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Sawan Somwar Vrat Katha: हिंदू धर्म की पवित्र परंपराओं में सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत केवल एक नियम नहीं, बल्कि भक्ति और आत्मिक जुड़ाव की गहराई से जुड़ा एक दिव्य साधन है। यह व्रत न केवल मनोकामनाओं की पूर्ति का मार्ग है, बल्कि भगवान शिव के चरणों में समर्पण का प्रतीक भी है।

सावन (Sawan Somwar Vrat Katha) का महीना बेहद पावन होता है। इस महीने के प्रत्येक सोमवार पर भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। साथ ही सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत रखा जाता है। इस व्रत की महिमा का वर्णन शास्त्रों में निहित है। भगवान शिव की पूजा से हर मनोकामना पूरी होती है।

Sawan Somvar Vrat Katha in Hindi: सावन सोमवार Somwar Vrat Katha के व्रत में कथा का पाठ करने का महत्‍व श‍िव पुराण में बहुत खास माना गया है। मान्‍यता है कि जो लोग सावन सोमवार का व्रत करते हैं उनको विधि विधान से पूजा करने के बाद व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। भगवान शिव का सबसे पहले दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है और फिर विधि विधान से पूजा करने के बाद सावन सोमवार के व्रत की कथा का पाठ करने से आपका व्रत संपूर्ण माना जाता है और पूजा का शुभ फल प्राप्‍त होता है। तो पढ़ें सावन सोमवार की व्रत कथा विस्‍तार से।

Sawan Somwar Vrat Katha: सावन सोमवार की व्रत कथा

मृत्युलोक में भ्रमण करने की इच्‍छा करके एक समय श्री भूतनाथ भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ मृत्युलोक में पधारे। भ्रमण करते-करते दोनों विदर्भ देशांतर्गत अमरावती नाम की अति रमणीक नगरी में पहुंचे। अमरावती नगरी स्‍वर्ग के सदृश सभी प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उसमें वहां के महाराज द्वारा बनवाया हुआ अति रमणीक शिवजी का मंदिर भी था।

Somwar Vrat Katha
Somwar Vrat Katha

भगवान शंकर भगवती पार्वती के साथ इस मन्दिर में निवास करने लगे। Somwar Vrat Katha एक समय माता पार्वतीजी भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न देखकर बोली, हे महाराज आज तो हम दोनों चौंसर खेलेंगे। शिवजी ने प्राण प्रिया की बात को मान लिया और चौंसर खेलने लगे। उसी समय मन्दिर का पुजारी ब्राह्मण मन्दिर में पूजा करने आया। माता पार्वती ने पुजारी से प्रश्‍न किया पुजारी जी, बताओ इस बाजी में हम दोनों में से किसी जीत होगी?

ब्राह्मण बिना विचारे जल्‍दी से बोल उठा कि महादेव जी की जीत होगी। थोड़ी देर में बाजी समाप्‍त हो गई और पार्वतीजी जीत हुई। Somwar Vrat Katha पार्वतीजी को बहुत गुस्सा आया और ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने चलीं। भोलेनाथ ने पार्वती को बहुत समझाया लेकिन उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी होने का शाप दे दिया।

कुछ समय बाद पार्वती जी के श्रापवश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया। वह बहुत अधिक दुखी रहने लगा। पूजारी को कष्ट भोगते हुए जब बहुत दिन गुजर गए तब एक दिन देवलोक की अप्‍सराएं शिवजी की पूजा करने के लिए उस मंदिर में पधारीं। Somwar Vrat Katha पुजारी के कोड़ के कष्ट को देखकर उन्हें बड़ी दया आई। उन्‍होंने उससे रोगी होने का कारण पूछा।

पुजारी ने निसंकोच सारी बातें बता दीं। वे अप्‍सराएं बोलीं हे पुजारी, अब तुम अधिक दुःखी मत होना। सावन सोमवार Somwar Vrat Katha का व्रत भक्तिभाव से करो। पुजारी ने अप्‍सराओं से व्रत की विधि पूछी। अप्‍सराओं ने बताया, सोमवार को भक्ति भाव से व्रत करो। साफ वस्‍त्र पहनो। संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहूं का आटा लो और उसके तीन भाग कर लो। घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, पूंगीफल, बेलपत्र, जनेऊ जोड़ा, चंदन, अक्षत पुष्‍पादि से प्रदोषकाल में भगवान शिव की पूजा करो।

उसके बाद तीन भागों में से एक भाग शिवजी को अर्पण करो, बाकी दो शिवजी का प्रसाद समझकर उपस्थित लोगों में बांट दो और आप भी प्रसाद समझकर खाओ। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत रखो। Somwar Vrat Katha सत्रहवें सोमवार को पाच-सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाओ, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाओ। भगवान भोलेनाथ को भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांट दो। इसके बाद कुट्‌म्ब सहित प्रसाद लो तो शिवजी की कृपा से उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

“ऐसा कहकर अप्सराएं स्वर्ग को चली गईं। ब्राहाण ने यथाविधि षोड्श सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिव की कृपा से रोग से मुक्ति पाकर आनन्द से रहने लगा। कुछ दिन बाद शिवजी और पार्वतीजी उस मन्दिर में पुनः पधारे। ब्राह्मण को निरोग देखकर पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोग से मुक्त होने का उपाय पूछा। ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत कथा सुनाई। पार्वतीजी बहुत प्रसन्‍न हुईं।

ब्राह्मण से व्रत विधि पूछकर स्‍वयं भी व्रत करने के लिए तैयार हो गई। व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूरी हुई हुई और उनके रूठे बेटे स्वामी कार्तिकेय स्वय माता के आज्ञाकारी हुए। कार्तिकेय जी को अपना यह विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई। वे माता से बोले हे माता। आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मम आपकी ओर आकर्षित हो गया?” पार्वती जी ने वही षोड्श सोमवार व्रत कथा की कथा उनको सुना दी।

कार्तिकय जी कहा इस व्रत को में भी करूंगा, क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बहुत दुःखी दिल से परदेश गया है। मेरी इसमे मिलने की बहुत इच्छा है। कार्तिकेय जी ने भी इस व्रत को किया और उनका प्यारा मित्र मिल गया। मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का भेद पूछा तो कार्तिकेय जी बोले हे मित्र। हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था।

अब तो ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बड़ी चिन्ता हुई। Somwar Vrat Katha उसने कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी और यथाविधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्य से विदेश गया तो वहां के राजा की लड़की का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार से श्रृङ्गारित हथिनी माला डालेगी, मैं उसी के साथ अपनी प्यारी बेटी का विवाह कर दूंगा।

शिवजी की कृपा से वह ब्राह्मण भी उस स्वयंवर को देखने की इच्छा से राज्यसभा में एक ओर जाकर बैठ गया। Somwar Vrat Katha नियत समय पर हथिनी आई और उसने जयमाला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से अपनी कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया और ब्राह्मण को बहुत-सा धन व सम्‍मान देकर सन्तुष्ट किया।

ब्राहाण सुन्दर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा। एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया- “हे प्राणनाथ! आपने ऐसा कौन-सा भारी पुण्य किया था जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया?” ब्राह्मण बोला- -हे “हे प्राणप्रिये ! – मैंने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कथनानुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी रूपवान पत्नी की प्राप्ति हुई है।

इस व्रत की महिमा सुनकर राजकन्या को बड़ी हैरत हुई। वह भी पुत्र की कामना करके इस व्रत को करने लगी। शिवजी की दया से उसके गर्भ से एक अति सुन्दर, सुशील, धर्मात्मा और विद्वान पुत्र उत्पन्न हुआ। माता और पिता उस देवपुत्र को पाकर अधिक प्रसन्न हुए और उसका लालन-पालन अच्छी प्रकार से करने लगे।

जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन उसने अपनी माता से प्रश्न किया कि “हे मां। तुSomwar Vrat Katha मने कौन-सा व्रत और तप किया है जो मेरे जैसा पुत्र तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न हुआ?” उसकी माता ने सोलह सोमवार की वत कथा पुत्र को बताई। पुत्र ने सब तरह के मनोरथ पूरे करने वाले इस सरल व्रत को सुना तो वह भी राज्याधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथाविधि यह व्रत करने लगा।

व्रत शुरू करने के बाद एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसको राजकन्या के लिये वरण किया। Somwar Vrat Katha राजा ने अपनी बेटी का विवाह ऐसे सर्वगुण सम्पन्न ब्राह्मण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्‍त किया। वृद्ध राजा के दिवंगत हो जाने के बाद इसी ब्राह्मण को सिंहासन पर बैठाया गया, क्योंकि दिवंगत राजा का कोई पुत्र नहीं था।

राज्य का उत्तराधिकारी होकर भी यह ब्राह्मण पुत्र सोलह करता रहा। Somwar Vrat Katha जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी प्रियतमा से पूजन-सामग्री लेकर शिवपूजा के लिए शिवालय में चलने को कहा, परन्तु उसकी पत्नी ने उसकी आज्ञा की परवाह न की। दास दासियों द्वारा सब सामग्रियां शिवालय में भिजवा दीं परन्तु स्वयं नहीं गई।

जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया तब आकाशवाणी हुई- “हे राजा। अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दे, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।” यह आकाशवाणी सुनने के बाद राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने मंत्रणागृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर कहा- “मन्त्रियों, मुझे आज शिवजी की आकाशवाणी हुई है

कि राजा तू अपनी इस रानी को राज्य से निकाल दे, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।” राज्य के मन्त्री और सभासद आदि सब विस्मय और दुःख में डूब गयेः क्योंकि जिस कन्या के कारण उसे राज्य मिला था, राजा उसी को निकालने की बात कह रहा था। Somwar Vrat Katha यह कैसे हो सकता था? पर राजा ने मन्त्रियों की परवाह नहीं की। उसने अपनी पत्नी को
राजमहल से निकाल दिया।

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रानी दुःखी हृदय से भाग्य को कोसती हुई राज्य से बाहर चली गई। बिना पदत्राण, फटे हुए वस्त्र पहने, भूख से दुःखी हृदय से भाग्य को कोसती हुई चली जा रही थी कि उसकी अचानक एक करुण बुढ़ि‍या से भेंट हुई जो सूत कातकर बेचने जाती थी। रानी की करुण दशा देखकर वह बोली- “चल तू मेरा सूत बिकवा दे। मैं बूढ़ी हूं, भाव करना नहीं जानती हूं।” यह बात सुन रानी ने बुढ़ि‍या के सिर से सूत की गठरी उतार कर अपने सिर पर रख ली। थोड़ी देर के बाद आंधी आ गई और बुढ़िया का सूत पोटली सहित उड़ गया।

बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई। उसने रानी को अपने से दूर रहने को कहा, इसके बाद रानी एक तेली के घर गई, तो शिवजी के प्रकोप के कारण तेली के सभी मटके उसी क्षण चटक गये। तेली ने भी रानी को अपने घर से निकाल दिया। Somwar Vrat Katha बहुत से दुःख उठाती रानी एक नदी के किनारे गई तो नदी का सारा जल सूख गया। उसके पश्चात रानी एक जंगल में गई। वहां सरोवर में पानी पीने गई तो उसके हाथ का स्पर्श होते ही सरोवर का नीलकमल के समान जल असंख्य कीड़ोंमय होकर गन्दा हो गया।

रानी ने भाग्य पर दोषरोपण करते हुए उस जल को पीकर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करना चाहा परन्तु वह जिस पेड़ के नीचे विश्राम करती, उस पेड़ के पत्ते तुरन्त टूटकर गिर जाते थे। वन, सरोवर, जलाशय की ऐसी दशा देख गऊ चराते ग्वालों ने अपने गुसाईं जी से, जो उस जंगल में स्थित मन्दिर में पुजारी थे, उनको यह बात बताई।

गुसाईं जी के आदेशानुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गुसाईं जी के पास लाये। रानी की मुख-कान्ति और शरीर शोभा देख गुसाईं जी जान गये कि यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कुलीन स्त्री है। Somwar Vrat Katha पुजारी रानी से कहा- “पुत्री! मैं तुमको अपनी पुत्री के समान रखूंगा। तुम मेरे आश्रम में आकर रहो। मैं तुम्हें किसी प्रकार का दुःख नहीं होने दूंगा।” गुसाईं जी के वचन सुनकर रानी को धीरज हुआ। वह आश्रम में रहने लगी।

रानी जो भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते। जल भर कर लाती उसमें भी कीड़े पड़ जाते। रानी की यह दशा देख गुसाई जी भी बड़े दुःखी हुए और रानी से बोले- “हे पुत्री! तुम्हारे ऊपर कौन से देवता का प्रकोप है, जिससे तुम्हारी ऐसी हालत हुई है?”

पुजारी जी की बात सुनकर रानी ने शिवजी महाराज के पूजन का बहिष्कार की बात बताई तो पुजारी जी शिवजी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी से बोले कि पुत्री, सब मनोरथ पूरे करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो, उसके प्रभाव से इस कष्ट से मुक्त हो सकोगी। गुसाईंजी की बात मानकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत किए, सत्रहवें सोमवार को विधि-विधान सहित पूजन किया। उस पूजा के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार आया कि रानी को गए हुए बहुत समय बीत गया, न जाने कहां-कहां भटकती होगी। उसे ढूंढ़ना चाहिये।

यह सोचकर रानी को तलाश करने के लिए राजा ने चारों दिशाओं में दूत भेजे। वे दूत रानी को तलाश करते हुए गुसाई जी के आश्रम में पहुंचे। वहां रानी को पाकर उनसे रानी को अपने साथ ले जाने का आग्रह करने लगे। परन्तु गुसाईंजी ने मना कर दिया। दूत चुपचाप वापस लौट आए और राजा को रानी का पता बतलाया। Somwar Vrat Katha रानी का पता पाकर राजा गुसाईं जी के आश्रम में गये और उनसे कहा- “महाराज । जो देवी आपके आश्रम में रहती है वह मेरी पत्नी है। शिवजी के प्रकोप के कारण मैंने उसको त्याग दिया था।

अब मैं भोलेनाथ की कृपा से उसे लेने आया हूं, कृपया मुझे अपनी पत्नी को साथ ले जाने की आज्ञा दें।” यह सुनकर गुसाईं जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने रानी को राजा के साथ जाने की अनुमति दे दी। राजा बड़ी प्रसन्नता से रानी को महल में लेकर आया।Somwar Vrat Katha सारे राज्य में उत्सव मनाया गया और चारों तरफ प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। सारी प्रजा ने अपनी रानी के आने पर खुशियां मनाई।

राजा और रानी फिर नियमपूर्वक सोलह सोमवार के व्रत का पालन करते हुए बहुत समय तक आनन्दपूर्वक भू-लोक पर निवास करते रहे। अन्त समय में दोनों को मोक्ष (स्वर्ग) की प्राप्ति हुई। Somwar Vrat Katha इस प्रकार जो मनुष्य सोलह सोमवार के व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं भगवान शिवजी की कृपा से पूर्ण होती हैं और उसे मोक्ष की प्राप्त होती है।

।। बोलो भगवान भोलेनाथ की जय ।।॥

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