गायत्रीष्टकम, गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक अर्थ और महत्व को समझने में मदद करने वाला एक संस्कृत स्तोत्र है। यह स्तोत्र गायत्री मंत्र के प्रत्येक अक्षर का वर्णन करता है और यह भी बताता है कि गायत्री मंत्र कैसे मनुष्य को आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर ले जा सकता है।
गायत्रीष्टकम का पाठ इस प्रकार है:
पहला श्लोक
जाती पंखज केतकी कुवलयैः संपूजिताङ्घ्रिद्वयाम् तत्त्वार्थात्मकवर्णपङ्क्तिसहितां तत्त्वार्थबुद्धिप्रदाम् प्राणायामपरायणैर्बुधजनैः संसेव्यमानां शिवां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिनयनां ध्यायामि पंचाननाम्
अर्थ
हम उस गायत्री देवी का ध्यान करते हैं, जो पुष्पों से सुशोभित हैं, जिनके दो पैर हैं, जो ब्रह्मांड के मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो बुद्धि को प्रदान करती हैं, जो प्राणायाम करने वालों द्वारा पूजनीय हैं, जो हरि की पत्नी हैं, और जिनके तीन नेत्र हैं।
दूसरा श्लोक
सर्वज्ञानीं सर्वशक्तिं सर्वज्ञरूपां सर्वगुणयुक्ताम् सर्वदुःखनाशिनीं सर्वसुखप्रदां सर्वजनवन्दिताम् सर्वलोकपालिनीं सर्वभूतात्मिकां सर्वहितकारिणीम् सर्वमंगलदायिनीं सर्वलोकप्रियां गायत्रीं भजे
अर्थ
हम उस गायत्री देवी का ध्यान करते हैं, जो सर्वज्ञ हैं, सर्वशक्तिमान हैं, सभी गुणों से संपन्न हैं, सभी दुखों को दूर करने वाली हैं, सभी सुखों को प्रदान करने वाली हैं, सभी लोगों द्वारा पूजनीय हैं, सभी लोकों की पालनहार हैं, सभी प्राणियों की आत्मा हैं, सभी के लिए लाभकारी हैं, सभी मंगलों को देने वाली हैं, और सभी लोगों द्वारा प्रिय हैं।
तीसरा श्लोक
सदाराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं विशोकामालोककां हृदयगत मोहान्धहरणीम् परां दिव्यां भव्यामगमभवसिंध्वे एकतरणीम् भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभागानन्दजननीम्
अर्थ
हम उस गायत्री देवी का ध्यान करते हैं, जो हमेशा पूजनीय हैं, जो साधना करने योग्य हैं, जो बुद्धि को बढ़ाती हैं, जो चिंता और मोह को दूर करती हैं, जो परम, दिव्य, और भव्य हैं, जो भव सागर को पार करने वाली हैं, और जो परम आनंद की जननी हैं।
चौथा श्लोक
अजां द्वैतां त्रैतां विविधगुणरूपां सुविमलां तमोहन्त्रीं-तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीम् महामान्यां धन्यां सततकरुणाशील विभवां भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभागानन्दजननीम्
अर्थ
हम उस गायत्री देवी का ध्यान करते हैं, जो अजन्मा हैं, जो द्वैत और त्रिगुण से परे हैं, जो सभी गुणों से संपन्न हैं, जो निर्मल हैं, जो मोह को दूर करने वाली हैं, जो मधुर स्वर वाली हैं, जो रसमयी हैं, जो महान हैं, जो धन्य हैं, जो सदैव करुणावान हैं, और जो विपुल हैं।
पांचवां श्लोक
जगद्धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं सुवीरां धीरां तां सुविमल तपो राशि सरणीम् अनेकामेकां वै त्रिजगसदधिष्ठानपदवीं भजेऽम्बां गायत्रीं परमसुभागानन्दजननीम्
अर्थ
हम उस गायत्री देवी का ध्यान करते हैं, जो जगत की माता हैं, जो समस्त भयों को दूर करने वाली हैं, जो सुंदर हैं, जो धैर्यवान हैं, जो सुविमल तप की राशि हैं, जो अनेक रूपों वाली हैं, जो एक हैं, जो त्रिजग की आधारशिला हैं, और जो परम आनंद की जननी हैं
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