August 8, 2022

विक्रम बेताल की इक्कीसवीं कहानी: सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था?

सम्राट विक्रमादित्य ने योगी को दिए वचन को पूरा करने के लिए एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारकर अपने कंधे पर बैठा दिया। इसके बाद वह योगी के पास चल दिए। रास्ता तय करने के लिए बेताल ने एक नई कहानी शुरू की। बेताल बोला… बहुत समय पहले की बात है। विशाला नाम के राज्य में पदमनाभ नाम का एक राजा राज किया करता था। उसी के राज्य में एक साहूकार रहता था। उस साहूकार का नाम था अर्थदत्त। अर्थदत्त की एक सुंदर लड़की थी, अनंगमंजरी। अनंगमंजरी जब बड़ी हुई तो साहूकार ने मणिवर्मा नाम के एक धनी साहूकार से उसका विवाह कर दिया। मणिवर्मा, अनंगमंजरी को काफी चाहता था, लेकिन अनंगमंजरी, मणिवर्मा को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। एक दिन मणिवर्मा किसी काम से अपने राज्य से बाहर गया था और अनंगमंजरी अकेली थी। इसलिए वह अपने घर से कुछ दूर टहलने के लिए निकली। तभी रास्ते में अनंगमंजरी ने राजपुरोहित के लड़के कमलाकर को देखा। कमलाकर को देखते ही अनंगमंजरी को उससे प्रेम हो गया। वहीं, दूसरी ओर कमलाकर भी अनंगमंजरी को मन ही मन चाहने लगा था। अनंगमंजरी बिना देर किए महल के बाग में जाती है और चंडी देवी को प्रणाम करती है। अनंगमंजरी चंडी देवी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, “हे माता, अगर मैं इस जन्म में कमलाकर को नहीं पा सकी, तो अगले जन्म में मैं उनकी ही पत्नी बनूं।” इतना कहते हुए अनंगमंजरी ने अपना दुपट्टा खींचा और पेड़ पर दुपट्टे से फांसी लगाने की तैयारी करने लगी। तभी राज्य की दासी और अनंगमंजरी की सहेली वहां आ गई। सहेली ने कहा, “अनंगमंजरी तुम ये क्या कर रही हो।” इस पर अनंगमंजरी उसे अपनी मन की बात बताती है। यह सुनने के बाद सहेली कहती है, “तुम बिल्कुल भी परेशान न हो। जल्द ही मैं कमलाकर से तुम्हारी मुलाकात करा दूंगी।” सहेली की यह बात सुनकर अनंगमंजरी रुक गई। अगले ही दिन अनंगमंजरी की सहेली ने कमलाकर के साथ उसकी मुलाकात का प्रबंध किया। दोनों एक-दूसरे से मिलने बाग में पहुंचे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खुद को रोक न सके। कमलाकर बेताब होकर अनंगमंजरी की ओर दौड़ा। कमलाकर को अपने नजदीक आते देख अनंगमंजरी की धड़कने तेज हो गईं और मारे खुशी के उसकी धड़कने ही रुक गईं। अनंगमंजरी को मरा देख कमलाकर भी बहुत दुखी हुआ, जिससे उसका दिल फट गया और वह भी मर गया। इस बीच मणिवर्मा भी वहां पहुंच गया और अपनी पत्नी को दूसरे आदमी से साथ मृत पड़ा देख बहुत दुखी हुआ। वह अनंगमंजरी को बहुत चाहता था। इसलिए उससे अपनी पत्नी का वियोग सहा नहीं गया और उसने भी प्राण छोड़ दिए। यह सब देख चंडी देवी स्वयं वहां प्रकट हुईं और सबको दोबारा जीवित कर दिया। इतना कहकर बेताल बोला, “बता बिक्रम इन तीनों में सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था।” जब विक्रम कुछ नहीं बोला तो बेताल ने फिर कहा, “बता विक्रम प्रेम में अंधा कौन था।” बेताल के बार-बार पूछने पर विक्रम ने कहा, “सुनो बेताल, सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा था मणिवर्मा। वजह यह है कि अनंगमंजरी और कमलाकर अचानक मिले और वह उस खुशी के कारण मरे। वहीं, मणिवर्मा यह देख कर शोक में मर गया कि उसकी पत्नी किसी दूसरे से प्रेम करती थी और अपने प्रेम से मिलने की खुशी में मर गई।” यह सुनते ही बेताल बोला, “हां राजन, तुमने बिल्कुल सही जवाब दिया, लेकिन तू बोला तो मैं चला। इतना कहकर बेताल एक बार फिर विक्रम के कंधे से उड़कर पेड़ पर फिर जा लटकता है। इसी के साथ प्रेम में अंधा कौन विक्रम बेताल कहानी समाप्त होती है। कहानी से सीख : किसी भी चीज की अति नुकसानदायक हो सकती है, इसलिए इंसान को हमेशा अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।

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विक्रम बेताल की बीसवीं कहानी: बालक क्यों हंसा?

इस बार भी पेड़ पर लटके बेताल को राजा विक्रमादित्य उतारते हैं और कंधे पर लादकर आगे बढ़ते हैं। बेताल हर बार की तरह राजा विक्रमादित्य को फिर से एक कहानी सुनाता है। बेताल कहता है… एक बार की बात है, चित्रकूट नगर में एक चन्द्रवलोक नाम का राजा राज करता था। उसे शिकार करने का बहुत शौक था। एक बार वो जंगल में शिकार करने निकला, वहां घूमते-घूमते वो रास्ता भटक गया। थककर वो एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा। आराम करते हुए उसने एक खूबसूरत कन्या को देखा। उसकी खूबसूरती राजा की आंखों में बस गई। उस लड़की ने फूलों के गहने पहने हुए थे, राजा उस कन्या के पास पहुंचा। वो कन्या भी राजा को देखकर बहुत खुश हुई। इतने में उस कन्या की सहेली ने राजा से कहा कि यह ऋषि की बेटी है। उसकी सहेली की बात सुनकर राजा खुद ही ऋषि के पास गए, उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने राजा से पूछा, “राजा आप यहां कैसे?” राजा ने कहा, “मैं यहां शिकार खेलने आया था।” राजा की बात सुन ऋषि ने कहा, “बेटा, तुम क्यों मासूम जीवों को मारकर पाप के भागी बन रहे हो।” ऋषि की बात का राजा पर बहुत असर हुआ। राजा ने कहा, “मुझे आपकी बात समझ आ गई है, अब मैं कभी शिकार नहीं करूंगा।” राजा की बात सुनकर ऋषि बहुत खुश हुए और बोले, “राजा तुम्हें जो मांगना है मांगो।” राजा ने ऋषि की बेटी के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा। ऋषि ने राजा की बात मान ली और बेटी की शादी राजा के साथ कर दी। शादी के बाद राजा अपनी पत्नी को लेकर अपने राज्य के तरफ चल पड़ा। रास्ते में जाते-जाते दोनों को एक भयानक राक्षस मिला। वो राक्षस बहुत ही भयानक था, उसने राजा की पत्नी को खाने की धमकी दी। राक्षस ने कहा, “अगर अपनी रानी को बचाना चाहते हो तो सात दिन के अंदर एक ऐसे ब्राह्मण के बेटे की बलि दो, जो खुद की मर्जी से अपने-आपको समर्पित कर दे और उसकी मौत के वक्त उसके माता-पिता उसके हाथ पकडे रहे।” राजा बहुत डरा हुआ था और उसी डर से उसने राक्षस की बात मान ली। राजा डरते हुए अपने नगर पहुंचा और अपने दीवान को सारी बात बताई। दीवान ने राजा की पूरी बात सुनते हुए राजा को सांत्वना दी और कहा, “आप चिंता मत कीजिये, मैं कुछ उपाय करता हूं।” फिर दीवान ने सात साल के एक बालक की मूर्ति बनवाई और उसे कीमती गहने और कपड़े पहनाएं। उसके बाद दीवान ने उस मूर्ति गांव-गांव और आस-पास के नगरों में भी घुमवाया। साथ ही उसने यह भी कहलवाया कि अगर किसी ब्राह्मण का सात साल का बेटा अपने आपको अपनी मर्जी से बलिदान देगा और बलि के वक्त उसके माता-पिता हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसे यह मूर्ती मिलेगी और साथ ही साथ सौ गांव भी मिलेंगे। यह खबर सुनकर एक ब्राह्मण का बेटा राजी हो गया। उसने अपने माता-पिता से कहा, “आपको बेटे कई मिल जाएंगे, मेरे बलिदान से राजा का भला हो जाएगा और आप लोगों की गरीबी भी खत्म हो जाएगी।” माता-पिता ने काफी मना किया, लेकिन बेटा जिद पर अड़ा रहा और अंत में माता-पिता को मनवा लिया। ब्राह्मण माता-पिता अपने बेटे को लेकर राजा के पास गए। राजा सभी को लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के कहे अनुसार, राजा उस बालक की बलि के लिए तैयार हुआ और बलि के वक्त बालक के माता-पिता ने उसके हाथ पकड़े। राजा ने बालक को मारने के लिए जैसे ही तलवार उठाया, बालक जोर से हंस पड़ा। इतने में ही बेताल ने कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य ब्राह्मण का लड़का क्यों हंसा?” राजा ने जवाब देते हुए कहा, “ब्राह्मण का बेटा इसलिए हंसा क्योंकि जब भी कोई आदमी डरता है तो वो सबसे पहले अपने माता-पिता को बुलाता है। अगर माता-पिता नहीं हो तो व्यक्ति राजा को मदद के लिए बुलाता है। अगर राजा भी मदद न कर सके तो व्यक्ति भगवान को मदद के लिए याद करता है, लेकिन यहां तो कोई भी ब्राह्मण के बेटे की मदद के लिए नहीं था। माता-पिता बालक के हाथ पकड़े हुए थे, राजा हाथ में तलवार लिए खड़ा था और राक्षस उसके सामने उसे खाने के लिए तैयार था। ब्राह्मण का बेटा किसी और की भलाई के लिए खुद का बलिदान दे रहा था और इसी कारण वो हंस पड़ा।” इतना सुनकर बेताल खुश हो गया और राजा की तारीफ। फिर तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। कहानी से सीख : मुसीबत के समय चाहे जीतने भी लोग आसपास रहें, लेकिन उसका सामना अकेले ही करना होता है।

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विक्रम बेताल की उन्नीसवीं कहानी: पिण्ड दान का अधिकारी कौन?

हर बार की तरह इस बार भी राजा विक्रमादित्य ने बेताल को अपने कंधे पर लादा और आगे बढ़ने लगे। सफर लंबा था, इसलिए बेताल ने राजा को फिर से एक नई कहानी सुनाई। बेताल कहता है… यह कहानी है विधवा भागवती और उसकी बेटी धनवंती की। भागवती के विधवा होने के बाद उसके पति के रिश्तेदार उसका सारा धन लेकर भागवती और उसकी बेटी को घर से निकाल देते हैं। इसके बाद दोनों मां-बेटी दूसरे नगर के लिए निकल पड़ती हैं। रास्ते में दोनों एक जगह आराम करने के लिए रुकती हैं तो वहां एक सिपाही एक चोर को बांधकर रखे रहता है। चोर को प्यास लगी होती है वो भागवती और उसकी बेटी धनवंती से पानी पिलाने के लिए विनती करता है। पानी पीने के बाद वो मां-बेटी से सारी बातें पूछता है कि उनके साथ क्या हुआ था। सारी बातें सुनने के बाद चोर धनवंती के साथ शादी करने की इच्छा रखता है। यह सुनकर भागवती को गुस्सा आता है और वो उस सिपाही को चोर की बात बताती है। सिपाही भी चोर पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहता है कि, “कुछ दिनों में तुम्हें फांसी लगेगी और तुम शादी करने की बात करते हो।” यह सुनकर चोर कहता है, “बहुत पाप किये हैं मैंने, अब लगता है कोई तो हो जो मरने के बाद मुझे पानी दे सके। मेरा कोई बच्चा नहीं है, मैं चैन से मर भी नहीं सकता, भूत बनकर भटकूंगा मैं।” यह सब सुनने के बाद सिपाही वहां चोर को बांधकर आराम करने चला गया। सिपाही के जाने के बाद चोर भागवती और उसकी बेटी धनवंती को अपने छिपाये धन के बारे में बताने लगा, उसने कहा, “अगर आप अपनी बेटी धनवंती की शादी मेरे साथ कर देंगी तो मैं आपको अपने छिपाये धन के बारे में बता दूंगा, मेरे मरने के बाद आप दोनों उस धन के साथ अपनी पूरी जिंदगी आराम से बिता सकेंगी।” उसकी बात सुनकर दोनों सोच में पड़ गईं। धनवंती की मां भागवती ने चोर से पूछा, “तुम यह क्यों करना चाहते हो।” तो चोर ने कहा, “शादी के बाद मेरा जो बच्चा होगा वो मेरे मरने के बाद पिंडदान करेगा, जिससे मुझे मुक्ति मिल जाएगी और मैं भूत नहीं बनूंगा।” ये सब सुनने के बाद  भागवती अपनी बेटी की शादी चोर से कराने के लिए तैयार हो जाती है। दोनों की शादी होती है और जल्द ही दोनों को एक बच्चा भी होता है। कुछ दिनों बाद चोर को फांसी लगा दी जाती है। भागवती और धनवंती काफी दुखी होते हैं। कुछ दिनों बाद भागवती को चोर की बात याद आती है कि एक गुफा में मूर्ति के सामने की जमीन के नीचे उसने खजाना छिपाकर रखा था। दोनों मां-बेटी वहां जाकर देखते हैं और जमीन खोदने लगते हैं, फिर उन्हें वहां सोना-चांदी और पैसे मिलते हैं। धनवंती फिर भी दुखी रहती है और कहती है, “अगर पैसे नहीं मिलते, लेकिन वो जिंदा रहते तो मुझे सबकुछ मिल जाता।” भागवती बेटी को समझाते हुए बोलती है कि, “अगर पैसा है तो सारी खुशी मिल जाएगी।” उसके बाद दोनों मां-बेटी एक नए शहर जाकर खुशी-खुशी अपनी जिंदगी बिताने लगते हैं। कुछ समय बाद भागवती की सहेलियां धनवंती की शादी कराने को लेकर पूछने लगती हैं। भागवती कहती है, “मुझे अपनी बेटी की शादी तो करवानी है, लेकिन लड़का ऐसा होना चाहिए जो घर-जमाई बनकर रहे।” फिर कुछ वक्त बाद एक एक पंडित लड़का उनके घर आता है, जिसके सामने भागवती अपनी बेटी धनवंती के शादी का प्रस्ताव रखती है। उनका बड़ा घर और पैसे देखकर वो लड़का लालच में आकर शादी के लिए हां कर देता है। वो कुछ वक्त तक उनके साथ रहता है और उनका भरोसा जीतने के बाद एक रात घर के सारे गहने और पैसे लेकर भाग गया। इस दुख में धनवंती की मां भगवती की मौत हो गई और धनवंती गरीब और अकेली हो गई। उसके बाद वो उस शहर से अपने बच्चे के साथ दूसरे शहर निकल पड़ी। समय बीतता गया और धनवंती किसी तरह अपना गुजारा करने लगी। धीरे-धीरे धनवंती का बच्चा भी बड़ा होने लगा। एक दिन दोनों मां-बेटे रास्ते में भटक रहे थे कि इतने में उन दोनों की नजर एक राजकुमार पर पड़ी, जिसके गले को एक अजगर ने जकड़ रखा था। धनवंती के बेटे ने उस अजगर को काफी मुश्किलों के बाद राजकुमार के गले से निकाला, लेकिन अफसोस तब तक राजकुमार की मौत हो गई थी। इसी बीच राजकुमार के पिता जो कि उस राज्य के राजा थे वो वहां पहुंच गए। बेटे की मौत से वो काफी दुखी हुए, लेकिन धनवंती के बेटे के साहस को देखते हुए राजा ने धनवंती के बेटे को गोद लेने का फैसला किया। धनवंती और उसका बेटा महराज के यहां रहने लगें। धनवंती का बेटा देखते ही देखते राजमहल और राजा के सारे कार्यों को सीख गया और राजा के बेटे की जगह ले ली। राजा की उम्र बहुत ज्यादा हो गई थी और कुछ वक्त बाद राजा की मौत हो गई। राजा ने मरने से पहले धनवंती के बेटे को सारा राजपाठ सौंप उसे राजा बना दिया। उसके बाद धनवंती ने अपने बेटे से कहा कि पिता की मौत के बाद बेटे को पिता की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करना होता है। यह बात सुन उसका बेटा अपनी मां धनवंती के साथ पिंड दान करने निकल पड़ा। जब वो नदी के किनारे पहुंचा तो उसे तीन हाथ दिखाए दिए। इतनी कहानी सुनाने के बाद बेताल रुक गया और हर बार की तरह इस बार भी उसने राजा विक्रमादित्य से सवाल पूछा,  “बताओ राजन, उस लड़ने का पिता कौन है? धनवंती का बेटा किस हाथ में पिंड देगा? इसमें एक हाथ उस चोर का है, जिसके साथ धनवंती की शुरुआत में शादी हुई थी। दूसरा हाथ उस आदमी का है, जिसने धन की लालच में धनवंती से विवाह किया था और तीसरा हाथ उस राजा का, जिसने धनवंती के बेटे को गोद लेकर अपने बेटे की तरह रखा था।” विक्रमादित्य ने जवाब दिया, “उस लड़के का पिता वो चोर है, जिसने धनवंती से पूरे रीति-रिवाज के साथ शादी की। दूसरे व्यक्ति ने लालच में

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विक्रम बेताल की अठारहवीं कहानी: ब्राह्मण कुमार की कथा

बेताल का पीछा करते हुए राजा विक्रामादित्य शिशपा वृक्ष के पास पहुंचे और किसी तरह बेताल को अपने कंधे पर उठाकर आगे बढ़ने लगे। पहले की तरह ही बेताल रास्ता बड़ा होने की वजह से राजन को कहानी सुनाने लगता है। बेताल कहता है… सालों पहले की बात है, जब उज्जैन नगर में राजा महासेन राज किया करता था। उसी राज्य में एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम वासुदेव था। उसका एक ही बेटा था, गुणकार। नाम का तो वह गुणकार था, लेकिन उसमें कोई गुण नहीं था। वो दिन रात बस जुआ खेलता था। जुए में वह पिता के कमाए सारे पैसे हार जाता। उसकी दो बहन भी थीं। उसे उनका भी ख्याल नहीं था। वो बस दिन-रात जुआ खेलने में ही व्यस्त रहता। अपने बेटे का ऐसा हाल देखकर ब्राह्मण बड़ा परेशान हो गया। एक दिन वासुदेव ने सोचा, मैं जो भी कमाता हूं, उसे भी यह जुएं में उड़ा देता है। यही सोचकर उसने अपने बेटे गुणकार को घर से निकाल दिया। घर से निकलते ही वह दूसरे राज्य पहुंच गया। वहां वह भूखा-प्यासा घूमता रहा, न तो उसे कोई काम मिला और न ही कुछ खाने के लिए। ऐसा होते-होते वह एक दिन बेहोश हो गया। पास से ही गुजर रहे एक सिद्ध पुरुष ने उसे देखा, तो उसे अपने साथ गुफा में ले आए। होश में आने के बाद योगी ने लड़के से पूछा, “क्या खाओगे।” ब्राह्मण पुत्र कहता है, “आप योगी हैं, आपके पास जो होगा आप वही खिला पाएंगे। मैं जो खाना चाहता हूं, शायद वो आपके पास न हो।” इतना सुनते ही योगी ने कहा, “तुम बस बताओ, तुम्हें क्या खाने की इच्छा है।” इतना सुनने के बाद गुणकार ने अपनी इच्छा जाहिर की, जिसे सुनते ही योगी ने अपनी सिद्धि की मदद से उसकी मनपसंद थाली प्रकट कर दी। वह लड़का हैरान रह गया, पहले उसने खान खाया और फिर सिद्ध पुरुष से पूछा, “यह चमत्कार आपने कैसे किया।” योगी ने कुछ कहा नहीं, बस अंदर की ओर जाना का इशारा किया। वह जैसे ही अंदर गया, तो उसे बड़ा सा महल और दासियां दिखाई दीं। सब ने उसकी अच्छे से सेवा की और वह आराम से सो गया। सोकर उठने के बाद उसने सिद्ध पुरुष से दोबारा वही प्रश्न किया। योगी ने कहा, “इससे तुम्हें क्या करना है, तुम यहां कुछ दिन मेहमान की तरह रहो और व्यवस्था का आनंद उठाओ।” ब्राह्मण पुत्र जिद में अड़ गया और कहने लगा कि वो भी यह सिद्धि हासिल करना चाहता है। परेशान होकर योगी ने उसे विधि बता दी और कहा कि जाओ अब मन लगाकर साधना करो। कुछ समय बाद वह साधना पूरी करके आ जाता है। फिर योगी कहता है, “तुम सब कुछ बहुत सही तरीके से कर रहे हो। यह पहला पड़ाव था, जिसे तुमने पार किया है। अब तुम्हें दूसरे पड़ाव की ओर बढ़ना होगा।” उसने कहा, “मैं, ऐसा ही करूंगा, लेकिन दूसरा पड़ाव शुरू करने से पहले मैं एक बार अपने घर जाना चाहता हूं।” सिद्ध योगी ने कहा, “जाओ, जरूर जाओ।” जाने से पहले ब्राह्मण पुत्र ने योगी से अपने परिवार के लिए तोहफे की मांग की। योगी ने अपनी सिद्धि से उसे खूब सारे तोहफे दिए। उसके बाद उसने पैसों की मांग की, सिद्ध पुरुष ने अपनी विद्या के दम पर उसे खूब सारा पैसा भी दिया। उसके बाद उसने अपने लिए अच्छे से कपड़े मांगे, योगी ने उसे वो भी दे दिए। सब कुछ लेकर वह अपने घर पहुंचा, तो उसके परिवार के सभी लोग गुणकार को देखकर दंग रह गए। साथ लाए तोहफे और धन को देखकर उसके ब्राह्मण पिता ने पूछा, “बेटा कहीं तुमने कोई चोरी तो नहीं की है न।” गुणकार ने बड़े गर्व से कहा, “पिताजी मुझे कुछ ऐसा प्राप्त हो गया है, जिसकी मदद से मैं अब सबकी हर इच्छा पूरी कर सकता हूं।” उसके पिता ने गुणकार को संभल कर रहने और अहंकार न करने की सलाह दी। कुछ दिन घर में बिताने के बाद गुणकार दोबारा सिद्ध पुरुष के पास लौट गया। वहां लौटकर उसने दोबारा से साधना शुरू की। बड़ी लगन से वह ध्यान करने लगा। समय के साथ-साथ ब्राह्मण पुत्र ने दूसरा पड़ाव भी पूरा कर लिया। पड़ाव पूरा होने के बाद उसे भी वह विद्या हासिल हो गई। योगी के पास जैसे ही वह विद्या हासिल करके पहुंचा, तो सिद्ध पुरुष बहुत प्रसन्न हुआ। उसने गुणकार से कहा, “तुमने अब विद्या हासिल कर ली है, आज तुम मुझे कुछ भोजन खिलाओ। मुझे भूख लगी है।” यह सुनते ही ब्राह्मण पुत्र बेहद खुश हुआ और सिद्धि की मदद से मन चाहा भोजन हासिल करने के लिए मन में मंत्र पड़ने लगा। काफी देर हो गई, लेकिन भोजन सामने नहीं आया। वह बहुत क्रोधित हुआ और चिल्लाने लगा, मेरी विद्या काम क्यों नहीं कर रही है। मैंने भी सिद्धि हासिल की है, उसका फल मुझे क्यों नहीं मिल रहा है? इतनी कहानी सुनाते ही बेताल चुप हो गया और राजा से पूछने लगा, बताओ इतने मन से पूरी विधि करने के बाद भी उसे सिद्धि हासिल क्यों नहीं हो पाई। विक्रमादित्य कहते हैं, बेताल! सबसे पहला कारण, तो यह है कि वह विद्या हासिल करने से पहले ही घर चला गया। उसके बाद वह विद्या लालच की वजह से हासिल करना चाहता था। लालच के चलते की गई चीजों का फल कभी प्राप्त नहीं होता है। सिद्धि हासिल करने के लिए व्यक्ति को बिना लालच के कर्म करना पड़ता है। कहानी से सीख: हमें कभी भी विद्या हासिल करने का फैसला लालच की वजह से नहीं करना चाहिए और विद्या पर अहंकार हो जाए, तो वह समय पर काम नहीं आती।

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विक्रम बेताल की सत्रहवीं कहानी: अधिक साहसी कौन?

इस बार भी राजा विक्रमादित्य ने बड़े से पेड़ पर लटके बेताल को उतारा और उसे लेकर आगे बढ़ने लगे। खुद को बचाने के लिए बेताल ने फिर से राजा को एक कहानी सुनाई। बेताल कहता है… एक बार की बात है, कनकपुर नाम का एक शहर था, जिसके राजा का नाम यशोधन था। वो राजा अपनी प्रजा का खूब ख्याल रखता था। उसी शहर में एक सेठ भी था, जिसकी बेटी का नाम उन्मादिनी था। वो बहुत ही सुंदर और गुणी थी, उसे जो भी देखता वो उसे देखता ही रह जाता था। जब सेठ की बेटी बड़ी हुई तो सेठ ने उसके शादी का निर्णय लिया। सेठ सबसे पहले राजा के पास अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव लेकर गया। सेठ ने राजा के पास जाकर कहा कि, “महाराज मैं अपनी बेटी की शादी के बारे में सोच रहा हूं। वो बहुत ही सुंदर, गुणी और विद्वान है। आप यहां के महाराज हैं, सबसे ज्यादा साहसी, गुणी और विद्वान आपसे अच्छा मेरी बेटी के लिए कोई नहीं हो सकता है। ऐसे में सबसे पहले मैं आपको निवेदन करना चाहता था, आप मेरी बेटी को पत्नी के रूप में अपनाएं और अगर आपको मंजूर नहीं तो आप अस्वीकार कर दें।” सेठ की बता सुनकर राजा उनकी बेटी को देखने और उनके लक्षणों को परखने के लिए ब्राह्मणों को भेजा। राजा की बात मानकर ब्राह्मण वहां उन्मादिनी को देखने गए। ब्राह्मण उन्मादिनी को देखकर काफी खुश हुए, लेकिन दूसरे ही पल उन्हें इस बात की चिंता भी हुई कि अगर राजा ने इतनी खूबसूरत लड़की से शादी की तो वो पूरा दिन उन्हें देखते ही रहेंगे और प्रजा पर ध्यान नहीं दे पाएंगे। इसलिए, ब्राह्मणों ने फैसला किया कि वो राजा को उन्मादिनी के रूप और गुणों के बारे में कुछ नहीं बताएंगे। सारे ब्राह्मण राजा के पास पहुंचे और बोले कि, “राजा वो लड़की अच्छी नहीं है, इसलिए आप उनसे शादी न करें।” ब्राह्मणों की बात सुनकर राजा को लगा कि वो लोग सच बोल रहे हैं। राजा ने उन्मादिनी से शादी करने के लिए मना कर दिया। फिर सेठ ने राजा की अनुमति से राजा के सेनापति बलधर के साथ अपनी बेटी की शादी करा दी। उन्मादिनी शादी के बाद खुशी से रहने लगी, लेकिन कभी-कभी उसके मन में यह बता जरूर आती थी कि राजा ने उसे बुरी औरत समझकर उसके साथ शादी करने से मना कर दिया था। एक बार बसंत के मौसम में राजा बसंत का मेला देखने निकले। राजा की सैर की खबर उन्मादिनी को भी मिली, वो देखना चाहती थी कि वो कौन राजा था, जिसने उसके साथ शादी नहीं की। यह सोचकर उन्मादिनी अपने घर की छत पर राजा को देखने के लिए खड़ी हो गई। राजा अपनी पूरी सेना के साथ उधर से जा ही रहे थे कि उनकी नजर छत पर खड़ी उन्मादिनी पर पड़ी। उसे देखकर राजा पूरी तरह से आकर्षित हो गए। उन्होंने अपने सेवक से पूछा, “यह खूबसूरत लड़की कौन है?” तब सेवक ने राजा को सारी कहानी बताई, “यह वही लड़की है, जिसके साथ ब्राह्मणों के कहने पर आपने शादी करने से मना कर दिया था। बाद में इसकी शादी सेनापति बलधर के साथ हो गई थी।” पूरी बात सुनकर राजा को गुस्सा आया और उसने ब्राह्मणों को नगर छोड़ने की सजा दे दी। उसके बाद राजा बार-बार यह बात सोच-सोचकर दुखी रहने लगा। उसे बार-बार शर्म भी आ रही थी कि वो एक ऐसी लड़की के बारे में सोच रहा था जो पहले से ही शादीशुदा है। राजा के हाव-भाव से आसपास के लोग उनकी मन की बात समझने लगे। राजा के मंत्री और चाहने वालों ने राजा से कहा, “राजा इसमें दुखी होने वाली क्या बात है, सेनापति तो आपके लिए ही काम करता है तो आप उनसे बात कर उसकी पत्नी को अपना लें।” राजा ने लेकिन मंत्रियों की बात नहीं मानी। राजा का सेनापति बलधर, जिससे उन्मादिनी की शादी हुई थी, वो राजा का भक्त था। उसे जब राजा की बात पता चली तो वो राजा के पास पहुंच गया और बोला, “राजा, मैं आपका दास हूं और वो आपके दासी की ही पत्नी है। मैं खुद उसे आपको भेंट देता हूं। आप उसे अपना लें या फिर मैं उसे मंदिर में छोड़ देता हूं। वो देवकुल की स्त्री हो जाएगी तो आप उसे अपना सकते हैं।” राजा को सेनापति की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया। राजा ने कहा, “राजा होकर मैं ही ऐसा बुरा काम करूंगा, कभी नहीं। तुम मेरे भक्त होकर मुझे ऐसा काम करने को कह रहे हो। अगर तुम अपनी पत्नी को नहीं अपनाओगे तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।” राजा मन ही मन उन्मादिनी के बारे में सोचते-सोचते मर गया। सेनापति राजा की मौत से बहुत दुखी हुआ और इस बात को सह नहीं पाया। उसने अपने गुरु को सब बात बताई। उसके गुरु ने कहा, “सेनापति का धर्म होता है कि वो राजा के लिए अपनी जान दे दे।” यह बात सुनकर सेनापति ने राजा के लिए बनाई गई चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। जब यह बात सेनापति की पत्नी उन्मादिनी को पता चली तो उसने भी अपने पति के लिए अपने प्राण त्याग दिए। इतना बताने के बाद बेताल ने राजा विक्रमादित्य से सवाल पूछा, “बताओ राजन, राजा और सेनापति में सबसे ज्यादा हिम्मतवाला कौन था?” विक्रमादित्य बोला, “राजा सबसे अधिक साहसी था, क्योंकि उसने राज धर्म निभाया। उसने सेनापति के कहने पर भी उन्मादिनी को नहीं अपनाया और खुद मर जाना सही समझा। सेनापति एक अच्छा सेवक था, अपने राजा के लिए उसने अपनी जान दे दी, इसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी। असली हिम्मत वाला तो राजा था, जिसने अपने धर्म और काम को अनदेखा नहीं किया।” विक्रमादित्य का जवाब सुनकर बेताल खुश हुआ और हर बार की तरह पेड़ पर जाकर लटक गया। कहानी से सीख : असली हिम्मतवाला इंसान वही होता है, जो खुद से पहले अपने परिवार के बारे में सोचे और अपनों का ध्यान रखे।

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