February 16, 2023

रविवार व्रत कथा एवं व्रत विधि

रविवार व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। सभी मनोकामनाएं पूर्ण करनेवाले और जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा हेतु सर्वश्रेष्ठ व्रत रविवार की कथा इस प्रकार से है रविवार व्रत कथा | Ravivar Vrat Katha प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती. रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुन कर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकम्पा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिन्ता व कष्ट नहीं था. धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे बुरी तरह जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपनी अनन्य भक्त बुढ़िया की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा- हे माता, तुम प्रत्येक रविवार को मेरी पूजा और व्रत करती हो। मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं और तुम्हें ऐसी गाय प्रदान करता हूं जो तुम्हारे घर-आंगन को धन-धान्य से भर देगी। तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। रविवार का व्रत करनेवालों की मैं सभी इच्छाएं पूरी करता हूँ। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। स्वप्न में उस बुढ़िया को ऐसा वरदान देकर सूर्य भगवान अन्तर्धान हो गए। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी। बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उस नगर के राजा के पास भेज दिया। राजा को जब बुढ़िया के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर बुढ़िया की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक उस बुढ़िया के घर पहुंचे। उस समय बुढ़िया सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय और बछड़े को खोला और अपने साथ महल की ओर ले चले। बुढ़िया ने सैनिकों से गाय और उसके बछड़े को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्लाई, लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय व बछड़े के चले जाने से बुढ़िया को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय व बछड़े को लौटाने के लिए प्रार्थना करती रही। सुन्दर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरन्त लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा। तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया। राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दण्ड दिया।फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए। राज्य में सभी स्त्री-पुरुष सुखी जीवन-यापन करने लगे। रविवार के व्रत को सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है। इस दिन प्रातः काल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शांतचित्त होकर भगवान सूर्य का स्मरण करें। घर में जो भी भोजन बनाएं, उसमें शुद्धता का ध्यान रखें और भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करें। भोजन एक ही समय करें और फलाहार भी सूर्य का प्रकाश रहते ही कर लें। सूर्य के अस्त होने के बाद कुछ भी आहार ग्रहण ना करें, केवल पानी ले सकते हैं। अगले दिन सूर्योदय के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न ग्रहण करें।

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शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ?

आइए पढ़ते है भगवान शिव के वाहन नंदी से सम्बंधित एक कहानी जिससे हमें पता चलेगा की नंदी क्यों और कैसे महादेव की सवारी बनें? और शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ? पौराणिक कथा शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त  होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा।भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए। शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो गया। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है। नंदी के नेत्र सदैव अपने इष्ट को स्मरण रखने का प्रतीक हैं, क्योंकि नेत्रों से ही उनकी छवि मन में बसती है और यहीं से भक्ति की शुरुआत होती है। नंदी के नेत्र हमें ये बात सिखाते हैं कि अगर भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध, अहम व दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। नंदी के दर्शन करने के बाद उनके सींगों को स्पर्श कर माथे से लगाने का विधान है। माना जाता है इससे मनुष्य को सद्बुद्धि आती है, विवेक जाग्रत होता है। नंदी के सींग दो और बातों का प्रतीक हैं। वे जीवन में ज्ञान और विवेक को अपनाने का संंदेश देते हैं। नंदी के गले में एक सुनहरी घंटी होती है। जब इसकी आवाज आती है तो यह मन को मधुर लगती है। घंटी की मधुर धुन का मतलब है कि नंदी की तरह ही अगर मनुष्य भी अपने भगवान की धुन में रमा रहे तो जीवन-यात्रा बहुत आसान हो जाती हैनंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं।उनका हर क्षण शिव को ही समर्पित है और मनुष्य को यही शिक्षा देते हैं कि वह भी अपना हर क्षण परमात्मा को अर्पित करता चले तो उसका ध्यान भगवान रखेंगे।

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माता वैष्णो देवी की अमर कथा

वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। माता वैष्णो देवी की अन्य कथा हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म

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जानिए कैसे हुई भगवान श्रीराम की मृत्यु?

जिस तरह दुनिया में आने वाला हर इंसान अपने जन्म से पहले ही अपनी मृत्यु की तारीख यम लोक में निश्चित करके आता है। उसी तरह इंसान रूप में जन्म लेने वाले भगवान के अवतारों का भी इस धरती पर एक निश्चित समय था, वो समय समाप्त होने के बाद उन्हें भी मृत्यु का वरण करके अपने लोक वापस लौटना पड़ा था।हम अब तक आप सब को भगवान श्रीकृष्ण और भगवान लक्ष्मण की मृत्यु या यूँ कहे की उनके स्वलोक गमन की कहानी बता चुके है। आज हम जानेंगे की भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए। भगवान श्री राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो राम के पास पहुँच चुके।  पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला।  आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला। एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया। वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

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सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’

आज हम आपको महाभारत से जुडी एक कथा बताते है। यह कथा पांडव कुल के अंतिम सम्राट जनमेजय (अर्जुन के प्रपौत्र) से जुडी है। जनमेजय ने एक बार पृथ्वी से सांपो का अस्तित्व मिटाने के लिए सर्प मेध यज्ञ किया था जिसमे पृथ्वी पर उपस्तिथ लगभग सभी सांप समाप्त हो गए थे। हालंकि अंत में अस्तिका मुनि के हस्तक्षेप के कारण सांपो का सम्पूर्ण विनाश होने से रह गया था, अन्यथा आज पृथ्वी पर सांपो का अस्तित्व नहीं होता। आइये जानते है कौन थे जनमेजय और क्यों उन्होंने सांपो के सम्पूर्ण विनाश की प्रतिज्ञा ली थी ? राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप- महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया गया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से होकर गुजरे। ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दिया कि जाओ तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी।  राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपो का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ- जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी। कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत- राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा तक पर न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपो का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राज परीक्षित को डस लिया।राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे। जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे। राजा जनमेजय का सर्प मेध यज्ञ- जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी। कैसे खत्म हुआ सर्प मेध यज्ञ:- सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए सभी देवता जनमेजय से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे लेकिन जनमेजय किसी भी रूप में अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था। जनमेजय के यज्ञ को रोकने के लिए अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिनके पिता एक ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या थी। अस्तिका मुनि की बात जनमेजय को माननी पड़ी और सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक को मुक्त करना पड़ा।

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सम्पूर्ण महाभारत कथा

महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवां वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। परिचय महाभारत की रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने की है, लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया है। इस ग्रंथ में चंद्रवंश का वर्णन है। महाभारत में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया हैं। यह महाकाव्य ‘जय’, ‘भारत’ और ‘महाभारत’ इन तीन नामों से प्रसिद्ध है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक हैं, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है। यह ग्रंथ स्मृति वर्ग में आता है। इसमें कुल 18 पर्व हैं जो इस प्रकार हैं- आदिपर्व, सभा पर्व, वनपर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेधिक पर्व, आश्रमवासिक पर्व, मौसल पर्व, महाप्रास्थनिक पर्व व स्वर्गारोहण पर्व। आइए इस लेख में हम इन 18 पर्वों के माध्यम से जानते है सम्पूर्ण महाभारत। 1. आदिपर्व चंद्रवंश में शांतनु नाम के प्रतापी राजा हुए। शांतनु का विवाह देवी गंगा से हुआ। शांतनु व गंगा के पुत्र देवव्रत (भीष्म) हुए। अपने पिता की प्रसन्नता के लिए देवव्रत ने उनका विवाह सत्यवती से करवा दिया और स्वयं आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली। देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें भीष्म कहा गया। शांतनु को सत्यवती से दो पुत्र हुए- चित्रांगद व विचित्रवीर्य। राजा शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बने। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे। विचित्रवीर्य का विवाह अंबिका एवं अंबालिका से हुआ। अंबिका से धृतराष्ट्र तथा अंबालिका से पांडु पैदा हुए। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, इसलिए पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से तथा पांडु का विवाह कुंती व माद्री से हुआ। धृतराष्ट्र से गांधारी को सौ पुत्र हुए। इनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था। पांडु को कुंती से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा माद्री से नकुल व सहदेव नामक पुत्र हुए। असमय पांडु की मृत्यु होने पर धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया। कौरव (धृतराष्ट्र के पुत्र) तथा पांडव (पांडु के पुत्र) को द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या सिखाई। एक बार जब सभी राजकुमार शस्त्र विद्या का प्रदर्शन कर रहे थे, तब कर्ण (यह कुंती का सबसे बड़ा पुत्र था, जिसे कुंती ने पैदा होते ही नदी में बहा दिया था।) ने अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करनी चाही, लेकिन सूतपुत्र होने के कारण उसे मौका नहीं दिया गया। तब दुर्योधन ने उसे अंगदेश का राजा बना दिया। एक बार दुर्योधन ने पांडवों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाक्षागृह का निर्माण करवाया। दुर्योधन ने षड्यंत्रपूर्वक पांडवों को वहां भेज दिया। रात के समय दुर्योधन ने लाक्षागृह में आग लगवा दी, लेकिन पांडव वहां से बच निकले। जब पांडव जंगल में आराम कर रहे थे, तब हिंडिब नामक राक्षस उन्हें खाने के लिए आया, लेकिन भीम ने उसका वध कर दिया। हिंडिब की बहन हिडिंबा भीम पर मोहित हो गई। भीम ने उसके साथ विवाह किया। हिडिंबा को भीम से घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। एक बार पांडव घूमते-घूमते पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर में गए। यहां अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रौपदी का वरण किया। जब अर्जुन द्रौपदी को अपनी माता कुंती के पास ले गए तो उन्होंने बिना देखे ही कह दिया कि पांचों भाई आपस में बांट लो। तब श्रीकृष्ण ने कहने पर पांचों भाइयों ने द्रौपदी से विवाह किया। जब भीष्म, विदुर आदि को पता चला कि पांडव जीवित हैं तो उन्हें वापस हस्तिनापुर बुलाया गया। यहां आकर पांडवों ने अपना अलग राज्य बसाया, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा। एक बार नियम भंग होने के कारण अर्जुन को 12 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा।वनवास के दौरान अर्जुन ने नागकन्या उलूपी, मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा व श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया। अर्जुन को सुभद्रा से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पांडवों को पांच पुत्र हुए। वनवास पूर्ण कर अर्जुन जब पुन: इंद्रप्रस्थ पहुंचे तो सभी बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन व श्रीकृष्ण के कहने पर ही मयासुर नामक दैत्य ने इंद्रप्रस्थ में एक सुंदर सभा भवन का निर्माण किया। 2. सभा पर्व मयासुर द्वारा निर्मित सभा भवन बहुत ही सुंदर व विचित्र था। एक बार नारद मुनि युधिष्ठिर के पास आए और उन्हें राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव चारों दिशाओं में गए तथा सभी राजाओं को युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। इसके बाद युधिष्ठिर ने समारोह पूर्वक राजसूय यज्ञ किया। इस समारोह में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया। युधिष्ठिर का ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन के मन में ईष्र्या होने लगी। दुर्योधन ने पांडवों का राज-पाठ हथियाने के उद्देश्य से उन्हें हस्तिनापुर जुआ खेलने के लिए बुलाया। पांडव जुए में अपना राज-पाठ व धन आदि सबकुछ हार गए। इसके बाद युधिष्ठिर स्वयं के साथ अपने भाइयों व द्रौपदी को भी हार गए। भरी सभा में दु:शासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर लाया और उसके वस्त्र खींचने लगा। किंतु श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बच गई। द्रौपदी का अपमान देख भीम ने दु:शासन के हाथ उखाड़ कर उसका खून पीने और दुर्योधन की जंघा तोडऩे की प्रतिज्ञा की। यह देख धृतराष्ट्र डर गए और उन्होंने पांडवों को कौरवों के दासत्व से मुक्त कर दिया। इसके बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को उनका राज-पाठ भी लौटा दिया।इसके बाद दुर्योधन ने पांडवों को दोबारा जुआ खेलने के लिए बुलाया। इस बार शर्त रखी कि जो जुए में हारेगा, वह अपने भाइयों के साथ तेरह वर्ष वन में बिताएगा, जिसमें अंतिम वर्ष अज्ञातवास होगा। इस बार भी दुर्योधन की ओर से शकुनि ने पासा फेंका तथा युधिष्ठिर को हरा दिया। शर्त के अनुसार पांडव तेरह वर्ष वनवास जाने के लिए विवश हुए और राज्य भी उनके हाथ से चला गया। 3. वन पर्व जुए की शर्त के अनुसार युधिष्ठिर को अपने भाइयों के साथ बारह वर्ष का वनवास

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मातृ और पितृभक्त श्रवण कुमार की कहानी/कथा |

श्रवण कुमार की कथा जनमानस के मष्तिस्क पटल पर आज भी अंकित है. मातृ और पिता के प्रति भक्ति की ऐसी कथा विरले ही सुनने को मिलती है. यह माता-पिता के प्रति अतुलनीय प्रेम और सम्मान का वर्णन करती है. श्रवण कुमार ने अपना संपूर्ण जीवन माता और पिता की सेवा-सुश्रुषा में समर्पित कर दिया और मृत्यु पर्यंत उनकी सेवा करते रहे. अपनी इसी मातृ और पितृभक्ति के कारण वह अमर हो गए. श्रवण कुमार का वर्णन वाल्मीकि रामायण के ६४वें अध्याय में मिलता है. श्रवण कुमार शांतनु नामक एक साधु के पुत्र थे. उनकी माता का नाम ज्ञानवती था, जो एक धर्मपरायण स्त्री थी. उनके माता-पिता नेत्रहीन थे. बड़े कष्ट सहकर उन्होंने उनका पालन-पोषण किया था. इसलिए माता-पिता के प्रति उनके मन में अथाह प्रेम और श्रद्धा थी.जब वे कुछ बड़े हुए, तो अपने माता-पिता की सेवा में लग गए. वे नदी से पानी भरकर लाते, जंगल से लकड़ियाँ चुनकर लाते, भोजन तैयार करते और घर के समस्त कार्य करते. माता-पिता की सेवा करना वे अपना परम धर्म मानते थे. विवाह योग्य होने पर माता-पिता द्वारा उनका विवाह करवा दिया गया. किंतु जिस स्त्री से उनका विवाह हुआ, वह श्रवण कुमार के नेत्रहीन माता-पिता को बोझ स्वरुप मानती थी. वह दिखावे मात्र के लिए श्रवण कुमार के समक्ष माता-पिता की सेवा करती और पीठ पीछे उनसे बुरा व्यवहार करती थी. जब श्रवण कुमार को इस विषय में ज्ञात हुआ, तो उन्होंने अपनी पत्नि को फटकार लगाईं. तब रूठकर वह अपने मायके चली गई और कभी वापस नहीं आई. पत्नि के जाने के बाद श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कभी कोई दुःख नहीं पहुँचने दिया. समय के साथ श्रवण कुमार के माता-पिता वृद्ध हो चले थे. उनकी इच्छा मृत्यु पूर्व तीर्थ यात्रा पर जाने की थी. एक दिन उन्होंने अपनी इच्छा श्रवण कुमार को बताई, तो श्रवण कुमार उनकी इस इच्छा की पूर्ति की तैयारियों में लग गए. दो बड़ी टोकरियों को एक मजबूत लकड़ी के दोनों छोर पर बंधकर उन्होंने कांवर तैयार किया. एक टोकरी में अपने पिता को बैठाया और एक में माता को. फिर उस कांवर को अपने कंधों में लादकर वे विभिन्न तीर्थों की यात्रा पर निकल गए. वे अपने माता-पिता को काशी, गया, प्रयागराज जैसे कई तीर्थों पर ले गए. तीर्थ स्थानों का वर्णन कर वे अपने माता-पिता को सुनाया करते थे. इस तरह उनके नेत्रहीन माता-पिता उनकी आँखों से तीर्थ दर्शन करने लगे. एक संध्या श्रवण कुमार कांवर लेकर एक वन से प्रस्थान कर रहे थे. उनके माता-पिता बहुत देर से प्यासे थे. उन्होंने श्रवण कुमार से पानी लाने को कहा. श्रवण कुमार ने एक पेड़ के नीचे कांवर नीचे रखा और कलश लेकर जल की खोज में निकल पड़े. पास ही उन्हें एक नदी दिखाई पड़ी और वे नदी तट पर पहुँच गए. उस दिन अयोध्या के राजा दशरथ उसी वन में आखेट कर रहे थे. दिन भर वन में भटकने के उपरांत भी उन्हें कोई आखेट न प्राप्त हो सका. वे वापस लौटने का मन बना ही रहे थे कि उन्हें नदी तट पर आहट सुनाई पड़ी. उन्होंने सोचा कि अवश्य ही कोई वन्य जीव नदी तट पर प्यास बुझाने आया है. शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत राजा दशरथ ने आहट की दिशा में बाण छोड़ दिया. किंतु वह कोई वन्य प्राणी नहीं अपितु श्रवण कुमार थे, जो अपने माता-पिता के लिए कलश में जल भर रहे थे. बाण उनके सीने में जा घुसा और वे पीड़ा से कराह उठे. यह कराह सुनकर राजा दशरथ को अपनी त्रुटी का भान हुआ और वे नदी के तट पर पहुँचे. घायल अवस्था में श्रवण वहाँ पड़े हुए थे. राजा दशरथ प्रायश्चित से भर उठे. वे श्रवण से क्षमा याचना करने लगे. तब श्रवण कुमार ने कहा, “राजन! मुझे अपनी मृत्यु का कोई दुःख नहीं. दुःख है कि मैं अपने माता-पिता की इच्छा पूर्ण न कर सका. मैं उन्हें समस्त तीर्थों की यात्रा न करा सका. इस समय वे प्यास से व्याकुल है. कृपा कर आप इस कलश में पानी भरकर उनकी प्यास बुझा दीजिये.” इतना कहकर श्रवण ने प्राण त्याग दिए. अनजाने में स्वयं से हुए अपराध से दु;खी राजा दशरथ श्रवण के माता-पिता के पास पहुँचे. श्रवण कुमार के माता-पिता कदमों की आहत से जान गए कि वह उनका पुत्र नहीं है. पूछने पर दशरथ ने पूरा वृतांत सुना दिया. अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुन माता-पिता विलाप करने लगे और उन्होंने दशरथ को श्राप दिया कि पुत्र वियोग में तड़प-तड़प कर वह भी अपने प्राण त्यागेगा. इस श्राप के कारण राजा दशरथ को तब पुत्र वियोग भोगना पड़ा, जब मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम १४ वर्ष के वनवास के लिए वन चले गए. पुत्र वियोग में तड़पते हुये ही राजा दशरथ ने अपने प्राण त्यागे. 

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कैसे बालक ध्रुव बना तारा? ध्रुव तारे की कहानी 

मरोज़ रात आसमान में जगमगाते असंख्य तारों को देखते हैं. उनमें से उत्तर दिशा में दिखाई देने वाला सबसे चमकदार तारा हम सबका ध्यान आकर्षित करता है. सदा स्थिर नज़र आने वाला वह तारा है – ध्रुव तारा है. ब्रह्माजी के मानस पुत्र स्वयंभू मनु ने दो पुत्र थे – प्रियवद और उत्तानपाद. राजा उत्तानपाद ने दो विवाह किये. उनकी पहली पत्नि का नाम सुनीति था और दूसरी का नाम सुरुचि. दोनों रानियों से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया और सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम. उत्तानपाद दोनों राजकुमारों के प्रति समान प्रेमभाव रखते थे. रानी सुनीति भी अपने पुत्र ध्रुव की तरह उत्तम को भी अपना ही पुत्र मान स्नेह किया करती थी. किंतु सुरुचि के मन में सुनीति और ध्रुव के प्रति ईर्ष्याभाव था. एक दिन उत्तम अपने पिता की गोद में बैठा खेल रहा था. उत्तानपाद उसे प्रेम से सहला रहे थे. जब ध्रुव वहाँ पहुँचा, तो उसका मन भी पिता की गोद में बैठने के लिए मचल उठा. वह भी जाकर अपने पिता की गोद में बैठ गया. उसी समय रानी सुरुचि वहाँ पहुँच गई. उसने जब ध्रुव को अपने पिता उत्तानपाद की गोद में बैठा देखा, तो चिढ़ गई और खींचकर ध्रुव को गोद से उतार दिया. फिर अपने कटु वचन से ध्रुव को आहत करते हुए बोली, “अपने पिता की गोद और इस राज्य के सिंहासन पर बैठने का अधिकार केवल मेरे पुत्र उत्तम का है.” सुरुचि के कटु वचन सुनकर ध्रुव का बालमन दु:खी हो गया. वह दौड़कर अपनी माता सुनीति के पास गया और रोते हुए सारी बात बता दी. सुनीति उसे समझाते हुए बोली, “पुत्र, दु:खी मत हो, ना ही उस मनुष्य के अमंगल की कामना करो, जिसने तुम्हें अपमानित किया है. अपने कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है. तुम अपना दुःख दूर करने के लिए भगवान विष्णु की आराधना करो. उनकी कृपा से ही तुम्हारे पितामह को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. वे दु:खहर्ता हैं. अब वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे.” माता की बात से बालक ध्रुव के कोमल मन में भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव जागृत हो गया. तत्काल गृह त्यागकर वह वन की ओर प्रस्थान कर गया. मार्ग में उसे देवर्षि नारद मिले. उन्होंने ध्रुव को भगवान विष्णु की आराधना की विधि से अवगत करवाया. उसके उपरांत ध्रुव ने यमुना में स्नान किया और अन्न-जल त्यागकर पैर के अंगूठे के बल खड़ा होकर भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो गया. समय व्यतीत होने के साथ उसके तप के तेज में वृद्धि होने लगी, जो तीनों लोक में पहुँच गई. उसके अंगूठे के भार से पृथ्वी दबने लगी. उसका कठोर तप देख भगवान विष्णु को उसके समक्ष प्रकट होना ही पड़ा. ध्रुव को दर्शन देकर भगवान विष्णु ने पूछा, “वत्स, तुम्हारी आराधना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ. बोलो, क्या वरदान चाहते हो?” बालक ध्रुव कहने लगा, “भगवन! मुझे माता सुरुचि ने अपमानित कर पिता की गोद से उतार दिया था. उनका कहना था कि मैं अपने पिता की गोद का अधिकारी नहीं हूँ. माता सुरुचि की इस बात ने मेरे अंतर्मन को आहत कर दिया था और मैं भागा-भागा माता सुनीति के पास अपनी व्यथा सुनाने गया, तो उन्होंने मुझे आपकी शरण में आने का परामर्श दिया….” “…..मैंने आपकी आराधना आपकी स्नेह प्राप्ति के लिए की है प्रभुवर. आप जगत के तारणहार हैं. आपकी दृष्टि में सृष्टि के समस्त प्राणी समान हैं. पिता के गोद से उतारे जाने के बाद मैंने प्रण लिया था कि अब मैं केवल आपकी ही गोद में बैठूंगा. कृपा मुझे अपनी गोद में वह स्थान दे दीजिये, जहाँ से मुझे कोई उतार न सके.” भावविभोर होकर बालक ध्रुव बोला. ध्रुव की अभिलाषा जानकर भगवान विष्णु बोले, “वत्स, तुम्हारा निःस्वार्थ भक्ति भाव देख मैं तुम्हें अपनी गोद में स्थान देता हूँ. यह ब्रह्माण्ड मेरा अंश है और आकाश मेरी गोद. तुम मेरी गोद आकाश में ध्रुव तारे के रूप में स्थापित होगे. तुम्हारे प्रकाश से पूरा ब्रह्माण्ड जगमगायेगा. तुम्हारा स्थान सप्तऋषियों से भी ऊपर होगा. वे तुम्हारी परिक्रमा करेंगे. जब तक ब्रह्माण्ड है, तुम्हारा स्थान निश्चित है. तुम्हारे स्थान से तुम्हें कोई डिगा नहीं पायेगा. किंतु वर्तमान में तुम्हें अपना राज्य संभालना है. इसलिए तुम घर लौट जाओ. छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी पर राजकर तुम मेरी गोद में आओगे.” इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए. ध्रुव वापस घर लौट गया. कुछ वर्ष उपरांत राजा उत्तानपाद अपना राजपाट ध्रुव को सौंपकर वन चले गए. भगवान विष्णु के वरदान अनुसार पृथ्वी पर छत्तीस हजार वर्ष तक धर्मपूर्वक राज करने के उपरांत ध्रुव आकाश में ध्रुव तारा बनकर सदा के लिए अमर हो गया.

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जब देवर्षि नारद बने बंदर : पौराणिक कथा

माता पार्वती देवर्षि नारद के तपोबल और ज्ञान से अत्यंत प्रभावित थी. वे सदा उनकी प्रशंषा करती रहती थी. एक बार बातों-बातों में वे भगवान शिव के समक्ष नारद मुनि की प्रशंषा करने लगी. तब शिव जी ने उन्हें बताया कि नारद ज्ञान के अथाह सागर हैं. किंतु एक बार उन्हें अपने ज्ञान और तपोबल का अहंकार हो गया और इस अहंकार के कारण उन्हें बंदर बनना पड़ गया देवर्षि नारद के बंदर बनने की बात से माता पार्वती पूर्णतः अनभिज्ञ थी. उनके मन में इस कथा को जानने की जिज्ञासा जाग उठी. उनकी जिज्ञासा शांत करने भगवान शिव ने उन्हें पूरी कथा सुनाई, जो इस प्रकार है – हिमालय पर्वत पर एक पवित्र गुफ़ा स्थित थी. उस गुफ़ा के आस-पास का वातावरण बड़ा ही मनमोहक था. समीप ही गंगा नदी प्रवाहित होती थी. ऊँचे पर्वत और हरे-भरे वन से आच्छादित वह स्थान देवलोक जैसा रमणीय प्रतीत होता था.एक दिन नारद भ्रमण करते हुए उस स्थान पर पहुँच गए. वहाँ का मनोरम दृश्य देख वे मुग्ध हो गए. वहाँ उन्होंने अपनी तपोस्थली बनाई और भगवान विष्णु की तपस्या में लीन हो गए. जब नारद की तपस्या के बारे में देवराज इंद्रा को पता चला, तो वे चिंतित हो उठे. उन्हें अपना इंद्रलोक का सिंहासन डोलता दिखाई पड़ने लगा. वे भयभीत हो गए कि कहीं अपने तपोबल से नारद उनका सिंहासन न छीन ले. देवराज इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने की ठान ली. उन्होंने कामदेव को उनके पास भेजा. जब कामदेव नारद के पास पहुँचे, तब वे तपस्या में लीन थे. कामदेव ने अपनी माया से उनकी कामाग्नि भड़काने का प्रयास प्रारंभ किया. सर्वप्रथम उन्होंने ऋतु परिवर्तित कर बसंत ऋतु उत्पन्न कर दी. बसंत ऋतु होते ही पेड़-पौधे रंग-बिरंगे पुष्प से आच्छादित हो गए. कोयल कूकने लगी और भंवरे गुंजन करने लगे. शीतल और सुगंधित पवन बहने लगी. कामदेव ने नारद के पास अप्सरायें भेंजी, जो नृत्य कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करने लगी. किंतु कामदेव का संपूर्ण प्रयास विफल रहा. नारद की तपस्या भंग न हो सकी. यह देख कामदेव भयभीत हो उठे. उन्हें भय था कि कहीं इस कृत्य के लिए नारद उन्हें श्राप न दें दे. वे उनसे क्षमा मांगने लगे. नारद ने उन्हें तो क्षमा कर दिया, किंतु काम को जीत लेने के कारण उनका मन अहंकार से भर उठा. मन में अहंकार लिए हुए वे भगवान शिव के पास पहुँचे और उनके सामने स्वयं का बखान करने लगे. शिवजी समझ गए कि नारद अहंकार में चूर है. उन्होंने नारद को परामर्श दिया कि यह बात भगवान विष्णु को न बताये. शिवजी जानते थे कि भगवान विष्णु यदि नारद के अहंकार को समझ गए, तो इसका परिणाम नारद को किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ेगा. किंतु अपने अहं में चूर नारद ने शिवजी की बात नहीं मानी और क्षीरसागर पहुँचकर भगवान विष्णु के समक्ष कामदेव की माया विफ़ल करने का वृतांत सुना दिया. भगवान विष्णु को नारद का अहंकार समझते देर न लगी. नारद से वे कुछ न बोले, किंतु उनका अहंकार तोड़ने अपनी लीला रच दी. कुछ देर उपरांत नारद भगवान विष्णु से आज्ञा लेकर प्रस्थान कर गए. वे जिस मार्ग से जा रहे थे, वहाँ भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक सुंदर नगर का निर्माण कर दिया. उस नगर का राजा शीलनिधि था. उसकी पुत्री विश्वमोहिनी थी, जो सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी. उसके सौंदर्य पर रीझकर कई राज्यों के राजकुमारों ने उससे विवाह करने का प्रस्ताव राजा के पास भिजवाया था. किंतु किसी राजकुमार का प्रस्ताव स्वीकार करने के स्थान पर राजा शीलनिधि ने राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर का आयोजन कर दिया. कई सुंदर, सुयोग्य और प्रतापी राजकुमार स्वयंवर हेतु नगर में उपस्थित हुए. नारद नगर में पहुंचकर राजा शीलनिधि से मिलने पहुँचे. राजा शीलनिधि ने उन्हें राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर के बारे में बताया तथा उसकी हस्तरेखा देख उसके भविष्य के बारे में जानकारी देने का निवेदन किया. राजकुमारी विश्वमोहिनी जब नारद के समक्ष उपस्थित हुई, तो वे उसका रूप देख मोहित हो गए. उसकी हस्तरेखा में लिखा था कि जो व्यक्ति उससे विवाह करेगा, वह अजेय और अमर हो जायेगा. नारद ने हस्तरेखा में लिखी यह बात पढ़ तो ली, किंतु राजा और राजकुमारी को नहीं बताई. वे उन्हें कुछ और ही बताकर वहाँ से चले आये. नारद मुनि अपना वैराग्य भूल चुके थे. वे राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे. उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया. जब भगवान विष्णु प्रकट हुए, तो नारद ने उनसे सुंदर रूप की मांग की, ताकि सुंदर रूप के बल पर राजकुमारी विश्वमोहिनी से विवाह कर सकें. भगवान विष्णु ने कहा, “नारद, तुम्हारा कल्याण हो और अंतर्ध्यान हो गए.” अपनी माया से उन्होंने नारद को बंदर का रूप दे दिया. नारद मुनि प्रसन्न मुद्रा में स्वयंवर के लिए निकल पड़े. वे इस बात से पूर्णतः थे कि उनका मुख बंदर के समान हो गया है. एक पेड़ के पीछे छिपे दो शिवगण यह सारी माया देख रहे थे. वे भी नारद मुनि के पीछे-पीछे स्वयंवर में पहुँच गए. स्वयंवर में वे नारद के निकट ही बैठे और आपस में उनके रूप की प्रशंषा करने लगे. यह प्रशंषा नारद ने सुन ली और उनका अहंकार अपने चरम पर पहुँच गया. वे यह मान बैठे थे कि राजकुमारी विश्वमोहिनी उनको ही वरमाला पहनाएगी. किंतु जब राजकुमारी विश्वमोहिनी वरमाला लेकर आयी, तो नारद को देखे बिना ही एक अन्य राजकुमार के गले में वरमाला डाल दी. यह राजकुमार और कोई नहीं, बल्कि भगवान विष्णु ही थे. भगवान विष्णु रूपी राजकुमार के गले में वरमाला देख अहंकार में चूर नारद के मन में क्रोध और ईर्ष्या का भाव जाग गया. उसी समय शिवगणों ने उनका परिहास करते हुए कहा, “ऐसे मुख को राजकुमारी क्या उसके दासी भी न देखे. तनिक जल में अपना मुख तो देखो.” नारद ने जब जल में अपना वानर मुख देखा, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया. क्रोध के आवेश में उन्होंने दोनों शिवगणों को राक्षस बन जाने का श्राप दिया और वहाँ से भगवान विष्णु से मिलने निकल गए. तब तक उनका मुख समान्य हो चुका था. मार्ग में ही उन्हें भगवान विष्णु मिल गए. उनके साथ माता लक्ष्मी और विश्वमोहिनी भी थी. नारद को भगवान

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कैसे मूषक बना भगवान गणेश का वाहन? पौराणिक कथा

सभी हिंदू देवी-देवताओं के अपने-अपने वाहन हैं. आपने अवश्य गौर किया होगा कि ये वाहन कोई न कोई पशु या पक्षी हैं. पशु या पक्षियों के देवी-देवताओं के वाहन बनने के पीछे के कारण में जाएँ, तो उनका उत्तर कुछ पौराणिक कथाओं में मिलता है. शिव और पार्वती के पुत्र गणेश जी मूषक पर विराजमान होते हैं. उनका वाहन ‘डिंक’ नामक मूषक है. गणेश जी की विशाल शारीरिक संरचना के समक्ष मूषक आकार में अत्यंत छोटा है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि गणेश जी छोटे से जीव पर क्यों विराजमान होते हैं? उन्होंने इतने छोटे से जीव को अपना वाहन क्यों चुना है? इन प्रश्नों का उत्तर भी दो पौराणिक कथाओं में वर्णित है. आइये जानते हैं मूषक के गणेश जी का वाहन बनने के पीछे की कथा : प्रथम कथा यह घटना द्वापर युग की है और इस कथा का विवरण गणेश पुराण में मिलता है. एक दिन देवराज इंद्र के दरबार में गहन चर्चा चल रही थी. दरबार में उपस्थित समस्त देवगण चर्चा में लीन थे. किंतु क्रौंच नामक गंधर्व अप्सराओं के साथ हँसी-ठिठोली कर रहा था. जब देवराज इंद्र की दृष्टि क्रौंच पर पड़ी, तो वे क्रोधित हो उठे और उसे मूषक बन जाने का श्राप दे दिया. मूषक बना क्रौंच स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक में पराशर ऋषि के आश्रम में आ गिरा. स्वभाव से चंचल क्रौंच ने ऋषि आश्रम में उत्पात मचा दिया. उसने मिट्टी के समस्त पात्र तोड़ डाले, उसमें रखे अन्न का भक्षण कर लिया, ऋषियों के वस्त्र कुतर दिए और आश्रम की सुंदर वाटिका उजाड़ दी. मूषक के इस उत्पात से पराशर ऋषि चिंतित हो गए और उससे छुटकारा दिलाने की प्रार्थना लिए गणेश जी की शरण में पहुँचे. गणेश जी ने पराशर ऋषि की प्रार्थना स्वीकार कर ली और मूषक रूपी क्रौंच को पकड़ने एक तेजस्वी पाश फेंका. पाश के बंधन से बचने क्रौंच पाताल लोक भाग गया. किंतु पाश ने पाताल लोक तक उसका पीछा किया और उसे बांधकर गणेश जी के समक्ष ला खड़ा किया. साक्षात गणेश जी को अपन समक्ष देख क्रौंच भयभीत हो गया और अपने प्राणों की भिक्षा मांगने लगा. तब गणेश जी बोले, “तूने पराशर ऋषि के आश्रम में बहुत उत्पात मचाया है, जो क्षमायोग्य तो नहीं है. किंतु मैं शरणागत की रक्षा अपना परम धर्म मानता हूँ. तुम्हें जो वरदान चाहिए मांग लो.” गणेश जी की इस बात पर क्रौंच का अहंकार जाग उठा और वह बोला, “मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है. आप चाहे तो मुझसे कोई वर मांग लें.” अहंकारी क्रौंच के इस कथन पर गणेश जी मंद-मंद मुस्कुराये और बोले, “ऐसा ही सही. मैं तुझसे अपना वाहन बन जाने का वर मांगता हूँ.” क्रौंच के पास कोई अन्य विकल्प न था. अपने कथन अनुसार वह गणेश जी का वाहन बन गया. गणेश जी जैसे ही मूषक रुपी क्रौंच पर आरूढ़ हुए, उनके भारी शरीर से वह दबने लगा और उसकी प्राणों पर बन आई. उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया. उसने गणेश जी से याचना की कि वे अपना वजन वहन करने योग्य कर लें. गणेश जी ने वैसा ही किया. उस दिन से मूषक गणेश जी का वाहन बन गया और सदा उनकी सेवा में लगा रहा. गणेश जी के वाहन के रूप में उसका नाम ‘डिंक’ पड़ा. गणेश जी की मूषक पर सवारी स्वार्थ पर विजय का संकेत है.     दूसरी कथा गजमुखासुर नामक दैत्य ने देव लोक में उत्पात मचा रखा था. समस्त देवता उससे तंग थे. एक दिन सभी देवगण एकत्रित होकर गणेश जी की शरण में पहुँचे और उनसे गजमुखासुर दैत्य से मुक्ति दिलाने हेतु प्रार्थना करने लगे. देवताओं की रक्षा के लिए गणेश जी ने गजमुखासुर से युद्ध किया. इस युद्ध में गणेश जी का एक दांत टूट गया. इसी दांत से गणेश जी ने गजमुखासुर पर प्रहार किया, जिससे बचने के लिए गजमुखासुर में मूषक का रूप धारण किया और युद्धस्थल से भाग खड़ा हुआ. किंतु गणेश जी ने उसे पकड़ लिया. तब गजमुखासुर गणेश जी से क्षमायाचना करते हुए अपने प्राणों की भीख मांगने लगा. गणेश जी ने उसे क्षमा कर अपना वाहन बना लिया. 

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आज है विजया एकादशी, शुभ मुहूर्त में इस विधि से करें व्रत और पूजा, जान लें मंत्र, पारण समय

फाल्गुन माह की विजया एकादशी आज 16 फरवरी दिन गुरुवार को है. आज एकादशी व्रत के दिन गुरुवार दिन का शुभ संयोग बना है. गुरुवार व्रत और एकादशी व्रत दोनों ही भगवान विष्णु की पूजा का अवसर हैं. विजया एकादशी का व्रत और विष्णु पूजा करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है क्योंकि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से पाप मिट जाते हैं और भगवान​ विष्णु की कृपा से कठिन से कठिन कार्यों में विजय प्राप्त होती है. श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ मृत्युञ्जय तिवारी बता रहे हैं विजया एकादशी का शुभ मुहूर्त, पारण समय, मंत्र, व्रत और पूजा विधि. हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर एक महीने में दो एकादशी का व्रत आता है जो एक शुक्ल पक्ष में जबकि दूसरा कृष्ण पक्ष को पड़ता है। हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को विजया एकादशी मनाई जाएगी। इस एकादशी में व्रत रखते हुए भगवान विष्णु की पूजा-आराधना विधि विधान से किया जाता है। मान्यता है जो भी इस वियजा एकादशी के दिन पूरे दिन व्रत रखते हुए भगवान विष्णु के नाम का जाप करता है उसको हर एक कार्य में विजय की प्राप्ति होती है। साल भर आने वाली हर एक एकादशी का अपना विशेष महत्व होता है। विजया एकादशी पर भगवान विष्णु का कथा सुनी जाती है जिससे मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं इस विजया एकादशी का महत्व, तिथि, पूजा मुहूर्त और व्रत पारण का समय… विजया एकादशी पूजा विधि 2022विजया एकादशी व्रत की पूजा में सात धान रखने का विधान है अतः एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान रखें। इस पर जल कलश स्थापित कर इसे आम या अशोक के पत्तों से सजाएं। तत्पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर पीले पुष्प,ऋतुफल,तुलसी आदि अर्पित कर धूप-दीप से श्री हरि की आरती उतारें। व्रत की सिद्धि के लिए घी का अखंड  दीपक जलाएं ,एवं दीपदान करना शुभ माना गया है। इस दिन हरि भक्तों को परनिंदा,छल-कपट,लालच,द्वेष की भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण को ध्यान में रखते हुए भक्ति भाव से व्रत करना चाहिए।

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