August 4, 2022

विक्रम बेताल की कहानी: पत्नी किसकी? – बेताल पच्चीसी छठी कहानी

कई प्रयासों के बाद राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ लिया। वह उसे जब योगी के पास ले जाने लगे, तो बेताल ने नई कहानी शुरू कर दी। बेताल ने नई कहानी सुनाते हुए कहा…. एक समय की बात है, धर्मपुर नाम के नगर में गंधर्वसेन नाम का युवक रहता था। गंधर्वसेन की कद-काठी बहुत आकर्षक थी। यही कारण था कि कई लड़कियां उससे विवाह करना चाहती थीं, लेकिन गंधर्वसेन को उनमें से एक भी लड़की पसंद नहीं थी। ब्राहमण पुत्र गंधर्वसेन जब अपने घोड़े पर सवार होकर नगर में निकलता था तो सारी लड़कियां उसे देखती रह जातीं। गंधर्वसेन किसी की तरफ नहीं देखता और तेज गति से नगर को पार करके रोजाना एक मंदिर की ओर निकल जाता था। यह मंदिर काली देवी का मंदिर था। गंधर्वसेन काली मां का बहुत बड़ा भक्त था। वो हर दिन मां काली की पूजा किया करता था। एक दिन जब वो मंदिर से लौट रहा था तो उसने नदी के किनारे एक धोबी की लड़की को कपड़े धोते हुए देखा। वह लड़की गंधर्वसेन को बहुत सुन्दर लगी। गंधर्वसेन को उस लड़की से प्यार हो गया और वो दिन रात उसी के बारे में सोचने लगा। उसे लड़की से बात करने का कोई रास्ता नहीं सूझता। एक दिन उसने काली मां के मंदिर में पूजा करते हुए ये प्रतिज्ञा ली कि अगर वो लड़की उसकी हो गयी तो वो काली मां के चरणों में अपना शीश चढ़ा देगा। गंधर्वसेन खाना-पीना भूल चुका था, वो दिन रात उसी लड़की के बारे में सोचता रहता। इसका परिणाम ये हुआ कि गंधर्वसेन बीमार हो गया। गंधर्वसेन की बीमारी की खबर सुनकर उसका सबसे अच्छा मित्र देवदत्त उससे मिलने आया। अपने परम मित्र को बिस्तर पर पड़ा देख देवदत्त ने उसकी उदासी का कारण पूछा। गंधर्वसेन ने देवदत्त को अपना हाल सुनाया और बोला कि उस लड़की से अगर मेरा विवाह नहीं हुआ तो मैं मर जाऊंगा। देवदत्त अपने मित्र से बहुत प्यार करता था, इसलिए उसने लड़की को ढूंढने की ठानी। देवदत्त उस लड़की को खोजने में सफल हुआ। देवदत्त ने उस लड़की के पिता से कहा कि अपनी बेटी की शादी गंधर्वसेन से कर दें। लड़की के पिता ने सारी स्थिति का जायजा लिया और अपनी बेटी का विवाह गंधर्वसेन से करा दिया। शादी को पांच दिन बीत गए और गंधर्वसेन उस प्रतिज्ञा को भूल चुका था, जो उसने काली मंदिर में ली थी। एक दिन सपने में गंधर्वसेन को अपनी छाया दिखाई देती है। उसकी छाया उसे वो प्रतिज्ञा याद दिलाती है और कहती है कि अगर तुम ये प्रतिज्ञा पूरी नहीं करोगे तो स्वार्थी कहे जाओगे। अगले दिन गंधर्वसेन को अपनी गलती का अहसास होता है और वो काली मंदिर में अपनी बलि देने के लिए तैयार हो जाता है। वो अपने मित्र देवदत्त को बुलाता है और उससे कहता है कि मैं, तुम और तुम्हारी भाभी मंदिर चलते हैं। मैं मदिर में अंदर पूजा करूंगा और तुम बाहर अपनी भाभी का ध्यान रखना। देवदत्त मंदिर चलने को तैयार हो जाता है। दोनों दोस्त उस लड़की के साथ मंदिर पहुंचते हैं। गंधर्वसेन मंदिर के अंदर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने चला जाता है। देवदत्त और गंधर्वसेन की पत्नी बाहर उसकी प्रतीक्षा करते हैं। बहुत समय तक जब गंधर्वसेन बाहर नहीं आता तो देवदत्त मंदिर के अंदर चला जाता है। देवदत्त अंदर जाकर देखता है कि गंधर्वसेन ने अपनी तलवार से अपना सिर काटकर काली मां को बलि चढ़ा दिया है। यह देखकर देवदत्त घबरा जाता है। देवदत्त सोचता है कि कोई भी व्यक्ति यह यकीन नहीं करेगा कि गंधर्वसेन ने अपनी हत्या खुद की है। सब ये सोचेंगे कि देवदत्त ने अपने मित्र को मारा है, ताकि वो उसकी पत्नी से विवाह कर सके। इस आरोप से बचने के लिए देवदत्त ने गंधर्वसेन की तलवार से अपना सिर भी काट लिया।थोड़े समय बाद गंधर्वसेन की पत्नी, अपने पति और उसके मित्र देवदत्त को खोजने मंदिर आयी। वहां दोनों मित्रों की लाश देखकर वो डर गयी। उसने सोचा कि लोग उन दोनों की ह्त्या का आरोप मेरे ऊपर लगाएंगे, इस लांछन से अच्छा है कि मैं भी मर जाऊं। जैसे ही उस लड़की ने अपना सिर काटने के लिए तलवार उठायी वैसे ही वहां मां काली प्रकट हुईं। मां काली ने कहा, “पुत्री मैं तुमसे प्रसन्न हूं बोलो क्या वरदान मांगती हो।” लड़की ने कहा, “आप इन दोनों को जीवित कर दीजिए।” काली मां बोली, “तुम इन दोनों के सिर इनके धड़ों पर रखोगी तो ये जीवित हो जाएंगे।” लड़की ने ऐसा ही किया, लेकिन उससे सिर रखने में गलती हो गयी। उसने गंधर्वसेन का सिर देवदत्त और देवदत्त का सिर गंधर्वसेन के धड़ पर लगा दिया। दोनों मित्र जीवित होकर उस लड़की के लिए लड़ने लगे। इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा, “राजन अब तुम ही बताओ कि उस लड़की का पति कौन है।” विक्रमादित्य को जवाब मालूम था। अगर वो चुप रहते तो बेताल उनका सिर धड़ से अलग कर देता, इसलिए विक्रमादित्य बोले, “व्यक्ति की पहचान उसके चेहरे से होती है, इसलिए देवदत्त उस लड़की का पति होगा, क्योंकि उसके धड़ पर गंधर्वसेन का मस्तिष्क वाला हिस्सा लगा है।” बेताल ने कहा, “इस बार भी तुमने सही जवाब दिया है, इसलिए मुझे फिर से उड़ जाना पड़ेगा।” इतना बोलकर बेताल फिर से घने जंगल की ओर उड़ गया। राजा विक्रमादित्य फिर से बेताल को ढूंढने के लिए उसके पीछे चल दिए। कहानी से सीख: इंसान जो भी करता है अपने मस्तिष्क से ही करता है, इसलिए उसकी पहचान मस्तिष्क से ही होती है।

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विक्रम बेताल की कहानी: असली वर कौन – बेताल पच्चीसी पांचवी कहानी

कई बार बेताल को अपने साथ ले जाने की असफल कोशिश के बावजूद राजा विक्रमादित्य ने हार नहीं मानी थी। इसलिए, राजा विक्रमादित्य फिर से पेड़ के पास पहुंचे और बेताल को अपनी पीठ पर लटका कर ले जाने लगे। अपनी शर्त के अनुसार, बेताल ने फिर से राजा विक्रम को एक कहानी सुनाना शुरू की। इस बार की कहानी है – असली वर कौन। सदियों पुरानी बात है, उज्जैन नगरी में महाबल नाम का एक राजा राज किया करता है। राजा बहुत पराक्रमी और दयालु था। उसकी एक बेटी थी, जिसका नाम था महादेवी था। महादेवी बहुत सुंदर और सुशील लड़की थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो राजा महाबल ने उसके लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी। एक-एक करके कई राजकुमार, राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा लिए राजा के पास आए, लेकिन राजा को कोई पसंद नहीं आया। राजकुमारी से विवाह करने के लिए राजा ने एक ही शर्त रखी थी कि उसकी बेटी का होने वाला पति हर चीज में निपुण हो। इस तरह कई दिन बीत गए, लेकिन राजा को कोई अपनी बेटी के लिए योग्य वर नहीं मिला। एक दिन की बात है, जब राजा अपने दरबार में बैठे थे कि तभी वहां एक राजकुमार आया और उसने कहा, “मैं राजकुमारी महादेवी से विवाह करना चाहता हूं।” यह सुनकर राजा ने कहा, “हे राजकुमार, मैं अपनी बेटी का विवाह उस व्यक्ति से करूंगा, जिसमें सभी गुण हो।” इस पर राजकुमार ने जवाब दिया, “मेरे पास ऐसा रथ है, जिसमें बैठकर क्षण भर में कहीं भी पहुंच सकते हैं।” यह सुनकर राजा ने कहा, “ठीक है तुम कुछ दिन रुको। मैं राजकुमारी से पूछकर तुम्हें जवाब दूंगा।” कुछ दिनों बाद एक और राजकुमार वहां पहुंचा। उसने राजा ने कहा, “मैं त्रिकालदर्शी हूं और भूत, वर्तमान व भविष्य, तीनों देख सकता हूं। मैं चाहता हूं कि राजकुमारी का विवाह मुझसे हो।” राजा ने उसे भी इंतजार करने को कहा। कुछ दिनों के बाद राजा महाबल के पास एक और राजकुमार उनकी बेटी का हाथ मांगने आया। राजा ने उससे पूछा कि तुममें ऐसा क्या गुण हैं, जो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ करूं? राजकुमार ने कहा, “राजन, मैं धनुर्विद्या में निपुण हूं। मेरे जैसा धनुर्धारी दूर-दूर तक कोई नहीं है।” राजा ने उससे कहा, “बहुत खूब! राजकुमार, आप कुछ दिन प्रतीक्षा करें। मैं अपनी बेटी से बात करके आपको जवाब दूंगा।” अब राजा असमंजस में पड़ गया कि तीनों ही राजकुमार गुणवान हैं, लेकिन वह तीनों से तो राजकुमारी की शादी कर नहीं सकता। तो अब सवाल यह था कि राजकुमारी का विवाह किससे होना चाहिए। वहीं, दूसरी ओर एक भयानक राक्षस राजकुमारी महादेवी पर नजर लगाए बैठा था और एक दिन मौका मिलते ही वह राजकुमारी को उठाकर ले गया। यह खबर जैसे ही महल में फैली तो राजा, रानी और तीनों राजकुमार एक जगह इकठ्ठा हो गए। त्रिकालदर्शी राजकुमार ने बताया कि वह राक्षस राजकुमारी को विन्ध्याचल पर्वत पर ले गया है। इस पर पहले राजकुमार ने कहा, “मैं अपना रथ लेकर आता हूं। हम सब उस पर बैठकर विन्ध्याचल चल सकते हैं।”तीसरे राजकुमार ने अपना तीर-कमान निकाला और कहा, “मैं उस राक्षस को मार गिराऊंगा।” इसके बाद, तीनों राजकुमार रथ पर बैठ कर विन्ध्याचल पर्वत की ओर चल पड़े। उन्हें जैसे ही वह राक्षस दिखा, तो धनुर्धारी राजकुमार ने कुशलता से उसका वध कर दिया और वो राकुमारी को बचाकर फिर से महल ले आए। इस कहानी को सुनाने के बाद बेताल ने राजा विक्रम से कहा, “राजन, राजकुमारी को बचाने में तीनों राजकुमारों का योगदान था। तो अब तुम मुझे बताओ कि राजकुमारी का विवाह किससे होना चाहिए? राजन, मैंने सुना है कि तू हमेशा न्याय करता है। जल्दी उत्तर दे, वरना तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।” इस पर राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया कि राजकुमारी का विवाह धनुर्धारी राजकुमार से होना चाहिए, क्योंकि उसने राक्षस से लड़ाई करके राजकुमारी को बचाया और बाकी दोनों राजकुमारों ने केवल उसकी मदद की। बस, फिर क्या था! जैसे ही राजा बोला, बेताल उसकी पीठ से उड़ कर फिर से पेड़ पर जा लटका। कहानी से सीख: मुश्किल समय में साहस ही काम आता है, इसलिए मुसीबत को देखकर घबराए नहीं। हमेशा साहस दिखाएं।

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विक्रम बेताल की कहानी: ज्यादा पापी कौन – बेताल पच्चीसी

बेताल के उड़ने के बाद दोबारा विक्रमादित्य शिंशपा वृक्ष की ओर दौड़े और पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को कंधे पर लादकर चल पड़े। इसी बीच एक बार फिर बेताल ने राजा को एक नई कहानी सुनाते हुए कहा – बहुत समय पहले एक भोगवती नाम की नगरी हुआ करती थी। उस नगरी में राज रूपसेन का राज हुआ करता था। राजा को शादी करने का बड़ा मन था। एक दिन राजा ने अपने चिन्तामणि नाम के तोते से पूछा, “बताओ मेरी शादी किसके साथ होगी।” तोते ने कहा, “मगध की राजकुमारी चन्द्रवाती से।” राजा ने तोते की बात सुनने के बाद एक ज्योतिषी को बुलाकर यही सवाल पूछा। ज्योतिषी ने भी राजा को वही उत्तर दिया, जो तोते ने दिया था। मगध की राजकुमारी को भी अपने होने वाले वर के बारे में जानने का बड़ा मन था। राजकुमारी ने अपनी मैना मन्जरी से पूछा, “अरे! यह बताओ मेरा विवाह किसके साथ होगा।” मैना ने भी राजकुमारी को राजा रूपसेन से शादी होने की बात बताई। इतना सुनने के बाद दोनों नगर की तरफ से शादी का न्योता एक दूसरे को भेजा गया, जो स्वीकार हो गया। इस तरह राजा रूपसेन और राजकुमारी की शादी हो गई। शादी होने के बाद रानी अपने साथ मैना को भी लेकर आई। राजा ने अपने तोते से मन्जरी मैना की शादी करवा दी और दोनों को एक ही पिंजरे में रख दिया। एक दिन किसी बात को लेकर मैना और तोते के बीच में बहुत बहस होने लगी। मैना गुस्से में कहने लगी, “पुरुष पापी, धोखेबाज और अधर्मी होते हैं।” फिर गुस्साएं तोते ने कहा, “स्त्री लालची, झूठी और हत्यारी होती हैं।” दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ गया कि यह बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने दोनों से पूछा, “क्या हुआ, तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो।” मैना ने झट से कह दिया कि महाराज, आदमी बहुत बुरे होते हैं और फिर सीधे कहानी सुनाने लग गई। सालों पहले इलाहापुर नगरी में महाधन नाम का सेठ रहता था। उस सेठ के घर शादी के कई सालों बाद एक लड़का पैदा हुआ। महाधन सेठ ने उसका बड़े ही अच्छे से पालन-पोषण किया। अच्छे संस्कार मिलने के बाद भी सेठ का बेटा बड़ा होकर जुआ खेलने लगा। जुए की लत में वो सारा पैसा जुआ खेलते हुए हार गया। इसी बीच सेठ की मौत हो गई। जुए की लत की वजह से न तो लड़के के पास पैसे बचे और न पैसा कमाने वाला बाप, तो लड़का अपना नगर छोड़कर चन्द्रपुरी नगर पहुंच गया। नए नगर पहुंचकर लड़के की मुलाकात कर्ज देने वाले साहूकार हेमगुप्त से हुई। लड़के ने अपने पिता के बारे में साहूकार को बताया और एक झूठी कहानी उसको सुनाने लगा। उसने कहा कि वो जहाज लेकर बहुत बड़ा सौदा करके लौट रहा था। उसी समय समुद्र में इतना तेज तूफान आया कि उसका जहाज वहीं डूब गया और वो बच-बचाकर यहां पहुंचा है। इतना सुनते ही साहूकार ने उसे अपने घर में रहने की इजाजत दे दी। इसी बीच हेमगुप्त साहूकार को ख्याल आया कि सेठ का यह लड़का मेरी बेटी के लिए अच्छा वर साबित हो सकता है। तुरंत साहूकार ने अपनी बेटी की शादी सेठ के बेटे से करवा दी। शादी के कुछ दिन तक अपने दामाद का काफी सत्कार करने के बाद साहूकार ने अपनी बेटी को खूब सारा धन देकर विदा कर दिया। दोनों के साथ साहूकार ने एक दासी को भी भेजा। रास्ते में सेठ के बेटे ने अपनी पत्नी से कहा, “सारे गहने मुझे दे दो। यहां कई लुटेरे हैं।” उसकी पत्नी ने ऐसा ही किया। जेवर मिलते ही उसने दासी को मारकर कुएं में फेंक दिया और अपनी पत्नी को भी कुएं में धक्का दे दिया। लड़की जोर-जोर से रोने लगी। उसकी रोने की आवाज सुनकर एक राहगीर ने महिला को कुएं से निकाला। कुएं से निकलते ही वो अपने पिता के पास चली गई। उसने अपने साहूकार पिता को सच्चाई नहीं बताई, उसने कहा, “कुछ लुटेरे ने उन्हें लूट लिया और दासी को मार दिया।” साहूकार ने अपनी बेटी को दिलासा देते हुए कहा, “चिंता मत करो तुम्हारा पति जिंदा होगा और वो कभी-न-कभी जरूर लौटकर आ जाएगा।” उधर लड़का अपने नगर पहुंचकर दोबारा सारे पैसे और जेवरात जुए में हार जाता है। पैसे खत्म होने के बाद उसकी हालत बहुत बुरी हो गई। इससे परेशान लड़का दोबारा साहूकार के पास जाता है। वहां पहुंचते ही उसकी मुलाकात पत्नी से होती है। वो उसे देखकर बहुत खुश होती है और बताती है कि उस दिन जो कुछ भी हुआ उसने अपने पिता को नहीं बताया है। वो उस झूठी कहानी के बारे में अपने पति को बताती है। जैसे ही साहूकार अपने दामाद को घर में देखा तो उसने उसका स्वागत किया। कुछ दिन साहूकार के घर में रहने के बाद एक रात को मौका देखकर सेठ का बेटा अपनी पत्नी को मारकर उसके सारे जेवरात लेकर फरार हो जाता है। यह कहानी बताने के बाद मैना कहती है, “महाराज ये सब होते हुए मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। यही वजह है मैं आदमियों को पापी कहती हूं।” मैना की कहानी सुनने के बाद राजा तोते से कहता है, “अब तुम बताओं स्त्रियों को बुरा क्यों कह रहे थे।” यह सुनते ही तोता भी कहानी सुनाने लग जाता है। वो बताता है कि एक समय वो कंचनपुर में सागरदत्त नाम सेठ के यहां रहता था। उसके बेटे का नाम श्रीदत्त था, जिसकी शादी पास के ही नगर श्रीविजयपुर के सेठ सोमदत्त की बेटी से हुई थी। शादी के बाद व्यापार करने के लिए लड़का परदेस चला गया। उसकी पत्नी जयश्री उसका इंतजार बेताबी से करती थी, लेकिन 12 साल गुजर गए, लेकिन वो परदेस से लौटकर नहीं आया। अपने पति का इंतजार करते हुए एक दिन महिला अपनी छत से एक पुरुष को आते हुए देखती है। वो उसे बेहद पसंद आता है। वो उसे अपनी सहेली के घर बुलाती है। वो उससे बात करती है और उससे रोज अपनी सहेली के घर मिलने को कहती है। अब श्रीदत्त की पत्नी जयश्री उस युवक से रोज मिलने लगी। ऐसा होते-होते कुछ महीने बीत गए। इसी बीच

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विक्रम बेताल की कहानी: बड़ा बलिदान किसका – बेताल पच्चीसी

हर बार की तरह राजा विक्रम फिर बेताल को पेड़ से नीचे उतारता है और पीठ पर लादकर उसे योगी के पास ले जाने के लिए चल देता है। ऐसे में एक बार फिर बेताल राजा विक्रम को बोलने पर विवश करने के लिए एक नई कहानी कहना शुरू करता है। कहानी है, राजा रूपसेन और अंगरक्षक वीरवर की। वर्धमान राज्य में रूपसेन नाम का एक राजा राज किया करता था। राजा बहुत ही साहसी, दयालु और न्यायप्रिय था। यही वजह थी कि केवल वर्धमान में ही नहीं बल्कि उसके राज्य से सटे सभी राज्यों में भी राजा रूपसेन के व्यक्तित्व की मिसाल दी जाती थी। एक दिन रूपसेन के दरबार में वीरवर नाम का एक व्यक्ति आया। जब राजा ने उसके आने की वजह पूछी तो वीरवर बोला, “मुझे नौकरी चाहिए और मैं अंगरक्षक के तौर पर आपकी सेवा करना चाहता हूं।” वीरवर की यह बात सुनकर राजा ने कहा, “ मैं तुम्हे अपना अंगरक्षक बना सकता हूं, लेकिन उसके लिए तुम्हें अपनी कार्यकुशलता सिद्ध करनी होगी। ताकि मैं यह तय कर सकूं कि तुम मेरे अंगरक्षक बनने के लायक हो भी या नहीं।” राजा की यह बात सुन वीरवर फौरन तैयार हो गया। उसने अपने बाहुबल के साथ अपना शस्त्र कौशल भी दिखाया। वीरवर की सभी विशेषताओं को देखकर राजा रूपसेन बहुत प्रभावित हुआ। राजा ने पूछा, “वीरवर बताओ अगर मैं तुम्हें अपना अंगरक्षक बनाता हूं, तो तुम्हें प्रतिदिन खर्च के लिए क्या चाहिए?” राजा के इस सवाल पर वीरवर बोला, “महाराज आप मुझे हजार तोले सोना दे देना।” वीरवर का इतना कहना था कि दरबार में मौजूद सभी लोग हैरान होकर वीरवर की ओर देखने लगे। राजा रूपसेन भी वीरवर की मांग पर आश्चर्य में पड़ गया। हो भी क्यों न, वेतन के रूप में वीरवर ने इतनी बड़ी रकम जो मांग ली थी। राजा ने गंभीर होकर वीरवर से पूछा, “तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं?” वीरवर ने उत्तर दिया, “कुल चार महाराज, मैं, मेरी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी।” वीरवर का जवाब सुन राजा ने मन ही मन सोचा कि आखिर चार लोगों के भरण-पोषण के लिए इसे इतने धन की क्या आवश्यकता। फिर कुछ सोचकर उसने वीरवर को हजार तोला सोना प्रतिदिन बतौर खर्च देने की बात मान ली। काम सिर्फ इतना था कि उसे हर रात राजा की सुरक्षा के लिए राजा के कक्ष के बाहर पहरा देना था। राजा यह जानना चाहता था कि वीरवर इतने धन का क्या करेगा। उसने वीरवर को हजार तोला सोना देकर रात में नौकरी पर आने को कहा और गुप्त रूप से कुछ सैनिकों को उसके पीछे लगा दिया। वीरवर नौकरी और मनचाहा वेतन पाकर बहुत खुश हुआ। वीरवर सोना लेकर खुशी-खुशी घर गया और आधा सोना ब्राह्मणों में बांट दिया। बाकी जो आधा बचा उसके दो हिस्से किए। एक हिस्सा वैरागियों, संन्यासियों और मेहमानों को दिया। फिर बचे हुए सोने से अनाज मंगाया और बढ़िया पकवान बनवाए। तैयार पकवान को पहले गरीबों को खिलाया और फिर उसके बाद जो बचा उसे अपने परिवार के साथ मिल बांट कर खाया। वीरवर की निगरानी कर रहे सैनिकों ने यह सारा नजारा देख जाकर राजा को बताया। राजा को यह जान संतोष हुआ कि उसके द्वारा दिए धन को वीरवर अच्छे काम में लगा रहा है। अब राजा को यह देखना था कि वीरवर अपने काम में कितना खरा उतरता है। वीरवर जब महल पहुंच राजा के कक्ष के बाहर पहरा देने लगा, तो राजा सोया नहीं। राजा पूरी रात चुपके से जांच करता रहा कि वीरवर अपना काम कितनी ईमानदारी से करता है। राजा ने पाया कि वीरवर बिना पलक झपकाए पूरी मुस्तैदी से कक्ष के बाहर पहरा दे रहा था। वीरवर की ऐसी कर्तव्यनिष्ठता देख राजा बहुत ही खुश हुआ। वीरवर प्रतिदिन इसी तरह सूरज ढलते ही महल पहुंच जाता और राजा की सुरक्षा में तैनात रहता। जब भी राजा को किसी भी चीज की जरूरत होती, वीरवर हमेशा हाजिर रहता। ऐसे ही देखते-देखते कई माह गुजर गए। एक रात कुछ अजीब घटना घटी। राजा ने आधी रात किसी स्त्री की रोने-बिलखने की आवाज सुनी। स्त्री की आवाज सुन राजा बहुत हैरान हुआ। राजा ने वीरवर को बुलाया और कहा, “जाओ और पता लगाकर आओ कि इतनी रात को कौन रो रहा है। साथ ही उसके रोने की वजह भी मालूम करना।” राजा का आदेश मिलते ही वीरवर वहां से फौरन उस स्त्री के रोने का कारण जानने के लिए निकल पड़ता है। थोड़ी दूर जाने के बाद वीरवर को एक स्त्री दिखाई दी। वह स्त्री सिर से पांव तक गहनों से लदी हुई थी। वह कभी नाचती, कभी कूदती और कभी सिर पीट-पीट कर रोती। यह सब देख वीरवर उस स्त्री के पास गया। उसने स्त्री के ऐसा करने के पीछे का कारण पूछा। वीरवर के पूछने पर स्त्री बोली, “मै राजलक्ष्मी हूं। रोती इसलिए हूं कि राजा रूपसेन की जल्द ही मौत होने वाली है। उनकी कुंडली में अकाल मृत्यु लिखी है। अब उनके जैसा न्याय प्रिय और कुशल राजा चला जाएगा, तो मुझे किसी और के अधिकार में रहना पड़ेगा। इसी बात का मुझे बहुत दुख है।” राजा की मौत की बात सुनकर वीरवर ने राजलक्ष्मी से पूछा, “क्या इस मुसीबत को टालने का कोई उपाय नहीं है?” इस पर राजलक्ष्मी बोली, “उपाय तो है, लेकिन क्या तू कर पाएगा।” वीरवर बोला, “आप मुझे उपाय बताएं, मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं अवश्य करूंगा।” वीरवर के हामी भरते ही राजलक्ष्मी बोली, “पूर्व की दिशा में यहां से कुछ दूर एक देवी का मंदिर है। अगर उस मंदिर में तू देवी के चरणों में अपने बेटे की बलि दे देता है, तो राजा पर आने वाला संकट टल जाएगा। उसके बाद राजा 100 साल तक बिना किसी तकलीफ के जीवित रहेगा और राज कर पाएगा।” राजलक्ष्मी की यह बात सुन वीरवर घर की ओर चल देता है और घर पहुंच कर सब हाल अपनी पत्नी को बताता है। इतने में उसका बेटा और बेटी भी जग जाते हैं। जब वीरवर के बेटे को इस बारे में पता चलता है, तो वह भी खुशी-खुशी देवी के चरणों में बलि चढ़ने के लिए राजी हो जाता है। वीरवर का बेटा कहता है, “सबसे पहले

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विक्रम बेताल की कहानी: पति कौन है?

सालों पहले यमुना किनारे धर्मस्थल नाम का एक नगर हुआ करता था। वहां एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम गणपति था। उसकी एक सुंदर और गुणवान बेटी थी। जैसे ही उसकी शादी की उम्र हुई, तो वो और उसका पूरा परिवार उसके लिए योग्य वर ढूंढने में लग गया। एक दिन ब्राह्मण किसी के घर पूजा करने के लिए गया और उसका बेटा भी पढ़ाई के लिए घर से बाहर चला गया। उस समय घर में ब्राह्मण की बेटी और उसकी पत्नी ही थी। उसी वक्त एक ब्राह्मण लड़का उनके घर आता है। ब्राह्मण की पत्नी उस लड़के का अच्छे से सत्कार करती है और खाना खिलाती है। लड़के का स्वभाव ब्राह्मण की पत्नी को पसंद आता है और वो उससे अपनी बेटी की शादी का वादा कर देती है। उधर, ब्राह्मण गणपति जिनके घर पूजा करने गया था, वहां भी वो एक ब्राह्मण लड़के से मिलता है और उससे अपनी बेटी की शादी करवाने का वचन दे देता है। ब्राह्मण का बेटा जहां पढ़ने गया था, वो भी वहां एक लड़के से यही वादा कर देता है। कुछ देर बाद गणपति और उसका बेटा दोनों खुद से चुने हुए लड़के को लेकर घर पहुंचते हैं। दोनों घर में एक और ब्राह्मण लड़के को देखकर चौंक जाते हैं। अब सभी इस दुविधा में पड़ जाते हैं कि लड़की एक है और शादी का वादा तीनों ने अलग-अलग लड़कों से कर दिया है, अब क्या होगा? लड़की का विवाह किससे करवाएंगे? इसी दुविधा के बीच पड़ोसी उनके घर खबर लेकर आता है कि उनकी बेटी को मोहल्ले में ही सांप न काट लिया है। भागा-भागा पूरा परिवार और तीनों ब्राह्मण लड़के लड़की के पास पहुंचते हैं, लेकिन तब तक लड़की की मौत हो जाती है। यह देखकर तीनों लड़के दुखी हो जाते हैं। कुछ देर बाद लड़की का परिवार और तीनों ब्राह्मण मिलकर उसका अंतिम संस्कार करते हैं। लड़की के क्रिया-कर्म के बाद एक ब्राह्मण लड़का उसकी हड्डियां अपने साथ लेकर जंगल चला जाता है। दूसरा उसकी राख को इकट्ठा करके पोटली में बांधकर उसी श्मशान घाट में झोपड़ी बनाकर रहने लगता है। तीसरा श्मशान घाट से निकल कर लड़की के गम में देश-देश योगी बनकर घूमने लगता है। ऐसा होते-होते कई साल गुजर गए। एक दिन अचानक योगी बनकर घूम रहा ब्राह्मण किसी तांत्रिक के घर पहुंच गया। ब्राह्मण को घर में देखकर तांत्रिक खुश हुआ और उसका सत्कार किया। तांत्रिक ने योगी से कुछ दिन अपने घर में ही रहने के लिए कहा। तांत्रिक की जिद देखकर योगी उनके घर में ही रुक गया। एक दिन तांत्रिक अपनी विद्या में बहुत लीन था और उसकी पत्नी सबके लिए खाना बना रही थी। उसी वक्त उनका बेटा रोने लगा और अपनी मां को परेशान करने लगा। तांत्रिक की पत्नी से उसे बहुत संभालने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं माना। आखिर में तांत्रिक की पत्नी को इतना गुस्सा आया कि उसने अपने बच्चे की पिटाई कर दी। उसके बाद भी जब बच्चा चुप नहीं हुआ, तो उसने उसे चूल्हे में डालकर जला दिया। यह सब देखकर योगी ब्राह्मण बहुत नाराज हुआ और बिना कुछ खाए ही अपनी पोटली लेकर उनके घर से जाने लगा। इतने में तांत्रिक आया और योगी से कहा, “महाराज खाना तैयार है, आप इस तरह गुस्से में बिना खाए यहां से न जाएं।” गुस्से में योगी ने कहा, “मैं इस घर में एक मिनट भी नहीं रुक सकता, जहां ऐसी राक्षसी रहती हो, वहां मैं कैसे कुछ खा सकता हूंं।” इतना सुनते ही तांत्रिक झट से चूल्हे के पास जाता है और एक किताब से एक मंत्र पढ़कर अपने बेटे को जिंदा कर देता है। यह सब देखकर योगी हैरान रह जाता है। उसने सोचा कि अगर यह किताब मेरे हाथ लग जाए, तो मैं अपनी पत्नी को भी जीवित कर सकता हूं। योगी यह सोच ही रहा होता है कि उधर तांत्रिक बेटे को जीवित करने के बाद फिर से योगी से खाना खाने का आग्रह करता है। योगी खाना खाता है और वहीं रुक जाता है। अब योगी के दिमाग में बस यही चल रहा था कि बस वो किसी तरह से उस किताब को हासिल कर ले। सोचते-सोचते रात हो जाती है। सब खाना खाकर सो जाते हैं। आधी रात को योगी उस मंत्र वाली किताब को लेकर तांत्रिक के घर से सीधे उस श्मशान घाट पहुंचता है, जहां ब्राह्मण की लड़की का अंतिम संस्कार किया गया था। वो सबसे पहले झोपड़ी बनाकर उसी जगह रह रहे ब्राह्मण को बुलाता है और उसे सारी कहानी सुनाता है। इसके बाद दोनों मिलकर फकीर बने ब्राह्मण को ढूंढते हैं। फकीर ब्राह्मण के मिलते ही योगी ब्राह्मण दोनों से कहता है कि लड़की की हड्डी और राख लेकर आओ, मैं उसे जिंदा करूंगा। दोनों ऐसा ही करते हैं। राख और हड्डी इकट्ठा करने के बाद लड़की को जलाई हुई जगह में योगी ब्राह्मण मंत्र पढ़ता और लड़की जिंदा हो जाती है। यह देख तीनों ब्राह्मण खुश हो जाते हैं। इतनी कहानी सुनाकर बेताल चुप हो जाता है। कुछ देर बाद वह राजा विक्रम से पूछता है, “बताओ वह लड़की किसकी पत्नी हुई?” विक्रमादित्य, बेताल के दोबारा उड़ने के डर से जवाब नहीं देते। गुस्से में बेताल कहता है, “देखो अगर तुम जवाब पता होते हुए भी नहीं दोगे, तो मैं तुम्हारी गर्दन में काट दूंगा, जल्दी से जवाब दो।” इतना सुनते ही राजा बोलते हैं, “जो ब्राह्मण श्मशान में कुटिया बनाकर रह रहा था, वो उसकी पत्नी हुई।” बेताल पूछता है, “कैसे?” तब विक्रमादित्य जवाब देते हैं, “जो हड्डी चुनकर फकीर बन गया, वो उसका बेटा हुआ। जिसने तांत्रिक विद्या से उसे जीवित किया, वो उसके पिता समान हुआ और जो उसकी राख के साथ जीवन जी रहा था, वो ही उसका पति हुआ।” जवाब सुनते ही बेताल ने कहा, “राजन तुमने बिलकुल सही उत्तर दिया है, लेकिन शर्त के मुताबिक तुम्हें मुंह नहीं खोलना था। इसलिए, मैं दोबारा उड़ रहा हूं।” इतना कहकर बेताल दोबारा घने जंगल के किसी पेड़ में जाकर लटक जाता है और राजा विक्रम उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगते हैं। कहानी से सीख चतुराई और बुद्धि से बड़ी से बड़ी समस्या को हल किया जा सकता है।

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