Sriprapanchamatapitrashtakam
श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के प्रपंचमत्पिता रूप की महिमा का वर्णन करता है। प्रपंचमत्पिता का अर्थ है "सभी प्रपंचों के पिता"। भगवान शिव को प्रपंचमत्पिता इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सभी ब्रह्मांडों के पिता हैं।
श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् इस प्रकार है:
श्रीगणेशाय नमः
श्रीशिवाय नमः
ओं नमः शिवाय
अर्थ:
हे गणेश, हे शिव, हे नमस्कार
हे शिव, हे नमस्कार
ओम, हे शिव, हे नमस्कार
अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक,
सर्वलोकनाथ त्रिपुरारी,
प्रपंचमत्पिता जगदीश्वर,
आपके चरणों में मेरा प्रणाम।
अर्थ:
अनंत ब्रह्मांडों के नायक, सभी लोकों के स्वामी, त्रिपुरारी, जगदीश्वर, प्रपंचमत्पिता, आपके चरणों में मेरा प्रणाम।
आप ही हैं त्रिदेव,
आप ही हैं त्रिशक्ति,
आप ही हैं त्रिलोकनाथ,
आप ही हैं जगदीश्वर।
अर्थ:
आप ही हैं त्रिदेव, आप ही हैं त्रिशक्ति, आप ही हैं त्रिलोकनाथ, आप ही हैं जगदीश्वर।
आप ही हैं सृष्टिकर्ता,
आप ही हैं पालनकर्ता,
आप ही हैं संहारकर्ता,
आप ही हैं सबके स्वामी।
Sriprapanchamatapitrashtakam
अर्थ:
आप ही हैं सृष्टिकर्ता, आप ही हैं पालनकर्ता, आप ही हैं संहारकर्ता, आप ही हैं सबके स्वामी।
आप ही हैं सबके आधार,
आप ही हैं सबके रक्षक,
आप ही हैं सबके उद्धारक,
आप ही हैं सबके त्राता।
अर्थ:
आप ही हैं सबके आधार, आप ही हैं सबके रक्षक, आप ही हैं सबके उद्धारक, आप ही हैं सबके त्राता।
आप ही हैं सबके मस्तक,
आप ही हैं सबके ह्रदय,
आप ही हैं सबके प्राण,
आप ही हैं सबके देवता।
अर्थ:
आप ही हैं सबके मस्तक, आप ही हैं सबके ह्रदय, आप ही हैं सबके प्राण, आप ही हैं सबके देवता।
आप ही हैं सबके जीवन,
आप ही हैं सबके प्रकाश,
आप ही हैं सबके भक्ति,
आप ही हैं सबके आश्रय।
अर्थ:
आप ही हैं सबके जीवन, आप ही हैं सबके प्रकाश, आप ही हैं सबके भक्ति, आप ही हैं सबके आश्रय।
श्रीप्रपंचमत्पित्राष्टकम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें सुख, समृद्धि, और शांति मिलती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण को बढ़ावा देता है।
KARMASU