श्रीशिवविभक्तिस्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की भक्ति में लिखा गया है। यह स्तोत्र भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों की स्तुति करता है। स्तोत्र की रचना आठवीं शताब्दी के हिंदू दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। यह स्तोत्र हिंदू धर्म में बहुत लोकप्रिय है और अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है।
श्रीशिवविभक्तिस्तोत्र का पाठ
श्लोक 1:
नमस्ते रुद्ररुद्राय नमस्ते महेश्वराय नमस्ते शम्भवे नमस्ते त्रिपुरारीश्वराय
अर्थ:
हे रुद्र, हे महेश्वर, हे शंभु, हे त्रिपुरारीश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्लोक 2:
नमस्ते सर्वाधाराय नमस्ते सर्वतोमुखाय नमस्ते सर्वभूतानां हृदि स्थिताय शंकराय
अर्थ:
हे सर्वाधार, हे सर्वतोमुख, हे सभी जीवों के हृदय में स्थित शंकर, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्लोक 3:
नमस्ते सर्वदेवानां नमस्ते सर्वगणानाम् नमस्ते सर्वलोकानां नाथाय नमस्तेश्वराय
अर्थ:
हे सभी देवताओं के स्वामी, हे सभी गणों के स्वामी, हे सभी लोकों के नाथ, हे शंकर, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्लोक 4:
नमस्ते त्रिनेत्राय नमस्ते गणपति नमस्ते भवानीपति नमस्ते नमस्ते
अर्थ:
हे तीन नेत्रों वाले, हे गणपति, हे भवानीपति, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्लोक 5:
नमस्ते शूलपाणये नमस्ते त्रिशूलधारिणे नमस्ते त्रिपुरनाशकाय नमस्ते नमस्ते
अर्थ:
हे शूलधारी, हे त्रिशूलधारी, हे त्रिपुरनाशक, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्लोक 6:
नमस्ते करुणाकराय नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते
अर्थ:
हे करुणाकर, मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूं।
श्रीशिवविभक्तिस्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों में भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति जागृत हो सकती है। यह स्तोत्र भक्तों को शांति, समृद्धि, और सफलता प्रदान कर सकता है।
श्रीशिवविभक्तिस्तोत्र के कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं:
- यह स्तोत्र भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों की स्तुति करता है।
- यह स्तोत्र भगवान शिव को सर्वोच्च देवता के रूप में दर्शाता है।
- यह स्तोत्र भक्तों में भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति जागृत करने में मदद कर सकता है।
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