द्वितीया चतुश्लोकी भागवत एक संस्कृत श्लोक है जो श्रीमद्भागवत पुराण से लिया गया है। यह श्लोक भगवान कृष्ण के अवतार और उनके उद्देश्य का वर्णन करता है।
द्वितीया चतुश्लोकी का पाठ निम्नलिखित है:
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
इस श्लोक का अर्थ है:
मैं ही आदि में एकमात्र था, और मैं ही सत् और असत् का परम आधार हूँ। मैं ही अंत में भी रहूँगा, और जो भी बचा रहेगा, वही मैं हूँ।
यह श्लोक बताता है कि भगवान कृष्ण ही ब्रह्म हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार के मूल कारण हैं। वे ही सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता के स्रोत हैं। वे ही सभी जीवों के अंदर मौजूद हैं।
द्वितीया चतुश्लोकी एक बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोक है। यह श्लोक भक्तों को भगवान कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को समझने में मदद करता है। यह श्लोक भक्तों को भगवान कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम और भक्ति विकसित करने में भी मदद करता है।
द्वितीया चतुश्लोकी के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं:
- यह श्लोक भगवान कृष्ण के अवतार और उनके उद्देश्य का वर्णन करता है।
- यह श्लोक बताता है कि भगवान कृष्ण ही ब्रह्म हैं।
- यह श्लोक बताता है कि भगवान कृष्ण ही सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता के स्रोत हैं।
- यह श्लोक बताता है कि भगवान कृष्ण ही सभी जीवों के अंदर मौजूद हैं।
द्वितीया चतुश्लोकी एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लोकप्रिय श्लोक है। यह श्लोक सभी भक्तों के लिए पढ़ने और ध्यान करने के लिए उपयुक्त है।
द्वितीया चतुःश्लोकी Dwitiya Chatushloki
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