July 19, 2022

रामायण की कहानी: लक्ष्मण जी नहीं सोए 14 साल

रामचंद्र जी को जब उनके पिता दशरथ राजपाट सौंपने वाले थे, तभी उनकी दूसरी पत्नी कैकेयी को उनकी दासी मथंरा ने खूब भड़काया। मंथरा ने कहा कि राजा तो आपके बेटे भरत को बनना चाहिए। इसके बाद कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे, पहला भरत को गद्दी मिलनी चाहिए और दूसरा राम को 14 वर्ष तक वन में रहना होगा। राजा दशरथ को अपनी पत्नी के वर पूरे करने पड़े। जब रामचंद्र जी वनवास के लिए अयोध्या से निकले, तब लक्ष्मण जी ने भी उनके साथ जाने की इच्छा जाहिर की। लक्ष्मण के वन जाने की बात सुनकर उनकी पत्नी उर्मिला भी साथ जाने की जिद करने लगती है। तब लक्ष्मण अपनी पत्नी उर्मिला को समझाते हैं कि वह अपने बड़े भाई और मां समान भाभी सीता की सेवा करने के लिए जा रहे हैं। अगर तुम वनवास में साथ चलोगी, तो मैं ठीक तरह से सेवा नहीं कर पाऊंगा। लक्ष्मण के सेवा भाव को देखकर उर्मिला साथ जाने की जिद छोड़ देती है और महल में ही रुक जाती है। वन में पहुंचकर लक्ष्मण, भगवान राम और सीता के लिए एक कुटिया बनाते हैं। जब राम और सीता कुटिया में विश्राम करते थे, तब लक्ष्मण बाहर पहरेदारी करते थे। वनवास के पहले दिन जब लक्ष्मण पहरेदारी कर रहे थे, तब उनके सामने निद्रा देवी प्रकट हुईं। लक्ष्मण ने निद्रा देवी से वरदान मांगा कि वह 14 साल तक निद्रा मुक्त रहना चाहते हैं। निद्रा देवी ने कहा कि तुम्हारे हिस्से की नींद किसी और को लेनी होगी। लक्ष्मण कहते हैं कि उनके हिस्से की नींद उनकी पत्नी को दे दें। इस कारण लक्ष्मण 14 साल तक नहीं सोए और उनकी पत्नी उर्मिला लगातार 14 वर्ष तक सोती रही। 14 वर्ष बाद जब भगवान राम और माता सीता के साथ जब लक्ष्मण अयोध्या वापस आए, तब नींद की अवस्था में रामचंद्र जी के राजतिलक समारोह में उर्मिला भी उपस्थित थी। यह देख लक्ष्मण को हंसी आती है। जब लक्ष्मण से हंसी की वजह पूछी गई, तो उन्होंने निद्रा देवी के वरदान के बारे में सब कुछ बताया। लक्ष्मण ने कहा कि जब मैं उबासी लूंगा, तब उर्मिला की नींद खुलेगी। लक्ष्मण जी की इस बात को सुनकर सभा में मौजूद सभी हंस पड़े। सभी को हंसते देख उर्मिला लज्जावश समारोह से उठकर बाहर चली जाती हैं।

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रामायण की कहानी: कुंभकरण की नींद

रामायण में रावण के भाई कुम्भकरण की भूमिका भी अद्भुत है। वो अपने विशाल शरीर और अपनी भूख से ज्यादा अपनी गहरी नींद के लिए जाना जाता था। माना जाता है कि राक्षस वंश का होने के बावजूद कुम्भकरण बुद्धिमान और बहादुर था। उसकी ताकत से देवराज इंद्र भी ईर्ष्या करते थे। एक बार रावण, कुम्भकरण और विभीषण एक साथ ब्रह्मदेव की तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने के लिए कहा। वहीं, दूसरी ओर इंद्र को डर था कि कुम्भकरण वरदान में कहीं स्वर्ग का सिंहासन न मांग लें। इस बात से डरकर, इंद्र ने मां सरस्वती से कुम्भकरण के वरदान के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की। मां सरस्वती ने कुम्भकरण की जीभ बांध दी, जिससे कुम्भकरण के मुख से इंद्रासन की जगह निंद्रासन निकल गया। इससे पहले कि कुम्भकरण को अपनी गलती का अहसास होता, ब्रह्मा तथास्तु बोल चुके थे। रावण सब कुछ समझ गया था, उसने ब्रह्मा से उनके दिए हुए वरदान को वापस लेने के लिये कहा। ब्रह्मा ने एक शर्त के साथ उस वरदान को वापस लिया कि कुम्भकरण 6 माह सोएगा और 6 माह तक जागता रहेगा। इस बात को रावण ने मान लिया। कहा जाता है कि जब राम-रावण का युद्ध हो रहा था, तब कुम्भकरण सो रहा था। उसे जगाने की कोशिश की गई, बहुत प्रयास करने के बाद ही वो नींद से जागा था।

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भगवान शिव को तीसरी आंख कैसे मिली

भगवान शिव जी की हर प्रतिमा में उनके मस्तक पर एक आंख दिखाई देती है। इसे भोलेनाथ की तीसरी आंख कहते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर तीसरी आंख है, इसलिए उन्हें त्रिलोचन भी कहा जाता है। वैसे क्या आप जानते हैं कि शिव जी को यह तीसरी आंख कैसे मिली? इस घटना के पीछे एक कहानी है, जिसमें शिव जी की तीसरी आंख का रहस्य और महत्व दोनों पता चलता है। एक समय की बात है, भगवान शिव कैलाश पर्वत पर तपस्या कर रहे थे, तभी देवी पार्वती वहां आईं। देवी पार्वती को मजाक सूझा और उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपने पति शिव की आंखों को ढक लिया। देवी पार्वती को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनके इस मजाक का क्या परिणाम होगा। जैसे ही पार्वती जी ने भगवान शिव की आंखों को ढका, वैसे ही पूरी सृष्टि में अंधेरा छा गया। सभी लोग अंधेरे से घबरा उठे। शिव जी से लोगों की यह हालत छुप नहीं सकी और उन्होंने अपने मस्तक पर एक आंख उत्पन्न कर ली। भगवान शिव की तीसरी आंख खुलते ही सारे लोकों में उजाला हो गया। तब से शिव जी की तीसरी आंख को प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक माना जाने लगा। भगवान शिव इस घटना के बाद पार्वती जी को बताते हैं कि उनकी दो आंखे पूरी सृष्टि की पालनहार हैं और तीसरी आंख प्रलय का कारण। शास्त्रों में भी कहा गया है कि जब भी भगवान शिव अपनी तीसरी आंख खोलेंगे, तब संसार को विनाश का सामना करना होगा।

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