August 3, 2022

विक्रम बेताल की कहानी: पापी कौन है – बेताल पच्चीसी पहली कहानी

कड़ी मेहनत के बाद राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ लिया। वह उसे अपने कंधे पर लादकर श्मशान की ओर ले चले। रास्ते में बेताल ने राजा को एक नई कहानी शुरू की और बेताल बोला… एक बार की बात है काशी में एक राजा था, जिसका नाम प्रताप मुकुट था। उसकी एक संतान थी, जिसका नाम वज्रमुकुट थी। एक दिन वज्रमुकुट दीवान के बेटे के साथ शिकार करने जंगल गया। काफी घूमने के बाद उन दोनों को एक तालाब दिखा, जिसमें कमल खिले थे और हंस उड़ रहे थे। दोनों दोस्तों ने वहां रुककर तालाब के पानी से हाथ-मुंह धोया और पास ही बने महादेव के मंदिर में दर्शन करने चले गए। दोनों ने अपने घोड़े मंदिर के बाहर ही बांध दिए। फिर जब दोनों दोस्त दर्शन करके मंदिर से बाहर निकले, तो उन्होंने देख कि तालाब में एक राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है।राकुमारी को देखकर राजकुमार काफी खुश हुआ। राजकुमार और राजकुमारी दोनों एक-दूसरे को देखकर मोहित हो गए, जबकि दीवान का बेटा वहीं एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा। राजकुमार को देखते ही राजकुमारी ने बालों में से एक कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दांतों से कुतरा, पैरों के नीचे दबाया और फिर अपने छाती से लगाकर अपनी सहेलियों के साथ चली गई। उसके जाने के बाद राजकुमार काफी दुखी हुआ और अपने मित्र के पास लौटकर सारी बात बताई। राजकुमार बोला, “मैं राजकुमारी के बिना नहीं रह सकता हूं, लेकिन मुझे इस राजकुमारी के बारे में कुछ भी नहीं पता है। वह कहां रहती, उसका नाम क्या है?” दीवान के बेटे ने सारी बातें सुनी और राजकुमार को दिलासा देते हुए बोला, “राजकुमार, आप घबराइए मत। राजकुमारी ने सबकुछ बताया है। आश्चर्यचकित होते हुए राजकुमार ने पूछा, “वो कैसे?”दीवान के बेटे ने राजकुमार को बताना शुरू किया कि राजकुमारी ने कमल के फूल को बालों से निकालकर कानों से लगाया यानी राजकुमारी का कहना है कि वह कर्नाटक से है। दांत से फूल को कुतरा, मतलब उनके पिता का नाम दंतावट है। फूल को पांव से दबाने का मतलब था कि राजकुमारी का नाम पद्मावती है और फूल को सीने से लगाने का मतलब था कि अब आप उनके हृदय में बस चुके हैं। यह सब सुनते ही राजकुमार बहुत ज्यादा खुश हो गया। खुश होते हुए राजकुमार ने दीवान के बेटे से कहा कि मुझे कर्नाटक जाना है मुझे वहां ले चलो। दोनों दोस्त कई दिनों तक घूमते-फिरते कर्नाटक पहुंचे। जब वो दोनों राजमहल के निकट पहुंचे, तो उन्हें एक चरखा चलाती बुजुर्ग महिला दिखी।महिला को देखते ही दोनों घोड़े से उतरे और उसके पास जाकर कहा, “माई, हम दोनों व्यापारी हैं, हम बहुत दूर से आए हैं। हमारा सामान अभी तक आया नहीं है, कुछ दिनों में हमारा सामान भी पहुंच जाएगा। हम दोनों को बस रहने के लिए थोड़ी-सी जगह चाहिए।” उनकी बातें सुनकर बुजुर्ग महिला की ममता जाग उठी, उसने कहा, “बेटा इसे अपना ही घर समझो। जब तक मन करे यहां रह सकते हो।” इसके बाद दोनों उसके घर में रहने लगे। इसी बीच दीवान के बेटे ने उस महिला से पूछा, “आप क्या काम करती हैं माई? आपके यहां कौन-कौन रहता है? आप कैसे अपना गुजर-बसर करती हैं?”इन सारे सवालों का जवाब धीरे-धीरे उस महिला ने देना शुरू किया। उसने कहा, “मेरा एक पुत्र है, जो राजा के यहां नौकरी करता है। मैं राजा की पुत्री पद्मावती की दासी थी। बूढ़ी हो गई हूं, इसलिए घर में ही रहती हूं। महाराज खाने को दे देते हैं और पूरे दिन में एक बार राजकुमारी से मिलने चली जाती हूं।इतना सुनते ही राजकुमार ने बूढ़ी औरत को कुछ धन दिए और राजकुमारी तक संदेशा पहुंचाने को कहा। राजकुमार ने उस बूढ़ी महिला को कहा, “माई, कल तुम जब राजकुमारी के पास जाओ, तो उनसे कहना कि जेठ सुदी पंचमी को तुम्हें नदी के पास जो राजकुमार मिला था, वो तुम्हारे राज्य में आ गया है।” अगले दिन वो बूढ़ी औरत राजकुमार का संदेश लेकर राजकुमारी के पास गई। उस महिला की बात सुनते ही राजकुमारी गुस्सा हो गई। उन्होंने हाथों में चंदन लगाकर उस महिला के गाल पर तमाचा मारते हुए कहा, मेरे घर से निकल जाओ।बूढ़ी औरत ने घर लौटकर राजकुमार को सारी बातें बताई। महिला की बातें सुनकर राजकुमार चौंक गया। फिर राजकुमार के मित्र ने राजकुमार को धैर्य बंधाते हुए कहा, “राजकुमार आप चिंतित न हों। राजकुमारी की बातों को समझने की कोशिश करें। ध्यान दें कि राजकुमारी ने उंगलियों को सफेद चंदन में डुबोकर गाल पर मारा है। इसका मतलब अभी कुछ दिन चांदनी के हैं। उनके खत्म होने के बाद अंधेरी रात में मिलूंगी।”कुछ दिनों बाद बूढ़ी महिला फिर राजकुमारी के पास संदेशा लेकर पहुंची। इस बार राजकुमारी ने केसरी रंग में तीन उंगलियां डुबोकर बूढ़ी महिला के मुंह पर मारते हुए कहा, “भागो यहां से।” फिर उस महिला ने आकर राजकुमार को सारी बातें बताई। राजकुमार यह सुनकर बहुत दुखी हुआ। इस पर दीवान के बेटे ने राजकुमार से कहा, “इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं है राजकुमार। राजकुमारी ने कहा है कि अभी उसकी तबीयत ठीक नहीं है, तो इसलिए तीन दिन और रुक जाओ।”तीन दिन बाद वो बूढ़ी महिला फिर राजकुमारी के पास जा पहुंची। इस बार फिर से राजकुमारी ने उस महिला को फटकारा और पश्चिम की खिड़की से बाहर जाने के लिए कहा। वो महिला फिर से राजकुमार के पास गई और सारी कहानी सुनाई। तब दीवान के बेटे ने राजकुमार को समझाते हुए कहा कि मित्र राजकुमारी ने आपको उस खिड़की की तरफ बुलाया है।राजकुमार यह सुनते ही खुशी से उछल पड़ा। उसने बूढ़ी महिला के कपड़े पहनकर नारी का भेष धारण किया, इत्र लगाया और हथियार बांधकर राजकुमारी से मिलने चल पड़ा। राजकुमार महल पहुंचा और खिड़की के रास्ते राजकुमारी के कमरे में पहुंच गया। राजकुमारी वहां पर तैयार थी और राजकुमार का इंतजार कर रही थी। राजकुमार जैसे ही कमरे में गया, उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। राजकुमारी के कमरे में कई महंगी चीजें रखी थीं। रातभर राजकुमार और राजकुमारी साथ ही रहे। फिर जैसे ही दिन निकलने को आया राजकुमारी ने उस राजकुमार को

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विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी

विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी कुछ इस प्रकार है। बहुत समय पहले की बात है। उज्जयनी नाम के राज्य में राजा विक्रामादित्य राज किया करते थे। राजा विक्रामादित्य की न्यायप्रियता, कर्तव्यनिष्ठता और दानशीलता के चर्चे पूरे देश में मशहूर थे। यही कारण था कि दूर-दूर से लोग उनके दरबार में न्याय मांगने आया करते थे। राजा हर दिन अपने दरबार में लोगों की तकलीफों को सुनते और उनका निवारण किया करते थे। एक दिन की बात है। राजदरबार लगा हुआ था। तभी एक भिक्षु विक्रमादित्य के दरबार में आता है और एक फल राजा को देकर चला जाता है। राजा उस फल को कोषाध्यक्ष को दे देता है। उस दिन के बाद से हर रोज वह भिक्षु राजा के दरबार में आने लगा। उसका रोज का काम यही था कि वह राजा को फल देता और चुपचाप चला जाता। राजा भी प्रत्येक दिन भिक्षु द्वारा दिया गया फल कोषाध्यक्ष को थमा देता। ऐसे करते-करते करीब 10 साल बीत गए। एक दिन जब भिक्षु फिर राजा के दरबार में आकर फल देता है, तो इस बार राजा फल कोषाध्यक्ष को न देकर वहां मौजूद एक पालतू बंदर के बच्चे को दे देते हैं। यह बंदर किसी सुरक्षाकर्मी का था, जो छूट कर अचानक राजा के पास आ जाता है। बंदर जब उस फल को खाने के लिए तोड़ता है, तो उस फल के बीच से एक बहुमूल्य रत्न निकलता है। उस रत्न की चमक को देख राज दरबार में मौजूद सभी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। राजा भी यह नजारा देख आश्चर्य में पड़ जाता है। राजा कोषाध्यक्ष को इससे पूर्व भिक्षु द्वारा दिए गए सभी फलों के बारे में पूछता है। राजा के पूछने पर कोषाध्यक्ष बताता है कि महाराज मैंने उन सभी फलों को राज कोष में सुरक्षित रखवा दिया है। मैं उन सभी फलों को अभी लेकर आता हूं। कुछ देर बाद कोषाध्यक्ष राजा को आकर बताता है कि सभी फल सड़-गल गए हैं। उनके स्थान पर बहुमूल्य रत्न बचे हुए हैं। यह सुनकर राजा बहुत खुश होता है और कोषाध्यक्ष को सारे रत्न सौंप देता है। अगली बार जब भिक्षु फल लेकर दोबारा विक्रमादित्य के दरबार पहुंचता है, तो राजा कहते हैं, “भिक्षु मैं आपका फल तब तक ग्रहण नहीं करूंगा, जब तक आप यह नहीं बताते कि हर दिन आप इतनी बहुमूल्य भेंट मुझे क्यों अर्पित करते हैं? राजा की यह बात सुन भिक्षु उन्हें एकांत स्थान पर चलने को कहता है। एकांत में ले जाकर भिक्षु राजा को बताता है कि मुझे मंत्र साधना करनी हैं और उस साधना के लिए मुझे एक वीर पुरुष की जरूरत है। चूंकि, मुझे तुमसे वीर दूसरा कोई नहीं मिल सकता, इसलिए यह बहुमूल्य उपहार तुम्हें दे जाता हूं। भिक्षु की बात सुन राजा विक्रमादित्य उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। तब भिक्षु राजा को बताता है कि अगली अमावस्या की रात को उसे पास के श्मशान आना होगा, जहां वह मंत्र साधना की तैयारी करेगा। इतना कहकर भिक्षु वहां से चला जाता है। अमावस्या का दिन आते ही राजा को भिक्षु की बात याद आती है और वह वचन के अनुसार श्मशान पहुंच जाते हैं। राजा को देख भिक्षु बहुत प्रसन्न होता है। भिक्षु कहता है, “हे राजन, तुम यहां आए मैं बहुत खुश हुआ कि तुम्हें तुम्हारा वचन याद रहा। अब यहां से पूर्व की दिशा में जाओ। वहां एक महाश्मशान मिलेगा। उस महाश्मशान में एक शीशम का एक विशाल वृक्ष है। उस वृक्ष पर एक मुर्दा लटका हुआ है। उस मुर्दे को तुम्हें मेरे पास लेकर आना है। भिक्षु की बात सुनकर राजा सीधे उस मुर्दे को लाने चल देता है। महाश्मशान में पहुंचने के बाद राजा को एक विशाल शीशम के पेड़ पर एक मुर्दा लटका हुआ दिखाई देता है। राजा अपनी तलवार खींचता है और पेड़ से बंधी डोर को काट देता है। डोर कटते ही मुर्दा जमीन पर आ गिरता है और जोर से चीखने की आवाज आती है। दर्दभरी चीख सुन राजा को लगता है कि शायद यह मुर्दा नहीं, बल्कि कोई जिंदा इंसान है। थोड़ी देर बाद जब मुर्दा तेजी से हंसने लगता है और फिर पेड़ पर जाकर लटक जाता है, तो विक्रम समझ जाता है कि इस मुर्दे पर बेताल चढ़ा है। काफी कोशिश के बाद विक्रम बेताल को पेड़ से उतार अपने कंधे पर टांग लेते हैं। इस पर बेताल विक्रम से कहता है, “विक्रम मैं तेरे साहस को मान गया। तू बड़ा ही पराक्रमी है। मैं तेरे साथ चलता हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि पूरे रास्ते में तू कुछ भी नहीं बोलेगा।” विक्रम सिर हिलाकर हां में बेताल की बात मान लेता है। इसके बाद बेताल विक्रम से कहता है कि रास्ता लंबा है, इसलिए इस रास्ते को रोमांचक बनाने के लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं। तो यह थी विस्तार से राजा विक्रम, योगी और बेताल की आरंभिक कहानी। यही से शुरू होता है बेताल पच्चीसी की 25 कहानियों का सफर, जो बेताल एक-एक करके विक्रम को सुनाता है। कहानियों के विक्रम-बेताल के इस भाग में आपको बेताल पच्चीसी की सभी कहानियां एक साथ पढ़ने को मिलेंगी। कहानी से सीख : एक राजा को हमेशा विक्रमादित्य की तरह सहासी और पराक्रमी होना चाहिए। तभी वह अपनी प्रजा की रक्षा कर सकता है।

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भीमसेन का अभिमान

पांडु पुत्र भीम को अपनें बलशाली होने पर अत्यंत गर्व हो जाता है। वनवास काल के दौरान एक दिन वह वन की ओर विचरते हुए दूर निकल जाते हैं। रास्ते में उन्हे एक वृद्ध वानर मिलता है। वानर की पूँछ भीमसेन के रास्ते में बिछी होती है। तभी भीम उसे अपनी पूँछ दूर हटा लेने को कहते हैं। परंतु वृद्ध वानर कहता है, “अब इस आयु में मुझसे बार-बार हिला-डुला नहीं जाता तुम तो काफी हट्टे-कट्टे हो, एक काम करो तुम ही मेरी पूँछ को हटा कर आगे बढ़ जाओ।” भीम उस वृद्ध वानर की पूँछ उठा कर हटाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं, परंतु वह पूँछ को एक इंच भी हिला नहीं पाते हैं। अंत में भीमसेन उन्हे हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हैं और उन्हे अपना परिचय देने का विनम्र आग्रह करते हैं। फिर वृद्ध वानर के रूप धरे हुए पवन पुत्र हनुमान अपनें असली स्वरूप में आ जाते हैं, और भीम को अपना अहंकार छोड़ने की सीख देते हैं। सार: बल, बुद्धि और कौशल पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए।

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शिव के गण नंदी की कहानी

पौराणिक दंत कथा अनुसार, एक बार शिवजी के निवास स्थान पर कुछ दुष्ट व्यक्ति प्रवेश कर जाते हैं। इस बात का बोध होते ही शिवजी नंदी को कुछ निर्देश देना के लिए बुलाते हैं लेकिन अतिउत्साही नंदी शिवजी को अनसुना कर के उन दुष्टों के पीछे भाग पड़ता है। नंदी के इस अबोध आचरण से क्रोधित हो कर भगवान शिव नंदी को आज्ञा देते हैं- आज से तुम्हारा स्थान मेरे निवास स्थान के बाहर ही रहेगा। इसी कारण आज के समय में भी भगवान शिव के प्रिय नंदी का स्थान मंदिर के बाहर ही स्थापित किया जाता है। सार / Moral of the story- बिन सोचे समझे किसी कार्य में अमल करने पर अपार विपदा आ सकती है। जब कोई ज्ञानी व्यक्ति कुछ बोल रहा हो तब उनकी बात काटनी नहीं चाहिए और उन्हे अनसुना नहीं करना चाहिए।

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कर्ण की निष्ठा

एक राज पुत्र होते हुए भी कर्ण सूत पुत्र कहा गया। कर्ण एक महान दानवीर था। अपनें प्रण और वचन के लिए कर्ण अपनें प्राणों की भी बलि दे सकता था। पांडवों की शिक्षा खतम होने के बाद आयोजित रंग-भूमि में आकर कर्ण अर्जुन को ललकारता है  कि अगर वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुरधर है तो उससे मुक़ाबला कर के सिद्ध करे। कर्ण एक सूत के घर पला-बढ़ा होता है, इसलिए उसे सूत पुत्र समझ कर अर्जुन से मुक़ाबला नहीं करने दिया जाता है। पांडवों के प्रखर विरोधी दुर्योधन को यहाँ एक अवसर दिखता है, और वह फौरन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर देता है। और कर्ण को अपना मित्र बना लेता है। दुर्योधन के इस कृत्य से कर्ण के दुखते घावों पर मरहम लग जाता है। लेकिन समय सीमा खत्म होने के कारण रंगभूमि में कर्ण-अर्जुन का मुक़ाबला टल जाता है। पांडवो और कौरवों के अंतिम निर्णायक युद्ध के पहले भगवान कृष्ण कर्ण को यह भेद बताते हैं कि तुम एक पांडव हो और कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो। इस रहस्य को जान कर भी कर्ण अपनें मित्र दुर्योधन से घात कर के अपनें भाइयों की ओर नहीं जाता है। दिव्य कवच-कुंडल के साथ कर्ण अजेय था और महाभारत के युद्ध में पांडव कभी उसे परास्त नहीं कर पाते। अतः इन्द्रदेव उससे सुबह स्नान के समय ब्राह्मण स्वरूप में आ कर दान में कवच-कुंडल मांगते हैं। पिता सूर्य देव द्वारा दिखाए गए स्वप्न से कर्ण को यह बात पहले ही ज्ञात हो जाती है कि इंद्र देव उससे रूप बदल कर कवच-कुंडल मांगने आयेंगे। पर फिर भी दानवीर कर्ण ब्राह्मण रुपी इंद्र देव को खाली हाथ नहीं लौटता और उनकी मांग पूरी करता है। इंद्र देव कवच-कुंडल के बदले में कर्ण को एक शक्ति अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका इस्तेमाल सिर्फ एक बार किया जा सकता था और उसका कोई काट नहीं था। युद्ध के दौरान भीम का पुत्र घटोत्कच कौरव सेना को तिनकों की तरह उड़ाए जा रहा था। उसने दुर्योधन को भी लहूलहान कर दिया। तब दुर्योधन सहायता मांगने कर्ण के पास आया। कर्ण शक्ति अस्त्र सिर्फ अर्जुन पर इस्त्माल करना चाहता था, पर मित्रता से विवश हो कर उसने वह अस्त्र भीम पुत्र घटोत्कच कर चला दिया। और उसका अंत कर दिया। और इस तरह अर्जुन सुरक्षित हो गया। अपनें साथ दो-दो शापों का बोझ ले कर चल रहे कर्ण को यह बात पता थी की जहां धर्म है वहीं कृष्ण होते हैं और जहां कृष्ण है वहीं विजय भी होती है। फिर भी उसने न दुर्योधन के एहसान भूल कर उससे घात किया, और ना ही अपनी दानवीरता से कभी पीछे हटा। सार- हो सके तो किसी के ऋणी मत बनो, और एक बार अगर किसी के ऋणी बन ही जाओ तो ऋण चुकाने में आनाकानी मत करो। अगर कोई कुछ मांगने आए तो उसे निराश नहीं करना चाहिए, जितना संभवतः हो उसकी मदद करनी चाहिए।

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