श्रीकृष्ण

श्रीकृष्णलहरीस्तोत्रम् Shrikrishnalharistotram

श्रीकृष्णलहरीस्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के बाल लीलाओं की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक ऐसे बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अत्यंत सुंदर, मधुरभाषी, और चतुर हैं। श्रीकृष्णलहरीस्तोत्र के छंद निम्नलिखित हैं: Shrikrishnalharistotram श्रीकृष्णलहरीस्तोत्र श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव लहरीं हरे लहरीं हरे लहरीं हरे कृष्ण लहरीं हरे लहरीं श्याम लहरीं श्याम लहरीं श्याम कृष्ण लहरीं श्याम लहरीं बाल लहरीं बाल लहरीं बाल कृष्ण लहरीं बाल लहरीं यशस्वी लहरीं यशस्वी लहरीं यशस्वी कृष्ण लहरीं यशस्वी लहरीं गोपीजनप्रिय लहरीं गोपीजनप्रिय लहरीं गोपीजनप्रिय कृष्ण लहरीं गोपीजनप्रिय लहरीं माधव लहरीं माधव लहरीं माधव कृष्ण लहरीं माधव लहरीं मधुरभाषी लहरीं मधुरभाषी लहरीं मधुरभाषी कृष्ण लहरीं मधुरभाषी लहरीं चतुर लहरीं चतुर लहरीं चतुर कृष्ण लहरीं चतुर लहरीं मधुर लहरीं मधुर लहरीं मधुर कृष्ण लहरीं मधुर लहरीं श्याम लहरीं श्याम लहरीं श्याम कृष्ण लहरीं श्याम श्रीकृष्णलहरीस्तोत्र का अर्थ निम्नलिखित है: हे कृष्ण, हे गोविन्द, हे हरे, हे मुरारे, हे नाथ, हे नारायण, हे वासुदेव, हे हरे, हे लहरीं, हे लहरीं, हे लहरीं, हे लहरीं, हे कृष्ण, हे श्याम, हे बाल, हे यशस्वी, हे गोपीजनप्रिय, हे माधव, हे मधुरभाषी, हे चतुर, हे मधुर, हे श्याम, श्रीकृष्णलहरीस्तोत्र एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की मनोहरता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। मन शांत और प्रसन्न होता है। प्रेम और भक्ति में वृद्धि होती है। दुख और कष्ट दूर होते हैं। सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।

श्रीकृष्णलहरीस्तोत्रम् Shrikrishnalharistotram Read More »

श्रीकृष्णस्तवराजः Srikrishnastavraj:

श्रीकृष्णस्तवराज एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सभी भक्तों के लिए एक आदर्श हैं। श्रीकृष्णस्तवराज के छंद निम्नलिखित हैं: Srikrishnastavraj: श्रीकृष्णस्तवराज श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव प्रसीद भगवन्मह्यमज्ञानात्कुण्ठितात्मने तवाङ्घ्रिपङ्कजरजोरागिणीं भक्तिमुत्तमाम् अज प्रसीद भगवन्नमितद्युतिपञ्जर अप्रमेय प्रसीदास्मद्दुःखहन्पुरुषोत्तम स्वसंवेद्य प्रसीदास्मदानन्दात्मन्ननामय अचिन्त्यसार विश्वात्मन्प्रसीद परमेश्वर प्रसीद तुङ्गतुङ्गानां प्रसीद शिवशोभन प्रसीद गुणगम्भीर गम्भीराणां महाद्युते प्रसीद व्यक्त विस्तीर्णं विस्तीर्णानामगोचर प्रसीदान्तान्तदायिनाम्प्रसीदान्तान्तदायिनाम् गुरोर्गरीयः सर्वेश प्रसीदानन्त देहिनाम् श्रीकृष्णस्तवराज का अर्थ निम्नलिखित है: हे कृष्ण, हे गोविन्द, हे हरे, हे मुरारे, हे नाथ, हे नारायण, हे वासुदेव, हे भगवान, मैं अज्ञान से कुंठित आत्मा हूं। आपके चरणकमल के रजोरागिणी भक्ति को मुझे प्रदान करें। हे अज, हे भगवान, आप अनंत हैं। आप दुखों को नष्ट करने वाले पुरुषोत्तम हैं। मुझे प्रसन्न करें। हे स्वसंवेद्य, हे आनंदात्मन, हे अनामय, हे अचिन्त्यसार, हे विश्वात्मन, हे परमेश्वर, मुझे प्रसन्न करें। हे तुंगतुङ्ग, हे शिवशोभन, हे गुणगम्भीर, हे महाद्युते, मुझे प्रसन्न करें। हे व्यक्त, हे विस्तीर्ण, हे विस्तीर्णानामगोचर, हे अन्तान्तदायिने, हे अन्तान्तदायिने, मुझे प्रसन्न करें। हे गुरुर्गरीय, हे सर्वेश, हे अनंत देहिने, मुझे प्रसन्न करें। श्रीकृष्णस्तवराज एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस स्तोत्र के कुछ अन्य संस्करण भी हैं, जिन्हें अन्य संतों और विद्वानों द्वारा रचित माना जाता है। इन संस्करणों में भी भगवान कृष्ण की स्तुति की जाती है, लेकिन वे अलग-अलग शब्दों और वाक्यों का उपयोग करते हैं। श्रीकृष्णस्तवराज एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक बहुत ही प्रभावी तरीका है। श्रीकृष्णस्तवराज के दो भाग हैं। पहले भाग में भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता का वर्णन किया गया है। दूसरे भाग में भगवान कृष्ण से भक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना की गई है। श्रीकृष्णस्तवराज का पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। भक्ति में वृद्धि होती है। मन शांत और प्रसन्न होता है। दुख और कष्ट दूर होते हैं। सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।

श्रीकृष्णस्तवराजः Srikrishnastavraj: Read More »

श्रीकृष्णस्तुतिः Shrikrishnastuti:

श्रीकृष्णस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सभी भक्तों के लिए एक आदर्श हैं। श्रीकृष्णस्तुति के छंद निम्नलिखित हैं: Shrikrishnastuti: श्रीकृष्णस्तुति श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव त्वम कृष्णोऽसि त्वम रामोऽसि त्वम रुद्रोऽसि त्वम ब्रह्माऽसि त्वम शंकरः त्वमेव सर्वम् त्वम आदिः त्वम मध्यमं त्वम अन्तिमं त्वं प्रणवः त्वं सर्ववेद त्वम ऋषयो देवताश्च त्वमेव त्वं पितरो मातामहश्च त्वं ब्रह्माण्डं त्वम वायुः त्वम अग्निः त्वम जलं त्वम पृथ्वी त्वम सूर्यो चन्द्रमा च त्वमेव त्वं नक्षत्राणि च ताराः त्वम ऋतुः त्वम ऋतुपतिश्च त्वमेव त्वम वनस्पतयः पशवः त्वम मनुष्याः त्वम देवताश्च त्वमेव त्वमेव सर्वम् जगत् श्रीकृष्णस्तुति का अर्थ निम्नलिखित है: हे कृष्ण, हे गोविन्द, हे हरे, हे मुरारे, हे नाथ, हे नारायण, हे वासुदेव, आप ही कृष्ण हैं, आप ही राम हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही शंकर हैं, आप ही सब कुछ हैं। आप ही आदि हैं, आप ही मध्य हैं, आप ही अंत हैं, आप ही प्रणव हैं, आप ही सभी वेद हैं। आप ही ऋषियों, देवताओं, पितरों, और मातामहों के रूप में हैं। आप ही ब्रह्मांड हैं, आप ही वायु हैं, आप ही अग्नि हैं, आप ही जल हैं, और आप ही पृथ्वी हैं। आप ही सूर्य हैं, आप ही चंद्रमा हैं, आप ही तारे हैं। आप ही ऋतु हैं, आप ही ऋतुपति हैं, आप ही वनस्पतियां और पशु हैं। आप ही मनुष्य हैं, आप ही देवता हैं, आप ही सब कुछ हैं। श्रीकृष्णस्तुति एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस स्तोत्र के कुछ अन्य संस्करण भी हैं, जिन्हें अन्य संतों और विद्वानों द्वारा रचित माना जाता है। इन संस्करणों में भी भगवान कृष्ण की स्तुति की जाती है, लेकिन वे अलग-अलग शब्दों और वाक्यों का उपयोग करते हैं। श्रीकृष्णस्तुति एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक बहुत ही प्रभावी तरीका है।

श्रीकृष्णस्तुतिः Shrikrishnastuti: Read More »

श्रीकृष्णस्तुतिः २ Sri Krishna Stuti: 2

श्रीकृष्ण स्तुति 2 एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सभी भक्तों के लिए एक आदर्श हैं। श्रीकृष्ण स्तुति 2 के छंद निम्नलिखित हैं: Sri Krishna Stuti: 2 श्रीकृष्ण स्तुति 2 त्वमेव ब्रह्मा त्वमेव विष्णुः त्वमेव रुद्रः त्वमेव महेश्वरः त्वमेव ईशः त्वमेव कर्मफलप्रदाता त्वमेव सर्वशक्तिमानो भगवान् त्वमेव त्रैलोक्यनाथः त्वमेव सर्वलोकपालः त्वमेव सर्वजनहितकरः त्वमेव सर्वजनप्रियः त्वमेव सर्वगुणसम्पन्नः त्वमेव सर्वशक्तिसम्पन्नः त्वमेव सर्वपापनाशकः त्वमेव सर्वसुखदः त्वमेव सर्वविघ्ननाशकः त्वमेव सर्वरोगनिवारकः त्वमेव सर्वशत्रुक्षयः त्वमेव सर्वसौभाग्यदायकः त्वमेव सर्वविजयप्रदः त्वमेव सर्वजनमान्यः त्वमेव सर्वलोकप्रियः त्वमेव सर्वलोकपालः त्वमेव सर्वगुणसम्पन्नः त्वमेव सर्वशक्तिसम्पन्नः त्वमेव सर्वपापनाशकः त्वमेव सर्वसुखदः श्रीकृष्ण स्तुति 2 का अर्थ निम्नलिखित है: हे भगवान कृष्ण, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही विष्णु हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही महेश्वर हैं। आप ही ईश्वर हैं, आप ही कर्मफल देने वाले हैं। आप ही सर्वशक्तिमान भगवान हैं। आप ही त्रिलोक्यनाथ हैं, आप ही सर्वलोकपाल हैं। आप ही सर्वजनहितकर हैं, आप ही सर्वजनप्रिय हैं। आप ही सर्वगुणसम्पन्न हैं, आप ही सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आप ही सर्वपापनाशक हैं, आप ही सर्वसुखद हैं। आप ही सर्वविघ्ननाशक हैं, आप ही सर्वरोगनिवारक हैं। आप ही सर्वशत्रुक्षय हैं, आप ही सर्वसौभाग्यदायक हैं। आप ही सर्वविजयप्रद हैं, आप ही सर्वजनमान्य हैं। आप ही सर्वलोकप्रिय हैं, आप ही सर्वलोकपाल हैं। आप ही सर्वगुणसम्पन्न हैं, आप ही सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आप ही सर्वपापनाशक हैं, आप ही सर्वसुखद हैं। श्रीकृष्ण स्तुति 2 एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस स्तोत्र के कुछ अन्य संस्करण भी हैं, जिन्हें अन्य संतों और विद्वानों द्वारा रचित माना जाता है। इन संस्करणों में भी भगवान कृष्ण की स्तुति की जाती है, लेकिन वे अलग-अलग शब्दों और वाक्यों का उपयोग करते हैं।

श्रीकृष्णस्तुतिः २ Sri Krishna Stuti: 2 Read More »

श्रीकृष्णस्तुतिःगुह्यक Shrikrishnastutihguhyak

श्रीकृष्णस्तुतिघुयक एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सभी भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। श्रीकृष्णस्तुतिघुयक के छंद निम्नलिखित हैं: Shrikrishnastutihguhyak श्रीकृष्णस्तुतिघुयकं नमस्ते सर्वभक्तरक्षितं सर्वपापनाशकं नमस्ते सर्वसुखदं सर्वलोकहितकरं नमस्ते सर्वलोकपालं सर्वस्वदातारं नमस्ते सर्वार्थसिद्धिदं सर्वकामप्रदायकं नमस्ते सर्वविघ्ननाशकं सर्वरोगनिवारकं नमस्ते सर्वसुखकरं सर्वग्रहनिवारकं नमस्ते सर्वशत्रुक्षयं सर्वसौभाग्यदायकं नमस्ते सर्वविजयं सर्वजनप्रियं नमस्ते सर्वजनमान्यं सर्वगुणसम्पन्नं नमस्ते सर्वशक्तिसम्पन्नं श्रीकृष्णस्तुतिघुयक का अर्थ निम्नलिखित है: हे भगवान कृष्ण, जो स्तुति से प्रसन्न होते हैं और सभी भक्तों की रक्षा करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी पापों को नष्ट करते हैं और सभी सुखों को प्रदान करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी लोकों के लिए हितकर हैं और सभी लोकों के पालक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी को अपना सर्वस्व प्रदान करते हैं और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं और सभी विघ्नों को दूर करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी रोगों को दूर करते हैं और सभी सुखों को प्रदान करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी ग्रहों के बुरे प्रभावों को दूर करते हैं और सभी शत्रुओं का नाश करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी सौभाग्यों को प्रदान करते हैं और सभी विजय प्रदान करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी मनुष्यों के लिए प्रिय हैं और सभी मनुष्यों द्वारा मान्य हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे भगवान कृष्ण, जो सभी गुणों से सम्पन्न हैं और सभी शक्तियों से सम्पन्न हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्रीकृष्णस्तुतिघुयक एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

श्रीकृष्णस्तुतिःगुह्यक Shrikrishnastutihguhyak Read More »

श्रीकृष्णस्तुतिःदेव Srikrishnastutihdev

श्रीकृष्णस्तुतिदेव एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सभी गुणों और शक्तियों से परिपूर्ण हैं। श्रीकृष्णस्तुतिदेव के छंद निम्नलिखित हैं: Srikrishnastutihdev श्रीकृष्णस्तुतिदेवं नमस्ते सर्वगुणसम्पन्नं ब्रह्माण्डनाथं नमस्ते सर्वशक्तिसम्पन्नं ऋषियोंवरं नमस्ते सर्ववेदसम्पन्नं देवताओंवरं नमस्ते सर्वप्राणसम्पन्नं पितरोंवरं नमस्ते सर्वपापनाशकं मातामहोंवरं नमस्ते सर्वसुखदं ब्रह्माण्डसम्पन्नं नमस्ते सर्वज्ञानसम्पन्नं वायुअग्निजलपृथ्वी सर्वभूतसम्पन्नं सूर्यचन्द्रनक्षत्राणां सर्वतारसम्पन्नं ऋतुऋतुपतियों च सर्ववनस्पतिसम्पन्नं पशुपक्षीजन्तुनां सर्वजीवसम्पन्नं मनुष्याणां च देवताणां सर्वजनसम्पन्नं सर्वलोकसम्पन्नं नमस्ते सर्वशुभदातारं सर्वपापनाशकं नमस्ते सर्वसुखदं सर्वलोकहितकरं नमस्ते सर्वलोकपालं श्रीकृष्णस्तुतिदेव का अर्थ निम्नलिखित है: हे भगवान कृष्ण, जो स्तुति से प्रसन्न होते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सर्वगुणसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे ब्रह्माण्डनाथ भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे ऋषियोंवर भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सर्ववेदसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे देवताओंवर भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सर्वप्राणसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे पितरोंवर भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे मातामहोंवर भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे ब्रह्माण्डसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सर्वज्ञानसम्पन्न भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सूर्य, चंद्रमा, और तारों से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे ऋतुओं, ऋतुपतियों, और वनस्पतियों से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे पशुओं, पक्षियों, और अन्य जीवों से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे मनुष्यों और देवताओं से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी लोकों से युक्त भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी शुभों को देने वाले भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी पापों को नष्ट करने वाले भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी सुखों को देने वाले भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी लोकों के लिए हितकर भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे सभी लोकों के पालक भगवान कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। **श्रीकृष्णस्तुतिदेव एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान

श्रीकृष्णस्तुतिःदेव Srikrishnastutihdev Read More »

श्रीकृष्णस्तोत्रम् Srikrishna Stotram

श्रीकृष्ण स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ देवता के रूप में वर्णित किया गया है। श्रीकृष्ण स्तोत्र के छंद निम्नलिखित हैं: Srikrishna Stotram श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव त्वम कृष्णोऽसि त्वम रामोऽसि त्वम रुद्रोऽसि त्वम ब्रह्माऽसि त्वम शंकरः त्वमेव सर्वम् त्वम आदिः त्वम मध्यमं त्वम अन्तिमं त्वं प्रणवः त्वं सर्ववेद त्वम ऋषयो देवताश्च त्वमेव त्वं पितरो मातामहश्च त्वं ब्रह्माण्डं त्वम वायुः त्वम अग्निः त्वम जलं त्वम पृथ्वी त्वम सूर्यो चन्द्रमा च त्वमेव त्वं नक्षत्राणि च ताराः त्वम ऋतुः त्वम ऋतुपतिश्च त्वमेव त्वम वनस्पतयः पशवः त्वम मनुष्याः त्वम देवताश्च त्वमेव त्वमेव सर्वम् जगत् श्रीकृष्ण स्तोत्र का अर्थ निम्नलिखित है: हे कृष्ण, हे गोविन्द, हे हरे, हे मुरारे, हे नाथ, हे नारायण, हे वासुदेव, आप ही कृष्ण हैं, आप ही राम हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही शंकर हैं, आप ही सब कुछ हैं। आप ही आदि हैं, आप ही मध्य हैं, आप ही अंत हैं, आप ही प्रणव हैं, आप ही सर्ववेद हैं। आप ही ऋषियों, देवताओं, पितरों, और मातामहों के रूप में हैं। आप ही ब्रह्मांड हैं, आप ही वायु हैं, आप ही अग्नि हैं, आप ही जल हैं, और आप ही पृथ्वी हैं। आप ही सूर्य हैं, आप ही चंद्रमा हैं, आप ही तारे हैं। आप ही ऋतु हैं, आप ही ऋतुपति हैं, आप ही वनस्पतियां और पशु हैं। आप ही मनुष्य हैं, आप ही देवता हैं, आप ही सब कुछ हैं। श्रीकृष्ण स्तोत्र एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और आस्था बढ़ती है। इस स्तोत्र के कुछ अन्य संस्करण भी हैं, जिन्हें अन्य संतों और विद्वानों द्वारा रचित माना जाता है। इन संस्करणों में भी भगवान कृष्ण की स्तुति की जाती है, लेकिन वे अलग-अलग शब्दों और वाक्यों का उपयोग करते हैं।

श्रीकृष्णस्तोत्रम् Srikrishna Stotram Read More »

श्रीगोपालाष्टकम् Srigopalashtakam

श्रीगोपालाष्टक एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के बाल रूप की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपनी लीलाओं से सभी को मोहित कर लेते हैं। श्रीगोपालाष्टक के छंद निम्नलिखित हैं: Srigopalashtakam विहरत स्वच्छन्दं आनन्दकन्दं, श्रीव्रजचन्दं ब्रह्मपरम ।। पूरणशशिवदनं, शोभासदनं, जित-छबिमदनं रूपवरम् ।। हलधरवरवीरं, श्यामशरीरं, गुणगम्भीरं धीरधरम् ।। राजत बनमाला, रूपविशाला, चाल मराला सुरतहरम् ।। कुण्डलधृतकरणं, गिरिवरधरणं, निज-जन शरणं कृपाकरम् ।। गोपिन कृतअंगं, ललित-त्रिभंगं, लज्जित अनंगं निरखि परम् ।। जलधरवरश्यामं, पूरणकामं, अति सुखधामं दुःखहरम् ।। वृन्दावन-क्रीड़ित असुरन-पीड़ित, ब्रजतिय-व्रीड़ित रसिकवरम् ।। श्रीगोपालाष्टक का अर्थ निम्नलिखित है: हे कृष्ण, आप स्वच्छन्द विचरण करते हैं, और आप आनंद के कंद हैं। आप श्रीव्रजचंद हैं, और आप ब्रह्म के परम रूप हैं। आपके मुख में पूर्णिमा का चाँद है, आप शोभा के सदन हैं, और आप अपनी छवि से सबको जीत लेते हैं। आप रूप के वरण हैं। आप हलधर हैं, आप वीर हैं, आप श्याम वर्ण के हैं, आप गुणों में गम्भीर हैं, और आप धीर हैं। आपके गले में मोतियों की माला है, आपका रूप विशालता से भरा है, आपकी चाल मराल जैसी है, और आप सुरत हरने वाले हैं। आपके कानों में कुण्डल हैं, आप गिरिवर को धारण करते हैं, आप अपने भक्तों की शरण हैं, और आप कृपा करने वाले हैं। आप गोपियों के द्वारा सजे हुए हैं, आपका त्रिभंग मुद्रा है, आप लज्जित हैं, और आपका रूप अनंग है। आप जलधर के समान श्याम हैं, आप पूर्णकाम हैं, आप अति सुख के धाम हैं, और आप दुःखों को हरने वाले हैं। आप वृन्दावन में क्रीड़ा करते हैं, आप असुरों को पीड़ित करते हैं, और आप ब्रज के लोगों के द्वारा व्रीड़ित होते हैं। आप रसिक वर हैं। श्रीगोपालाष्टक एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के बाल रूप की सुंदरता और आकर्षण को दर्शाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण के बाल रूप के प्रति प्रेम और आस्था बढ़ती है।

श्रीगोपालाष्टकम् Srigopalashtakam Read More »

श्रीमधुरापुरीस्तुतिः Shrimadhurapuristutih

Shrimadhurapuristutih श्रीमधुरापुरीस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे श्रीमद्भागवत महापुराण के अध्याय 10, श्लोक 32-39 में पाया जा सकता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के जन्मस्थान, मधुरापुरी की स्तुति करता है। श्रीमधुरापुरीस्तुति के छंद निम्नलिखित हैं: मधुरापुरी नमस्ते नमो नमो तुम ही त्रिभुवन की शोभा हो तुम ही भक्तों के लिए तीर्थ हो तुम ही प्रेम का निवास हो तुम ही भगवान कृष्ण की लीलाओं का साक्षी हो तुम ही उनके प्रेम का उद्गम हो तुम ही उनके भक्तों के लिए वरदान हो तुम ही उनकी कृपा का निवास हो तुम ही अमृत का सागर हो तुम ही मोक्ष का द्वार हो तुम ही प्रेम और भक्ति का स्वरूप हो तुम ही भगवान कृष्ण की प्रिय नगरी हो नमस्ते मधुरापुरी तुम ही भगवान कृष्ण की नगरी हो तुम ही भक्तों के लिए तीर्थ हो तुम ही प्रेम का निवास हो श्रीमधुरापुरीस्तुति का अर्थ निम्नलिखित है: हे मधुरापुरी, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं। तुम ही त्रिभुवन की शोभा हो। तुम ही भक्तों के लिए तीर्थ हो। तुम ही प्रेम का निवास हो। तुम ही भगवान कृष्ण की लीलाओं का साक्षी हो। तुम ही उनके प्रेम का उद्गम हो। तुम ही उनके भक्तों के लिए वरदान हो। तुम ही उनकी कृपा का निवास हो। तुम ही अमृत का सागर हो। तुम ही मोक्ष का द्वार हो। तुम ही प्रेम और भक्ति का स्वरूप हो। तुम ही भगवान कृष्ण की प्रिय नगरी हो। नमस्ते मधुरापुरी, तुम ही भगवान कृष्ण की नगरी हो। तुम ही भक्तों के लिए तीर्थ हो। तुम ही प्रेम का निवास हो। श्रीमधुरापुरीस्तुति एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र मधुरापुरी के प्रति भक्ति और सम्मान व्यक्त करता है। यह स्तोत्र मधुरापुरी के महत्व को भी बताता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मधुरापुरी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

श्रीमधुरापुरीस्तुतिः Shrimadhurapuristutih Read More »

श्रीयमुनाष्टकम् sriyamunashtakam

श्रीयमुनाष्टक एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे श्रील रूप गोस्वामी द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र यमुना नदी की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में यमुना नदी को एक पवित्र नदी के रूप में वर्णित किया गया है, जो भगवान कृष्ण और उनके भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। श्रीयमुनाष्टक के छंद निम्नलिखित हैं: sriyamunashtakam यमुना नदी नमस्ते, नमस्ते, नमस्ते तू श्रीकृष्ण की प्रेयसी, तू भक्तों की शान्ति तू त्रिवेणी संगम की शोभा, तू मोक्ष का द्वार तू ऋषि मुनियों की साधना, तू ब्रह्माण्ड का आधार तू प्रेम की प्रतिमा, तू ज्ञान की धारा तू करुणा की सागर, तू सुख की खान तू भक्तों की रक्षा, तू पापों का नाश तू यमुना नदी, तू सर्वशक्तिमान श्रीयमुनाष्टक का अर्थ निम्नलिखित है: हे यमुना नदी, मैं आपको प्रणाम करता हूं। आप श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं, आप भक्तों की शांति हैं। आप त्रिवेणी संगम की शोभा हैं, आप मोक्ष का द्वार हैं। आप ऋषि मुनियों की साधना हैं, आप ब्रह्माण्ड का आधार हैं। आप प्रेम की प्रतिमा हैं, आप ज्ञान की धारा हैं। आप करुणा की सागर हैं, आप सुख की खान हैं। आप भक्तों की रक्षा करती हैं, आप पापों का नाश करती हैं। आप यमुना नदी हैं, आप सर्वशक्तिमान हैं। श्रीयमुनाष्टक एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र यमुना नदी के प्रति भक्ति और सम्मान व्यक्त करता है। यह स्तोत्र यमुना नदी के महत्व को भी बताता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को यमुना नदी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

श्रीयमुनाष्टकम् sriyamunashtakam Read More »

श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावलिः shreeraadhaakrshnayugalasahasranaamaavaleeh

श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावली एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण और उनकी पत्नी राधा की सहस्र नामों की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण और राधा को एक ही रूप में वर्णित किया गया है, और उन्हें एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है। श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावली के छंद निम्नलिखित हैं: shreeraadhaakrshnayugalasahasranaamaavaleeh राधायाः कृष्णस्य च युगलस्य नामानि सहस्रं पठित्वा भक्त्या सर्वपापघ्नं चैव सर्वकामनाफलं च तद्भक्तो लभते नरः राधायाः कृष्णस्य च नामानि सहस्रं पठित्वा भक्त्या सकृत् भवतु तस्य सर्वत्र सुखं सर्वकालं सर्वत्र विजयी भवेत् राधायाः कृष्णस्य च नामानि सहस्रं पठित्वा भक्त्या नित्यं भविष्यति तस्य सर्वत्र कीर्तिः सर्वत्र पूज्यमानो भवेत् श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावली का अर्थ निम्नलिखित है: राधा और कृष्ण की सहस्र नामों का पाठ करने से, भक्तिपूर्वक सभी पापों का नाश होता है और सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। राधा और कृष्ण की सहस्र नामों का एक बार भी भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्त के लिए हर जगह सुख होता है और वह हर समय विजयी होता है। राधा और कृष्ण की सहस्र नामों का नियमित रूप से भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्त का हर जगह कीर्ति होती है और वह हर जगह पूजनीय होता है। श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावली एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण और राधा के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र में, भगवान कृष्ण और राधा को एक ही रूप में वर्णित किया गया है। वे एक दूसरे के पूरक हैं, और एक के बिना दूसरा अधूरा है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।

श्रीराधाकृष्णयुगलसहस्रनामावलिः shreeraadhaakrshnayugalasahasranaamaavaleeh Read More »

श्रीललितत्रिभङ्गीस्तोत्रम् shreelalitatribhangeestotram

श्रीलीलात्रिभंगैस्तोत्रम एक संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के बाल लीलाओं की स्तुति करता है। इस स्तोत्र में भगवान कृष्ण को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपनी लीलाओं से सभी को मोहित कर लेते हैं। श्रीलीलात्रिभंगैस्तोत्रम के छंद निम्नलिखित हैं: shreelalitatribhangeestotram वटवृक्षशाखावलम्बितमन्दोदरीमण्डित वृन्दावनकाननमध्यस्थां क्रीडन्तीं बालकृष्णं मुरारेरिन्द्रानन्दिनी ललितासुन्दरीसहितां दर्शित्वा त्रिभंगमुद्रां मुखमण्डलमुदयन्तीं हर्षाकुलं भवतां भवनं दर्शनेनैव शुभेन्दुवदनान्यवलोक्य च सर्वमंगलं भविष्यति श्रीलीलात्रिभंगैस्तोत्रम का अर्थ निम्नलिखित है: वटवृक्ष की शाखाओं पर चढ़े हुए, मनमोहक रूप वाली, वृंदावन के वन में स्थित क्रीड़ती हुई, भगवान कृष्ण और उनकी पत्नी राधा को देखकर त्रिभंग मुद्रा दिखाते हुए, उनके चेहरे पर मुस्कान आ रही है उनकी दृष्टि से, हे भगवान, आपका घर खुशी से भर जाएगा उनकी दृष्टि से, हे भगवान, आप सभी को देखकर आनंद आएगा उनकी दृष्टि से, हे भगवान, सभी शुभ कार्य सफल होंगे श्रीलीलात्रिभंगैस्तोत्रम एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र में, भगवान कृष्ण को एक बालक के रूप में वर्णित किया गया है, जो अपनी लीलाओं से सभी को मोहित कर लेते हैं। उनका चेहरा हमेशा मुस्कुराता हुआ रहता है, और उनकी दृष्टि से सभी को आनंद आता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मन को शांति और प्रसन्नता मिलती है।

श्रीललितत्रिभङ्गीस्तोत्रम् shreelalitatribhangeestotram Read More »