक दिन भस्म की तरह राख हो जाना है।  जीवन के इस पड़ाव के सम्मान में शिव जी अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार जब देवी सती ने क्रोध में आकर खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था, उस वक्त भगवान शंकर  उनका शव लेकर धरती से आकाश तक हर जगह घूमे थे। विष्णु जी से उनकी यह दशा देखी नहीं गई और उन्होंने माता सती के शव को छूकर भस्म में तब्दील कर दिया। अपने हाथों में भस्म देखकर शिव जी और परेशान हो गए और सती की याद में वो राख अपने शरीर पर लगा ली।  भगवान शिव हर युग में थे उपस्थित  भगवान शिव को आदिपुरुष कहा जाता है। और इसी वजह से माना जाता है भोलेनाथ ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्होंने हर युग में अपने भक्तों को दर्शन दिए हैं। सतुग में समुद्र मंथन के समय वे उपस्थित थे। त्रेतायुग में भगवान राम ने भी रामेश्वरम में उनके शिवलिंग रूप की आराधना की। रात्रि प्रवास के दौरान राम को स्वप्न में शिवलिंग का दर्शन हुआ था। द्वापरयुग में भगवान शिव स्वयं कृष्ण के बालरूप के दर्शन करने गोकुल पहुंचे थे। और कलयुग में राजा विक्रमादित्य कि तपस्या प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए थे, ऐसा उल्लेख मिलता है

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कहां और कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति, जानिए शिवजी से जुड़े ये रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस ब्रह्मांड के सृष्टि बनने से पहले पृथ्वी एक अंतहीन शक्ति थी। सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु पैदा हुए और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की नाभि से पैदा हुए भगवान ब्रह्मा। पृथ्वी पर पैदा होने के बाद कई सालों तक इन दोनों में युद्ध होता रहा है। दोनों आपस में एक दूसरे को ज्यादा शक्तिशाली मानते रहे। तभी आकाश में एक चमकता हुआ पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि जो इस पत्थर का अंत ढूंढ लेगा, उसे ही ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा। वह पत्थर शिवलिंग था। भगवान शिव को भक्त शिवशंकर, त्रिलोकेश, कपाली, नटराज समेत कई नामों से पुकराते हैं। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। हिंदू धर्म में भगवान शिव की मूर्ति व शिवलिंग दोनों की पूजा का विधान है। कहते हैं कि जो भी भक्त भगवान शिव की सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। धार्मिक शास्त्रों में शिवलिंग का महत्व बताया गया है. शिवलिंग को इस ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है. तो चलिए पंडित इंद्रमणि घनस्याल से जानते हैं शिवलिंग से जुड़ी कुछ रोचक बातें। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा समस्त ब्रह्मांड की पूजा के बराबर मानी जाती है, क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल हैं। शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो ‘शिव’ का अर्थ है ‘परम कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ होता है ‘सृजन’। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिंह या प्रतीक होता है। इस तरह शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। भगवान शिव को देव आदिदेव भी कहा जाता है। जिसका मतलब है कोई रूप ना होना। भगवान शिव अनंत काल और सृजन के प्रतीक हैं। भगवान शिव प्रतीक हैं, आत्मा के जिसके विलय के बाद इंसान परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। शिव जी की पूजा ही क्यों होती है लिंग रूप में, जानें अद्भुत रहस्य महार्षि भृगु जी द्वारा रचित ग्रंथ भृगु संहिता जो कि ताम्र पत्रों पर लिखित सुल्तानपुर लोधी में स्थित है। इस प्राचीन ग्रंथ में भगवान शिव जी की शिवलिंग के रूप में ही क्यों पूजा होती है सवाल का ऑथेंटिकेट जवाब लिखा हुआ है। ग्रंथ को पढ़ने वाले महायश वाचक श्री मुकेश पाठक जी ने बताया की भगवान शिव की पूजा भी लिंगाकृति में होती है इसका भी कारण है भृगु जी द्वारा दिया गया श्राप।  त्रिदेवों में से सर्वश्रेष्ठ कौन हैं ? इसकी परीक्षा लेने के लिये भृगु जी महाराज पहले सृष्टि रचियता ब्रह्मा जी के पास गये परन्तु सर्वश्रेष्ठ होने का गुण न पाकर फिर भगवान शंकर के पास कैलाश गये। शिव जी समाधी में लीन थे, उनके गणों ने भृगु जी को मिलने से मना कर दिया। महर्षि होने के कारण किसी भी स्थान पर जाने के लिय कोई रोक टोक नहीं थी। फिर भी महर्षि ने कहा कि, कृपा आप उन्हें मेरे आने का संदेशा अवश्य दें परन्तु शिव जी के गण हरगिज मानने को तैयार ना थे और ऐसा वाद-विवाद हो गया कि गणों ने भृगु जी का अपमान करना आरम्भ कर दिया। उनको मारने के लिये त्रिशूल इत्यादि शस्त्रों को साथ लेकर भृगु जी के पीछे-पीछे भागने लगे। अब भृगु जी ठहरे महर्षि उनके पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था। अगर था तो केवल एक कमंडल। भागते-भागते भृगु जी एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां आकर वह ठहर गये और उनको क्रोध आ गया और मन ही मन सोचने लगे कि हे शंकर जी आज मैं आपके पास आया तो किसी और काम से था। आज तो मैंने आपको एक बहुत बड़ी उपाधी से सुशोभित करना था परन्तु आपके गणों ने मेरी यह हालत कर दी।  इस हालात पर क्रोधित होकर महार्षि भृगु जी ने भगवान शंकर जी को श्राप दे दिया कि जाओ आपकी भी कलयुग में पूजा न हो। श्राप मिलते ही भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुल गया और महर्षि के सामने उपस्थित हो गये। कहने लगे, “हे भृगु ! अपना दिया श्राप वापिस लो क्योंकि इस सृष्ठि के निर्माण करने में मेरा भी नाम आता है। अगर मुझे ही इस सृष्टि से बाहर निकाल दोगे तो इस सृष्टि में कुछ नहीं बचेगा। अगर हम सृष्टि बना सकते हैं तो इसका विनाश भी कर सकते हैं। जब भृगु जी ने इस पर गंभीरता से विचार किया तो सोचने लगे कि यह कहते तो ठीक हैं – अगर बना सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं।  भृगु जी का भी क्रोध शांत हुआ और शंकर जी को कहा, हे शंकर जी दिया गया श्राप तो वापिस नहीं हो सकता परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन किया जा सकता है। शंकर जी श्राप के परिवर्तन के लिये सहमत हो गये। तब महार्षि ने पूछा प्रभु क्या आप अब प्रसन्न हैं, तो शंकर जी ने सहमती जतायी। तब महर्षि भृगु जी बोले कि आपकी कलयुग में पूजा अवश्य होगी परन्तु जो यह शरीरिक आकार लिये हुए हो, इस रूप में पूजा न होकर ब्रह्मांड रूपी लिंग आकृति में होगी। यही भृगु जी का श्राप ही सबसे बडा कारण है कि – भगवान शंकर की पूजा एक लिंग की आकृति में होती है। तब भगवान शंकर जी ने महार्षि भृगु को आर्शीवाद दिया। हे महर्षि! आप जिस कार्य में लगे हुए हैं, आपका वह कार्य पूर्ण हो। धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया है कि – संत वचन पलटे नहीं पलट जाये ब्रह्मांड। कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु और ब्रह्माजी में युद्ध होता रहा। दोनों खुद को सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध करने में लगे थे। इस दौरान आकाश में एक चमकीला पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि इस पत्थर का जो भी अंत ढूंढ लेगा, वह ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा. मान्यता है कि वह पत्थर शिवलिंग ही था। पत्थर का अंत ढूंढने के लिए भगवान विष्णु नीचे तो भगवान ब्रह्मा ऊपर चले गए परंतु दोनों को ही अंत नहीं मिला. तब भगवान विष्णु ने स्वयं हार मान ली. लेकिन ब्रह्मा जी ने सोचा कि अगर मैं भी हार मान लूंगा तो विष्णु को ज्यादा शक्तिशाली समझा जाएगा। इसलिए ब्रह्माजी ने कह दिया कि उनको पत्थर का अंत मिल गया है। इसी बीच फिर आकाशवाणी हुई कि मैं शिवलिंग हूं और मेरा ना कोई अंत है, ना ही शुरुआत और उसी

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भगवान शिव के पाँच डरावने और रहस्यात्मक मंदिर

पूरी दुनिया में भगवान शंकर के बहुत सारे मंदिर हैं ज्यादातर मंदिरे हमारे देश भारत में मौजूद हैं भगवान शंकर जितने सरल और सीधे हैं उतने ही वह रहस्य आत्मक भी हैं आज हम आपको भगवान शिव के कुछ मंदिर के विषय में  जानकारी देंगे। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर भेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर अरब सागर के तट पर हैं इस मंदिर को लगभग डेढ़ सौ साल पहले खोजा गया था स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का वर्णन शिव महापुराण के रूद्र संहिता में किया गया है। इस मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है वह 4 फुट ऊंचा और दो व्यास वाला है यह मंदिर इसीलिए रहस्यात्मक है की यह मंदिर दिन में दो बार पल भर के लिए गायब हो जाता है। कुछ ही क्षणों बाद फिर से दिखाई देने लगता है इस मंदिर का दर्शन भक्त लोग तभी कर सकते हैं जब समुद्र की लहरें बहुत कम हो वहां जाने वाले सभी भक्तों को एक विशेष पर्ची दी जाती है। जिसमें वहां के दर्शन से लेकर सावधानी तक सभी प्रकार की सूचनाएं लिखी होती है इस मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा भी है। एक बार राक्षस तारकासुर ने भगवान शंकर को खुश करने के लिए बहुत वर्षों तक तपस्या की तारकासुर की तपस्या से भगवान शिव खुश होकर प्रकट हुए।  भगवान शंकर ने तारकासुर से वरदान मांगने को कहा वरदान में तारकासुर ने शिव से कहा कि मुझे सिर्फ आपका ही पुत्र मार सकेगा वह भी सिर्फ 6 दिन का होना चाहिए दूसरा कोई नहीं मुझे मार न सके। मुझे ऐसा वरदान दीजिए भगवान शंकर ने  वैसा ही वरदान दिया और वही अंतर्ध्यान हो गये जैसे ही भगवान शिव ने तारकासुर को वरदान दिया तो तारकासुर ने तीनों लोकों में सब को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताऋषि मुनि डर के मारे भगवान भोलेनाथ के पास हाथ जोड़कर पहुंच गए देवताओं की बात सुनने के पश्चात भगवान भोलेनाथ ने कार्तिकेय को प्रकट किया। सिर्फ 6 दिन में ही कार्तिकेय ने तारकासुर को मार दिया कार्तिकेय को जब पता चला कि तारकासुर भगवान भोलेनाथ का अनन्य भक्त हैं तो उनको बहुत दुख हुआ। तब ब्रह्माजी ने कार्तिकेय को कहा जिस स्थान पर तुमने तारकासुर का वध किया है उसी स्थान पर भगवान भोलेनाथ का मंदिर बना दो तो तुम्हें शांति मिलेगी और तुम्हारा दुःख दूर होगा। तभी भगवान कार्तिकेय ने अपना दुख दूर करने के लिए तारकासुर के स्मरण मैं स्तंभेस्वर मंदिर का निर्माण कराया था। निष्कलंक महादेव मंदिर निष्कलंक महादेव मंदिर यह मंदिर गुजरात में स्थित है इस मंदिर के नाम से ही पता चल रहा है कि यह सभी कलंक को धोने वाला मंदिर है।  यह मंदिर पांचों पांडवों ने बनाया था जब कौरव और पांडवों में महाभारत का युद्ध हुआ युद्ध में पांडवों के हाथों कौरवों की मौत हो गई तब कौरवों को एहसास एहसास हुआ कि हमने तो अपने ही भाइयों का कत्ल किया है।  इस कलंक को मिटाने के लिए भगवान श्री कृष्ण के आदेश के अनुसार पांचो पांडव ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। अचलेश्वर महादेव मंदिर इस नाम से पूरे भारत देश में बहुत सारे मंदिर बने हुए हैं लेकिन प्रमुख मंदिर राजस्थान के धौलपुर में स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली बात यह है कि यह मंदिर में स्थित शिवलिंग एक दिन में तीन  बार अपना रंग बदलती है। सुबह शिवलिंग का रंग लाल और दोपहर में केसरिया और शाम ढलते ढलते इसका रंग सावला हो जाता है अचलेश्वर शिवलिंग की एक और विशेषता है। इस शिवलिंग के छोर को आज तक कोई नहीं जान पाया कि यह कितना बड़ा है बहुत बार शिवलिंग के छोर को जानने के लिए खुदाई भी की गई लेकिन इसका पता न चल सका। लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर भी बहुत प्राचीन है ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान राम ने जब खर और दूषण को मार दिया उसके पश्चात लक्ष्मण के कहने पर किया था। इस शिवलिंग की यह विशेषता है इस शिव लिंग में एक लाख छेद हे और इन 1 लाख छिद्रों की अलग-अलग विशेषताएं हैं शिवलिंग में एक लाख छेद होने के कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्यस्वर महादेव मंदिर पड़ा। बिजली महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित बिजली महादेव मंदिर कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली से ही जुड़ा हुआ है व्यास और पार्वती नदी के पास एक ऊंचे पर्वत में यह शिवलिंग स्थित है ऐसी मान्यता है कि हर 12 वर्ष में शिवलिंग के ऊपर एक बिजली गिरती है और वह शिवलिंग खंडित हो जाता है वहां के पुजारी मक्खन आदि से उस शिवलिंग को पुनः जोड़ कर यथावत कर देते हैं

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