August 6, 2022

विक्रम बेताल की कहानी: सबसे अधिक कोमल कौन? – बेताल पच्चीसी ग्यारहवीं

बेताल का उड़कर पेड़ पर लौटने और राजा विक्रम का उसे दोबारा पकड़ने का सिलसिला जारी रहता है। इस बार राजा विक्रमादित्य बेताल को फिर से पेड़ से उतारकर ले जाते हैं। रास्ते में बेताल राजा से कहता है, “मार्ग बहुत बड़ा है, चलो मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूं, इसे तुम ध्यान से सुनना।” बेताल बताता है.. एक समय की बात है, गौड़ नाम के देश में गुणशेखर राजा का राज हुआ करता था। राजा इतना बलवान था कि उसकी चर्चा दूर-दूर के राज्यों तक फैली हुई थी। उस राजा की तीन सुंदर बेटियां थीं। तीनों इतनी कोमल थीं कि राजा को अक्सर उनकी चिंता लगी रहती थी। राजा की सबसे बड़ी बेटी इतनी कोमल थी कि चांद के प्रकाश से ही उसके शरीर पर छाले पड़ जाते थे। दूसरी बेटी को गुलाब के फूल जैसी नाजुक चीज के टकराने पर भी चोट लग जाती और खून बहने लगता था। तीसरी बेटी के कानों में किसी के चलने या कुछ कूटने की आवाज पहुंचते ही उसके हाथ-पांव पर छाले पड़ जाते थे। हर कोई उनकी इस कोमलता के बारे में सुनकर हैरान रह जाता था। कई राजकुमार उनसे शादी भी करना चाहते थे, लेकिन उनकी कोमलता के बारे में जानकर पीछे हट जाते। राजा को उनकी शादी की चिंता सताने लगी। उन्हें लगने लगा कि इस कठोर संसार में उसकी कोमल बेटियां कैसे जी पाएंगी। तब राजा ने फैसला लिया कि वो सबसे पहली बेटी को हर दम छांव में ही रखेंगे, ताकि किसी तरह की रोशनी की वजह से उसके शरीर पर छाले न पड़ें। राजा ने दूसरी बेटी को हल्के कपड़ों और गहनों के साथ ऐसी जगह रखने का फैसला किया जहां कोई भी चीज उससे न टकराए। राज ने तीसरी बेटी को ऐसी जगह रखा जहां किसी की भी आवाज न पहुंच पाए। इसी दौरान एक पड़ोस के राज्य का राजकुमार उनकी कोमलता के बारे में सुनने के बाद गौड़ देश पहुंच गया। उसने सबसे पहली राजकुमारी के चेहरे को गुलाब के फूल का स्पर्श कराया, जिससे राजकुमारी के चेहरे पर घाव के निशान बन गए। राजकुमार हैरान रह गया। इसके बाद उसने दूसरी राजकुमारी को चांदनी रात में बाहर जाने को कहा, लेकिन जब राजकुमारी ने मना कर दिया, तो वो उसे खिड़की के पास ले गया, जहां चांद की रोशनी पड़ रही थी। चांद की रोशनी राजकुमारी पर पड़ते ही उसके शरीर पर छाले पड़ गए। अगले दिन राजकुमार ने सभी लोगों से मसाला कूटने के लिए कहा, जिसकी आवाज सुनकर सबसे छोटी राजकुमारी बेहोश हो गई। इतनी कहानी सुनाकर बेताल एकदम चुप हो गया और राजा विक्रम से पूछा, “महाराज ये बताइये कि इन तीनों राजकुमारियों में से सबसे अधिक सुकुमारी व कोमल कौन सी है और राजकुमार कौन सी राजकुमारी से विवाह करेगा।” सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से आपका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।” इतना सुनने के कुछ देर बाद राजा बोले, “तीसरी राजकुमारी सबसे अधिक सुकुमारी है, क्योंकि बिना कुछ किए ही उसके हाथ पैर पर छाले पड़ रहे थे और वो बेहोश हो रही थी। वो सिर्फ तन से नहीं मन से भी कोमल है। इसी वजह से राजकुमार सबसे छोटी राजकुमारी से शादी करेगा।” जवाब मिलते ही बेताल राजा विक्रम की पीठ से उड़कर फिर से पेड़ पर जाकर लटक जाता है और राजा उसके पीछे-पीछे जंगल की ओर भागते हैं। कहानी से सीख: इंसान को अपना मन साफ रखना चाहिए। साफ मन वाले लोग दूसरों के दुख को पहचान लेते हैं।

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विक्रम बेताल की दसवीं कहानी: सबसे अधिक त्यागी कौन?

एक बार फिर राजा विक्रमादित्य बेताल को पेड़ से उतारकर योगी के पास जाने के लिए आगे बढ़ता है। हर बार की तरह इस बार फिर बेताल राजन को एक कहानी सुनाता है। बेताल बताता है कि… वीरबाहु नाम का एक राजा था, जो छोटे-छोटे राज्यों पर राज किया करता था। राजा अनगपुर नामक राजधानी में रहता था। उसी राजधानी में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी भी रहता था, जिसकी मदनसेना नाम की एक बेटी थी। व्यापारी की बेटी अक्सर घूमने के लिए बाग में जाया करती थी। एक दिन एक युवक ने मदनसेना को बाग में देखा और देखता ही रह गया। वो मदनसेना से प्रेम करने लगा था और हर दम उसी के ख्यालों में डूबा रहता है।एक दिन हिम्मत करके युवक बाग में गया। वहां मदनसेना अकेले बैठी थी। उसने नवयुवती को बताया, “मेरा नाम धर्म सिहं है और मैं आपकी खूबसूरती पर फिदा हो गया हूं।” व्यापारी के बेटी ने उत्तर दिया, “ मुझसे तुम दूर रहो, मैं किसी और की अमानत हूं।” धर्म सिंह उसकी बात नहीं सुनता और उससे विवाह का आग्रह करता है। फिर मदनसेना बताती है, “मेरा विवाह समुद्र दत्त के साथ तय हो गया है और मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकती हूं।” इतना सुनते ही धर्म सिंह दुखी हो गया। गुस्से में उसने मदनसेना से कहा, “अगर तुम मेरी हुईं तो मैं अपनी नस काट लूंगा।” यह सुनकर मदनसेना बहुत डर गई। मदनसेना ने उसे वचन दिया कि वो ठीक पांच दिन बाद उससे मिलने के लिए आएगी। यह सुनकर धर्म सिंह खुश हो गया। पांचवें दिन मदनसेना का विवाह समुद्र दत्त से होना था। विवाह के सारे रीति-रिवाज पूरे करने के बाद मदनसेना अपने पति समुद्रदत्त के घर चली गई, लेकिन उसे धर्म सिंह को दिया हुआ अपना वादा याद था। पति जैसे ही मदनसेना के पास जाता है, तो वह उससे कहती है कि मुझे आपसे बहुत जरूरी बात करनी है। वो बताती है, “ मुझे एक लड़के से मिलने जाना है, जिसे मैंने शादी से पहले आज के दिन मिलने का वचन दिया था।” यह बात सुनकर समुद्र दत्त बहुत दुखी हो गया। उसने सोचा कि ऐसी महिला पर तो धिक्कार है, जो पहले दिन ही दूसरे आदमी के पास जाना चाहती है। इसे अगर मैं रोकूंगा तो भी यह चली ही जाएगी। ऐसा सोचकर समुद्र दत्त ने उसे जाने की इजाजत दे दी। पति से जाने की आज्ञा मिलने के बाद मदनसेना तेजी से उस लड़के के घर की ओर जाने लगी। दुल्हन के कपड़ों में जाती महिला को देखकर एक चोर ने उसे रोक दिया। उसका पल्ला पकड़कर चोर बोला, “कहा चली।” मदनसेना डर गई। उसने चोर को कहा, “तुम मेरे गहने ले लो और मुझे जाने दे।” चोर ने कहा,” मुझे तेरे गहने नहीं बल्कि तू चाहिए।” मदनसेना ने सारी बात बताते हुए कहा, “पहले मैं धर्म सिंह से मिलने जाऊंगी, उसके बाद मैं लौटकर तुम्हारे पास आऊंगी।” चोर ने पूछा, “तुम शादी के पहले दिन ही अपने पति को छोड़कर जा रही हो।” लड़की ने जवाब दिया कि वो अपने पति की इजाजत लेकर जा रही है। यह सुनकर चोर ने कहा, “जब तुम्हारा पति तुम्हें भेज सकता है, तो जाओ मैं भी तुम्हें जाने देता हूं। पर वहां से लौटकर सीधे तुम मेरे पास आना।” मदनसेना चोर को वचन देकर उस लड़के पास जाने के लिए चलने लगी। उधर, मदनसेना का पति और चोर दोनों उसका पीछा कर रहे थे। चलते-चलते मदनसेना धर्म सिंह के घर पहुंच गई। उसने मदनसेना को शादी के जोड़े में देखकर पूछा, “अरे! तुम मुझसे विवाह करने के लिए शादी का जोड़ा पहनकर आई हो।” मदनसेना ने उसे बताया कि उसकी शादी हो गई है। इतना सुनते ही लड़के ने कहा, “तुम कैसे अपने पति से बचकर यहां आ गई।” मदनसेना ने उसे सारी बात बता दी कि वो किस तरह अपने पति से इजाजत लेकर आई है। यह सुनते ही धर्म सिंह ने कहा, “तुम्हारे पति ने इतने विश्वास के साथ तुम्हें आने दिया है और अब तुम शादी करके किसी और की अमानत बन गई हो। प्रेम तो मैं तुमसे बहुत करता हूं, लेकिन किसी और की स्त्री को हाथ नहीं लगा सकता। इससे पहले की कोई तुम्हें देख ले, तुम जाओ अपने पति के पास।” चोर और मदनसेना का पति दोनों छुपकर उनकी सारी बातें सुन रहे थे। जैसे ही मदनसेना, धर्म सिंह के घर से बाहर निकलती है, तो वह दोनों भी अपने-अपने रास्ते पर निकल पड़ते हैं। मदनसेना लड़के के घर से निकलकर सीधा चोर के पास पहुंचती है। चोर उसे देखकर मन में सोचता है, यह कितनी पवित्र है, इसके साथ कुछ भी करना गलत होगा। साथ ही उसे धर्म सिंह के घर की बात भी याद आ जाती है। वो मदनसेना की सच्चाई और धर्म सिंह के त्याग को देखकर प्रभावित होता है और कहता है, “जाओ अपने पति के पास यहां क्या कर रही हो।” ऐसा कहकर चोर मदनसेना को उसके घर तक छोड़कर आता है। बेताल मदनसेना की कहानी रोककर राजा से पूछता है, “हे राजन! अब यह बताओ, इन तीनों में से सबसे बड़ा त्याग किसका है।” विक्रमादित्य कहता है, “बेताल सबसे बड़ा त्याग चोर ने किया है।” इतना सुनते ही वो राजा से पूछता है कैसे? विक्रमादित्य कहता है, “सुन बेताल, मदनसेना का पति उसे यह सोचकर जाने देता है कि यह दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षित है, ऐसी स्त्री का क्या करना। धर्म सिंह उसे दूसरे की पत्नी समझकर छोड़ता है और उसे यह बोध भी था कि वह पाप कर रहा है। साथ ही इस बात का डर भी रहा होगा कि मदनसेना का पति सुबह होते ही उसे राजा से कहकर दण्ड न दिलवा दें। चोर को किसी बात का डर नहीं था, गहने से लदी स्त्री को उसने त्याग दिया। वो हमेशा से ही पाप कर्म करते आ रहा था, इस बार भी कर लेता तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता। इसी वजह से चोर का त्याग बड़ा है।” राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन तूने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।” इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। कहानी से सीख:

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विक्रम बेताल की कहानी: सर्वश्रेष्ठ वर कौन – बेताल पच्चीसी नववी कहानी

राजा विक्रमादित्य बेताल को ले जाने में कई बार विफल रहे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस बार भी उन्होंने बेताल को अपने कंधे पर लादा और आगे बढ़ने लगे। हर बार की तरह इस बार भी बेताल ने राजा को नई कहानी सुनाई। जानिए क्या थी वो कहानी और राजा ने कहानी से जुड़े बेताल के सवाल का क्या जवाब दिया। एक बार की बात है, उज्जैन शहर में एक राजा राज करता था। उसका नाम वीरदेव और रानी का नाम पद्मा था। उन दोनों की एक बेटी थी रूपमती। एक बार रूपमती अपनी सहेलियों और मंत्रियों के साथ राज्य में घूमने निकली। घूमने के साथ-साथ वह अपनी प्रजा को कुछ भेंट भी दे रही थी। इतने में एक व्यक्ति ने राजकुमारी को एक खूबसूरत साड़ी भेंट में दी। राजकुमारी उस साड़ी को देखकर बहुत खुश हुई। उसने उस व्यक्ति से पूछा, “आपने यह साड़ी कहां से खरीदी? यह साड़ी बहुत सुन्दर है।” इतने में राजकुमारी के मंत्री ने कहा, “यह साड़ी इन्होंने खुद बनाई है। यह बहुत बड़े कलाकार हैं।” मंत्री की बात सुनकर राजकुमारी आश्चर्यचकित हो गईं। राजकुमारी ने उस व्यक्ति द्वारा बुनी गई दूसरी साड़ियों और कपड़ों को देखने की इच्छा जताई। वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ और राजकुमारी को अपने घर चलने के लिए आमंत्रित किया। राजकुमारी ने निमंत्रण स्वीकार किया और उसके घर जाकर कई वस्त्र देखे। वह बहुत खुश हुई और बोली, “मन कर रहा है यहीं रुक जाऊं और आपसे यह कारीगरी सीखूं।” इतना कहने के बाद राजकुमारी अपनी यात्रा पूरी करने के लिए फिर निकल पड़ी। राजकुमारी थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि आगे से एक व्यक्ति आया और उसने राजकुमारी और उनकी सहेलियों को कहा कि आगे पेड़ के नीचे शेर है। राजकुमारी ने चौंककर उस व्यक्ति से पूछा, “आपको कैसे पता चला? आपने देखा है क्या?” उस व्यक्ति ने कहा, “नहीं राजकुमारी , मुझे मेरे पक्षी दोस्त ने जानकारी दी है।” राजकुमारी फिर चौंकी, उन्होंने पूछा, “क्या आप पक्षियों से बातें करते हैं?” तो उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि उसे पक्षियों, जानवरों और पानी में रहने वाले जीवों की भाषा आती है। राजकुमारी यह सुनकर काफी खुश हुई और चिड़ियों और जानवरों की भाषा सीखने की इच्छा जताकर उन्हें महल आने के लिए आमंत्रित किया। उस व्यक्ति ने कहा ये पक्षियां और जानवर ही उनका परिवार है, वो महल कैसे आ सकते हैं। तो राजकुमारी ने उसकी बात का मान रखते हुए कहा, “कभी भविष्य में मौका मिला, तो वह खुद उनके पास यह भाषा सीखने आएगी।” इतना कहकर वह आगे बढ़ गईं। यात्रा लंबी थी। यात्रा करते-करते राजकुमारी की तबीयत खराब होने लगी। राजकुमारी को वैध के पास ले जाया गया। उस वैध ने राजकुमारी को उनके यहां आराम करने को कहा और जड़ी-बूटी दी। उस दवा के सेवन से कुछ ही घंटों में राजकुमारी ठीक हो गईं। राजकुमारी ने उस वैध का धन्यवाद किया। वहां बैठे अन्य मरीजों ने वैध के बारे में राजकुमारी को कई बातें बताई कि वो कैसे सबकी सेवा करते हैं और उनकी दवाइयों से कई लोग ठीक हो गए हैं। ये सब सुनकर राजकुमारी ने वैध को कहा, “आप बहुत अच्छा और पुण्य का काम कर रहे हैं। मेरा भी मन है कि मैं भी दूसरों की ऐसे ही सेवा करूं।” फिर राजकुमारी अपनी यात्रा पूरी करने आगे निकल पड़ी। वह थोड़ी दूर ही गई थी कि उसका पैर जानवरों के लिए बिछाए गए एक जाल में फंस गया। राजकुमारी मदद के लिए चिल्लाने लगी। उसकी सहेलियां और मंत्री भी मदद के लिए पुकारने लगे। इतने में एक वीर ने अपनी सूझबूझ और तीरंदाजी से राजकुमारी को जाल से बाहर निकाला। राजकुमारी खुश हुई और उसने वीर का धन्यवाद किया। साथ ही उससे दोबारा मिलने की इच्छा जताकर वहां से चली गई। इसके बाद राजकुमारी लंबी यात्रा के बाद महल लौट आई। घर लौटने के बाद राजा ने उन्हें बताया कि आसपास के राज्यों से राजाओं और राजकुमारों के रिश्ते आने लगे हैं। राजकुमारी ने पिता की बात सुनी और कहा कि उन्हें कोई राजा या राजकुमार नहीं, बल्कि कोई साधारण व्यक्ति चाहिए। उन्होंने पिता से कहा, “मैंने इस यात्रा में यह जाना कि साधारण मनुष्य भी बहुत ज्ञानी, मेहनती और महान होते हैं। इसलिए, मुझे कोई साधारण व्यक्ति ही जीवनसाथी के रूप में चाहिए।” राजा ने बेटी की बात को मानते हुए स्वयंवर की घोषणा की। उस स्वयंवर की बात उन चारों व्यक्तियों तक भी पहुंची जिनसे राजकुमारी यात्रा के दौरान मिली थी। वो चारों राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे। कहानी यहां तक पहुंची ही थी कि हर बार की तरह इस बार भी बेताल ने कहानी को बीच में रोकते हुए विक्रम से सवाल पूछा बैठा। बेताल ने पूछा, “राजकुमारी के सामने चार वर थे, एक कपड़े बनाने वाला कलाकार, एक भाषा ज्ञानी, एक वैध और एक वीर। अब बताओ इसमें से राजकुमारी के लिए सर्वश्रेष्ठ वर कौन था? किसके गले में राजकुमारी ने स्वयंवर की माला डाली? जल्दी बताओ वरना मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूंगा।” राजा विक्रम ने जवाब देते हुए कहा, “कलाकार बहुत धनी व्यक्ति था, लेकिन राजकुमारी को धन की क्या कमी। इसलिए, राजकुमारी कलाकार का चुनाव नहीं करेंगी। वहीं, दूसरा व्यक्ति जो भाषा ज्ञानी है, वह मनोरंजन के लिए ठीक है। तीसरा वैद्य है, जो एक अच्छा व्यक्ति है, समाज की सेवा करता है। अगर उसकी तुलना उस वीर से की जाए तो राजकुमारी वीर का ही चुनाव करेंगी। राजा का कोई बेटा नहीं है, इसलिए वीर दामाद ही राज्य की रक्षा कर सकता है। इसलिए, राजकुमारी का सर्वश्रेष्ठ वर वो वीर व्यक्ति ही है। विक्रम की बात सुनकर बेताल खुश हो गया, लेकिन हर बार की तरह विक्रम के बोलते ही बेताल फिर पेड़ पर जाकर लटक गया। कहानी से सीख: मौका मिलने पर वीर और बुद्धिमान व्यक्ति को अपने जीवन का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए।

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विक्रम बेताल की कहानी: सबसे अधिक सुकुमार कौन? – बेताल पच्चीसी आठवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लादने की कई कोशिश कर चुके थे, लेकिन हर बार बेताल कोई कहानी सुनाता और राज विक्रमादित्य से हाथों से बच निकलता। इस बार भी बेतान ने एक नई कहानी सुनाई। बेताल कहता है… एक बार की बात है, अंगदेश के एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ रहता था। एक बार ब्राह्मण ने अपने तीनों बेटों के बुलाया और कहा कि हमारे तालाब के लिए एक कछुए की जरूरत है। कल तुम तीनों समुद्र के पास जाकर वहां से कछुआ पकड़ कर ले आना। तीनों ने हां कर दी और दूसरे दिन तीनों माता-पिता का आशीर्वाद लेकर समुद्र की ओर चल पड़े। वहां तीनों काे एक बड़ा-सा कछुआ दिखाई दिया, लेकिन तीनों में से कोई भी उसे उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ। उनमें से सबसे बड़ा भाई बोला, “मैं कछुए को नहीं उठाऊंगा, इससे बहुत गंदी बदबू आ रही है।” दूसरे नबंर के भाई ने कहा, “मैं भी इसे नहीं उठाऊंगा, मुझे भी इससे गंदी बदबू आ रही है।” तीसरे नंबर के भाई की बारी आई, तो उसने कहा, “मैं भी इसे नहीं उठा सकता, मैं बहुत कोमल हूं। तीनों में झगड़ा शुरू हो गया और यह मामला राज दरबार तक पहुंच गया। राजा ने कहा, “इस प्रकार का मामला मेरी जिंदगी में पहली बार आया है, इसका न्याय मैं कल सुबह करूंगा। आज आप हमारे यहां मेहमान हैं, इसलिए भाेजन और आराम यहां पर ही कीजिए।” यह बोलकर राजा ने तीनों को भोजन के लिए निमंत्रण दिया। सभी बड़े चाव से खाना खा रहे थे, लेकिन सबसे बड़े भाई ने नहीं खाया। राजा ने जब उससे पूछा तो उसने कहा, “चावल में से श्मशान में जले हुए मुर्दे की बदबू आ रही है।” राजा ने इस बात का पता किया तो मालूम हुआ कि चावल किसी श्मशान के पास के खेत से लाए गए हैं। यह देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सभी लोग खाना खाकर शाम को संगीत सुनने के लिए बैठ गए। तब दूसरे नंबर के भाई ने राजा से निवेदन किया कि वो मृदंग बजाना चाहता है। राजा की आज्ञा से वो गायिका के पास जाकर जैसे ही बैठा, तो तुरंत खड़ा होकर दूर बैठ गया। राजा ने खड़े होने का कारण पूछा, तो दूसरे नंबर के भाई ने कहा, “गायिका से बकरी के दूध की बदबू आ रही है और वो मुझे पसंद नहीं है।” जब राजा ने इस बात का पता किया, तो मालूम चला कि बचपन में गायिका को बकरी का दूध दिया जाता था। राजा एक बार फिर खुश हो गया। इसके बाद सभी लोग सोने के लिए चले गए। दोनों भाई आराम से सो गए, लेकिन सबसे छोटे भाई को नींद नहीं आ रही थी। राजा ने अपने एक सेवक को आदेश दिया कि जाकर तीनों को देख आओ कि वे सोए या नहीं। सेवक गया तो उसने देखा कि सबसे छोटे भाई को छोड़कर बाकी दोनों सो गए हैं। सेवक ने यह समाचार राजा को दिया और राजा इसका कारण जानने के लिए खुद वहां पहुंच गया जहां तीनों सो रहे थे। राजा को देखकर तीनों उठ बैठे। राजा ने सबसे छोटे वाले भाई से पूछा, “आपको नींद क्यों नहीं आ रही?” तब वह बोला, “मुझे इस बिस्तर पर कुछ चुभ रहा है।” यह सुनकर सेवक ने तीनों के बिस्तर की छान-बीन की, तो उन्हें कुछ नहीं मिला। तब सबसे छोटे भाई ने सभी बिस्तर को अलग किया और वहां पर एक बाल था। उसने अपना कुर्ता उतारा, सब ने देखा कि उस बाल का निशान उसकी पीठ पर बना हुआ था। राजा यह देखकर हैरान हुआ और खुश भी। दूसरे दिन राजा ने न्याय के लिए तीनों को बुलाया। उसने सबसे छोटे वाले को इनाम दिया और बाकी दो को कुछ सोने के सिक्के दिये। राजा ने कहा, “आप तीनों में अलग-अलग खूबी है और मैं आप तीनों से बहुत खुश हूं। मैं अपने सैनिकों को भेजकर कछुआ आपके घर भिजवा दूंगा।” इतना कह कर बेताल ने विक्रम से पूछा, “बताओ तीनों भाइयों में से सबसे अधिक सुकुमार कौन था?” तब विक्रम बोला, “सबसे छोटा भाई, क्योंकि हो सकता है कि दोनों बड़े भाइयों ने अपने सुकुमार होने का दिखावा किया हो, लेकिन सबसे छोटा भाई कितना सुकुमार है यह तो राजा ने खुद आंखों से देखा।” विक्रम का सही जबाब सुनकर बेताल ने उसकी तारीफ की और अपनी शर्त के अनुसार वापस पेड़ पर जाकर लटक गया। कहानी से सीख: कभी भी उन गुणों को उजागर नहीं करना चाहिए, जो हम में नहीं हैं।

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विक्रम बेताल की कहानी: राजा चन्द्रसेन और नवयुवक सत्वशील

बहुत समय पहले की बात है जब समुद्र किनारे बसे एक नगर ताम्रलिपि पर राजा चंद्रसेन का राज हुआ करता था। राजा से मिलने के लिए हजारों लोग उत्सुक रहते थे। उन्हीं में से एक था नवयुवक सत्वशील। सत्वशील को काम की तलाश थी, इसलिए वो हर दिन राजा चंद्रसेन से मिलने के लिए उनके राज महल पहुंच जाता। अफसोस, उसे हर बार दरबारी भगा देते थे। ऐसा होते-होते बहुत समय गुजर गया, लेकिन लड़के ने हिम्मत नहीं हारी। वो राज महल के साथ ही हर उस जगह पहुंच जाता, जहां राजा की सवारी जाती थी। एक दिन राजा भ्रमण कर अपने सैनिकों के साथ महल की ओर लौट रहे थे। कड़ी धूप होने के कारण राजा को काफी तेज प्यास लगी। सैनिक इधर-उधर पानी ढूंढने लगते हैं, लेकिन कोई भी कामयाब नहीं होता है। तभी राजा अपने मार्ग पर खड़े सत्वशील को देखते हैं। नवयुवक को देख राजा पूछते हैं – क्या तुम्हारे पास पानी है? सत्वशील तुरंत राजा को पानी पिलाता है और साथ ही मीठे फल भी खिलाता है। राजा उससे काफी प्रसन्न होते हैं और कहते हैं – ‘मैं तुम्हें कुछ भेंट देना चाहता हूं, बताओ तुम्हें क्या चाहिए?’ भूपति चन्द्रसेन के सवाल पूछते ही झट से सत्वशील कहता है कि महराज में लंबे समय से काम की तलाश कर रहा हूं, अगर आप मुझे कुछ काम दे दें तो आपकी बहुत कृपा होगी। इतना सुनते ही राजा तुरंत उसे अपने दरबार में नौकरी दे देते हैं और कहते हैं कि उसके द्वारा पिलाए गए पानी का उपकार वो जीवन भर याद रखेंगे। वक्त बीतता गया और अपनी प्रतिभा की वजह से नवयुवक राजा का बहुत करीबी बन गया। एक दिन भूपति चन्द्रसेन सत्वशील से कहते हैं – ‘हमारे नगर ताम्रलिपि में बेरोजगारी काफी बढ़ गई है, इसके लिए हमें कुछ करना चाहिए’। इतना सुनते ही नवयुवक कहता है – ‘आप हुक्म कीजिए महाराज।’ राजा कहते हैं – ‘हमारे पास एक टापू है, जो काफी हरा-भरा है। अगर वहां कुछ खोज की जाए तो काम के कुछ अवसर मिल सकते हैं।’ इतना सुनते ही सत्वशील, जी महाराज कहकर टापू के लिए रवाना हो गया। समुद्र के रास्ते टापू के पास पहुंचते ही सत्वशील को पानी में तैरता हुआ एक झंडा नजर आता है। झंडे को देखते ही वो हिम्मत जुटा कर पानी में कूदता है। पानी में कूदते ही नवयुवक सत्वशील टापू की राजकुमारी के पास पहुंच जाता है, जहां वो अपनी सहेलियों और सेविकाओं के साथ गाना गा रही होती हैं। राजकुमारी को नवयुवक अपना परिचय देता है। कुछ देर बातचीत करने के बाद राजकुमारी सत्वशील को भोजन का निमंत्रण देती हैं और खाना खाने से पहले पास के ही एक तलाब में स्नान करने का आग्रह करती हैं। जैसे ही सत्वशील तलाब में नहाने के लिए उतरता है, वो ताम्रलिपि महल की सभा में पहुंच जाता है। एकदम सभा में सत्वशील को देख राजा चन्द्रसेन चकित हो जाते हैं। वह उससे पूछते हैं – ‘अरे, तुम यहां कैसे?’ सत्वशील राजा को पूरी घटना के बारे में बताता है। सारी बातें जानने के बाद राजा भी उस टापू में जाने का फैसला लेते हैं। वहां पहुंच कर भूपति चन्द्रसेन उस टापू पर जीत हासिल कर लेते हैं। ऐसा होते ही राजा चन्द्रसेन को राजकुमारी उस टापू का राजा घोषित कर देती है। राजा टापू को जीतने की खुशी में वहां की पूर्व राजकुमारी और सत्वशील की शादी करवा देते हैं। इस तरह राजा चन्द्रसेन सत्वशील के पानी के उपकार को चुकाते हैं। इतनी कहानी बताकर बेताल चुप हो जाता है और विक्रम से पूछता है कि राजा चन्द्रसेन और सत्वशील, दोनों में से सबसे बलवान कौन था? सवाल सुनते ही विक्रम बोल पड़ता है – सत्वशील ज्यादा शक्तिशाली था। बेताल पूछता है – कैसे ?तब विक्रम बताता है कि सत्वशील बिना कुछ सोचे समझे ही टापू के पास झंडा देखकर पानी में कूद जाता है। वहां कूदने पर उसे किसी भी तरह का खतरा हो सकता था, जबकि राजा को पता था कि वहां पानी में कोई खतरा नहीं है। सवाल का जवाब मिलते ही बेताल, राजा विक्रम के कंधे से उड़कर वापस घने जंगल में किसी पेड़ पर जाकर बैठ जाता है। कहानी से सीख: हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिए और कर्म लगातार करते रहना चाहिए।

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