नहीं, श्रीराधा स्तोत्रम गणेशकृत नहीं है। इसकी रचना 16वीं शताब्दी के वैष्णव कवि और दार्शनिक चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गई थी। चैतन्य महाप्रभु ने इस स्तोत्र की रचना कृष्ण की प्रेमिका राधा की महिमा का वर्णन करने के लिए की थी।
श्रीराधा स्तोत्रम में, चैतन्य महाप्रभु राधा को कृष्ण की वल्लभा, त्रिभुवन की जननी, सरस्वती, गंगा, कमला और भवानी के रूप में वर्णित करते हैं। वे राधा को अष्टभुजा जगदम्बा और त्रिपुरसुंदरी भी कहते हैं।
श्रीराधा स्तोत्रम में, चैतन्य महाप्रभु राधा को कृष्ण की प्रियतम, मधुर विलास करने वाली, कृष्ण की भक्ति करने वाली, मधुर गीतों का गायन करने वाली, कृष्ण की लीलाओं की दर्शिनी, कृष्ण की प्रेयसी, कृष्ण की सखी और कृष्ण की भगवती के रूप में भी वर्णित करते हैं।
श्रीराधा स्तोत्रम एक शक्तिशाली भक्ति स्तोत्र है जो भक्तों के दिलों में राधा के लिए प्रेम और भक्ति को जगा सकता है। यह स्तोत्र राधा की भक्ति करने की इच्छा को प्रेरित करने में मदद कर सकता है।
श्रीराधा स्तोत्रम के 8 श्लोकों का वर्णन इस प्रकार है:
श्लोक 1:
राधिका कृष्णवल्लभा त्रिभुवन-जननी
सरस्वती गंगा-कमला भवानी
अष्टभुजा जगदम्बा त्रिपुरसुंदरी
राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा कृष्ण की वल्लभा हैं, त्रिभुवन की जननी हैं, सरस्वती, गंगा, कमला और भवानी हैं। वे अष्टभुजा जगदम्बा और त्रिपुरसुंदरी हैं।
श्लोक 2:
राधिका गोपी-वल्लभा यमुना-तट-निवासिनी अष्टांग-सौन्दर्य-सम्पन्ना मधुर-भाषिणी राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा गोपीओं की वल्लभा हैं, यमुना के तट पर निवास करती हैं, और आठ अंगों के सौंदर्य से सम्पन्न हैं। वे मधुर वाणी वाली हैं।
श्लोक 3:
राधिका कृष्ण-प्रिया मधुर-विलासिनी
गोपी-गण-समवेता यमुना-तट-निवासिनी
राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा कृष्ण की प्रिय हैं, मधुर विलास करने वाली हैं, गोपीओं के साथ यमुना के तट पर निवास करती हैं।
श्लोक 4:
राधिका कृष्ण-भाविनी मधुर-गीति-गायिका
गोपी-गण-समवेता यमुना-तट-निवासिनी
राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा कृष्ण की भक्ति करती हैं, मधुर गीतों का गायन करती हैं, गोपीओं के साथ यमुना के तट पर निवास करती हैं।
श्लोक 5:
राधिका कृष्ण-भक्ता मधुर-लीला-दर्शिनी
गोपी-गण-समवेता यमुना-तट-निवासिनी
राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा कृष्ण की भक्त हैं, कृष्ण की लीलाओं की दर्शिनी हैं, गोपीओं के साथ यमुना के तट पर निवास करती हैं।
श्लोक 6:
राधिका कृष्ण-प्रेयसी मधुर-रस-निधिनी
गोपी-गण-समवेता यमुना-तट-निवासिनी
राधा-राधा जय राधा जय राधा
अर्थ:
राधा कृष्ण की प्रेयसी हैं, मधुर रस की निधि हैं।
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