श्रीकृष्ण

श्रीगर्वापहाराष्टकम् Srigarvapaharashtakam

Srigarvapaharashtakam श्री गर्वपहाराशतकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के भक्ति संत, श्री हरिदास द्वारा रचित है। स्तोत्र के प्रारंभ में, भगवान कृष्ण को गर्व को दूर करने वाले देवता के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा और एक करुणामयी देवता

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श्रीगिरिधार्यष्टकम् Srigiridharyastakam

Srigiridharyastakam श्री गिरिधर्याष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के भक्ति संत, श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित है। स्तोत्र के प्रारंभ में, भगवान कृष्ण को गिरिराज पर्वत का धारक बताया गया है। उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा और एक करुणामयी देवता के रूप में वर्णित किया गया

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श्रीगिरिराजधार्यष्टकम् Srigirirajdharyashtakam

Srigirirajdharyashtakam श्री गिरिराजधार्याष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के भक्ति संत, श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित है। स्तोत्र के प्रारंभ में, भगवान कृष्ण को गिरिराज पर्वत का धारक बताया गया है। उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा और एक करुणामयी देवता के रूप में वर्णित किया गया

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श्रीगीतावली २ Shree Geetavali 2

Shree Geetavali 2 श्री गीतावली 2 एक संस्कृत ग्रंथ है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह ग्रंथ 16वीं शताब्दी के भक्ति संत, सूरदास द्वारा रचित है। श्री गीतावली 2 में कुल 250 गीतों का संग्रह है। इन गीतों में, सूरदास कृष्ण के प्रेम, करुणा और शक्ति की स्तुति करते हैं। श्री गीतावली

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श्रीगुरुवायुपुराधीशाष्टोत्तरशतनामावलिः Sriguruvayupurapaigashtakotashanamavalih

Sriguruvayupurapaigashtakotashanamavalih श्रीगुरुवल्लभ अष्टकोटशतानामावली एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के 8000 नामों का वर्णन करता है। स्तोत्र के प्रारंभ में, भगवान कृष्ण को एक सर्वशक्तिमान देवता के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें ब्रह्मांड का सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता बताया गया

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श्रीगुसा_ईंजीकृतदण्डकः Shreegusa injeeleekrtadandakah

 Shreegusa injeeleekrtadandakah श्रीगुसा इंजीलीकृत दण्डक एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण को एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में दर्शाता है। स्तोत्र के प्रारंभ में, भगवान कृष्ण को एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें एक महान धनुर्धर, एक कुशल तलवारबाज और

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श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रम् Srigopalasahasranamastotram

Srigopalasahasranamastotram श्रीगोपाल सहस्रनाम स्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के 1000 नामों का वर्णन करता है। स्तोत्र के प्रारंभ में, पार्वती देवी भगवान शिव से पूछती हैं कि वे किस स्तोत्र का पाठ करते हैं। भगवान शिव उन्हें बताते हैं कि

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श्रीविष्णुतीर्थविरचितं श्रीकृष्णाष्टकम् Shri Vishnu Teertha Vir Chitam Shri Krishna Ashtakam

Shri Vishnu Teertha Vir Chitam Shri Krishna Ashtakam श्री विष्णु तीर्थ वीरचित श्री कृष्णाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के भक्ति संत वीरचित द्वारा रचित है। स्तोत्र के प्रारंभ में, वीरचित भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें कृष्ण की स्तुति करने

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सरस्वतीप्रोक्तं कृष्णस्तोत्रम् Sarasvateeproktan krshnastotram

Sarasvateeproktan krshnastotram सरस्वतीप्रोक्त कृष्णस्तोत्रम् एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र ऋग्वेद की एक देवी, सरस्वती को संबोधित किया गया है। सरस्वती को ज्ञान, विद्या और संगीत की देवी माना जाता है। स्तोत्र में सरस्वती को कृष्ण को स्तुति करने के लिए कहा गया है। स्तोत्र का

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वह्निसूनुस्तवः vahnisoonustavah ​

वह्निसूनस्तवः एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “अग्नि की स्तुति”। यह एक प्रकार की धार्मिक स्तुति है जो अग्नि देवता की महिमा का गुणगान करती है। वह्निसूनस्तवः अक्सर हिंदू धर्म में प्रचलित होती हैं। उन्हें अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों और समारोहों में पढ़ा जाता है। वह्निसूनस्तवः के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं: vahnisoonustavah ​ अग्निस्तुति: यह

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विज्ञप्तिश्लोक: vigyapti shlok

विज्ञप्तिश्लोकाः एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “घोषणा के श्लोक”। यह एक प्रकार के श्लोक हैं जो किसी विशेष विषय या विचार को घोषित करते हैं। विज्ञप्तिश्लोकाः अक्सर धार्मिक या आध्यात्मिक विषयों पर लिखे जाते हैं। वे किसी भगवान या देवी की महिमा का गुणगान कर सकते हैं, या किसी आध्यात्मिक सिद्धांत को व्यक्त

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विवेकधैर्याश्रयः vivekadhairyashrayah

विवेकदैर्घ्यश्रय एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “विवेक की लंबी आयु”। यह एक हिंदू धार्मिक अवधारणा है जो ज्ञान और विवेक के महत्व पर जोर देती है। विवेकदैर्घ्यश्रय का अर्थ है कि विवेक की लंबी आयु से प्राप्त होने वाले लाभ अनंत हैं। विवेक के माध्यम से, हम सही और गलत के बीच अंतर

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