श्रीमथुरास्थाव एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के जन्मस्थान मथुरा की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र संत कवि विद्यापति द्वारा रचित है। यह स्तोत्र वंशस्थल छंद में रचित है, जिसमें प्रत्येक चरण में 16 अक्षर होते हैं।
श्रीमथुरास्थाव की पहली दो पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
shreemathuraastavah
श्रीमथुरास्थाव
श्रीमथुरा, श्रीमथुरा,
हे मधुबन,
तेरी महिमा अपार,
तेरी छवि अपरंपार।
इस स्तोत्र में, विद्यापति मथुरा को "मधुबन" कहते हैं, जिसका अर्थ है "मधु से भरा हुआ स्थान"। वे इसे "मधुबन" इसलिए कहते हैं क्योंकि यह स्थान भगवान कृष्ण के जन्मस्थान के रूप में प्रसिद्ध है। वे मथुरा की महिमा का वर्णन करते हैं और इसे "अपार" और "अपरंपार" कहते हैं।
इस स्तोत्र में, विद्यापति मथुरा की सुंदरता का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि मथुरा के वृक्ष, फूल, और नदी सभी अत्यंत सुंदर हैं। वे कहते हैं कि मथुरा का वातावरण अत्यंत आनंदमय है।
श्रीमथुरास्थाव एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र मथुरा के भक्तों के लिए एक अमूल्य निधि है।
यहाँ श्रीमथुरास्थाव की पूरी स्तोत्र दी गई है:
श्रीमथुरा, श्रीमथुरा,
हे मधुबन,
तेरी महिमा अपार,
तेरी छवि अपरंपार।
तेरे वृक्ष, तेरे फूल,
तेरी नदी, तेरे ताल,
सब अत्यंत सुंदर,
तेरा वातावरण आनंदमय।
तेरे द्वार पर,
कृष्ण ने चरखे को खड़ा किया,
और तेरे आंगन में,
कृष्ण ने रासलीला की।
तेरे मंदिरों में,
कृष्ण की प्रतिमाएं,
हमारी मन को,
मोहित करती हैं।
हे मधुबन,
हम तेरे चरणों में,
सदा शीश झुकाते हैं।
श्रीमथुरास्थाव की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह स्तोत्र मथुरा की महिमा का वर्णन करता है।
- यह स्तोत्र वंशस्थल छंद में रचित है।
- यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है।
- यह स्तोत्र संत कवि विद्यापति द्वारा रचित है।
श्रीमथुरास्थाव एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र मथुरा के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है।
श्रीमथुरास्थाव के रचयिता, संत कवि विद्यापति, एक विख्यात मैथिली कवि थे। वे बिहार के दरभंगा के रहने वाले थे। वे अपनी भक्ति और प्रेम के गीतों के लिए प्रसिद्ध हैं। श्रीमथुरास्थाव इनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक है।
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