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Published October 6, 2023
Updated October 6, 2023

एकादशमुखी हनुमत्कवच (अगस्त्य संहिता अंतर्गत) एक संस्कृत श्लोक है जो हनुमान जी की स्तुति करता है। यह कवच अगस्त्य संहिता, एक तांत्रिक ग्रंथ में पाया जाता है।

कवच इस प्रकार है:

॥ एकांश हनुमत्कवच ॥

ॐ नमो भगवते महाबलपराक्रमाय विघ्ननाशाय सर्वकार्ये सिद्धिप्रदाय।

ॐ नमो हनुमतये रुद्ररूपाय अष्टमुखाय महावीराय।

ॐ नमो हनुमतये नवमुखाय सुग्रीवप्रियाय महाबलाय।

ॐ नमो हनुमतये दशमुखाय राक्षसदर्पनाशनाय।

ॐ नमो हनुमतये एकादशमुखाय सर्वशत्रुविनाशाय।

इति एकांश हनुमत्कवच समाप्तम्।

इस कवच में, हनुमान जी को एकादशमुखी रूप में दर्शाया गया है। प्रत्येक मुख को अलग-अलग शक्तियों से संपन्न माना जाता है।

कवच की शुरुआत हनुमंत जी के नमस्कार से होती है। इसके बाद, प्रत्येक मुख को अलग-अलग शक्तियों के साथ संबद्ध किया जाता है। उदाहरण के लिए, अष्टमुखी मुख को विघ्ननाशक माना जाता है, जबकि एकादशमुखी मुख को सर्वशत्रुविनाशक माना जाता है।

कवच के अंत में, इसकी समाप्ति की घोषणा की जाती है।

यह कवच हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस कवच के पाठ से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं।

यहां कवच का एक सरल अर्थ है:

नमस्कार है हनुमंत जी को, जो महान बल और पराक्रम के स्वामी हैं। आप सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करते हैं।

आप रुद्र रूपी हनुमान जी के एक मुख में से एक हैं। आप अष्टमुखी हनुमान जी के आठ मुखों में से एक हैं।

आप नवमुखी हनुमान जी के नौ मुखों में से एक हैं। आप सुग्रीव के प्रिय और महान बल वाले हनुमान जी हैं।

आप दशमुखी हनुमान जी के दस मुखों में से एक हैं। आप राक्षसों के दर्प को नष्ट करने वाले हनुमान जी हैं।

आप एकादशमुखी हनुमान जी के एकादश मुखों में से एक हैं। आप सभी शत्रुओं का नाश करने वाले हनुमान जी हैं।

इस प्रकार एकादशमुखी हनुमत्कवच समाप्त होता है।

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