July 14, 2022

भगवान शिव को प्रसन्न करने के सबसे सरल व आसान उपाय

सनातन धर्म के आदिपंच देवों में से एक शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन हमेशा लय और प्रलय दोनों उनके अधीन रहते हैं। पंडित एसडी शर्मा के अनुसार शिव का अर्थ है कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ और रूद्र आदि नाम से भगवान शंकर हिंदुओं के शीर्ष देवता हैं, वे देवों के देव महादेव कहे गए हैं। मान्यता है कि यदि शिव को सच्चे मन से याद कर लिया जाए तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। धर्म कथाओं के अनुसार भगवान शंकर का माता पार्वती के साथ विवाह हुआ था। वहीं हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव का प्रमुख पर्व महाशिवरात्रि हिंदी वर्ष के अंत में आती है, ऐसे में इस दिन पूरे वर्ष में हुई जानें अनजाने गलतियों के लिए भगवान शंकर से क्षमा याचना की जाती है और आने वाले वर्ष में उन्नति व सदगुणों के विकास के लिए प्रार्थना की जाती है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय : ‘ॐ नमः शिवाय:’ पंचतत्वमक मंत्र है इसे शिव पंचक्षरी मंत्र कहते हैं। इस पंचक्षरी मंत्र के जाप से ही मनुष्य संपूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव का निरंतर चिंतन करते हुए इस मंत्र का जाप करें।: व्रती दिनभर शिव मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय:’ का जाप करें तथा पूरा दिन निराहार रहें। रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।: शिवपुराण में रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा का विधान है। माना जाता है कि इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए। रात को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हर व्रती का धर्म माना गया है।: श्री महाशिवरात्रि व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। स्नान, वस्त्र, धूप, पुष्प और फलों के अर्पण करें। इसलिए इस दिन उपवास करना अति उत्तम कर्म है।: वहीं सभी प्रकार के पापों का नाश करने और समस्त सुखों की कामना के लिए महाशिवरात्रि व्रत करना श्रेष्ठ माना जाता है।: महाशिवरात्रि की रात को भगवान शिव की चार प्रहर की पूजा बड़े भाव से करने का विधान है। भगवान शिव को दूध, दही, शहद, सफेद पुष्प, सफेद कमल पुष्पों के साथ ही भांग, धतूरा और बिल्व पत्र अति प्रिय हैं। इन मंत्रों का जाप करें-‘ओम नम: शिवाय ‘, ‘ओम सद्योजाताय नम:’, ‘ओम वामदेवाय नम:’, ‘ओम अघोराय नम:’, ‘ओम ईशानाय नम:’, ‘ओम तत्पुरुषाय नम:’। अर्घ्य देने के लिए करें ‘गौरीवल्लभ देवेश, सर्पाय शशिशेखर, वर्षपापविशुद्धयर्थमर्ध्यो मे गृह्यताम तत:’ मंत्र का जाप। रात को शिव चालीसा का पाठ करें। इसके अतिरिक्त पूजा की प्रत्येक वस्तु को भगवान को अर्पित करते समय उससे सम्बन्धित मंत्र का भी उच्चारण करें। प्रत्येक प्रहर की पूजा का सामान अलग से होना चाहिए। भोलेनाथ प्रसन्न को प्रसन्न करने के लिए इन बातों का ध्यान रखते हुए ये चढ़ाएं- :- केसर, चीनी, इत्र, दूध, दही, घी, चंदन, शहद, भांग,सफेद पुष्प, धतूरा और बिल्व पत्र।:- ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।:- बिल्व पत्र के तीनों पत्ते पूरे होने चाहिएं, खंडित पत्र कभी न चढ़ाएं।:- चावल सफेद रंग के साबुत होने चाहिएं, टूटे हुए चावलों ना चढ़ायें।:- फूल ताजे ही चढ़ाएं, बासी एवं मुरझाए हुए न हों।:- शिवलिंग पर लाल रंग, केतकी एवं केवड़े के पुष्प अर्पित नहीं किए जाते।:- भगवान शिव पर कुमकुम और रोली का अर्पण भी निषेध है।

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भोलेनाथ का आशीर्वाद तो सावन के हर सोमवार करें ये उपाय

हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को बहुत प्रिय माना जाता है। सावन के महीने में किए जाने वाले पूजा-पाठ और व्रत का भी बड़ा महत्व है। वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि सावन के हर सोमवार को इन उपायों को करने से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।हिंदू कैलेंडर के अनुसार पांचवा महीना सावन भगवान शिव को बड़ा प्रिय माना गया है। सावन के पूरे महीने में भोलेनाथ के मंदिरों में भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। शिवभक्त महादेव को प्रसन्न करने के लिए पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि करते हैं। इस साल श्रावण मास की शुरुआत 14 जुलाई 2022 से हो रही है और सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई को है। ऐसे में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सावन के हर सोमवार को इन उपायों को करके भी भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है… ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सावन के सोमवार का व्रत रखने के अलावा शिवलिंग पर जलाभिषेक को बहुत महत्व दिया गया है। साथ ही प्रत्येक सोमवार को गाय को पालक खिलाने और गरीबों को भोजन तथा वस्त्रों का दान बहुत शुभ माना जाता है। सावन सोमवार के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर गंगाजल, चीनी, चावल और कच्चे दूध के मिश्रण वाला जल भगवान भोलेनाथ को अर्पित करें। मान्यता है कि सावन के हर सोमवार इस तरह से भोलेनाथ का अभिषेक करने से व्यापार, नौकरी और वैवाहिक जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। भोलेनाथ की पूजा में बेलपत्र बहुत शुभ माना जाता है ऐसे में सावन के सोमवार के दिन बेलपत्र पर चंदन से ओम नमः शिवाय लिखें और फिर इस महादेव को अर्पित कर दें। ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक आक का फूल भोलेनाथ हो बेहद प्रिय होता है। ऐसे में मनोकामना की पूर्ति के लिए आक के फूल की माला बनाकर भोलेनाथ को अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल देते हैं। (डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई सूचनाएं सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। इनकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह ले लें।)

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सावन सोमवार के दिन भोलेनाथ को इस कथा से करें प्रसन्‍न

भगवान शिव को प्रसन्‍न करने के लिए किसी भी तरह के खास विशेष पूजन की आवश्‍यकता नहीं होती। क्‍योंकि कहा जाता है कि वह तो भोले हैं और भक्‍त की मन से की गई क्षणिक मात्र की भक्ति से ही वह प्रसन्‍न हो जाते हैं। अगर आप भी शिव की भक्ति और कृपा पाने के लिए सावन के सोमवार का व्रत करते हैं तो इस कथा से भोलेनाथ को प्रसन्‍न कर सकते हैं। एक साहूकार था जो शिव का अनन्‍य भक्‍त था। उसके पास धन-धान्‍य किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन उसके पुत्र नहीं था और वह इसी कामना को लेकर रोज शिवजी के मंदिर जाकर दीपक जलाता था। उसके इस भक्ति भाव को देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिव जी से कहा कि प्रभु यह साहूकार आपका अनन्‍य भक्‍त है। इसी को किसी बात का कष्‍ट है तो आपको उसे अवश्‍य दूर करना चाहिए। शिव जी बोले कि हे पार्वती इस साहूकार के पास पुत्र नहीं है। यह इसी से दु:खी रहता है। माता पार्वती कहती हैं कि हे प्रभु कृपा करके इसे पुत्र का वरदान दीजिए। तब भोलेनाथ ने कहा कि हे पार्वती साहूकार के भाग्‍य में पुत्र का योग नहीं है। ऐसे में अगर इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान मिल भी गया तो वह केवल 12 वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा। यह सुनने के बाद भी माता पार्वती ने कहा कि हे प्रभु आपको इस साहूकार को पुत्र का वर देना ही होगा अन्‍यथा भक्‍त क्‍यों आपकी सेवा-पूजा करेंगे? माता के बार-बार कहने से भोलेनाथ ने साहूकार को पुत्र का वरदान दिया। लेकिन यह भी कहा कि वह केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा। साहूकार यह सारी बातें सुन रहा था, इसलिए उसे न तो खुशी हुई और न ही दु:ख। वह पहले की ही तरह भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करता रहा। उधर सेठानी गर्भवती हुई और नवें महीने उसे सुंदर से बालक की प्राप्ति हुई। परिवार में खूब हर्षोल्‍लास मनाया गया लेकिन साहूकार पहले ही की तरह रहा। और उसने बालक की 12 वर्ष की आयु का जिक्र किसी से भी नहीं किया। जब बालक 11 वर्ष की आयु हो गई तो एक दिन साहुकार की सेठानी से बालक के विवाह के लिए कहा। तो साहूकार ने कहा कि वह अभी बालक को पढ़ने के लिए काशीजी भेजेगा। इसके बाद उसने बालक के मामा जी को बुलाया और कहा कि इसे काशी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्‍ते में जिस भी स्‍थान पर रुकना वहां यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए आगे बढ़ना। उन्‍होंने भी इसी तरह करते हुए जा रहे थे कि रास्‍ते में एक राजकुमारी का विवाह था। जिससे उसका विवाह होना था वह एक आंख से काना था। तो उसके पिता ने जब अति सुंदर साहूकार के बेटे को देखा तो उनके मन में आया कि क्‍यों न इसे ही घोड़ी पर बिठाकर शादी के सारे कार्य संपन्‍न करा लिये जाएं। तो उन्‍होंने मामा से बात की और कहा कि इसके बदले में वह ढेर सारा धन देंगे तो वह भी राजी हो गए।इसके बाद साहूकार का बेटा विवाह की बेदी पर बैठा और जब विवाह कार्य संपन्‍न हो गए तो जाने से पहले उसने राजकुमारी की चुंदरी के पल्‍ले पर लिखा कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ लेकिन जिस राजकुमार के साथ भेजेंगे वह तो एक आंख का काना है। इसके बाद वह अपने मामा के साथ काशी के लिए चला गया। उधर जब राजकुमार ने अपनी चुनरी पर यह लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया। तो राजा ने भी अपनी पुत्री को बारात के साथ विदा नहीं किया। बारात वापस लौट गई। उधर मामा और भांजे काशी जी पहुंच गये थे। एक दिन जब मामा ने यज्ञ रचा रखा था और भांजा बहुत देर तक बाहर नहीं आया तो मामा ने अंदर जाकर देखा तो भांजे के प्राण निकल चुके थे। वह बहुत परेशान हुए लेकिन सोचा कि अभी रोना-पीटना मचाया तो ब्राह्मण चले जाएंगे और यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। जब यज्ञ संपन्‍न हुआ तो मामा ने रोना-पीटना शुरू किया। उसी समय शिव-पार्वती उधर से जा रहे थे तो माता पार्वती ने शिव से कहा कि हे प्रभु कौन रो रहा है इतना तभी उन्‍हें पता चलता है कि यह तो भोलेनाथ के आर्शीवाद से जन्‍मा साहूकार का पुत्र है। तो वह कहती हैं कि हे स्‍वामी इसे जीवित कर दें अन्‍यथा इसके माता-पिता के रोते-रोते प्राण निकल जाएंगे। तब भोलेनाथ ने कहा कि हे पार्वती इसकी आयु इतनी ही थी सो वह भोग चुका। लेकिन मां के बार-बार आग्रह करने पर भोलेनाथ ने उसे जीवित कर दिया। लड़का ओम नम: शिवाय करते हुए जी उठा और मामा-भांजे दोनों ने ईश्‍वर को धन्‍यवाद दिया और अपनी नगरी की ओर लौटे। रास्‍ते में वही नगर पड़ा और राजकुमारी ने उन्‍हें पहचान लिया तब राजा ने राजकुमारी को साहूकार के बेटे के साथ बहुत सारे धन-धान्‍य के साथ विदा किया। उधर साहूकार और उसकी पत्‍नी छत पर बैठे थे। उन्‍होंने यह प्रण कर रखा था कि यदि उनका पुत्र सकुशल न लौटा तो वह छत से कूदकर अपने प्राण त्‍याग देंगे। तभी लड़के के मामा ने आकर साहूकार के बेटे और बहू के आने का समाचार सुनाया लेकिन वे नहीं मानें तो मामा ने शपथ पूर्वक कहा त‍ब तो दोनों को विश्‍वास हो गया और दोनों ने अपने बेटे-बहू का स्‍वागत किया। उसी रात साहूकार को स्‍वप्‍न ने शिव जी ने दर्शन दिया और कहा कि तुम्‍हारे पूजन से मैं प्रसन्‍न हुआ। इसी प्रकार जो भी व्‍यक्ति इस कथा को पढ़ेगा या सुनेगा उसके समस्‍त दु:ख दूर हो जाएंगे और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होगी।

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इन पवित्र पर्वों और त्योहारों से भरा है शिव शंभू को समर्पित सावन माह 

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है जिसमें भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। वर्ष 2022 में सावन का महीना 14 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई के दिन पड़ने वाला है। जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है और उनकी तपस्या में लीन रहता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे जीवन में हमेशा सफलता हाथ लगती है। इसके साथ यह भी कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन में व्रत करना फलदाई होता है। माना जाता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने के दौरान पौराणिक कथाओं का पाठ अवश्य करना चाहिए। जो भक्त भगवान शिव की पौराणिक कथा का पाठ करता है उसे व्रत का पूरा फल मिलता है।  सावन माह प्रारंभ, समापन और‌ सभी सोमवारी व्रतों की तिथियां सावन माह प्रारंभ- 14 जुलाई 2022 सावन माह समान- 12 अगस्त 2022 सावन का पहला सोमवारी व्रत- 18 जुलाई 2022 सावन का दूसरा सोमवारी व्रत- 25 जुलाई 2022  सावन का तीसरा सोमवारी व्रत- 01 अगस्त 2022  सावन का चौथा सोमवारी व्रत- 08 अगस्त 2022 सावन माह में सभी मंगला गौरी​ व्रतों की तिथि  प्रथम मंगला गौरी व्रत- 19 जुलाई 2022 द्वितीय मंगला गौरी व्रत- 26 जुलाई 2022  तृतीय मंगला गौरी व्रत- 2 अगस्त 2022  चतुर्थ मंगला गौरी व्रत- 9 अगस्त 2022 आपको बता दें सावन के महीने में पड़ने वाले सभी मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। सावन माह में पड़ने वाले प्रमुख व्रत, पर्व और त्योहर 2022 पुत्रदा एकादशी व्रत- 08 अगस्त 2022, दिन- सोमवार सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। संतान प्राप्ति की अभिलाषा से भक्त यह व्रत रखते हैं। इसके साथ संतान के अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य के लिए भी यह व्रत रखना लाभदायक माना गया है। सावन शिवरात्रि- 26 जुलाई 2022, दिन- मंगलवार सावन माह में सावन शिवरात्रि का व्रत रखने से समस्त पाप खत्म हो जाते हैं। महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ने वाली सावन शिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक करने से जीवन में खुशहाली आती है। हरियाली अमावस्या- 28 जुलाई 2022, दिन- गुरुवार  श्रावण मास की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह तिथि पर्यावरण के महत्व को दर्शाती है। इस दिन कृषि उपकरणों की पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पौधा लगाना फलदाई होता है। हरियाली तीज व्रत- 31 जुलाई 2022, दिन- रविवार  सनातन धर्म में हरियाली तीज का पर्व बेहद प्रमुख माना गया है। यह पर्व सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाता है। शादीशुदा स्त्रियों और कुंवारी लड़कियों के लिए हरियाली तीज का व्रत रखना लाभदायक माना गया है।  नाग पंचमी व्रत- 02 अगस्त 2022, दिन- मंगलवार  सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता के साथ भगवान भोलेनाथ की भी पूजा की जाती है।  रक्षाबंधन- 11 अगस्त, दिन- गुरुवार भाई बहन के प्यार का प्रतीक है रक्षाबंधन का त्योहार, जो इस वर्ष 11 अगस्त को पड़ रहा है। यह त्योहार हर वर्ष श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है। 

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सिर्फ मांस-मदिरा ही नहीं बल्कि सावन माह में नहीं खानी चाहिए ये चीजें, जानें क्या क्या है शामिल

भगवान भोलेनाथ की भक्ति का महीना सावन शुरू हो चुका है। गुरुवार 14 जुलाई 2022 से सावन का पावन महीना शुरू होगा जोकि 12 अगस्त 2022 तक रहेगा। सावन का महीना धार्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि यह माह भगवान शिवजी की भक्ति-आराधना के लिए समर्पित होता है। सावन के पूरे महीने भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं सावन में पड़ने वाले सोमवार के दिन व्रत रखने का विधान है। सावन माह में जिस तरह पूजा-पाठ और व्रत के के दौरान कई नियमों का पालन करना पड़ता है। ठीक उसी तरह सावन माह में खान-पान को लेकर भी सावधानी बरतनी चाहिए। इस माह मांस-मदिरा के सेनव का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए।  आयुर्वेद में सावन के माह में खान-पान को लेकर विशेष निर्देश दिए गए हैं। इसका कारण यह है कि इस माह मानसून और हरियाली होती है। इसलिए इस माह लोगों के बीमार होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। जानते हैं इस महीने मांस मदिरा के त्याग के साथ ही किन चीजों को नहीं खाना चाहिए और किन चीजों का सेवन अच्छा माना गया है। सावन महीने में भूलकर न खाएं ये चीजें दही सावन माह में दही खाने की सलाह नहीं दी जाती। इसका कारण यह होता है कि दही की तासीर ठंडी होती है जोकि इस माह बीमारी की संभावना को बढ़ा सकती है। सावन महीने में दही का सेवन करने से सर्दी जुकाम और गले से संबंधित बीमारियां हो सकती है। दूध दही की तरह ही सावन के महीने में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। इस महीने दूध पीने से पेट संबंधी बीमारियां और अत्यधिक गैस की संभावना बढ़ जाती है। सावन में दूध नहीं पीने का धार्मिक कारण यह भी है कि भगवान शिवजी को सावन में दूध से अभिषेक किया जाता है। इस कारण भी इस महीने कच्चा दूध नहीं पीना चाहिए। बैंगन सावन महीने में बैंगन या बैंगन से बनी प्रकार का व्यंजन नहीं खाना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार बैंगन को अशुद्ध सब्जी के रूप में माना गया है। इसलिए सावन के पवित्र माह में बैंगन नहीं खाना चाहिए। इसका दूसरा कारण यह भी है कि इस माह खूब वर्षा होती है जिस कारण बैंगन में कीड़े ज्यादा लगते हैं। इसलिए भी सावन में बैंगन खाने के लिए मना किया जाता है। मांसाहार भोजन सावन के महीने में मांसाहार भोजन का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए और सात्विक चीजें खानी चाहिए। लेकिन खासकर इस माह मछली नहीं खानी चाहिए। क्योंकि बारिश में नदी-तालाब का पानी प्रदूषित हो जाता है और इससे इसमें रहने वाले जल-जीव भी दूषित हो जाते हैं, जिसे खाने से बीमारियां हो सकती है। पत्तेदार साग-सब्जियां सावन माह में पत्तेदार हरी सब्जियां जैसे पालक, साग, गोभी, मूली जैसी सब्जियों को भी नहीं खाना चाहिए। क्योंकि मॉनसून होने के कारण इनमें कीड़े लगते हैं। प्याज-लहसुन और तली-भुनी चीजें  सावन माह में प्याज-लहसुन का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए। साथ ही ज्यादा तले-भुने भोजन से भी परहेज करना चाहिए। सावन में खाएं ये चीजें जल्दी पचने वाली सब्जियां सावन के महीने में ऐसी हरी सब्जियों का सेवन करें जो जल्दी डाइजेस्ट होती हो। जैसे इस माह लौकी और तुरई जैसी सब्जियों को सबसे अच्छा माना जाता है।

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सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी।

आषाढ़ माह खत्म होते ही सावन माह की शुरुआत आज 14 जुलाई से शुरू हो गई है। सावन का महीना भोलेनाथ की पूजा-अराधना के लिए समर्पित होता है। इस पूरे माह भगवान शिवजी की विशेष आराधना की जाती है, जिससे वे प्रसन्न होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। सावन शिवजी का प्रिय माह होता है। यही कारण है कि शिवभक्तों को भी इस माह का बेसब्री से इंतजार रहता है। वैसे तो भोले भंडारी एक लोटे शुद्ध जल से जलाभिषेक करने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन यदि आप सावन में भगवान शिव की विशेष कृपा चाहते हैं तो उनके प्रिय फल-फूल के साथ ही यह 5 तरह के अनाज अर्पित करें। शिवजी को इन 5 तरह के अनाज चढ़ाने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी होगी और कष्टों से मुक्ति मिलेगी। जानते हैं कौन से हैं ये पांच अनाज.. सावन में शिवजी को अर्पित करें ये 5 अनाज अक्षत सावन माह में शिवलिंग पर सफेद चावल या अक्षत चढ़ाने से धन लाभ होता है। सावन सोमवारी के दिन एक मुट्ठी अक्षत शिवजी को चढ़ाएं और इसके बाद यह अक्षत किसी गरीब को दान दे दें। ऐसा करने से रुपये-पैसों से जुड़ी समस्या दूर होती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि चावल का कोई भी दाना टूटा हुआ न हो। काला तिल भांग, धतूरा और बेलपत्र की तरह ही शिवलिंग पर काला तिल भी चढ़ाया जाता है। क्योंकि काला तिल भगवान शिव को अतिप्रिय है। सावन में शिवजी को काले तिल अर्पित करने से मानसिक और शारीरिक संबंधी परेशानियां दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। अरहर दाल सावन माह में शिवलिंग पर पीली अरहर की दाल अर्पित करना बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गेहूं विवाह में किसी कारण देरी हो रही है या बाधाएं उत्पन्न हो रही है तो सावन माह में शिवलिंग पर गेहूं अर्पित करना चाहिए। साथ ही गेहूं चढ़ाने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है और व्यक्ति के बौद्धिक स्तर का भी विकास होता है। मूंग हरे मूंग की दाल सावन माह में शिवलिंग पर अर्पित करें। इससे भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। Read More »

सावन का पहला व्रत, जानें क्यों होता है सावन में दाढ़ी व बाल कटवाना वर्जित?

भगवान शिव का सबसे प्रिय सावन हिंदू पंचांग के अनुसार 14 जुलाई गुरुवार से शुरू होने वाला है। सावन का त्योहार 12 अगस्त तक रहेगा। इस साल सावन में चार सोमवार पड़ेंगे। पहला सोमवार का व्रत 18 जुलाई को रखा जाएगा। सावन का त्यौहार शिव भक्तों के लिए सबसे खास होता है। सावन के महीने में शिव भक्त भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करने पर भगवान शिव हर मनोकामना पूरी करते हैं। सावन के सोमवार में कुछ लोग पूरा सावन व्रत भी रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो करना वर्जित माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन कार्यों को करने से भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। आइए जातने हैं आखिर क्यों इन कार्यों को करना सावन के महीने में वर्जित माना जाता है। दाढ़ी व बाल काटना माना जाता है अशुभ हिंदू शास्त्रों के अनुसार सावन के महीने में बाल काटना व दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है। अगर आप सावन का व्रत रख रहे हैं तो नियमित रूप से शिवजी के मंदिर जाकर पूजा पाठ करें और सावन के महीने में बाल काटने व दाढ़ी बनाने से बचें। इसके अलावा सावन के महीने में नाखून काटना व शरीर पर तेल मालिश करना भी वर्जित बताया गया है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रह दोष लगता है और सावन में रखा गया व्रत भी फलदाई नहीं होता है। सब पर नहीं होता यह नियम लागू हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन का महीना धार्मिक कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। इस महीने में बहुत से लोग कावड़ चढ़ाने जाते हैं। बहुत से धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं, इसलिए अनुष्ठान तथा कावड़ का कार्य जब तक पूरा नहीं होता तब तक लोग दाढ़ी बाल नहीं कटवाते हैं और ना ही नाखून काटते हैं। ज्योतिष के अनुसार दाढ़ी और बाल काटने का नियम सभी पर लागू नहीं होता है। यह स्वैच्छिक है अनिवार्य नहीं।

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Sawan Vrat Katha in Hindi: सावन का पवित्र महीना मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा के दौरान कथा का पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है जिसमें भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। वर्ष 2022 में सावन का महीना 14 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई के दिन पड़ने वाला है। जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है और उनकी तपस्या में लीन रहता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे जीवन में हमेशा सफलता हाथ लगती है। इसके साथ यह भी कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन में व्रत करना फलदाई होता है। माना जाता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने के दौरान पौराणिक कथाओं का पाठ अवश्य करना चाहिए। जो भक्त भगवान शिव की पौराणिक कथा का पाठ करता है उसे व्रत का पूरा फल मिलता है। कैसे शुरू हुई कांवड़ की परंपरा? पौराणिक कथाओं के अनुसार, कांवड़ की परंपरा शुरू करने वाले भगवान परशुराम थे। कहा जाता है कि सावन के महीने में भगवान परशुराम सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा आराधना किया करते थे। वह कांवड़ में जल भरकर शिव मंदिर तक यात्रा करते थे और शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के बाद भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करते थे। भगवान शिव को सावन का महीना और सावन सोमवार बेहद प्रिय है इसीलिए सावन के महीने में सोमवार का व्रत करना बहुत लाभदायक माना गया है। कहा जाता है कि भगवान परशुराम की वजह से ही भगवान शिव की पूजा और उनका व्रत शुरू हुआ था। भगवान शिव को क्यों प्रिय है सावन का महीना? एक और कथा के मुताबिक, भगवान शिव ने सनत कुमारों को स्वयं यह बताया था कि उन्हें सावन का महीना क्यों प्रिय है और इस महीने में उनकी पूजा करना क्यों लाभदायक है। जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन के महीने की महिमा पूछी तब भगवान शिव ने यह कहा कि देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में शरीर का त्याग किया था। देवी सती ने यह संकल्प लिया था कि वह हर जन्म भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। अगले जन्म देवी सती का पार्वती के रूप में जन्म हुआ था। पार्वती ने सावन के महीने में ही भगवान शिव को पाने के लिए कड़ी तपस्या की थी। जिसकी वजह से उन्हें भगवान शिव मिले थे और उन्होंने सुखी जीवन व्यतीत किया था। तब से ही भगवान शिव के लिए सावन का महीना बेहद प्रिय हो गया।

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नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन? | Nandi Kaise Bane Shiv Ke Vahan

पुराणों के अनुसार नंदी असल में शिलाद ऋषि के पुत्र थे और शिलाद ऋषि थे ब्रह्मचारी। दरअसल, हुआ यूं कि ब्रह्मचारी व्रत का पालन करते-करते शिलाद ऋषि के मन एक भय बैठ गया। भय था कि बिना संतान उनकी मृत्यु के बाद उनका वंश समाप्त हो जाएगा। इसलिए, उन्होंने अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए एक बच्चा गोद लेने का मन बनाया। मन तो ऋषि शिलाद ने बना लिया, लेकिन दुविधा यह थी कि ऋषि ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिस पर भगवान शिव की असीम कृपा हो। अब ऐसा बालक ढूंढने से भी मिलना मुश्किल था तो ऋषि भगवान की घोर तपस्या में लीन हो गए। लंबे समय तक तप करने के बाद भी उन्हें इसका कोई भी फल प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि शिलाद ने अपनी तपस्या को और भी कठोर कर दिया। काफी समय के कठोर तप के बाद आखिर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि शिलाद को दर्शन दिए। भगवान शिव ने शिलाद ऋषि से कहा, “मांगो, क्या वर मांगना चाहते हो।” ऋषि शिलाद ने अपनी कामना भगवान शिव से जाहिर की। भगवान शिव ने शिलाद को पुत्र का आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। अगले ही दिन जब ऋषि शिलाद पास के खेतों से गुजर रहे थे तो उन्हें वहां एक नवजात बच्चा मिला। बच्चे का मुख बेहद ही मनमोहक और लुभावना था। ऋषि बच्चे को देख बहुत खुश हुए और यह सोचकर इधर-उधर देखने लगे कि इतने प्यारे बच्चे को इस हाल में यहां छोड़कर कौन चला गया। तभी भगवान शिव की आवाज आई और उन्होंने कहा शिलाद यही है, तुम्हारा पुत्र। अब तो ऋषि शिलाद की प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही नहीं था। वह उसे अपने साथ अपने घर ले आए और उसका लालन-पालन करने लगे। देखते देखते नंदी बड़ा हो गया। एक दिन ऋषि शिलाद के घर दो सन्यासी आए। ऋषि शिलाद की आज्ञा से नंदी ने दोनों सन्यासियों का खूब आदर सत्कार किया। उन्हें भोजन कराया। ऋषि शिलाद के घर मिले इस सेवा भाव से दोनों सन्यासी अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि शिलाद को दीर्घ आयु का आशीर्वाद दिया, लेकिन नंदी जिसने उनकी इतनी मन से सेवा की थी उसके लिए एक शब्द भी नहीं कहा। सन्यासियों द्वारा ऐसा किए जाने पर ऋषि शिलाद को आश्चर्य हुआ। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए शिलाद ने सन्यासियों से ऐसा करने के पीछे की वजह पूछी। तब सन्यासियों ने बताया कि आपके इस पुत्र की आयु बहुत कम है। इसलिए, हमने इसे कोई आशीर्वाद नहीं दिया। नंदी ने सन्यासियों की यह बात सुन ली। नंदी ने अपने पिता से कहा, “आपने मुझे स्वयं भगवान शिव के आशीर्वाद से पाया है, तो मेरे इस जीवन की रक्षा भी भगवान शिव ही करेंगे। आप इस बात की बिलकुल भी चिंता न करो।” इतना कहते हुए नंदी भगवान शिव की अराधना में लग जाता है। अपने पिता की तरह ही नंदी ने भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। फलस्वरूप भगवान शिव प्रसन्न हुए और नंदी को बैल का मुख देकर अपना सबसे प्रिय और वाहक बनाया। इस प्रकार नंदी भगवान शिव के सबसे प्रिय वाहन बने और समाज में उन्हें पूजनीय स्थान भी मिला। यही वजह है कि भगवान शिव की आराधना से पूर्व उनके प्रिय नंदी की पूजा की जाती है।

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श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी | Shri Krishna Govardhan Parvat

गोकुल के निवासी देवराज इंद्र से बहुत भयभीत रहते थे। उन्हें लगता था कि देवराज इंद्र ही धरती पर बारिश करते हैं। नगरी के सभी निवासी इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए उनकी बहुत पूजा किया करते थे, ताकि गोकुल पर इंद्रदेव की कृपा बनी रहे। एक बार श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों को समझाया कि इन्द्रदेव की पूजा में अपना समय बर्बाद करने से अच्छा है कि तुम लोग गाय-भैंसों की पूजा करो। ये तुम्हें दूध देती हैं। ये पशु सम्मान के अधिकारी हैं। गोकुलवासी श्री कृष्ण की बात जरूर मानते थे। उन्होंने इंद्रदेव की जगह पशुओं को मान-सम्मान देना शुरू कर दिया। जब इन्द्रदेव ने देखा कि अब कोई भी उनकी पूजा नहीं कर रहा है, तो वह इस अपमान से तिलमिला उठे। इन्द्रदेव ने गुस्से में आकर गोकुलवासियों को सबक सिखाने का निर्णय लिया। भगवान इंद्र ने बादलों को आदेश दिया कि गोकुल नगरी तब तक तुम बरसते रहो, जब तक वह डूब न जाए। इन्द्रदेव का आदेश पाकर बादलों ने गोकुल नगरी पर बरसना शुरू कर दिया। गोकुल नगर में ऐसी बारिश कभी नहीं पड़ी थी। चारों ओर पानी ही पानी नजर आने लगा। पूरे नगर में बाढ़ आ गई। गोकुलवासी घबरा कर श्री कृष्ण के पास पहुंचे। श्री कृष्ण ने सभी गोकुलवासियों को अपने पीछे चलने का आदेश दिया। गोकुलवासी अपनी गाय और भैंस साथ लेकर श्री कृष्ण के पीछे-पीछे चल दिए। श्री कृष्ण गोवर्धन नाम के पर्वत पर पहुंचे और उस पर्वत को अपने हाथ की सबसे छोटी ऊंगली पर उठा लिया। सभी गोकुल निवासी उस पर्वत के नीचे आकर खड़े हो गए। श्री कृष्ण का यह चमत्कार देखकर भगवान इंद्र भी भयभीत हो गए। उन्होंने वर्षा बंद कर दी। यह देखकर गोकुल वासी खुश हो गए और अपने-अपने घर को लौट गए। इस तरह श्री कृष्ण ने अपनी शक्ति से गोकुलवासियों की जान बचाई।

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कृष्ण और पूतना वध की कहानी | Shri Krishna Putna Vadh

कंस का अंत नजदीक आ चुका था। उसे इस बात का पता चल चुका था कि उसकी मृत्यु उसके ही भांजे कृष्ण के हाथों होने वाली है। फिर क्या था, बाल गोपाल को मारने के लिए कंस कई तरह के हथकंडे अपनाने लगा। वह कृष्ण को मारने के लिए शक्तिशाली दानवों को भेजता, लेकिन नटखट कन्हैया की बाल लीला के आगे किसी की नहीं चली। एक बार कंस ने पूतना नाम की राक्षसी को बाल कृष्ण का वध करने के लिए भेजा। जैसे ही पूतना गोकुल पहुंची, उसने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया। स्त्री का रूप धारण कर पूतना घर-घर जाकर कृष्ण की तलाश करने लगी। कृष्ण की खोज में पूतना को जो भी बालक मिलता, वो उसे अपने विष वाले दूध को पिलाकर मार देती। जब पूतना कृष्ण के घर पहुंचती है, तब भगवान कृष्ण को पता चल जाता है कि वह एक राक्षसी है। पूतना कृष्ण को गोदी में उठाकर अपना विषैला दूध पिलाने लगती है। कृष्ण को दूध पीते देखकर पूतना सोचने लगती है कि अब यह मर जाएगा। भगवान कृष्ण कुछ देर बाद दूध पीते-पीते ही राक्षसी के प्राण खींचने लगते हैं। दर्द के कारण राक्षसी पूतना कृष्ण को आसमान की ओर लेकर उड़ जाती है और पास के जंगल में कान्हा सहित गिर जाती है। थोड़ी देर बाद ही राक्षसी के प्राण निकल जाते हैं। इस तरह भगवान कृष्ण राक्षसी पूतना का वध कर देते हैं।

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श्री कृष्ण को गोविंद क्यों कहते हैं? | Shri Krishna Kyon Govinda Kyun Kehte

बच्चों, जब भगवान कृष्ण छोटे थे, तो बहुत नटखट थे। उनके कन्हैया, श्याम, नंदलाला और गोपाल जैसे कई नाम थे और हर नाम के पीछे एक कहानी है। ऐसी ही कहानी उनके गोविंद नाम के पीछे भी है, तो आज की कहानी इस गोविंद नाम पर ही है। बात उन दिनों की है जब बाल-गोपाल कृष्ण जंगल में गायों को चराने जाया करते थे। एक दिन वह अपनी गायों को जंगले ले कर गए, तो कामधेनु नाम की एक गाय उनके पास आई। उस गाय ने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “मेरा नाम कामधेनु है और मैं स्वर्गलोक से आई हूं। जिस तरह आप पृथ्वी पर गायों की रक्षा करते हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित हूं और आपका सम्मान करने के लिए आपका अभिषेक करना चाहती हूं।” कामधेनु की यह बात सुन कर भगवान मुस्कुराए और उन्होंने उसे अभिषेक करने की अनुमति दे दी। इसके बाद, कामधेनु ने पवित्र जल से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। इसके बाद, इंद्रदेव अपने हाथी एरावत पर बैठकर वहां आए और उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि आपके पुण्य कामों की वजह से अब से सारी दुनिया में लोग आपको गोविंद के नाम से भी जानेंगे।

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