जानिए कैसे हुई गरुड़ और नागों की उत्पत्ति और कैसे बने गरुड़ विष्णु के वाहन ?
आज हम आपको एक पौराणिक कथा बता रहे है जिसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। यह कथा बताती है की इस धरती पर गरुड़ और नागों की उत्पत्ति कैसे हुई, क्यों गरुड़ नाग के दुशमन हुए, क्यों नागो की जीभ आगे से दो हिस्सों में बटी हुई है और कैसे गरुड़, भगवान विष्णु के वाहन बने ? महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थी। लेकिन विनता और कद्रू नामक अपनी दो पत्नियों से वे विशेष प्रेम करते थे। एक दिन महर्षि जब आनंद भाव में बैठे थे तो उनकी दोनों पत्नियां उनके समीप पहुंची और पति के पांव दबाने लगी। प्रसन्न होकर महर्षि ने बारी-बारी से दोनों को सम्बोधित किया- “तुम दोनों ही मुझे विशेष प्रिय हो। तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।” कद्रू बोली- “स्वामी ! मेरी इच्छा है कि मैं हजार पुत्रो की माँ बनूं।” फिर महर्षि ने विनता से पूछा। विनता ने कहा- “मैं भी माँ बनना चाहती हूं स्वामी ! किन्तु हजार पुत्रो की नहीं, बल्कि सिर्फ एक ही पुत्र की। लेकिन मेरा पुत्र इतना बलवान हो कि कद्रू के हजार पुत्र भी उसकी बराबरी न कर सके।” महर्षि बोले- “शीघ्र ही मैं एक यज्ञ करने वाला हूं। यज्ञोपरांत तुम दोनों की माँ बनने की इच्छाएं अवश्य पूरी होगी।” महर्षि कश्यप ने यज्ञ किया। देवता और ऋषि-मुनियों ने सहर्ष यज्ञ में हिस्सा लिया। यज्ञ सम्पूर्ण करके महर्षि कश्यप पुनः तपस्या करने चले गए। कुछ माह पश्चात विनता ने दो तथा कद्रु ने एक हजार अंडे दिए। कुछ काल के पश्चात कद्रु ने अपने अंडे फोड़े तो उनमे से काले नागों के बच्चे निकल पड़े। कद्रु ने ख़ुशी से चहकते हुए विनता को पुकारा- “विनता ! देखो तो मेरे अन्डो से कितने प्यारे बच्चे बाहर निकले है।” विनता बोली- “सचमुच बहुत खूबसूरत है कद्रू ! बधाई हो, अब मैं भी अपने दोनों अंडो को फोड़कर देखती हूं।” यह कहकर विनता अपने दोनों अंडो के पास गई। उसने एक अंडा फोड़ दिया, लेकिन अंडे के अंदर से एक बच्चे का आधा बना शरीर देखकर वह सहम गई। बोली- “हे भगवान ! जल्दीबाजी में मैने ये क्या कर डाला। यह बच्चा तो अभी अपूर्ण है।” तभी फूटे हुए अंडे के अंदर से बालक बोल पड़ा- “जल्दबाजी में अंडा फोड़कर तुमने बहुत बड़ा अपराध कर डाला है। फलस्वरूप तुम्हे कुछ समय तक दासता करनी होगी।” विनता बोली- “अपराध तो मुझसे हो ही गया। लेकिन इसका निराकरण कैसे होगा पुत्र ?” अपूर्ण बालक बोला-“दूसरे अंडे को फोड़ने में जल्दबाजी मत करना। यदि तुमने ऐसा किया तो जीवन भर दासता से मुक्त नहीं हो पाओगी। क्योंकि उसी अंडे से पैदा होने वाला तुम्हारा पुत्र तुम्हे दासता से मुक्ति दिलाएगा।” इतना कहकर अंडे से उत्पन्न अपूर्ण बालक आकाश में उड़ गया और विनता दूसरे अंडे के पकने तक इंतजार करने लगी। समय पाकर अंडा फूटा और उसमे से एक महान तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गरुड़ रखा गया। गरुड़ दिन-प्रतिदिन बड़ा होने लगा और कद्रू के हजार पुत्रों पर भारी पड़ने लगा। परिणामस्वरूप विनता और कद्रू के संबंध दिन-प्रतिदिन कटु से कटुतर होते गए। फिर एक दिन जब विनता और कद्रू भृमण कर रही थी। कद्रू ने सागर के किनारे दूर खड़े सफेद घोड़े को देखकर विनता से कहा- “बता सकती हो विनता ! दूर खड़ा वह घोडा किस रंग का है ?” विनता बोली- “सफेद रंग का।” कद्रू बोली- “शर्त लगाकर कह सकती हो कि घोडा सफेद रंग का ही है। मुझे तो इसकी पूंछ काले रंग की नजर आ रही है।” विनता बोली- “तुम्हारा विचार गलत है। घोडा पूंछ समेत सफेद रंग का है।” दोनों में काफी देर तक यही बहस छिड़ी रही। आखिर में कद्रू ने कहा- “तो फिर हम दोनों में शर्त हो गई। कल घोड़े को चलकर देखते है। यदि वह सम्पूर्ण सफेद रंग का हुआ तो मैं हारी, और यदि उसकी पूंछ काली निकली तो मैं जीत जाऊंगी। उस हालत में जो भी हम दोनों में से जीतेगी, तो हारने वाली को जितने वाली की दासी बनना पड़ेगा। बोलो तुम्हे मंजूर है ?” विनता बोली- “मुझे मंजूर है।” रात को ही कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को बुलाकर कहा- “आज रात को तुम सब उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट जाना। ताकि सुबह जब विनता देखे तो उसे घोड़े की पूंछ काली नजर आए।” योजनानुसार नाग उच्चेः श्रवा घोड़े की पूंछ से जाकर लिपट गए। परिणामस्वरूप सुबह जब कद्रू ने विनता को घोड़े की पूंछ काले रंग की दिखाई तो वह हैरान रह गई। बोली- “ऐसा कैसे हो गया। कल तो इसकी पूंछ बिलकुल सफेद थी।” कद्रू बोली- “खूब तसल्ली से देख लो। घोड़े की पूंछ आरम्भ से ही काली है। शर्त के मुताबित तुम हार चुकी हो। इसलिए अब तुम्हे मेरी दासी बनकर रहना पड़ेगा।” विवशतापूर्वक विनता को कद्रू की दासता स्वीकार करनी पड़ी। माता को उदास देखकर गरुड़ ने पूछा- “क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे आप कद्रू की दासता से मुक्त हो जाए ?” विनता बोली- “यह तो कद्रू से ही पूछना पड़ेगा। यदि वह प्रसन्न हो जाती है तो मुझे दासता से मुक्त कर देगी।” गरुड़ अपनी माता विनता को लेकर कद्रू के पास पहुंचा और कहा- “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप मेरी माता को अपनी दासता से मुक्त कर दे।” कद्रू बोली- “हो सकता है। बशर्ते कि तुम मेरे पुत्रों को अमृत लाकर दे दो।” यह सुनकर गरुड़ सोच में पड़ गया। उसने अपनी माता से पूछा- “माँ ! अमृत कहा मिलेगा जिसे लेकर मैं तुम्हे दासी जीवन से मुक्त कर संकू।” विनता ने कहा- “अमृत का पता तुम्हारे पिता बता सकते है पुत्र ! तुम उन्हीं के पास जाकर पूछो।” गरुड़ महर्षि कश्यप के पास पहुंचा। कश्यप अपने पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। गरुड़ ने उनसे पूछा- “पिताश्री ! मैं अमृत लेकर अपनी माता को दासता से मुक्ति दिलाना चाहता हूं। कृपया मुझे बताइये कि अमृत कहा मिलेगा।” महर्षि बोले- “पुत्र ! देवराज इंद्र ने अमृत की सुरक्षा के लिए बहुत व्यापक प्रबंध कर रखा है। वहां तक पहुचना कठिन है।” गरुड़ बोला- “इंद्र ने कितनी ही कड़ी सुरक्षा प्रबंध क्यों न कर रखे हो। मगर मैं अमृत ले आऊंगा। आप मुझे सिर्फ उस स्थान का पता बता दीजिये।” महर्षि कश्यप ने गरुड़ को इंद्र का
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