शिव भगवान

श्रीमलहानिकरेश्वरस्तुतिः Shrimalhanikareshwarstutih

Shrimalhanikareshwarstutih (श्रीश‍ृङ्गगिरौ – श्रीभवानीमलहानिकरेश्वरकल्याणोत्सवे )श्रीभवानीमलहानिकरेश्वरकल्याणोत्सवे स्वग्रामगमनवाच्छा सर्वेषां प्रकृतिसिद्धा हि । काशीयात्रा तस्मात्काशीश तवैव खलु युक्ता ॥ १॥ शीर्षान्मुक्ताहारव्याजात्स्वर्गापगा शम्भोः । गङ्गाधर विस्रस्ता नृत्यं किमु कुर्वतस्तवेशान ॥ २॥ शरदिन्दुसोदरमुखं करनिर्जितपङ्कजं कृपाम्भोधिम् ।कृपाम्भोधिम् त्वां पश्यन्तं मामिह क्षुत्तृष्णे नैव बाधेते ॥ ३॥ सर्वाङ्गसुन्दर विभो करुणामृतपूरपूरितापङ्ग । त्वां चक्षुषी ममेमे न त्यजतः किं करोमि वद शम्भो ॥ ४॥ श्रीमल्लारिकवचम् Srimallarikavacham

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श्रीमल्लारिकवचम् Srimallarikavacham

Srimallarikavacham श्रीमल्हारिकवचम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के मल्लिकार्जुन रूप की रक्षा प्रदान करने वाले मंत्र का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव के मल्लिकार्जुन रूप के विभिन्न गुणों और विशेषताओं का वर्णन किया गया है। श्रीमल्हारिकवचम् की रचना का श्रेय आमतौर पर 10वीं शताब्दी के कन्नड़ कवि और दार्शनिक श्रीविश्वनाथचार्य को दिया जाता है। श्रीविश्वनाथचार्य एक महान विद्वान और दार्शनिक थे। उन्होंने कई संस्कृत और कन्नड़ ग्रंथों की रचना की, जिनमें श्रीमल्हारिकवचम् भी शामिल है। श्रीमल्हारिकवचम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्रीमल्हारिकवचम् के कुछ प्रसिद्ध श्लोक:** अर्थ: हे मल्लिकार्जुन, आप समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। आप सभी भक्तों के लिए एक शक्तिशाली शरण हैं। अर्थ: हे मल्लिकार्जुन, आप सभी बुराई और पाप का नाश करने वाले हैं। आप सभी कष्टों और दुखों को दूर करने वाले हैं। आप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। अर्थ: जो कोई भी इस मंत्र का जाप करता है, उसे भगवान मल्लिकार्जुन की पूर्ण रक्षा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार के भय, दुख, और कष्टों से मुक्त हो जाता है। श्रीमल्हारिकवचम् एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान शिव के मल्लिकार्जुन रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो सुरक्षा, शांति, और समृद्धि की प्राप्ति चाहते हैं। Srimallarikavacham श्रीमल्हारिकवचम् का पाठ:** नमस्ते मल्लिकार्जुन! सर्वब्रह्मांडनाथ! सर्वप्राणिपाल! सर्वभक्तशरण! नमस्ते दुष्टविनाशक! सर्वदुःखनिवारक! सर्वकामधायक! यः पठेत् मल्लिकार्जुनवचनम् सर्वरक्षां लभते। सर्वभयं नाशयति। सर्वसौख्यं प्राप्नोति। अनुवाद: हे मल्लिकार्जुन, आपको मेरा प्रणाम। आप समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। आप सभी भक्तों के लिए एक शक्तिशाली शरण हैं। हे मल्लिकार्जुन, आप सभी बुराई और पाप का नाश करने वाले हैं। आप सभी कष्टों और दुखों को दूर करने वाले हैं। आप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। जो कोई भी इस मंत्र का जाप करता है, उसे भगवान मल्लिकार्जुन की पूर्ण रक्षा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार के भय, दुख, और कष्टों से मुक्त हो जाता है। वह सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त करता है। श्रीमल्लारिमाहात्म्यम् Srimallarimahatmyam

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श्रीमल्लारिमाहात्म्यम् Srimallarimahatmyam

Srimallarimahatmyam ध्यानम् -ध्यानम् हेमाम्भोजप्रवालप्रतिमनिजरुचिं चारुखट्वाङ्गपद्मौ चक्रं शक्तिं सपाशं सृणिमतिरुचिरामक्षमालां कपालम् ।कपालम् हस्ताम्भोजैर्दधानं त्रिनयनविलसद्वेदवक्त्राभिरामं मार्ताण्डं वल्लभार्धं मणिमयमुकुटं हारदीप्तं भजामः ॥ मकुटमणिमयूखप्रोज्झिताशेषरत्नं विमलशशिकलाङ्कं सुन्दरेन्दीवराक्षम् ।सुन्दरेन्दीवराक्षम् अनुकृतशशितेजः कुण्डलं चारुहासं प्रकटदशनशोभानिर्जितानेकहीरम् ॥प्रकटदशनशोभानिर्जितानेकहीरम् १॥ श्रीवेणुगोपालस्वामिनः shreevenugopaalasvaameeh

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श्रीमल्लिकार्जुनस्तोत्रम् Sri Mallikarjunastotram

Sri Mallikarjunastotram श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् की रचना का श्रेय आमतौर पर 10वीं शताब्दी के कन्नड़ कवि और दार्शनिक श्रीविश्वनाथचार्य को दिया जाता है। श्रीविश्वनाथचार्य एक महान विद्वान और दार्शनिक थे। उन्होंने कई संस्कृत और कन्नड़ ग्रंथों की रचना की, जिनमें श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् भी शामिल है। श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् के कुछ प्रसिद्ध श्लोक:** अर्थ: हे मल्लिकार्जुन, आप कल्याणस्वरूप हैं। आप पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए सूर्यस्वरूप हैं। आप दक्ष के यज्ञ का नाश करनेवाले हैं। जिनकी ध्वजा में वृषभ (बैल) का चिह्न शोभायमान है, ऐसे नीलकण्ठ शिव को नमस्कार है॥ अर्थ: हे मल्लिकार्जुन, आपके कण्ठ में सर्पों का हार है। आपके तीन नेत्र हैं। भस्म ही जिनका अंगराग है और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं अर्थात् जो दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं ऐसे शुद्ध अविनाशी महेश्वर को नमस्कार है॥ अर्थ: हे मल्लिकार्जुन, आप समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। आप समस्त ज्ञान के स्रोत हैं। आप समस्त आनंद के स्रोत हैं। आप मुझे ज्ञान, आनंद और मोक्ष प्रदान करें॥ श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति चाहते हैं। Sri Mallikarjunastotram श्री मल्लिकार्जुन स्तोत्रम् का पाठ: नमस्ते मल्लिकार्जुन! कल्याणस्वरूप! सूर्यस्वरूप! दक्षयज्ञविनाशक! वृषध्वज! नीलकण्ठ! नमस्ते भस्मोत्तंग! त्रिनेत्र! दिगम्बर! महेश्वर! नमस्ते सर्वप्राणिपाल! ज्ञानसागर! आनन्दसागर! मोक्षदायक! त्वां शरणं गच्छामि। अनुवाद: हे मल्लिकार्जुन, आपको मेरा प्रणाम। आप कल्याणस्वरूप हैं। आप पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए सूर्यस्वरूप हैं। आप दक्ष के यज्ञ का नाश करनेवाले हैं। जिनकी ध्वजा में वृषभ (बैल) का चिह्न शोभायमान है, ऐसे नीलकण्ठ शिव को नमस्कार है॥ हे मल्लिकार्जुन, आपके कण्ठ में सर्पों का हार है। आपके तीन नेत्र हैं। भस्म ही जिनका अंगराग है और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं अर्थात् जो दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं ऐसे शुद्ध अविनाशी महेश्वर को नमस्कार है॥ हे मल्लिकार्जुन, आप समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। आप समस्त ज्ञान के स्रोत हैं। आप समस्त आनंद के स्रोत हैं। आप मुझे ज्ञान, आनंद और मोक्ष प्रदान करें॥ मैं आपके चरणों में शरण लेता हूं। श्रीमल्हारि म्हाळसाकान्तप्रातःस्मरणम् Srimalhari Mhalsakantpratahsmaranam

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श्रीमल्हारि म्हाळसाकान्तप्रातःस्मरणम् Srimalhari Mhalsakantpratahsmaranam

Srimalhari Mhalsakantpratahsmaranam श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो देवी महालक्ष्मी की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है और इसमें देवी महालक्ष्मी के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् की रचना का श्रेय आमतौर पर स्वामी मधुसूदन सरस्वती को दिया जाता है। स्वामी मधुसूदन सरस्वती एक महान विद्वान और दार्शनिक थे। उन्होंने कई संस्कृत ग्रंथों की रचना की, जिनमें श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् भी शामिल है। श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् के कुछ प्रसिद्ध श्लोक:** अर्थ: हे महालक्ष्मी, आप धन, समृद्धि, और सौभाग्य की देवी हैं। आप सभी प्राणियों की आराध्य हैं। अर्थ: आप सभी कष्टों को दूर करने वाली हैं। आप सभी दुखों को मिटाने वाली हैं। आप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। अर्थ: आप सभी ज्ञान के स्रोत हैं। आप सभी आनंद के स्रोत हैं। आप सभी मोक्ष की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने वाली हैं। Srimalhari Mhalsakantpratahsmaranam श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो देवी महालक्ष्मी की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो धन, समृद्धि, और सौभाग्य की प्राप्ति चाहते हैं। श्रीमलहरी महालक्ष्मीप्रातःस्मरणम् का पाठ: नमस्ते महालक्ष्मी! धनधान्यसमृद्धिदायनी! सर्वसौभाग्यदायनी! सर्वप्राणिप्रिये! सर्वदुःखविनाशिनी! सर्वकामधायके! ज्ञानसागरे! आनन्दसागरे! मोक्षमार्गदर्शिके! त्वां शरणं गच्छामि। अनुवाद: हे महालक्ष्मी, आपको मेरा प्रणाम। आप धन, समृद्धि, और सौभाग्य की देवी हैं। आप सभी प्राणियों की आराध्य हैं। आप सभी कष्टों को दूर करने वाली हैं। आप सभी दुखों को मिटाने वाली हैं। आप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। आप सभी ज्ञान के स्रोत हैं। आप सभी आनंद के स्रोत हैं। आप सभी मोक्ष की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने वाली हैं। मैं आपके चरणों में शरण लेता हूं। श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् Srivaidyanathstotram

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श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् Srivaidyanathstotram

Srivaidyanathstotram श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव को एक महान चिकित्सक के रूप में वर्णित किया गया है। श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् की रचना का श्रेय आमतौर पर आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। शंकराचार्य एक महान दार्शनिक और धर्मगुरु थे। उन्होंने हिंदू धर्म के दर्शन और सिद्धांतों को दुनिया भर में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् के कुछ प्रसिद्ध श्लोक: अर्थ: हे वैद्यनाथ, आप सभी रोगों के नाशक हैं। आप सभी कष्टों को दूर करने वाले हैं। आप सभी दुखों को मिटाने वाले हैं। अर्थ: आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। आप सभी भक्तों के स्वामी हैं। आप सभी ज्ञान के स्रोत हैं। अर्थ: आप सभी आनंद के स्रोत हैं। आप सभी मोक्ष के मार्गदर्शक हैं। मैं आपके चरणों में शरण लेता हूं। श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो बीमार हैं या किसी कष्ट से पीड़ित हैं। Srivaidyanathstotram श्रीवैद्यनाथस्तोत्रम् का पाठ: नमस्ते वैद्यनाथ! सर्वरोगहर! सर्वदुःखहर! सर्वकष्टहर! प्राणिपाल! भक्तनायक! ज्ञानसागर! आनन्दसागर! मोक्षमार्गदर्शक! त्वां शरणं गच्छामि। अनुवाद: हे वैद्यनाथ, आपको मेरा प्रणाम। आप सभी रोगों के नाशक हैं। आप सभी कष्टों को दूर करने वाले हैं। आप सभी दुखों को मिटाने वाले हैं। आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। आप सभी भक्तों के स्वामी हैं। आप सभी ज्ञान के स्रोत हैं। आप सभी आनंद के स्रोत हैं। आप सभी मोक्ष के मार्गदर्शक हैं। मैं आपके चरणों में शरण लेता हूं। श्रीशङ्करमाहात्म्यम् Shrishankarmahatmyam

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श्रीशङ्करमाहात्म्यम् Shrishankarmahatmyam

 Shrishankarmahatmyam श्रीशंकरमाहात्म्यम् एक संस्कृत ग्रंथ है जो आदि गुरु शंकराचार्य की जीवनी और शिक्षाओं का वर्णन करता है। यह ग्रंथ 12 अध्यायों में विभाजित है और इसमें शंकराचार्य के जन्म, शिक्षा, गुरुभक्ति, दर्शन, और कर्मों का वर्णन किया गया है। श्रीशंकरमाहात्म्यम् की रचना का श्रेय आमतौर पर अज्ञात लेखक को दिया जाता है। हालांकि, कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि इसे स्वामी ब्रह्मानंद ने लिखा था। श्रीशंकरमाहात्म्यम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र ग्रंथ माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्रीशंकरमाहात्म्यम् के कुछ प्रसिद्ध प्रसंग:** Shrishankarmahatmyam शंकराचार्य का जन्म और शिक्षा: शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कांचीपुरम में हुआ था। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम अन्नपूर्णा था। शंकराचार्य बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान और धार्मिक थे। उन्होंने अपने गुरु गोविंदपाद से शिक्षा प्राप्त की। शंकराचार्य की गुरुभक्ति: शंकराचार्य अपने गुरु गोविंदपाद के प्रति अत्यंत भक्त थे। उन्होंने अपने गुरु के आदेश का पालन करने के लिए अपने घर को छोड़ दिया और भिक्षु बन गए। शंकराचार्य का दर्शन: शंकराचार्य एक महान दार्शनिक थे। उन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन की स्थापना की। अद्वैत वेदांत दर्शन के अनुसार, ब्रह्म (परमसत्ता) ही सत्य है। ईश्वर, जीव और ब्रह्म एक ही हैं। शंकराचार्य के कर्म: शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने चार मठों की स्थापना की और हिंदू धर्म के सिद्धांतों और शिक्षाओं का प्रचार किया। श्रीशंकरमाहात्म्यम् एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो आदि गुरु शंकराचार्य के जीवन और शिक्षाओं को जानने के लिए आवश्यक है। यह ग्रंथ हिंदू धर्म के इतिहास और दर्शन के लिए भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। श्रीशङ्करापराधक्षमापनस्तोत्रम् Sri Shankaraparadhakshamapanastotram

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श्रीशङ्करापराधक्षमापनस्तोत्रम् Sri Shankaraparadhakshamapanastotram

 Sri Shankaraparadhakshamapanastotram श्रीशङ्करापराधक्षमापनस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो आदि गुरु शंकराचार्य से क्षमा मांगता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिन्होंने शंकराचार्य के सिद्धांतों और शिक्षाओं का उल्लंघन किया है। श्री शंकराचार्य अपराधक्षमापन स्तोत्रम् की रचना का श्रेय आमतौर पर स्वामी विवेकानंद को दिया जाता है। विवेकानंद एक महान दार्शनिक और धर्मगुरु थे। उन्होंने हिंदू धर्म के दर्शन और सिद्धांतों को दुनिया भर में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री शंकराचार्य अपराधक्षमापन स्तोत्रम् को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्री श्रीशङ्करापराधक्षमापनस्तोत्रम् के कुछ प्रसिद्ध श्लोक: अर्थ: हे शंकराचार्य, आप ब्रह्मांड के निर्माता, संहारक और पालनहार हैं। आप सभी देवताओं के देवता हैं। आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। अर्थ: मैं आपके अनंत ज्ञान और दया का स्मरण करता हूं। मैं आपके सामने अपने अपराधों की क्षमा मांगता हूं। अर्थ: मैं आपकी शिक्षाओं और सिद्धांतों का उल्लंघन करता हूं। मैं आपके प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को कम करता हूं। अर्थ: मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरे अपराधों को क्षमा करें। मुझे ज्ञान, आनंद और मोक्ष प्रदान करें। श्री शंकराचार्य अपराधक्षमापन स्तोत्रम् एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो आदि गुरु शंकराचार्य की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शक है जो शंकराचार्य के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपनाना चाहते हैं। Sri Shankaraparadhakshamapanastotram श्रीश्रीशङ्करापराधक्षमापनस्तोत्रम् का पाठ: नमस्ते शंकराचार्य! ब्रह्माण्डनायक! देवानाम देव! प्राणिनां रक्षक! अनन्तज्ञान! अनन्तकृपा! अहं त्वां शरणं गच्छामि। त्वद्भक्तानां मध्ये मम स्थानं देहि। त्वदज्ञानेन मयाकृता अपराधाः सर्वाः क्षमा कुरु भगवन्। त्वदज्ञानेन मयाकृता पापानि सर्वाः क्षमा कुरु भगवन्। त्वदज्ञानेन मयाकृता कर्मपापानि सर्वाः क्षमा कुरु भगवन्। ज्ञानं देहि भगवन्। आनन्दं देहि भगवन्। मोक्षं देहि भगवन्। अनुवाद: हे शंकराचार्य, आपको मेरा प्रणाम। आप ब्रह्मांड के निर्माता, संहारक और पालनहार हैं। आप सभी देवताओं के देवता हैं। आप सभी प्राणियों के रक्षक हैं। आपके अनंत ज्ञान और दया का मैं स्मरण करता हूं। मैं आपके सामने अपने अपराधों की क्षमा मांगता हूं। मैं आपकी शिक्षाओं और सिद्धांतों का उल्लंघन करता हूं। मैं आपके प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को कम करता हूं। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरे अपराधों को क्षमा करें। मुझे ज्ञान, आनंद और मोक्ष प्रदान करें। श्रीशिवपञ्चचामरस्तोत्रम् Shreeshivpanchamarstotram

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श्रीशिवपञ्चचामरस्तोत्रम् Shreeshivpanchamarstotram

Shreeshivpanchamarstotram श्रीशिवपंचामर्स्तोत्रम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र केवल पाँच श्लोकों में रचित है, लेकिन इसमें भगवान शिव के सभी महत्वपूर्ण रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। श्रीशिवपंचामर्स्तोत्रम की रचना का श्रेय आमतौर पर आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। शंकराचार्य एक महान दार्शनिक और धर्मगुरु थे। उन्होंने हिंदू धर्म के दर्शन और सिद्धांतों को दुनिया भर में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीशिवपंचामर्स्तोत्रम को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। श्रीशिवपंचामर्स्तोत्रम के कुछ प्रसिद्ध श्लोक: Shreeshivpanchamarstotram अर्थ: हे शिव, आप कल्याणस्वरूप हैं। आप पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए सूर्यस्वरूप हैं। आप दक्ष के यज्ञ का नाश करनेवाले हैं। जिनकी ध्वजा में वृषभ (बैल) का चिह्न शोभायमान है, ऐसे नीलकण्ठ शिव को नमस्कार है॥ अर्थ: हे शिव, आपके कण्ठ में सर्पों का हार है। आपके तीन नेत्र हैं। भस्म ही जिनका अंगराग है और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं अर्थात् जो दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं ऐसे शुद्ध अविनाशी महेश्वर को नमस्कार है॥ अर्थ: हे शिव, गङ्गाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मन्दार-पुष्प तथा अन्य पुष्पों से जिनकी भलिभाँति पूजा हुई है। नन्दी के अधिपति, शिवगणों के स्वामी महेश्वर को नमस्कार है॥ अर्थ: हे शिव, आप समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। आप समस्त ज्ञान के स्रोत हैं। आप समस्त आनंद के स्रोत हैं। हे शिव, आप मुझे ज्ञान, आनंद और मोक्ष प्रदान करें॥ श्रीशिवपंचामर्स्तोत्रम एक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। श्रीशिवस्तोत्रम् – स्वामी विवेकानन्दविरचितम् Sri Shivastotram – Swami Vivekananda Virchitam

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श्रीशिवस्तोत्रम् – स्वामी विवेकानन्दविरचितम् Sri Shivastotram – Swami Vivekananda Virchitam

Sri Shivastotram – Swami Vivekananda Virchitam श्री शिवस्तोत्रम एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 100 श्लोकों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। श्री शिवस्तोत्रम की रचना का श्रेय आमतौर पर ऋषि भारद्वाज को दिया जाता है। हालांकि, कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि इसे ऋषि वशिष्ठ ने लिखा था। श्री शिवस्तोत्रम को हिंदू धर्म में एक पवित्र स्तोत्र माना जाता है। इसे अक्सर पूजा और अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है। स्वामी विवेकानंद एक भारतीय दार्शनिक और धर्मगुरु थे। वे रामकृष्ण मिशन के संस्थापक थे। स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म के दर्शन और सिद्धांतों को दुनिया भर में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। Sri Shivastotram – Swami Vivekananda Virchitam स्वामी विवेकानंद ने कई संस्कृत स्तोत्रों का अनुवाद और व्याख्या की, लेकिन उन्होंने कोई नया स्तोत्र नहीं लिखा। श्री शिवस्तोत्रम के कुछ प्रसिद्ध श्लोक: अर्थ: हे शिव, आपके तीन नेत्र ब्रह्मांड के तीनों काल हैं: भूत, वर्तमान और भविष्य। आपका त्रिशूल तीन गुणों: सत्व, रज और तम का प्रतिनिधित्व करता है। आपका त्रिशूल समस्त सृष्टि को नियंत्रित करता है। अर्थ: हे शिव, आपका डमरु सृष्टि की रचना और विनाश का प्रतीक है। आपका नृत्य सृष्टि की ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। आपका गले में लिपटा हुआ नाग समस्त विषों का प्रतिनिधित्व करता है। ॐकारेश्वरमहात्म्यम् Omkareshwarmahatmyam

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विश्वजछन्दसा अण्डधर आनन्द Vishvajchhandsa Andadhar Anand

Vishvajchhandsa Andadhar Anand विश्वज्छंदसा अंधकार आनंद एक संस्कृत वाक्य है जिसका अर्थ है “अनंत आनंद का अंधकार”। यह वाक्य भगवान शिव की स्तुति में प्रयोग किया जाता है। वाक्य के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: विश्वज्छंदसा का अर्थ है “अनंत आनंद”। यह भगवान शिव के आनंदमय स्वरूप का प्रतीक है। अंधकार का अर्थ है “अनंत”। यह भगवान शिव के अनंत स्वरूप का प्रतीक है। वाक्य का अर्थ यह है कि भगवान शिव का आनंद अनंत है और यह अनंत काल से विद्यमान है। भगवान शिव के आनंद में कोई अंधकार नहीं है, बल्कि यह पूर्ण प्रकाश है। वाक्य भगवान शिव की महिमा और शक्ति को व्यक्त करता है। यह वाक्य भक्तों को भगवान शिव के प्रति समर्पित होने और उनके आनंद में विलीन होने के लिए प्रेरित करता है। वाक्य का प्रयोग अक्सर भजनों और स्तुतियों में किया जाता है। यह वाक्य भगवान शिव के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। वाक्य के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं: “विश्वज्छंदसा अंधकार आनंद, शिव सदाशिव नमस्ते।” “विश्वज्छंदसा अंधकार आनंद, तुम हो एकमात्र सत्य।” “विश्वज्छंदसा अंधकार आनंद, मैं तुम्हारी शरण में हूं।” विश्वज्छंदसा अंधकार आनंद एक महत्वपूर्ण वाक्य है जो भगवान शिव की भक्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह वाक्य भक्तों को भगवान शिव के अनंत आनंद में विलीन होने के लिए प्रेरित करता है। ॐकारेश्वरमहात्म्यम् Omkareshwarmahatmyam

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ॐकारेश्वरमहात्म्यम् Omkareshwarmahatmyam

 Omkareshwarmahatmyam ओंकारेश्वर महात्म्य एक संस्कृत ग्रंथ है जो भगवान शिव के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के माहात्म्य का वर्णन करता है। यह ग्रंथ 12 अध्यायों में विभाजित है, प्रत्येक अध्याय में एक अलग विषय का वर्णन किया गया है। ग्रंथ के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का नाम इसके स्वरूप के कारण पड़ा है। इस ज्योतिर्लिंग का आकार ॐ अक्षर के समान है। Omkareshwarmahatmyam ग्रंथ में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के कई चमत्कारों का वर्णन किया गया है। उदाहरण के लिए, एक बार एक ऋषि ने इस ज्योतिर्लिंग के सामने तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें वरदान दिया। ग्रंथ में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन के लाभों का भी वर्णन किया गया है। यह कहा गया है कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन से भक्तों को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। ओंकारेश्वर महात्म्य एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो भगवान शिव की भक्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह ग्रंथ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के महत्व और महिमा को बताता है। ओंकारेश्वर महात्म्य के कुछ महत्वपूर्ण अंश निम्नलिखित हैं:** “ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक दिव्य स्वरूप है। यह ज्योतिर्लिंग सभी प्रकार के पापों और अधर्म का नाश करता है।” “ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन से भक्तों को सभी प्रकार के सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।” “ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग एक शक्तिशाली तीर्थस्थल है। जो कोई भी इस तीर्थस्थल पर आता है, वह अवश्य ही लाभान्वित होता है।” ओंकारेश्वर महात्म्य एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो सभी भक्तों के लिए पढ़ने योग्य है। अगस्त्यप्रोक्ता सुन्दरेशस्तुतिः Agastyaprokta sundareshstutih

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