2022

विक्रम बेताल की चौदहवीं कहानी: चोर हंसने से पहले क्यों रोया?

एक बार फिर राजा विक्रमादित्य, बेताल को पेड़ से उतारकर कंधे पर लादकर योगी की ओर बढ़ने लगता है। इस दौरान बेताल फिर से राजा को एक नई कहानी सुनाता है और शर्त वही होती है, अगर राजा ने मुंह खोला तो वो उड़ जाएगा और जवाब पता होते हुए भी नहीं दिया तो राजा की गर्दन को धड़ से अलग कर देगा। बेताल राजा को सुनाता है… बहुत साल पहले अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का एक राजा राज करता था। उसी राज्य में एक साहूकार भी रहता था। धनी साहूकार का नाम था रत्नदत्त। उसकी एक ही सुंदर सी बेटी थी रत्नावती। रत्नावती के लिए कई रिश्ते आए, लेकिन उसने किसी से भी शादी करने के लिए हां नहीं की। इस वजह से उसके पिता काफी परेशान थे। रत्नावती को सिर्फ सुंदर और धनवान नहीं बल्कि बुद्धिमान और बलवान वर चाहिए था। एक और रत्नावती के पिता अपनी बेटी से परेशान थे। दूसरी ओर नगर में चोरी शुरू होने लगी थी, जिस वजह से रत्नदत्त को हर समय यह डर सताता था कि कहीं, उसके घर से चोर सारा धन न लेकर चला जाए। इसी बीच रत्नावती की मुलाकात उस चोर से हो जाती है। रत्नावती को लोगों के घरों से फल तोड़कर खाने में बड़ा आनंद आता था। वह चोर रत्नावती को आम चुराना सिखाता है। वह लड़की उससे बहुत प्रभावित होती है और रोज उससे मिलने लगती है। वक्त के साथ-साथ उसे चोर से प्यार हो जाता है। इधर, चोर रोज रत्नावती से मिलने के बाद चोरी करने के लिए निकल जाता था। उधर, अयोध्या में बढ़ती चोरी से परेशान राजा ने सारे मंत्रियों और पहरेदारों को डांट लगाते हुए कहा, “नगर में रोज चोरियां हो रही हैं, लेकिन न तो कोई पहरेदार उसे पकड़ पा रहा है और न ही कोई मंत्री उसे पकड़ने की योजना बना पा रहा है।” इसके बाद राजा ने खुद चोर को पकड़ने का फैसला लिया। चोर को पकड़ने के लिए राजा रोज रात को नगर में घूमने लगे। एक दिन राजा ने रात में किसी को घर में कूदते हुए देखा। राजा को शक हुआ तो वह भी उसके पीछे चल पड़े। जैसे ही राजा वहां पहुंचे तो चोर उन्हें देखकर कहने लगा, “अरे! मुझे तो लगता था कि यहां मैं ही एक चोर हूं। तुम भी चोरी के इरादे से यहां आएं हो।” राजा कुछ भी नहीं कहते। इसके बाद चोर कहता है, “तुम भी चोरी के इरादे से आए हो और मैं भी। तो तुम्हें मुझसे डरने की जरूरत नहीं है। तुम एक तरह से मेरे मित्र हो।” इसके बाद चोर, राजा वीरकेतु को अपने घर चलने का निमंत्रण देता है। चोर का आग्रह सुनकर राजा उसके साथ चले जाते हैं। चोर उन्हें अपनी गुफा में ले जाता है, जहां उसने सारा चोरी का धन छिपा रखा था। राजा वीरकेतु इतना सारा धन और गुफा में मौजूद सुख-सुविधाओं को देखकर हैरान रह गए। कुछ देर बाद राजा ने चोर से पूछा, “तुमने इतना सारा धन इकट्ठा कर रखा है। तुम्हें चोरी करते हुए डर नहीं लगता।” चोर जोर से हंसकर कहता है, “राजा की सेना में कोई भी साहसी नहीं है और न ही वो अपने काम को ईमानदारी कर रहे हैं। अगर एक व्यक्ति भी अपना कार्य ईमानदारी से करता, तो इतना मुश्किल नहीं होता मुझे पकड़ना। एक चोर राजा की पूरी सेना पर भारी पड़ गया है। वहां कोई योद्धा ही नहीं है।” यह सुनते ही राजा ने अपनी तलवार निकाली और चोर से युद्ध करके उसे अपना बंधी बना लिया। चोर हैरान रह गया। उसे कुछ देर बाद समझ आया कि इतनी देर से राजा भेष बदलकर उसके साथ थे। राजा वीरकेतु उसे अपने साथ राजमहल ले जाते हैं और फांसी पर चढ़ाने की सजा सुना देते हैं। जैसे ही इस बात का एलान होता है कि चोर पकड़ा गया और उसे फांसी होने वाली है, तो रत्नावती परेशान हो जाती है। उसे पता चल गया था कि राज्य में जो चोरी कर रहा था, वही उसे आम चुराना सिखाता था। परेशान होकर रत्नावती अपने पिता रत्नदत्त से कहती है, “पिता जी, जिस व्यक्ति को मैं मन-ही-मन अपना पति मान चुकी हूं, उसे राजा ने पकड़ लिया है और वो उसे फांसी पर लटकाने वाले हैं। आप कुछ कीजिए।” रत्नदत्त को अपनी बेटी की बात समझ ही नहीं आती है। तब वह अपने पिता को चोर और अपनी मुलाकात के बारे में विस्तार से बताती है और कहती है कि वो उसके बिना नहीं रह सकती है। रत्नदत्त अपनी बेटी को समझाने की कोशिश करता है। जब बेटी नहीं मानती है, तो वह मजबूर होकर राजा के पास चला जाता है। वह राजा को बताता है कि उसकी बेटी रत्नावती चोर से बहुत प्यार करती है। अगर उसे फांसी हो गई, तो वह भी अपने प्राण त्याग देगी। वह व्यापारी अपनी बेटी के खातिर राजा को सोने के सिक्के और चोर द्वारा चुराया गया सारा धन देने का प्रस्ताव रखता है, लेकिन राजा उसकी एक नहीं सुनते। कुछ देर बाद ही राजमहल में रत्नावती पहुंच जाती है। वह भी राजा से आग्रह करती है, लेकिन राजा किसी की नहीं सुनते और जल्लाद से चोर को जल्दी फांसी देने को कह देते हैं। जैसे ही चोर को फांसी होने वाली होती है, वह पहले रोता है और फिर जोर से हंसने लगता है। उस चोर को फांसी होते ही, लड़की भी अपने प्राण त्यागने की कोशिश करती है। उसी वक्त आकाशवाणी होती है। भगवान रत्नावती से कहते हैं, “हे पुत्री! तुम्हारा प्रेम बहुत पवित्र है। तुम्हारे इस प्यार को देखकर हम बहुत खुश हुए हैं। तुम मांगों, जो भी तुम्हें मांगना है।” यह सुनकर रत्नावती कहती है, “मेरे पिता का कोई बेटा नहीं, आप उन्हें आशीर्वाद दें कि उनके सौ पुत्र हो जाएं।” एक बार फिर, आकाशवाणी होती है, “ऐसा ही होगा, लेकिन तुम कुछ और भी वरदान मांग सकती हो।” फिर रत्नावती कहती है, “मैं उस चोर से बेहद प्यार करती हूं, अगर हो सके तो आप उन्हें जीवित कर दीजिए।” रत्नावती के वरदान मांगते ही चोर फिर से जीवित हो जाता है। इधर, यह सब देखकर राजा बहुत हैरान हो जाते हैं।

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विक्रम बेताल की कहानी: अपराधी कौन? – बेताल पच्चीसी तेरहवीं

पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को एक बार फिर अपन कंधे पर उठाकर राजा विक्रमादित्य ने श्मशान की ओर चलना शुरू किया, तो बेताल ने एक नई कहानी शुरू कर दी। बेताल बोला…. एक बार की बात है, बनारस में हरिस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बहुत सुन्दर थी और उसका नाम लावण्यवती था। लावण्यवती का रूप इतना सुन्दर था कि कोई भी पुरुष उस पर मोहित हो जाता। एक दिन लावण्यवती अपने घर की छत्त पर सो रही थी। जैसे ही आधी रात हुई, एक गंधर्व कुमार आकाश मार्ग से उड़ता हुआ जा रहा था। उसकी नजर लावण्यवती पर पड़ी तो वो उसकी ओर आकर्षित हो गया। गंधर्व कुमार लावण्यवती को उठाकर ले गया। हरिस्वामी ने सुबह उठकर देखा तो उसकी पत्नी गायब थी। हरिस्वामी के लिए यह बड़े दुख की बात थी। वह अपनी पत्नी के अपहरण से इतना दुखी हुआ कि उसने आत्महत्या करने की ठान ली। जब लोगों को यह बात पता चली तो उन्होंने हरिस्वामी को समझाया कि उसे तीर्थ यात्रा करनी चाहिए। तीर्थ यात्रा से सारे पाप कट जाएंगे और तुम्हारी पत्नी तुम्हें वापस मिल जाएगी। हरिस्वामी के पास और कोई विकल्प न था इसलिए वो तीर्थ यात्रा के लिए घर से निकल पड़ा। हरिस्वामी जब एक गांव से गुजर रहा था तो उसे भूख लगी। वह एक ब्राह्मण के घर पहुंचा। ब्राह्मण की पत्नी ने हरिस्वामी को खीर खाने को दी। हरिस्वामी उस खीर को लेकर एक तालाब के किनारे पहुंचा ताकि वो मुहं हाथ धोकर खीर खा सके और प्यास लगने पर उसे पानी भी मिल जाए। खीर का कटोरा एक पेड़ के नीचे रखकर हरिस्वामी हाथ पैर धोने लगा। तभी उस पेड़ पर एक बाज आकर बैठ गया। बाज के मुहं में सांप था और वो उसे खा रहा था। सांप का जहर हरिस्वामी की खीर में टपक गया। भूखा हरिस्वामी जल्दी-जल्दी उस खीर को खा गया। उसे ये पता ही नहीं चला कि खीर में जहर है। जहर हरिस्वामी के शरीर में फैल गया और वो तड़पने लगा। हरिस्वामी दौड़कर ब्राह्मण की पत्नी के पास आकर कहने लगा कि तूने मुझे जहर क्यों दिया और इतना कहकर वो मर गया। ब्राह्मण ने जब यह देखा तो उसने अपनी पत्नी की एक बात भी नहीं सुनी और उस पर ब्राह्मण हत्या का दोष लगाकर अपने घर से निकाल दिया। इतनी कहानी सुनाकर बैताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन बताओ कि इस कहानी में अपराधी कौन है सांप, बाज या ब्राह्मण की पत्नी? राजा ने उत्तर दिया, “इस कहानी में इन तीनों में से कोई अपराधी नहीं हैं, क्योंकि सांप अपने शत्रु यानी बाज के वश में था, वह कुछ कर ही नहीं सकता था। बाज ने जान बूझकर खीर में जहर नहीं मिलाया, बल्कि वो तो शांतिपूर्वक अपना खाना खा रहा था। ब्राह्मण की पत्नी ने अतिथि का सत्कार किया था, उसे भोजन दिया था। जो इन तीनों को दोषी कहेगा, वो खुद दोषी माना जाएगा। इस कहानी में अगर कोई अपराधी है तो वो है ब्राह्मण, जिसने बिना विचार करे और सच्चाई को जाने बिना अपनी निर्दोष पत्नी को बेघर कर दिया।” बैताल बोला, “राजन आपने इस बार भी बिलकुल सही जवाब दिया है।” इतना कहकर बैताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रमादित्य उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागे। कहानी से सीख हमें बिना जांच-पड़ताल किए कोई भी बड़ा निर्णय नहीं लेना चाहिए।

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विक्रम बेताल की कहानी: दीवान की मृत्यु – बेताल पच्चीसी बारहवीं कहानी

कई असफलताओं के बाद राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को योगी के पास ले जाने की कोशिश में अपनी पीठ कर लादा और चल पड़े। रास्ता काटने के लिए बेताल ने फिर से राजा को एक नई कहानी सुनानी शुरू की। बहुत पुरानी बात है, यशकेतु नाम के राजा पुण्यपुर नामक राज्य में राज करते थे। उनका सत्यमणि नाम का एक दीवान था। सत्यमणि बड़ा ही समझदार और चतुर मंत्री था। वह राजा का सारा राज-पाठ संभालता था और विलासी राजा मंत्री पर सारा भार डालकर भोग में पड़ा रहता। राजा के भोग-विलासिता में होते अधिक खर्च की वजह से राज कोष का धन कम होने लगा। प्रजा भी राजा से नाराज रहने लगी। जब मंत्री को इस बारे में पता चला कि सब राजा की निंदा कर रहे हैं, तो उसे बहुत दुःख हुआ। फिर जब उसने देखा कि राजा के साथ उसकी भी निन्दा हो रही है, तो उसे बहुत बुरा लगा। सत्यमणि ने अपने आप को शांत करने के लिए तीर्थयात्रा पर जाने के बारे में सोचा। इस बारे में उसने राजा से बात की और आज्ञा लेकर वह तीर्थ-यात्रा पर निकल गया। सत्यमणि चलते-चलते एक समुद्री तट पर पहुंच गया। पूरा दिन बीत गया और रात हो चुकी थी। उसने सोचा कि आज रात यहीं रुक कर आराम कर लेता हूं। यह सोच कर वह एक पेड़ के नीचे सो गया। आधी रात को जब उसकी आंख खुली, तो उसने देखा कि समुद्र से एक जगमगाता वृक्ष निकल रहा है। उस पर तरह-तरह के हीरे-जवारात लगे हुए थे। उस वृक्ष पर वीणा बजाती एक सुंदर-सी कन्या बैठी थी। इस नजारे को देख सत्यमणि को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। देखते ही देखते अचानक वह पेड़ और उस पर बैठी कन्या गायब हो गई। इस सब के बाद वह हक्का-बक्का रह गया और उल्टे पैर अपने नगर की ओर दौड़ पड़ा। जब वह राज्य पहुंचा, तो उसने देखा कि उसकी अनुपस्थिति की वजह से राजा के सारे लोभ छूट गए हैं। उसने राजा को पूरा किस्सा सुनाया। दीवान की यह बात सुनकर राजा के मन में उस कन्या को पाने की लालसा पैदा हो गई। उसने सारा राज्य दीवान के भरोसे छोड़ दिया और खुद साधू का भेष बनाकर उस समुद्री तट पर जा पहुंचा। जब रात हुई, तो राजा को भी वह हीरे-मोती से जड़ा वृक्ष दिखा। वह कन्या अब भी उस वृक्ष पर बैठी हुई थी। राजा तैरता हुआ उस कन्या के पास जा पहुंचा और उसे अपना परिचय दिया। फिर उसने कन्या से उसके बारे में पूछा। कन्या ने कहा, “मेरा नाम मृगांकवती है और मैं राजा गंधर्व विद्याधर की पुत्री हूं।” फिर राजा ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और कन्या ने कहा, “आप जैसे महान राजा की रानी बनकर मेरा जीवन सफल हो जाएगा राजन, लेकिन मेरी एक शर्त है। मैं हर कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष की चतुर्दशी और अष्टमी को एक राक्षस के पास जाती हूं, जो मुझे निगल लेता है। आपको उस राक्षस को खत्म करना होगा।” राजा यशकेतु ने तुरंत यह शर्त मान ली। इसके बाद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी आई, तो मृगांकवती रात को बाहर निकली। उसके साथ राजा भी गया और छिपकर उस राक्षस का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद राक्षस वहां आया और कन्या को निगल गया। यह देखकर राजा ने राक्षस पर हमला किया और अपनी तलवार से उसका पेट चीरकर मृगांकवती को जीवित बाहर निकाल लिया। इसके बाद राजा ने उससे पूछा कि यह सब क्या है। इस पर मृगांकवती ने उत्तर दिया कि, “मैं हर अष्टमी और चतुदर्शी के दिन यहां शिव पूजा करने आती हूं और जब तक मैं घर नहीं लौटती मेरे पिता मेरे बिना कभी भोजन करते। एक बार मुझे घर पहुंचने में देर हो गई और पिताजी को अधिक देर तक भूखा रहना पड़ा। जब मैं घर लौटी तो वह बहुत गुस्सा थे और उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि जब भी मैं चतुर्दशी के दिन पूजा करने जाएंगी, तो एक राक्षस मुझे निगल लेगा। फिर मैं उसका पेट चीरकर बाहर निकल आया करूंगी। जब मैंने उनसे श्राप से मुक्त करने की विनती की, तो उन्होंने कहा कि जब पुण्यपुर के राजा मुझसे विवाह करने के लिए उस राक्षस का वध करेंगे, तो मैं श्रापमुक्त हो जाऊंगी। कन्या के श्रापमुक्त होने के बाद राजा उसे अपने साथ अपने राज्य ले आए और धूमधाम से उसके साथ शादी की। इसके बाद राजा ने दीवान को सारी कहानी सुनाई और यह सब सुनकर दीवान की मृत्यु हो गई। इतना कहकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, “हे राजन! अब तुम यह बताओ कि यह सब सुनकर दीवान की मृत्यु क्यों हुई थी?”विक्रम ने कहा, “दीवान की मृत्यु इसलिए हुई, क्योंकि उसने सोचा कि राजा फिर स्त्री के लोभ में पड़ गया और उसके भोग-विलास के कारण राज्य की दशा फिर से खराब हो जाएगी। उस कन्या के बारे में राजा को न बताना ही बेहतर था।” राजा विक्रम ने जैसे ही उत्तर दिया, बेताल फिर से पेड़ की ओर उड़ चला और जाकर उस पर उल्टा लटक गया। वहीं, राजा विक्रमादित्य एक बार फिर बेताल को पकड़ने उसके पीछे दौड़ पड़े। कहानी से सीख: किसी भी व्यक्ति को भोग विलास में इतना नहीं डूबना चाहिए कि उसका सबकुछ खत्म हो जाए। अपनी स्थिति और जरूरत के हिसाब से ही चीजों को करना अच्छा होता है।

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विक्रम बेताल की कहानी: सबसे अधिक कोमल कौन? – बेताल पच्चीसी ग्यारहवीं

बेताल का उड़कर पेड़ पर लौटने और राजा विक्रम का उसे दोबारा पकड़ने का सिलसिला जारी रहता है। इस बार राजा विक्रमादित्य बेताल को फिर से पेड़ से उतारकर ले जाते हैं। रास्ते में बेताल राजा से कहता है, “मार्ग बहुत बड़ा है, चलो मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूं, इसे तुम ध्यान से सुनना।” बेताल बताता है.. एक समय की बात है, गौड़ नाम के देश में गुणशेखर राजा का राज हुआ करता था। राजा इतना बलवान था कि उसकी चर्चा दूर-दूर के राज्यों तक फैली हुई थी। उस राजा की तीन सुंदर बेटियां थीं। तीनों इतनी कोमल थीं कि राजा को अक्सर उनकी चिंता लगी रहती थी। राजा की सबसे बड़ी बेटी इतनी कोमल थी कि चांद के प्रकाश से ही उसके शरीर पर छाले पड़ जाते थे। दूसरी बेटी को गुलाब के फूल जैसी नाजुक चीज के टकराने पर भी चोट लग जाती और खून बहने लगता था। तीसरी बेटी के कानों में किसी के चलने या कुछ कूटने की आवाज पहुंचते ही उसके हाथ-पांव पर छाले पड़ जाते थे। हर कोई उनकी इस कोमलता के बारे में सुनकर हैरान रह जाता था। कई राजकुमार उनसे शादी भी करना चाहते थे, लेकिन उनकी कोमलता के बारे में जानकर पीछे हट जाते। राजा को उनकी शादी की चिंता सताने लगी। उन्हें लगने लगा कि इस कठोर संसार में उसकी कोमल बेटियां कैसे जी पाएंगी। तब राजा ने फैसला लिया कि वो सबसे पहली बेटी को हर दम छांव में ही रखेंगे, ताकि किसी तरह की रोशनी की वजह से उसके शरीर पर छाले न पड़ें। राजा ने दूसरी बेटी को हल्के कपड़ों और गहनों के साथ ऐसी जगह रखने का फैसला किया जहां कोई भी चीज उससे न टकराए। राज ने तीसरी बेटी को ऐसी जगह रखा जहां किसी की भी आवाज न पहुंच पाए। इसी दौरान एक पड़ोस के राज्य का राजकुमार उनकी कोमलता के बारे में सुनने के बाद गौड़ देश पहुंच गया। उसने सबसे पहली राजकुमारी के चेहरे को गुलाब के फूल का स्पर्श कराया, जिससे राजकुमारी के चेहरे पर घाव के निशान बन गए। राजकुमार हैरान रह गया। इसके बाद उसने दूसरी राजकुमारी को चांदनी रात में बाहर जाने को कहा, लेकिन जब राजकुमारी ने मना कर दिया, तो वो उसे खिड़की के पास ले गया, जहां चांद की रोशनी पड़ रही थी। चांद की रोशनी राजकुमारी पर पड़ते ही उसके शरीर पर छाले पड़ गए। अगले दिन राजकुमार ने सभी लोगों से मसाला कूटने के लिए कहा, जिसकी आवाज सुनकर सबसे छोटी राजकुमारी बेहोश हो गई। इतनी कहानी सुनाकर बेताल एकदम चुप हो गया और राजा विक्रम से पूछा, “महाराज ये बताइये कि इन तीनों राजकुमारियों में से सबसे अधिक सुकुमारी व कोमल कौन सी है और राजकुमार कौन सी राजकुमारी से विवाह करेगा।” सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से आपका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।” इतना सुनने के कुछ देर बाद राजा बोले, “तीसरी राजकुमारी सबसे अधिक सुकुमारी है, क्योंकि बिना कुछ किए ही उसके हाथ पैर पर छाले पड़ रहे थे और वो बेहोश हो रही थी। वो सिर्फ तन से नहीं मन से भी कोमल है। इसी वजह से राजकुमार सबसे छोटी राजकुमारी से शादी करेगा।” जवाब मिलते ही बेताल राजा विक्रम की पीठ से उड़कर फिर से पेड़ पर जाकर लटक जाता है और राजा उसके पीछे-पीछे जंगल की ओर भागते हैं। कहानी से सीख: इंसान को अपना मन साफ रखना चाहिए। साफ मन वाले लोग दूसरों के दुख को पहचान लेते हैं।

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विक्रम बेताल की दसवीं कहानी: सबसे अधिक त्यागी कौन?

एक बार फिर राजा विक्रमादित्य बेताल को पेड़ से उतारकर योगी के पास जाने के लिए आगे बढ़ता है। हर बार की तरह इस बार फिर बेताल राजन को एक कहानी सुनाता है। बेताल बताता है कि… वीरबाहु नाम का एक राजा था, जो छोटे-छोटे राज्यों पर राज किया करता था। राजा अनगपुर नामक राजधानी में रहता था। उसी राजधानी में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी भी रहता था, जिसकी मदनसेना नाम की एक बेटी थी। व्यापारी की बेटी अक्सर घूमने के लिए बाग में जाया करती थी। एक दिन एक युवक ने मदनसेना को बाग में देखा और देखता ही रह गया। वो मदनसेना से प्रेम करने लगा था और हर दम उसी के ख्यालों में डूबा रहता है।एक दिन हिम्मत करके युवक बाग में गया। वहां मदनसेना अकेले बैठी थी। उसने नवयुवती को बताया, “मेरा नाम धर्म सिहं है और मैं आपकी खूबसूरती पर फिदा हो गया हूं।” व्यापारी के बेटी ने उत्तर दिया, “ मुझसे तुम दूर रहो, मैं किसी और की अमानत हूं।” धर्म सिंह उसकी बात नहीं सुनता और उससे विवाह का आग्रह करता है। फिर मदनसेना बताती है, “मेरा विवाह समुद्र दत्त के साथ तय हो गया है और मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकती हूं।” इतना सुनते ही धर्म सिंह दुखी हो गया। गुस्से में उसने मदनसेना से कहा, “अगर तुम मेरी हुईं तो मैं अपनी नस काट लूंगा।” यह सुनकर मदनसेना बहुत डर गई। मदनसेना ने उसे वचन दिया कि वो ठीक पांच दिन बाद उससे मिलने के लिए आएगी। यह सुनकर धर्म सिंह खुश हो गया। पांचवें दिन मदनसेना का विवाह समुद्र दत्त से होना था। विवाह के सारे रीति-रिवाज पूरे करने के बाद मदनसेना अपने पति समुद्रदत्त के घर चली गई, लेकिन उसे धर्म सिंह को दिया हुआ अपना वादा याद था। पति जैसे ही मदनसेना के पास जाता है, तो वह उससे कहती है कि मुझे आपसे बहुत जरूरी बात करनी है। वो बताती है, “ मुझे एक लड़के से मिलने जाना है, जिसे मैंने शादी से पहले आज के दिन मिलने का वचन दिया था।” यह बात सुनकर समुद्र दत्त बहुत दुखी हो गया। उसने सोचा कि ऐसी महिला पर तो धिक्कार है, जो पहले दिन ही दूसरे आदमी के पास जाना चाहती है। इसे अगर मैं रोकूंगा तो भी यह चली ही जाएगी। ऐसा सोचकर समुद्र दत्त ने उसे जाने की इजाजत दे दी। पति से जाने की आज्ञा मिलने के बाद मदनसेना तेजी से उस लड़के के घर की ओर जाने लगी। दुल्हन के कपड़ों में जाती महिला को देखकर एक चोर ने उसे रोक दिया। उसका पल्ला पकड़कर चोर बोला, “कहा चली।” मदनसेना डर गई। उसने चोर को कहा, “तुम मेरे गहने ले लो और मुझे जाने दे।” चोर ने कहा,” मुझे तेरे गहने नहीं बल्कि तू चाहिए।” मदनसेना ने सारी बात बताते हुए कहा, “पहले मैं धर्म सिंह से मिलने जाऊंगी, उसके बाद मैं लौटकर तुम्हारे पास आऊंगी।” चोर ने पूछा, “तुम शादी के पहले दिन ही अपने पति को छोड़कर जा रही हो।” लड़की ने जवाब दिया कि वो अपने पति की इजाजत लेकर जा रही है। यह सुनकर चोर ने कहा, “जब तुम्हारा पति तुम्हें भेज सकता है, तो जाओ मैं भी तुम्हें जाने देता हूं। पर वहां से लौटकर सीधे तुम मेरे पास आना।” मदनसेना चोर को वचन देकर उस लड़के पास जाने के लिए चलने लगी। उधर, मदनसेना का पति और चोर दोनों उसका पीछा कर रहे थे। चलते-चलते मदनसेना धर्म सिंह के घर पहुंच गई। उसने मदनसेना को शादी के जोड़े में देखकर पूछा, “अरे! तुम मुझसे विवाह करने के लिए शादी का जोड़ा पहनकर आई हो।” मदनसेना ने उसे बताया कि उसकी शादी हो गई है। इतना सुनते ही लड़के ने कहा, “तुम कैसे अपने पति से बचकर यहां आ गई।” मदनसेना ने उसे सारी बात बता दी कि वो किस तरह अपने पति से इजाजत लेकर आई है। यह सुनते ही धर्म सिंह ने कहा, “तुम्हारे पति ने इतने विश्वास के साथ तुम्हें आने दिया है और अब तुम शादी करके किसी और की अमानत बन गई हो। प्रेम तो मैं तुमसे बहुत करता हूं, लेकिन किसी और की स्त्री को हाथ नहीं लगा सकता। इससे पहले की कोई तुम्हें देख ले, तुम जाओ अपने पति के पास।” चोर और मदनसेना का पति दोनों छुपकर उनकी सारी बातें सुन रहे थे। जैसे ही मदनसेना, धर्म सिंह के घर से बाहर निकलती है, तो वह दोनों भी अपने-अपने रास्ते पर निकल पड़ते हैं। मदनसेना लड़के के घर से निकलकर सीधा चोर के पास पहुंचती है। चोर उसे देखकर मन में सोचता है, यह कितनी पवित्र है, इसके साथ कुछ भी करना गलत होगा। साथ ही उसे धर्म सिंह के घर की बात भी याद आ जाती है। वो मदनसेना की सच्चाई और धर्म सिंह के त्याग को देखकर प्रभावित होता है और कहता है, “जाओ अपने पति के पास यहां क्या कर रही हो।” ऐसा कहकर चोर मदनसेना को उसके घर तक छोड़कर आता है। बेताल मदनसेना की कहानी रोककर राजा से पूछता है, “हे राजन! अब यह बताओ, इन तीनों में से सबसे बड़ा त्याग किसका है।” विक्रमादित्य कहता है, “बेताल सबसे बड़ा त्याग चोर ने किया है।” इतना सुनते ही वो राजा से पूछता है कैसे? विक्रमादित्य कहता है, “सुन बेताल, मदनसेना का पति उसे यह सोचकर जाने देता है कि यह दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षित है, ऐसी स्त्री का क्या करना। धर्म सिंह उसे दूसरे की पत्नी समझकर छोड़ता है और उसे यह बोध भी था कि वह पाप कर रहा है। साथ ही इस बात का डर भी रहा होगा कि मदनसेना का पति सुबह होते ही उसे राजा से कहकर दण्ड न दिलवा दें। चोर को किसी बात का डर नहीं था, गहने से लदी स्त्री को उसने त्याग दिया। वो हमेशा से ही पाप कर्म करते आ रहा था, इस बार भी कर लेता तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता। इसी वजह से चोर का त्याग बड़ा है।” राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन तूने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।” इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। कहानी से सीख:

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विक्रम बेताल की कहानी: सर्वश्रेष्ठ वर कौन – बेताल पच्चीसी नववी कहानी

राजा विक्रमादित्य बेताल को ले जाने में कई बार विफल रहे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस बार भी उन्होंने बेताल को अपने कंधे पर लादा और आगे बढ़ने लगे। हर बार की तरह इस बार भी बेताल ने राजा को नई कहानी सुनाई। जानिए क्या थी वो कहानी और राजा ने कहानी से जुड़े बेताल के सवाल का क्या जवाब दिया। एक बार की बात है, उज्जैन शहर में एक राजा राज करता था। उसका नाम वीरदेव और रानी का नाम पद्मा था। उन दोनों की एक बेटी थी रूपमती। एक बार रूपमती अपनी सहेलियों और मंत्रियों के साथ राज्य में घूमने निकली। घूमने के साथ-साथ वह अपनी प्रजा को कुछ भेंट भी दे रही थी। इतने में एक व्यक्ति ने राजकुमारी को एक खूबसूरत साड़ी भेंट में दी। राजकुमारी उस साड़ी को देखकर बहुत खुश हुई। उसने उस व्यक्ति से पूछा, “आपने यह साड़ी कहां से खरीदी? यह साड़ी बहुत सुन्दर है।” इतने में राजकुमारी के मंत्री ने कहा, “यह साड़ी इन्होंने खुद बनाई है। यह बहुत बड़े कलाकार हैं।” मंत्री की बात सुनकर राजकुमारी आश्चर्यचकित हो गईं। राजकुमारी ने उस व्यक्ति द्वारा बुनी गई दूसरी साड़ियों और कपड़ों को देखने की इच्छा जताई। वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ और राजकुमारी को अपने घर चलने के लिए आमंत्रित किया। राजकुमारी ने निमंत्रण स्वीकार किया और उसके घर जाकर कई वस्त्र देखे। वह बहुत खुश हुई और बोली, “मन कर रहा है यहीं रुक जाऊं और आपसे यह कारीगरी सीखूं।” इतना कहने के बाद राजकुमारी अपनी यात्रा पूरी करने के लिए फिर निकल पड़ी। राजकुमारी थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि आगे से एक व्यक्ति आया और उसने राजकुमारी और उनकी सहेलियों को कहा कि आगे पेड़ के नीचे शेर है। राजकुमारी ने चौंककर उस व्यक्ति से पूछा, “आपको कैसे पता चला? आपने देखा है क्या?” उस व्यक्ति ने कहा, “नहीं राजकुमारी , मुझे मेरे पक्षी दोस्त ने जानकारी दी है।” राजकुमारी फिर चौंकी, उन्होंने पूछा, “क्या आप पक्षियों से बातें करते हैं?” तो उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि उसे पक्षियों, जानवरों और पानी में रहने वाले जीवों की भाषा आती है। राजकुमारी यह सुनकर काफी खुश हुई और चिड़ियों और जानवरों की भाषा सीखने की इच्छा जताकर उन्हें महल आने के लिए आमंत्रित किया। उस व्यक्ति ने कहा ये पक्षियां और जानवर ही उनका परिवार है, वो महल कैसे आ सकते हैं। तो राजकुमारी ने उसकी बात का मान रखते हुए कहा, “कभी भविष्य में मौका मिला, तो वह खुद उनके पास यह भाषा सीखने आएगी।” इतना कहकर वह आगे बढ़ गईं। यात्रा लंबी थी। यात्रा करते-करते राजकुमारी की तबीयत खराब होने लगी। राजकुमारी को वैध के पास ले जाया गया। उस वैध ने राजकुमारी को उनके यहां आराम करने को कहा और जड़ी-बूटी दी। उस दवा के सेवन से कुछ ही घंटों में राजकुमारी ठीक हो गईं। राजकुमारी ने उस वैध का धन्यवाद किया। वहां बैठे अन्य मरीजों ने वैध के बारे में राजकुमारी को कई बातें बताई कि वो कैसे सबकी सेवा करते हैं और उनकी दवाइयों से कई लोग ठीक हो गए हैं। ये सब सुनकर राजकुमारी ने वैध को कहा, “आप बहुत अच्छा और पुण्य का काम कर रहे हैं। मेरा भी मन है कि मैं भी दूसरों की ऐसे ही सेवा करूं।” फिर राजकुमारी अपनी यात्रा पूरी करने आगे निकल पड़ी। वह थोड़ी दूर ही गई थी कि उसका पैर जानवरों के लिए बिछाए गए एक जाल में फंस गया। राजकुमारी मदद के लिए चिल्लाने लगी। उसकी सहेलियां और मंत्री भी मदद के लिए पुकारने लगे। इतने में एक वीर ने अपनी सूझबूझ और तीरंदाजी से राजकुमारी को जाल से बाहर निकाला। राजकुमारी खुश हुई और उसने वीर का धन्यवाद किया। साथ ही उससे दोबारा मिलने की इच्छा जताकर वहां से चली गई। इसके बाद राजकुमारी लंबी यात्रा के बाद महल लौट आई। घर लौटने के बाद राजा ने उन्हें बताया कि आसपास के राज्यों से राजाओं और राजकुमारों के रिश्ते आने लगे हैं। राजकुमारी ने पिता की बात सुनी और कहा कि उन्हें कोई राजा या राजकुमार नहीं, बल्कि कोई साधारण व्यक्ति चाहिए। उन्होंने पिता से कहा, “मैंने इस यात्रा में यह जाना कि साधारण मनुष्य भी बहुत ज्ञानी, मेहनती और महान होते हैं। इसलिए, मुझे कोई साधारण व्यक्ति ही जीवनसाथी के रूप में चाहिए।” राजा ने बेटी की बात को मानते हुए स्वयंवर की घोषणा की। उस स्वयंवर की बात उन चारों व्यक्तियों तक भी पहुंची जिनसे राजकुमारी यात्रा के दौरान मिली थी। वो चारों राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे। कहानी यहां तक पहुंची ही थी कि हर बार की तरह इस बार भी बेताल ने कहानी को बीच में रोकते हुए विक्रम से सवाल पूछा बैठा। बेताल ने पूछा, “राजकुमारी के सामने चार वर थे, एक कपड़े बनाने वाला कलाकार, एक भाषा ज्ञानी, एक वैध और एक वीर। अब बताओ इसमें से राजकुमारी के लिए सर्वश्रेष्ठ वर कौन था? किसके गले में राजकुमारी ने स्वयंवर की माला डाली? जल्दी बताओ वरना मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूंगा।” राजा विक्रम ने जवाब देते हुए कहा, “कलाकार बहुत धनी व्यक्ति था, लेकिन राजकुमारी को धन की क्या कमी। इसलिए, राजकुमारी कलाकार का चुनाव नहीं करेंगी। वहीं, दूसरा व्यक्ति जो भाषा ज्ञानी है, वह मनोरंजन के लिए ठीक है। तीसरा वैद्य है, जो एक अच्छा व्यक्ति है, समाज की सेवा करता है। अगर उसकी तुलना उस वीर से की जाए तो राजकुमारी वीर का ही चुनाव करेंगी। राजा का कोई बेटा नहीं है, इसलिए वीर दामाद ही राज्य की रक्षा कर सकता है। इसलिए, राजकुमारी का सर्वश्रेष्ठ वर वो वीर व्यक्ति ही है। विक्रम की बात सुनकर बेताल खुश हो गया, लेकिन हर बार की तरह विक्रम के बोलते ही बेताल फिर पेड़ पर जाकर लटक गया। कहानी से सीख: मौका मिलने पर वीर और बुद्धिमान व्यक्ति को अपने जीवन का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए।

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विक्रम बेताल की कहानी: सबसे अधिक सुकुमार कौन? – बेताल पच्चीसी आठवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लादने की कई कोशिश कर चुके थे, लेकिन हर बार बेताल कोई कहानी सुनाता और राज विक्रमादित्य से हाथों से बच निकलता। इस बार भी बेतान ने एक नई कहानी सुनाई। बेताल कहता है… एक बार की बात है, अंगदेश के एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ रहता था। एक बार ब्राह्मण ने अपने तीनों बेटों के बुलाया और कहा कि हमारे तालाब के लिए एक कछुए की जरूरत है। कल तुम तीनों समुद्र के पास जाकर वहां से कछुआ पकड़ कर ले आना। तीनों ने हां कर दी और दूसरे दिन तीनों माता-पिता का आशीर्वाद लेकर समुद्र की ओर चल पड़े। वहां तीनों काे एक बड़ा-सा कछुआ दिखाई दिया, लेकिन तीनों में से कोई भी उसे उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ। उनमें से सबसे बड़ा भाई बोला, “मैं कछुए को नहीं उठाऊंगा, इससे बहुत गंदी बदबू आ रही है।” दूसरे नबंर के भाई ने कहा, “मैं भी इसे नहीं उठाऊंगा, मुझे भी इससे गंदी बदबू आ रही है।” तीसरे नंबर के भाई की बारी आई, तो उसने कहा, “मैं भी इसे नहीं उठा सकता, मैं बहुत कोमल हूं। तीनों में झगड़ा शुरू हो गया और यह मामला राज दरबार तक पहुंच गया। राजा ने कहा, “इस प्रकार का मामला मेरी जिंदगी में पहली बार आया है, इसका न्याय मैं कल सुबह करूंगा। आज आप हमारे यहां मेहमान हैं, इसलिए भाेजन और आराम यहां पर ही कीजिए।” यह बोलकर राजा ने तीनों को भोजन के लिए निमंत्रण दिया। सभी बड़े चाव से खाना खा रहे थे, लेकिन सबसे बड़े भाई ने नहीं खाया। राजा ने जब उससे पूछा तो उसने कहा, “चावल में से श्मशान में जले हुए मुर्दे की बदबू आ रही है।” राजा ने इस बात का पता किया तो मालूम हुआ कि चावल किसी श्मशान के पास के खेत से लाए गए हैं। यह देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सभी लोग खाना खाकर शाम को संगीत सुनने के लिए बैठ गए। तब दूसरे नंबर के भाई ने राजा से निवेदन किया कि वो मृदंग बजाना चाहता है। राजा की आज्ञा से वो गायिका के पास जाकर जैसे ही बैठा, तो तुरंत खड़ा होकर दूर बैठ गया। राजा ने खड़े होने का कारण पूछा, तो दूसरे नंबर के भाई ने कहा, “गायिका से बकरी के दूध की बदबू आ रही है और वो मुझे पसंद नहीं है।” जब राजा ने इस बात का पता किया, तो मालूम चला कि बचपन में गायिका को बकरी का दूध दिया जाता था। राजा एक बार फिर खुश हो गया। इसके बाद सभी लोग सोने के लिए चले गए। दोनों भाई आराम से सो गए, लेकिन सबसे छोटे भाई को नींद नहीं आ रही थी। राजा ने अपने एक सेवक को आदेश दिया कि जाकर तीनों को देख आओ कि वे सोए या नहीं। सेवक गया तो उसने देखा कि सबसे छोटे भाई को छोड़कर बाकी दोनों सो गए हैं। सेवक ने यह समाचार राजा को दिया और राजा इसका कारण जानने के लिए खुद वहां पहुंच गया जहां तीनों सो रहे थे। राजा को देखकर तीनों उठ बैठे। राजा ने सबसे छोटे वाले भाई से पूछा, “आपको नींद क्यों नहीं आ रही?” तब वह बोला, “मुझे इस बिस्तर पर कुछ चुभ रहा है।” यह सुनकर सेवक ने तीनों के बिस्तर की छान-बीन की, तो उन्हें कुछ नहीं मिला। तब सबसे छोटे भाई ने सभी बिस्तर को अलग किया और वहां पर एक बाल था। उसने अपना कुर्ता उतारा, सब ने देखा कि उस बाल का निशान उसकी पीठ पर बना हुआ था। राजा यह देखकर हैरान हुआ और खुश भी। दूसरे दिन राजा ने न्याय के लिए तीनों को बुलाया। उसने सबसे छोटे वाले को इनाम दिया और बाकी दो को कुछ सोने के सिक्के दिये। राजा ने कहा, “आप तीनों में अलग-अलग खूबी है और मैं आप तीनों से बहुत खुश हूं। मैं अपने सैनिकों को भेजकर कछुआ आपके घर भिजवा दूंगा।” इतना कह कर बेताल ने विक्रम से पूछा, “बताओ तीनों भाइयों में से सबसे अधिक सुकुमार कौन था?” तब विक्रम बोला, “सबसे छोटा भाई, क्योंकि हो सकता है कि दोनों बड़े भाइयों ने अपने सुकुमार होने का दिखावा किया हो, लेकिन सबसे छोटा भाई कितना सुकुमार है यह तो राजा ने खुद आंखों से देखा।” विक्रम का सही जबाब सुनकर बेताल ने उसकी तारीफ की और अपनी शर्त के अनुसार वापस पेड़ पर जाकर लटक गया। कहानी से सीख: कभी भी उन गुणों को उजागर नहीं करना चाहिए, जो हम में नहीं हैं।

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विक्रम बेताल की कहानी: राजा चन्द्रसेन और नवयुवक सत्वशील

बहुत समय पहले की बात है जब समुद्र किनारे बसे एक नगर ताम्रलिपि पर राजा चंद्रसेन का राज हुआ करता था। राजा से मिलने के लिए हजारों लोग उत्सुक रहते थे। उन्हीं में से एक था नवयुवक सत्वशील। सत्वशील को काम की तलाश थी, इसलिए वो हर दिन राजा चंद्रसेन से मिलने के लिए उनके राज महल पहुंच जाता। अफसोस, उसे हर बार दरबारी भगा देते थे। ऐसा होते-होते बहुत समय गुजर गया, लेकिन लड़के ने हिम्मत नहीं हारी। वो राज महल के साथ ही हर उस जगह पहुंच जाता, जहां राजा की सवारी जाती थी। एक दिन राजा भ्रमण कर अपने सैनिकों के साथ महल की ओर लौट रहे थे। कड़ी धूप होने के कारण राजा को काफी तेज प्यास लगी। सैनिक इधर-उधर पानी ढूंढने लगते हैं, लेकिन कोई भी कामयाब नहीं होता है। तभी राजा अपने मार्ग पर खड़े सत्वशील को देखते हैं। नवयुवक को देख राजा पूछते हैं – क्या तुम्हारे पास पानी है? सत्वशील तुरंत राजा को पानी पिलाता है और साथ ही मीठे फल भी खिलाता है। राजा उससे काफी प्रसन्न होते हैं और कहते हैं – ‘मैं तुम्हें कुछ भेंट देना चाहता हूं, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?’ भूपति चन्द्रसेन के सवाल पूछते ही झट से सत्वशील कहता है कि महराज में लंबे समय से काम की तलाश कर रहा हूं, अगर आप मुझे कुछ काम दे दें तो आपकी बहुत कृपा होगी। इतना सुनते ही राजा तुरंत उसे अपने दरबार में नौकरी दे देते हैं और कहते हैं कि उसके द्वारा पिलाए गए पानी का उपकार वो जीवन भर याद रखेंगे। वक्त बीतता गया और अपनी प्रतिभा की वजह से नवयुवक राजा का बहुत करीबी बन गया। एक दिन भूपति चन्द्रसेन सत्वशील से कहते हैं – ‘हमारे नगर ताम्रलिपि में बेरोजगारी काफी बढ़ गई है, इसके लिए हमें कुछ करना चाहिए’। इतना सुनते ही नवयुवक कहता है – ‘आप हुक्म कीजिए महाराज।’ राजा कहते हैं – ‘हमारे पास एक टापू है, जो काफी हरा-भरा है। अगर वहां कुछ खोज की जाए तो काम के कुछ अवसर मिल सकते हैं।’ इतना सुनते ही सत्वशील, जी महाराज कहकर टापू के लिए रवाना हो गया। समुद्र के रास्ते टापू के पास पहुंचते ही सत्वशील को पानी में तैरता हुआ एक झंडा नजर आता है। झंडे को देखते ही वो हिम्मत जुटा कर पानी में कूदता है। पानी में कूदते ही नवयुवक सत्वशील टापू की राजकुमारी के पास पहुंच जाता है, जहां वो अपनी सहेलियों और सेविकाओं के साथ गाना गा रही होती हैं। राजकुमारी को नवयुवक अपना परिचय देता है। कुछ देर बातचीत करने के बाद राजकुमारी सत्वशील को भोजन का निमंत्रण देती हैं और खाना खाने से पहले पास के ही एक तलाब में स्नान करने का आग्रह करती हैं। जैसे ही सत्वशील तलाब में नहाने के लिए उतरता है, वो ताम्रलिपि महल की सभा में पहुंच जाता है। एकदम सभा में सत्वशील को देख राजा चन्द्रसेन चकित हो जाते हैं। वह उससे पूछते हैं – ‘अरे, तुम यहां कैसे?’ सत्वशील राजा को पूरी घटना के बारे में बताता है। सारी बातें जानने के बाद राजा भी उस टापू में जाने का फैसला लेते हैं। वहां पहुंच कर भूपति चन्द्रसेन उस टापू पर जीत हासिल कर लेते हैं। ऐसा होते ही राजा चन्द्रसेन को राजकुमारी उस टापू का राजा घोषित कर देती है। राजा टापू को जीतने की खुशी में वहां की पूर्व राजकुमारी और सत्वशील की शादी करवा देते हैं। इस तरह राजा चन्द्रसेन सत्वशील के पानी के उपकार को चुकाते हैं। इतनी कहानी बताकर बेताल चुप हो जाता है और विक्रम से पूछता है कि राजा चन्द्रसेन और सत्वशील, दोनों में से सबसे बलवान कौन था? सवाल सुनते ही विक्रम बोल पड़ता है – सत्वशील ज्यादा शक्तिशाली था। बेताल पूछता है – कैसे ?तब विक्रम बताता है कि सत्वशील बिना कुछ सोचे समझे ही टापू के पास झंडा देखकर पानी में कूद जाता है। वहां कूदने पर उसे किसी भी तरह का खतरा हो सकता था, जबकि राजा को पता था कि वहां पानी में कोई खतरा नहीं है। सवाल का जवाब मिलते ही बेताल, राजा विक्रम के कंधे से उड़कर वापस घने जंगल में किसी पेड़ पर जाकर बैठ जाता है। कहानी से सीख: हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिए और कर्म लगातार करते रहना चाहिए।

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विक्रम बेताल की कहानी: पत्नी किसकी? – बेताल पच्चीसी छठी कहानी

कई प्रयासों के बाद राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ लिया। वह उसे जब योगी के पास ले जाने लगे, तो बेताल ने नई कहानी शुरू कर दी। बेताल ने नई कहानी सुनाते हुए कहा…. एक समय की बात है, धर्मपुर नाम के नगर में गंधर्वसेन नाम का युवक रहता था। गंधर्वसेन की कद-काठी बहुत आकर्षक थी। यही कारण था कि कई लड़कियां उससे विवाह करना चाहती थीं, लेकिन गंधर्वसेन को उनमें से एक भी लड़की पसंद नहीं थी। ब्राहमण पुत्र गंधर्वसेन जब अपने घोड़े पर सवार होकर नगर में निकलता था तो सारी लड़कियां उसे देखती रह जातीं। गंधर्वसेन किसी की तरफ नहीं देखता और तेज गति से नगर को पार करके रोजाना एक मंदिर की ओर निकल जाता था। यह मंदिर काली देवी का मंदिर था। गंधर्वसेन काली मां का बहुत बड़ा भक्त था। वो हर दिन मां काली की पूजा किया करता था। एक दिन जब वो मंदिर से लौट रहा था तो उसने नदी के किनारे एक धोबी की लड़की को कपड़े धोते हुए देखा। वह लड़की गंधर्वसेन को बहुत सुन्दर लगी। गंधर्वसेन को उस लड़की से प्यार हो गया और वो दिन रात उसी के बारे में सोचने लगा। उसे लड़की से बात करने का कोई रास्ता नहीं सूझता। एक दिन उसने काली मां के मंदिर में पूजा करते हुए ये प्रतिज्ञा ली कि अगर वो लड़की उसकी हो गयी तो वो काली मां के चरणों में अपना शीश चढ़ा देगा। गंधर्वसेन खाना-पीना भूल चुका था, वो दिन रात उसी लड़की के बारे में सोचता रहता। इसका परिणाम ये हुआ कि गंधर्वसेन बीमार हो गया। गंधर्वसेन की बीमारी की खबर सुनकर उसका सबसे अच्छा मित्र देवदत्त उससे मिलने आया। अपने परम मित्र को बिस्तर पर पड़ा देख देवदत्त ने उसकी उदासी का कारण पूछा। गंधर्वसेन ने देवदत्त को अपना हाल सुनाया और बोला कि उस लड़की से अगर मेरा विवाह नहीं हुआ तो मैं मर जाऊंगा। देवदत्त अपने मित्र से बहुत प्यार करता था, इसलिए उसने लड़की को ढूंढने की ठानी। देवदत्त उस लड़की को खोजने में सफल हुआ। देवदत्त ने उस लड़की के पिता से कहा कि अपनी बेटी की शादी गंधर्वसेन से कर दें। लड़की के पिता ने सारी स्थिति का जायजा लिया और अपनी बेटी का विवाह गंधर्वसेन से करा दिया। शादी को पांच दिन बीत गए और गंधर्वसेन उस प्रतिज्ञा को भूल चुका था, जो उसने काली मंदिर में ली थी। एक दिन सपने में गंधर्वसेन को अपनी छाया दिखाई देती है। उसकी छाया उसे वो प्रतिज्ञा याद दिलाती है और कहती है कि अगर तुम ये प्रतिज्ञा पूरी नहीं करोगे तो स्वार्थी कहे जाओगे। अगले दिन गंधर्वसेन को अपनी गलती का अहसास होता है और वो काली मंदिर में अपनी बलि देने के लिए तैयार हो जाता है। वो अपने मित्र देवदत्त को बुलाता है और उससे कहता है कि मैं, तुम और तुम्हारी भाभी मंदिर चलते हैं। मैं मदिर में अंदर पूजा करूंगा और तुम बाहर अपनी भाभी का ध्यान रखना। देवदत्त मंदिर चलने को तैयार हो जाता है। दोनों दोस्त उस लड़की के साथ मंदिर पहुंचते हैं। गंधर्वसेन मंदिर के अंदर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने चला जाता है। देवदत्त और गंधर्वसेन की पत्नी बाहर उसकी प्रतीक्षा करते हैं। बहुत समय तक जब गंधर्वसेन बाहर नहीं आता तो देवदत्त मंदिर के अंदर चला जाता है। देवदत्त अंदर जाकर देखता है कि गंधर्वसेन ने अपनी तलवार से अपना सिर काटकर काली मां को बलि चढ़ा दिया है। यह देखकर देवदत्त घबरा जाता है। देवदत्त सोचता है कि कोई भी व्यक्ति यह यकीन नहीं करेगा कि गंधर्वसेन ने अपनी हत्या खुद की है। सब ये सोचेंगे कि देवदत्त ने अपने मित्र को मारा है, ताकि वो उसकी पत्नी से विवाह कर सके। इस आरोप से बचने के लिए देवदत्त ने गंधर्वसेन की तलवार से अपना सिर भी काट लिया।थोड़े समय बाद गंधर्वसेन की पत्नी, अपने पति और उसके मित्र देवदत्त को खोजने मंदिर आयी। वहां दोनों मित्रों की लाश देखकर वो डर गयी। उसने सोचा कि लोग उन दोनों की ह्त्या का आरोप मेरे ऊपर लगाएंगे, इस लांछन से अच्छा है कि मैं भी मर जाऊं। जैसे ही उस लड़की ने अपना सिर काटने के लिए तलवार उठायी वैसे ही वहां मां काली प्रकट हुईं। मां काली ने कहा, “पुत्री मैं तुमसे प्रसन्न हूं बोलो क्या वरदान मांगती हो।” लड़की ने कहा, “आप इन दोनों को जीवित कर दीजिए।” काली मां बोली, “तुम इन दोनों के सिर इनके धड़ों पर रखोगी तो ये जीवित हो जाएंगे।” लड़की ने ऐसा ही किया, लेकिन उससे सिर रखने में गलती हो गयी। उसने गंधर्वसेन का सिर देवदत्त और देवदत्त का सिर गंधर्वसेन के धड़ पर लगा दिया। दोनों मित्र जीवित होकर उस लड़की के लिए लड़ने लगे। इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा, “राजन अब तुम ही बताओ कि उस लड़की का पति कौन है।” विक्रमादित्य को जवाब मालूम था। अगर वो चुप रहते तो बेताल उनका सिर धड़ से अलग कर देता, इसलिए विक्रमादित्य बोले, “व्यक्ति की पहचान उसके चेहरे से होती है, इसलिए देवदत्त उस लड़की का पति होगा, क्योंकि उसके धड़ पर गंधर्वसेन का मस्तिष्क वाला हिस्सा लगा है।” बेताल ने कहा, “इस बार भी तुमने सही जवाब दिया है, इसलिए मुझे फिर से उड़ जाना पड़ेगा।” इतना बोलकर बेताल फिर से घने जंगल की ओर उड़ गया। राजा विक्रमादित्य फिर से बेताल को ढूंढने के लिए उसके पीछे चल दिए। कहानी से सीख: इंसान जो भी करता है अपने मस्तिष्क से ही करता है, इसलिए उसकी पहचान मस्तिष्क से ही होती है।

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विक्रम बेताल की कहानी: असली वर कौन – बेताल पच्चीसी पांचवी कहानी

कई बार बेताल को अपने साथ ले जाने की असफल कोशिश के बावजूद राजा विक्रमादित्य ने हार नहीं मानी थी। इसलिए, राजा विक्रमादित्य फिर से पेड़ के पास पहुंचे और बेताल को अपनी पीठ पर लटका कर ले जाने लगे। अपनी शर्त के अनुसार, बेताल ने फिर से राजा विक्रम को एक कहानी सुनाना शुरू की। इस बार की कहानी है – असली वर कौन। सदियों पुरानी बात है, उज्जैन नगरी में महाबल नाम का एक राजा राज किया करता है। राजा बहुत पराक्रमी और दयालु था। उसकी एक बेटी थी, जिसका नाम था महादेवी था। महादेवी बहुत सुंदर और सुशील लड़की थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो राजा महाबल ने उसके लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी। एक-एक करके कई राजकुमार, राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा लिए राजा के पास आए, लेकिन राजा को कोई पसंद नहीं आया। राजकुमारी से विवाह करने के लिए राजा ने एक ही शर्त रखी थी कि उसकी बेटी का होने वाला पति हर चीज में निपुण हो। इस तरह कई दिन बीत गए, लेकिन राजा को कोई अपनी बेटी के लिए योग्य वर नहीं मिला। एक दिन की बात है, जब राजा अपने दरबार में बैठे थे कि तभी वहां एक राजकुमार आया और उसने कहा, “मैं राजकुमारी महादेवी से विवाह करना चाहता हूं।” यह सुनकर राजा ने कहा, “हे राजकुमार, मैं अपनी बेटी का विवाह उस व्यक्ति से करूंगा, जिसमें सभी गुण हो।” इस पर राजकुमार ने जवाब दिया, “मेरे पास ऐसा रथ है, जिसमें बैठकर क्षण भर में कहीं भी पहुंच सकते हैं।” यह सुनकर राजा ने कहा, “ठीक है तुम कुछ दिन रुको। मैं राजकुमारी से पूछकर तुम्हें जवाब दूंगा।” कुछ दिनों बाद एक और राजकुमार वहां पहुंचा। उसने राजा ने कहा, “मैं त्रिकालदर्शी हूं और भूत, वर्तमान व भविष्य, तीनों देख सकता हूं। मैं चाहता हूं कि राजकुमारी का विवाह मुझसे हो।” राजा ने उसे भी इंतजार करने को कहा। कुछ दिनों के बाद राजा महाबल के पास एक और राजकुमार उनकी बेटी का हाथ मांगने आया। राजा ने उससे पूछा कि तुममें ऐसा क्या गुण हैं, जो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ करूं? राजकुमार ने कहा, “राजन, मैं धनुर्विद्या में निपुण हूं। मेरे जैसा धनुर्धारी दूर-दूर तक कोई नहीं है।” राजा ने उससे कहा, “बहुत खूब! राजकुमार, आप कुछ दिन प्रतीक्षा करें। मैं अपनी बेटी से बात करके आपको जवाब दूंगा।” अब राजा असमंजस में पड़ गया कि तीनों ही राजकुमार गुणवान हैं, लेकिन वह तीनों से तो राजकुमारी की शादी कर नहीं सकता। तो अब सवाल यह था कि राजकुमारी का विवाह किससे होना चाहिए। वहीं, दूसरी ओर एक भयानक राक्षस राजकुमारी महादेवी पर नजर लगाए बैठा था और एक दिन मौका मिलते ही वह राजकुमारी को उठाकर ले गया। यह खबर जैसे ही महल में फैली तो राजा, रानी और तीनों राजकुमार एक जगह इकठ्ठा हो गए। त्रिकालदर्शी राजकुमार ने बताया कि वह राक्षस राजकुमारी को विन्ध्याचल पर्वत पर ले गया है। इस पर पहले राजकुमार ने कहा, “मैं अपना रथ लेकर आता हूं। हम सब उस पर बैठकर विन्ध्याचल चल सकते हैं।”तीसरे राजकुमार ने अपना तीर-कमान निकाला और कहा, “मैं उस राक्षस को मार गिराऊंगा।” इसके बाद, तीनों राजकुमार रथ पर बैठ कर विन्ध्याचल पर्वत की ओर चल पड़े। उन्हें जैसे ही वह राक्षस दिखा, तो धनुर्धारी राजकुमार ने कुशलता से उसका वध कर दिया और वो राकुमारी को बचाकर फिर से महल ले आए। इस कहानी को सुनाने के बाद बेताल ने राजा विक्रम से कहा, “राजन, राजकुमारी को बचाने में तीनों राजकुमारों का योगदान था। तो अब तुम मुझे बताओ कि राजकुमारी का विवाह किससे होना चाहिए? राजन, मैंने सुना है कि तू हमेशा न्याय करता है। जल्दी उत्तर दे, वरना तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।” इस पर राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया कि राजकुमारी का विवाह धनुर्धारी राजकुमार से होना चाहिए, क्योंकि उसने राक्षस से लड़ाई करके राजकुमारी को बचाया और बाकी दोनों राजकुमारों ने केवल उसकी मदद की। बस, फिर क्या था! जैसे ही राजा बोला, बेताल उसकी पीठ से उड़ कर फिर से पेड़ पर जा लटका। कहानी से सीख: मुश्किल समय में साहस ही काम आता है, इसलिए मुसीबत को देखकर घबराए नहीं। हमेशा साहस दिखाएं।

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विक्रम बेताल की कहानी: ज्यादा पापी कौन – बेताल पच्चीसी

बेताल के उड़ने के बाद दोबारा विक्रमादित्य शिंशपा वृक्ष की ओर दौड़े और पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को कंधे पर लादकर चल पड़े। इसी बीच एक बार फिर बेताल ने राजा को एक नई कहानी सुनाते हुए कहा – बहुत समय पहले एक भोगवती नाम की नगरी हुआ करती थी। उस नगरी में राज रूपसेन का राज हुआ करता था। राजा को शादी करने का बड़ा मन था। एक दिन राजा ने अपने चिन्तामणि नाम के तोते से पूछा, “बताओ मेरी शादी किसके साथ होगी।” तोते ने कहा, “मगध की राजकुमारी चन्द्रवाती से।” राजा ने तोते की बात सुनने के बाद एक ज्योतिषी को बुलाकर यही सवाल पूछा। ज्योतिषी ने भी राजा को वही उत्तर दिया, जो तोते ने दिया था। मगध की राजकुमारी को भी अपने होने वाले वर के बारे में जानने का बड़ा मन था। राजकुमारी ने अपनी मैना मन्जरी से पूछा, “अरे! यह बताओ मेरा विवाह किसके साथ होगा।” मैना ने भी राजकुमारी को राजा रूपसेन से शादी होने की बात बताई। इतना सुनने के बाद दोनों नगर की तरफ से शादी का न्योता एक दूसरे को भेजा गया, जो स्वीकार हो गया। इस तरह राजा रूपसेन और राजकुमारी की शादी हो गई। शादी होने के बाद रानी अपने साथ मैना को भी लेकर आई। राजा ने अपने तोते से मन्जरी मैना की शादी करवा दी और दोनों को एक ही पिंजरे में रख दिया। एक दिन किसी बात को लेकर मैना और तोते के बीच में बहुत बहस होने लगी। मैना गुस्से में कहने लगी, “पुरुष पापी, धोखेबाज और अधर्मी होते हैं।” फिर गुस्साएं तोते ने कहा, “स्त्री लालची, झूठी और हत्यारी होती हैं।” दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ गया कि यह बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने दोनों से पूछा, “क्या हुआ, तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो।” मैना ने झट से कह दिया कि महाराज, आदमी बहुत बुरे होते हैं और फिर सीधे कहानी सुनाने लग गई। सालों पहले इलाहापुर नगरी में महाधन नाम का सेठ रहता था। उस सेठ के घर शादी के कई सालों बाद एक लड़का पैदा हुआ। महाधन सेठ ने उसका बड़े ही अच्छे से पालन-पोषण किया। अच्छे संस्कार मिलने के बाद भी सेठ का बेटा बड़ा होकर जुआ खेलने लगा। जुए की लत में वो सारा पैसा जुआ खेलते हुए हार गया। इसी बीच सेठ की मौत हो गई। जुए की लत की वजह से न तो लड़के के पास पैसे बचे और न पैसा कमाने वाला बाप, तो लड़का अपना नगर छोड़कर चन्द्रपुरी नगर पहुंच गया। नए नगर पहुंचकर लड़के की मुलाकात कर्ज देने वाले साहूकार हेमगुप्त से हुई। लड़के ने अपने पिता के बारे में साहूकार को बताया और एक झूठी कहानी उसको सुनाने लगा। उसने कहा कि वो जहाज लेकर बहुत बड़ा सौदा करके लौट रहा था। उसी समय समुद्र में इतना तेज तूफान आया कि उसका जहाज वहीं डूब गया और वो बच-बचाकर यहां पहुंचा है। इतना सुनते ही साहूकार ने उसे अपने घर में रहने की इजाजत दे दी। इसी बीच हेमगुप्त साहूकार को ख्याल आया कि सेठ का यह लड़का मेरी बेटी के लिए अच्छा वर साबित हो सकता है। तुरंत साहूकार ने अपनी बेटी की शादी सेठ के बेटे से करवा दी। शादी के कुछ दिन तक अपने दामाद का काफी सत्कार करने के बाद साहूकार ने अपनी बेटी को खूब सारा धन देकर विदा कर दिया। दोनों के साथ साहूकार ने एक दासी को भी भेजा। रास्ते में सेठ के बेटे ने अपनी पत्नी से कहा, “सारे गहने मुझे दे दो। यहां कई लुटेरे हैं।” उसकी पत्नी ने ऐसा ही किया। जेवर मिलते ही उसने दासी को मारकर कुएं में फेंक दिया और अपनी पत्नी को भी कुएं में धक्का दे दिया। लड़की जोर-जोर से रोने लगी। उसकी रोने की आवाज सुनकर एक राहगीर ने महिला को कुएं से निकाला। कुएं से निकलते ही वो अपने पिता के पास चली गई। उसने अपने साहूकार पिता को सच्चाई नहीं बताई, उसने कहा, “कुछ लुटेरे ने उन्हें लूट लिया और दासी को मार दिया।” साहूकार ने अपनी बेटी को दिलासा देते हुए कहा, “चिंता मत करो तुम्हारा पति जिंदा होगा और वो कभी-न-कभी जरूर लौटकर आ जाएगा।” उधर लड़का अपने नगर पहुंचकर दोबारा सारे पैसे और जेवरात जुए में हार जाता है। पैसे खत्म होने के बाद उसकी हालत बहुत बुरी हो गई। इससे परेशान लड़का दोबारा साहूकार के पास जाता है। वहां पहुंचते ही उसकी मुलाकात पत्नी से होती है। वो उसे देखकर बहुत खुश होती है और बताती है कि उस दिन जो कुछ भी हुआ उसने अपने पिता को नहीं बताया है। वो उस झूठी कहानी के बारे में अपने पति को बताती है। जैसे ही साहूकार अपने दामाद को घर में देखा तो उसने उसका स्वागत किया। कुछ दिन साहूकार के घर में रहने के बाद एक रात को मौका देखकर सेठ का बेटा अपनी पत्नी को मारकर उसके सारे जेवरात लेकर फरार हो जाता है। यह कहानी बताने के बाद मैना कहती है, “महाराज ये सब होते हुए मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। यही वजह है मैं आदमियों को पापी कहती हूं।” मैना की कहानी सुनने के बाद राजा तोते से कहता है, “अब तुम बताओं स्त्रियों को बुरा क्यों कह रहे थे।” यह सुनते ही तोता भी कहानी सुनाने लग जाता है। वो बताता है कि एक समय वो कंचनपुर में सागरदत्त नाम सेठ के यहां रहता था। उसके बेटे का नाम श्रीदत्त था, जिसकी शादी पास के ही नगर श्रीविजयपुर के सेठ सोमदत्त की बेटी से हुई थी। शादी के बाद व्यापार करने के लिए लड़का परदेस चला गया। उसकी पत्नी जयश्री उसका इंतजार बेताबी से करती थी, लेकिन 12 साल गुजर गए, लेकिन वो परदेस से लौटकर नहीं आया। अपने पति का इंतजार करते हुए एक दिन महिला अपनी छत से एक पुरुष को आते हुए देखती है। वो उसे बेहद पसंद आता है। वो उसे अपनी सहेली के घर बुलाती है। वो उससे बात करती है और उससे रोज अपनी सहेली के घर मिलने को कहती है। अब श्रीदत्त की पत्नी जयश्री उस युवक से रोज मिलने लगी। ऐसा होते-होते कुछ महीने बीत गए। इसी बीच

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विक्रम बेताल की कहानी: बड़ा बलिदान किसका – बेताल पच्चीसी

हर बार की तरह राजा विक्रम फिर बेताल को पेड़ से नीचे उतारता है और पीठ पर लादकर उसे योगी के पास ले जाने के लिए चल देता है। ऐसे में एक बार फिर बेताल राजा विक्रम को बोलने पर विवश करने के लिए एक नई कहानी कहना शुरू करता है। कहानी है, राजा रूपसेन और अंगरक्षक वीरवर की। वर्धमान राज्य में रूपसेन नाम का एक राजा राज किया करता था। राजा बहुत ही साहसी, दयालु और न्यायप्रिय था। यही वजह थी कि केवल वर्धमान में ही नहीं बल्कि उसके राज्य से सटे सभी राज्यों में भी राजा रूपसेन के व्यक्तित्व की मिसाल दी जाती थी। एक दिन रूपसेन के दरबार में वीरवर नाम का एक व्यक्ति आया। जब राजा ने उसके आने की वजह पूछी तो वीरवर बोला, “मुझे नौकरी चाहिए और मैं अंगरक्षक के तौर पर आपकी सेवा करना चाहता हूं।” वीरवर की यह बात सुनकर राजा ने कहा, “ मैं तुम्हे अपना अंगरक्षक बना सकता हूं, लेकिन उसके लिए तुम्हें अपनी कार्यकुशलता सिद्ध करनी होगी। ताकि मैं यह तय कर सकूं कि तुम मेरे अंगरक्षक बनने के लायक हो भी या नहीं।” राजा की यह बात सुन वीरवर फौरन तैयार हो गया। उसने अपने बाहुबल के साथ अपना शस्त्र कौशल भी दिखाया। वीरवर की सभी विशेषताओं को देखकर राजा रूपसेन बहुत प्रभावित हुआ। राजा ने पूछा, “वीरवर बताओ अगर मैं तुम्हें अपना अंगरक्षक बनाता हूं, तो तुम्हें प्रतिदिन खर्च के लिए क्या चाहिए?” राजा के इस सवाल पर वीरवर बोला, “महाराज आप मुझे हजार तोले सोना दे देना।” वीरवर का इतना कहना था कि दरबार में मौजूद सभी लोग हैरान होकर वीरवर की ओर देखने लगे। राजा रूपसेन भी वीरवर की मांग पर आश्चर्य में पड़ गया। हो भी क्यों न, वेतन के रूप में वीरवर ने इतनी बड़ी रकम जो मांग ली थी। राजा ने गंभीर होकर वीरवर से पूछा, “तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं?” वीरवर ने उत्तर दिया, “कुल चार महाराज, मैं, मेरी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी।” वीरवर का जवाब सुन राजा ने मन ही मन सोचा कि आखिर चार लोगों के भरण-पोषण के लिए इसे इतने धन की क्या आवश्यकता। फिर कुछ सोचकर उसने वीरवर को हजार तोला सोना प्रतिदिन बतौर खर्च देने की बात मान ली। काम सिर्फ इतना था कि उसे हर रात राजा की सुरक्षा के लिए राजा के कक्ष के बाहर पहरा देना था। राजा यह जानना चाहता था कि वीरवर इतने धन का क्या करेगा। उसने वीरवर को हजार तोला सोना देकर रात में नौकरी पर आने को कहा और गुप्त रूप से कुछ सैनिकों को उसके पीछे लगा दिया। वीरवर नौकरी और मनचाहा वेतन पाकर बहुत खुश हुआ। वीरवर सोना लेकर खुशी-खुशी घर गया और आधा सोना ब्राह्मणों में बांट दिया। बाकी जो आधा बचा उसके दो हिस्से किए। एक हिस्सा वैरागियों, संन्यासियों और मेहमानों को दिया। फिर बचे हुए सोने से अनाज मंगाया और बढ़िया पकवान बनवाए। तैयार पकवान को पहले गरीबों को खिलाया और फिर उसके बाद जो बचा उसे अपने परिवार के साथ मिल बांट कर खाया। वीरवर की निगरानी कर रहे सैनिकों ने यह सारा नजारा देख जाकर राजा को बताया। राजा को यह जान संतोष हुआ कि उसके द्वारा दिए धन को वीरवर अच्छे काम में लगा रहा है। अब राजा को यह देखना था कि वीरवर अपने काम में कितना खरा उतरता है। वीरवर जब महल पहुंच राजा के कक्ष के बाहर पहरा देने लगा, तो राजा सोया नहीं। राजा पूरी रात चुपके से जांच करता रहा कि वीरवर अपना काम कितनी ईमानदारी से करता है। राजा ने पाया कि वीरवर बिना पलक झपकाए पूरी मुस्तैदी से कक्ष के बाहर पहरा दे रहा था। वीरवर की ऐसी कर्तव्यनिष्ठता देख राजा बहुत ही खुश हुआ। वीरवर प्रतिदिन इसी तरह सूरज ढलते ही महल पहुंच जाता और राजा की सुरक्षा में तैनात रहता। जब भी राजा को किसी भी चीज की जरूरत होती, वीरवर हमेशा हाजिर रहता। ऐसे ही देखते-देखते कई माह गुजर गए। एक रात कुछ अजीब घटना घटी। राजा ने आधी रात किसी स्त्री की रोने-बिलखने की आवाज सुनी। स्त्री की आवाज सुन राजा बहुत हैरान हुआ। राजा ने वीरवर को बुलाया और कहा, “जाओ और पता लगाकर आओ कि इतनी रात को कौन रो रहा है। साथ ही उसके रोने की वजह भी मालूम करना।” राजा का आदेश मिलते ही वीरवर वहां से फौरन उस स्त्री के रोने का कारण जानने के लिए निकल पड़ता है। थोड़ी दूर जाने के बाद वीरवर को एक स्त्री दिखाई दी। वह स्त्री सिर से पांव तक गहनों से लदी हुई थी। वह कभी नाचती, कभी कूदती और कभी सिर पीट-पीट कर रोती। यह सब देख वीरवर उस स्त्री के पास गया। उसने स्त्री के ऐसा करने के पीछे का कारण पूछा। वीरवर के पूछने पर स्त्री बोली, “मै राजलक्ष्मी हूं। रोती इसलिए हूं कि राजा रूपसेन की जल्द ही मौत होने वाली है। उनकी कुंडली में अकाल मृत्यु लिखी है। अब उनके जैसा न्याय प्रिय और कुशल राजा चला जाएगा, तो मुझे किसी और के अधिकार में रहना पड़ेगा। इसी बात का मुझे बहुत दुख है।” राजा की मौत की बात सुनकर वीरवर ने राजलक्ष्मी से पूछा, “क्या इस मुसीबत को टालने का कोई उपाय नहीं है?” इस पर राजलक्ष्मी बोली, “उपाय तो है, लेकिन क्या तू कर पाएगा।” वीरवर बोला, “आप मुझे उपाय बताएं, मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं अवश्य करूंगा।” वीरवर के हामी भरते ही राजलक्ष्मी बोली, “पूर्व की दिशा में यहां से कुछ दूर एक देवी का मंदिर है। अगर उस मंदिर में तू देवी के चरणों में अपने बेटे की बलि दे देता है, तो राजा पर आने वाला संकट टल जाएगा। उसके बाद राजा 100 साल तक बिना किसी तकलीफ के जीवित रहेगा और राज कर पाएगा।” राजलक्ष्मी की यह बात सुन वीरवर घर की ओर चल देता है और घर पहुंच कर सब हाल अपनी पत्नी को बताता है। इतने में उसका बेटा और बेटी भी जग जाते हैं। जब वीरवर के बेटे को इस बारे में पता चलता है, तो वह भी खुशी-खुशी देवी के चरणों में बलि चढ़ने के लिए राजी हो जाता है। वीरवर का बेटा कहता है, “सबसे पहले

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