Shreekrshnaleelaashukamunipranito dakshinaamoortistavah
श्रीकृष्णलीलाशुकमुनिप्राणीतो दक्षिणामूर्तिस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु के एक रूप, दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के तमिल कवि मणीक्कवासिगर द्वारा लिखा गया था। स्तोत्र में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति की महिमा का वर्णन करते हैं, और उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में मानते हैं।
श्रीकृष्णलीलाशुकमुनिप्राणीतो दक्षिणामूर्तिस्तुति को अक्सर दक्षिणामूर्ति की पूजा के दौरान गाया जाता है। यह स्तोत्र दक्षिणामूर्ति के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
स्तोत्र के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं:
- "ओ दक्षिणामूर्ति, तुम भगवान विष्णु के अवतार हो, तुम ही हो ब्रह्मांड के स्वामी, तुम ही हो सृष्टि के सृजनकर्ता, तुम ही हो संहारकर्ता, तुम ही हो पालनकर्ता।"
- "तुम ज्ञान का स्रोत हो, तुम प्रेम का स्रोत हो, तुम आनंद का स्रोत हो।"
- "तुम भक्तों के रक्षक हो, तुम मोक्ष का मार्गदर्शक हो।"
श्रीकृष्णलीलाशुकमुनिप्राणीतो दक्षिणामूर्तिस्तुति एक शक्तिशाली और भावपूर्ण स्तोत्र है जो दक्षिणामूर्ति की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र दक्षिणामूर्ति के भक्तों के लिए एक प्रेरणा है।
स्तोत्र का एक अंग्रेजी अनुवाद निम्नलिखित है:
हे दक्षिणमूर्ति, आप भगवान विष्णु के अवतार हैं, आप ब्रह्मांड के भगवान हैं, आप सृष्टि के निर्माता हैं, आप संहारक हैं, आप पालनकर्ता हैं।
आप ज्ञान का स्रोत हैं, आप प्रेम का स्रोत हैं, आप आनंद का स्रोत हैं।
आप भक्तों के रक्षक हैं, आप मुक्ति के मार्गदर्शक हैं।
यह श्लोक एक शक्तिशाली और मार्मिक भजन है जो दक्षिणामूर्ति की महिमा का वर्णन करता है। यह दक्षिणामूर्ति के भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
श्रीकृष्णलीलाशुकमुनिप्राणीतो दक्षिणामूर्तिस्तुति के 10 श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक दक्षिणामूर्ति की एक विशेष विशेषता या गुण का वर्णन करता है।
पहले श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "दक्षिणामूर्ति" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम दक्षिण दिशा में उनकी स्थिति के आधार पर दिया गया है। दक्षिण दिशा को ज्ञान और ध्यान की दिशा माना जाता है।
दूसरे श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "भगवान विष्णु" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम भगवान विष्णु के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक है।
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तीसरे श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "ब्रह्मांड के स्वामी" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम दक्षिणामूर्ति की सर्वोच्चता का वर्णन करता है।
चौथे श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "सृष्टि के सृजनकर्ता" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम दक्षिणामूर्ति की सृजनात्मक शक्ति का वर्णन करता है।
पांचवें श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "संहारकर्ता" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम दक्षिणामूर्ति की विनाशकारी शक्ति का वर्णन करता है।
छठे श्लोक में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति को "पालनकर्ता" नाम से संबोधित करते हैं। यह नाम दक्षिणामूर्ति की संरक्षक शक्ति का वर्णन करता है।
शेष 4 श्लोकों में, मणीक्कवासिगर दक्षिणामूर्ति की अन्य विशेषताओं और गुणों का वर्णन करते हैं।













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