शिव भगवान

भैरवस्तवः Bhairavastavah

Bhairavastavah भैरवस्थान एक ऐसी जगह है जहां भगवान शिव के भैरव रूप का मंदिर या मठ है। भैरव भगवान शिव के गण हैं, जो उनके सहायक और दूत हैं। वे अक्सर श्मशानों में रहते हैं और उन्हें भय और मृत्यु का देवता माना जाता है। हालांकि, वे भी ज्ञान और सुरक्षा के देवता हैं। भारत में भैरवस्थान की एक बड़ी संख्या है। कुछ सबसे प्रसिद्ध भैरवस्थानों में शामिल हैं: श्री कालभैरव मंदिर, उज्जैन श्री भैरवनाथ मंदिर, काशी श्री भैरवनाथ मंदिर, हरिद्वार श्री भैरवनाथ मंदिर, गोरखपुर श्री भैरवनाथ मंदिर, कानपुर Bhairavastavah भैरवस्थान आमतौर पर शक्तिशाली और पवित्र स्थान होते हैं। उन्हें भैरव की कृपा प्राप्त करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तीर्थयात्रा के रूप में जाना जाता है। भैरवस्थान के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: भैरव की कृपा प्राप्त करना आशीर्वाद प्राप्त करना शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना कामनाओं की पूर्ति करना मोक्ष प्राप्त करना भैरवस्थान पर जाने से पहले, कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए: शुद्ध और पवित्र रहें भैरव की पूजा करें उनके मंत्रों का जाप करें उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करें भैरवस्थान पर जाने से आपको भैरव की कृपा प्राप्त करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद मिलेगी। महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् Mahakaalbhairavashtakam or Tikshandanshtrakaalbhairavashtakam

भैरवस्तवः Bhairavastavah Read More »

महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् Mahakaalbhairavashtakam or Tikshandanshtrakaalbhairavashtakam

 Mahakaalbhairavashtakam or Tikshandanshtrakaalbhairavashtakam महाकालभैरवष्टक और तिखंडंदष्ट्राकालभैरवष्टक दो संस्कृत स्तोत्र हैं जो भगवान शिव के भैरव रूप की स्तुति करते हैं। ये दोनों स्तोत्र 8 श्लोकों के हैं और इन्हें 13वीं शताब्दी के एक महान वैष्णव संत, श्रीनिवासाचार्य ने लिखा था। महाकालभैरवष्टक श्लोक 1 नमस्ते श्मशाननिवासाय नमस्ते कालभैरवाय।नमस्ते भूतनाथाय नमस्ते नृसिंहाय ते। अर्थ: हे श्मशान में रहने वाले, आपको नमस्कार।हे कालभैरव, आपको नमस्कार।हे भूतनाथ, आपको नमस्कार।हे नृसिंह, आपको नमस्कार। श्लोक 2 नमस्ते त्रिनेत्राय नमस्ते सर्वशक्तिमानाय।नमस्ते त्रिपुरांतकाय नमस्ते मृत्युंजयाय ते। अर्थ: हे त्रिनेत्र, आपको नमस्कार।हे सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार।हे त्रिपुरांतक, आपको नमस्कार।हे मृत्युंजय, आपको नमस्कार। श्लोक 3 नमस्ते चंद्रमौलिकाय नमस्ते गंगाधारकाय।नमस्ते वृषभवाहकाय नमस्ते त्रिशूलधारकाय ते। अर्थ: हे चंद्रमौली, आपको नमस्कार।हे गंगाधारी, आपको नमस्कार।हे वृषभवाहक, आपको नमस्कार।हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार। श्लोक 4 नमस्ते सर्वभूतनाथाय नमस्ते षडाननाय ते।नमस्ते त्रिलोकनाथाय नमस्ते रुद्ररूपाय ते। अर्थ:  Mahakaalbhairavashtakam or Tikshandanshtrakaalbhairavashtakam हे सर्वभूतनाथ, आपको नमस्कार।हे षडानन, आपको नमस्कार।हे त्रिलोकनाथ, आपको नमस्कार।हे रुद्ररूप, आपको नमस्कार। श्लोक 5 नमस्ते सर्वशत्रुहराय नमस्ते सर्वरोगनाशिने।नमस्ते सर्वपापनाशिने नमस्ते सर्वविघ्ननाशिने ते। अर्थ: हे सभी शत्रुओं को हराने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी रोगों को नष्ट करने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी पापों को नष्ट करने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी विघ्नों को नष्ट करने वाले, आपको नमस्कार। श्लोक 6 नमस्ते सर्वकष्टनाशिने नमस्ते सर्वभयनाशिने।नमस्ते सर्वार्थसिद्धिदायकाय नमस्ते सर्वशक्तिदायकाय ते। अर्थ: हे सभी कष्टों को नष्ट करने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी भयों को नष्ट करने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी प्रकार की सिद्धि देने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी शक्तियों को देने वाले, आपको नमस्कार। श्लोक 7 नमस्ते सर्वकामनापूर्ते नमस्ते सर्वलोकपालाय।नमस्ते सर्वदेवतानाथाय नमस्ते सर्वसुरप्रियाय ते। अर्थ: हे सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले, आपको नमस्कार।हे सभी लोकों के पालक, आपको नमस्कार।हे सभी देवताओं के नाथ, आपको नमस्कार।हे सभी सुरों के प्रिय, आपको नमस्कार। श्लोक 8 नमस्ते कालभैरवदेवाय नमस्ते महाभैरवाय।नमस्ते सर्वलोकनायकाय नमस्ते सर्वमंगलदायकाय ते। अर्थ: हे कालभैरव देव, आपको नमस्कार।हे महाभैरव, आपको नमस्कार। **हे सभी लोकों के नायक महादेवस्तुतिः वरप्राप्त्यर्थं पार्वतिकृता Mahadevstuti: Varapraptyaartham Parvatikrita

महाकालभैरवाष्टकम् अथवा तीक्ष्णदंष्ट्रकालभैरवाष्टकम् Mahakaalbhairavashtakam or Tikshandanshtrakaalbhairavashtakam Read More »

महादेवस्तुतिः वरप्राप्त्यर्थं पार्वतिकृता Mahadevstuti: Varapraptyaartham Parvatikrita

Mahadevstuti: Varapraptyaartham Parvatikrita महादेवस्तुति: वरप्राप्तिार्थं पार्वतीकृत एक संस्कृत स्तुति है जो भगवान शिव की स्तुति करती है। यह स्तुति 100 श्लोकों की है और इसे 10वीं शताब्दी के एक महान वैष्णव संत, शंकराचार्य ने लिखा था। स्तुति की शुरुआत में, पार्वती भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें अपने दर्शन दें और उन्हें अपने मार्ग पर चलने की शक्ति दें। वे भगवान शिव को समस्त ब्रह्मांड का स्वामी और सभी देवताओं का गुरु कहते हैं। फिर, पार्वती भगवान शिव की महिमा का वर्णन करती हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव ही सृष्टि, पालन और संहार के देवता हैं। वे ही ब्रह्मांड के सर्वोच्च भगवान हैं। स्तुति की अंतिम श्लोकों में, पार्वती भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें वरदान दें। वे कहते हैं कि वे भगवान शिव से मोक्ष और ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। महादेवस्तुति: वरप्राप्तिार्थं पार्वतीकृत एक शक्तिशाली स्तुति है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने और सभी प्रकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए उपयोग की जा सकती है.. Mahadevstuti: Varapraptyaartham Parvatikrita स्तुति का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है: महादेवस्तुति: वरप्राप्तिार्थं पार्वतीकृत श्लोक 1 देवदेव महादेव नमस्ते।गुरुदेव साक्षात नमस्ते।सर्वदेवानां ईश्वर नमस्ते।ब्रह्माण्डनाथ नमस्ते। अर्थ: हे देवों के देव, भगवान शिव, आपको नमस्कार।हे गुरुदेव, आपको नमस्कार।सभी देवताओं के ईश्वर, आपको नमस्कार।ब्रह्ांड के स्वामी, आपको नमस्कार। श्लोक 2 सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता।त्रिगुणमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान।त्र्यम्बक, त्रिपुरांतक, मृत्युंजय।भगवान् शिव, आपको नमस्कार। अर्थ: सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता।त्रिगुणमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान।त्र्यंबक, त्रिपुरांतक, मृत्युंजय।भगवान शिव, आपको नमस्कार। श्लोक 3 गंगाधर, चंद्रमौली, वृषभवाहन।शिवलिंगधारी, नंदीश्वर।भूतनाथ, निराकार, निर्विकार।भगवान् शिव, आपको नमस्कार। अर्थ: गंगाधर, चंद्रमौली, वृषभवाहन।शिवलिंगधारी, नंदीश्वर।भूतनाथ, निराकार, निर्विकार।भगवान शिव, आपको नमस्कार। श्लोक 4 भस्मधारी, भैरव, कालभैरव।सर्वभूतों के स्वामी, आप ही।मोक्षदाता, ज्ञानदाता, आप ही।भगवान् शिव, आपको नमस्कार। अर्थ: भस्मधारी, भैरव, कालभैरव।सभी भूतों के स्वामी, आप ही।मोक्षदाता, ज्ञानदाता, आप ही।भगवान शिव, आपको नमस्कार। श्लोक 5 देवी पार्वती प्रार्थना करती हैं: हे भगवान शिव, मुझे अपने दर्शन दीजिए।मुझे अपने मार्ग पर चलने की शक्ति दीजिए।मैं आपकी भक्ति करना चाहती हूं।मुझे आपकी कृपा प्राप्त करने दीजिए। अर्थ: देवी पार्वती प्रार्थना करती हैं: हे भगवान शिव, मुझे अपने दर्शन दीजिए।मुझे अपने मार्ग पर चलने की शक्ति दीजिए।मैं आपकी भक्ति करना चाहती हूं।मुझे आपकी कृपा प्राप्त करने दीजिए। श्लोक 6 **हे  महामृत्युञ्जयकवचम् २ Mahamrityunjayakavacham 2

महादेवस्तुतिः वरप्राप्त्यर्थं पार्वतिकृता Mahadevstuti: Varapraptyaartham Parvatikrita Read More »

महामृत्युञ्जयकवचम् २ Mahamrityunjayakavacham 2

Mahamrityunjayakavacham 2 महामृत्युंजयकवचम् 2 एक संस्कृत कवच है जो भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र की रक्षा करती है। यह कवच 2 श्लोकों का है और इसे 14वीं शताब्दी के एक महान वैष्णव संत, श्रीनिवासाचार्य ने लिखा था। श्लोक 1 ॐ नमस्ते रुद्राय नमस्ते शर्वाय नमः।नमस्ते अघोराय नमस्ते भैरवाय नमः।नमस्ते त्रिपुरान्तकाय नमस्ते त्रिनेत्राय नमः।नमस्ते पंचमुखाय नमस्ते त्रिशूलधारकाय नमः।नमस्ते वृषभवाहकाय नमस्ते चंद्रमौलिकाय नमः।नमस्ते गंगाधारकाय नमस्ते मृत्युंजयाय नमः।नमस्ते कालभैरवाय नमस्ते सर्वभूतनाथाय नमः।नमस्ते सर्वशक्तिमानाय नमस्ते सर्वकारणाय नमः।नमस्ते सर्वज्ञाय नमस्ते सर्वशरणाय नमः।नमस्ते सर्वशक्तिदायकाय नमस्ते सर्वदुःखनाशकाय नमः।नमस्ते सर्वमोक्षदायकाय नमः। Mahamrityunjayakavacham 2 अर्थ: हे रुद्र, आपको नमस्कार।हे शंकर, आपको नमस्कार।हे अघोर, आपको नमस्कार।हे भैरव, आपको नमस्कार।हे त्रिपुरान्तक, आपको नमस्कार।हे त्रिनेत्र, आपको नमस्कार।हे पंचमुख, आपको नमस्कार।हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार।हे वृषभवाहक, आपको नमस्कार।हे चंद्रमौली, आपको नमस्कार।हे गंगाधारी, आपको नमस्कार।हे मृत्युंजय, आपको नमस्कार।हे कालभैरव, आपको नमस्कार।हे सर्वभूतनाथ, आपको नमस्कार।हे सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार।हे सर्वकारण, आपको नमस्कार।हे सर्वज्ञ, आपको नमस्कार।हे सर्वशरण, आपको नमस्कार।हे सर्वशक्तिदायक, आपको नमस्कार।हे सर्वदुःखनाशक, आपको नमस्कार।हे सर्वमोक्षदायक, आपको नमस्कार। श्लोक 2 ॐ नमो भगवते रुद्राय अमुकं रक्षां कुरु।अमुकं रोगं हरि, अमुकं क्लेशं हरि।अमुकं भयं हरि, अमुकं शोकं हरि।अमुकं दुःखं हरि, अमुकं कष्टं हरि।अमुकं संकटं हरि, अमुकं विघ्नं हरि।अमुकं मृत्युं हरि, अमुकं मोक्षं देहि। अर्थ: हे भगवान शिव, मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूं।मेरी सभी समस्याओं को दूर करें।मेरी सभी बीमारियों को दूर करें।मेरी सभी चिंताओं को दूर करें।मेरी सभी आशंकाओं को दूर करें।मेरी सभी दुखों को दूर करें।मेरी सभी कठिनाइयों को दूर करें।मेरी सभी बाधाओं को दूर करें।मेरी मृत्यु को दूर करें।मुझे मोक्ष प्रदान करें। कवच का उपयोग कैसे करें इस कवच का उपयोग करने के लिए, इसे एक शांत और पवित्र स्थान पर बैठें और इसे ध्यान से पढ़ें। आप इसे एक माला पर भी जप सकते हैं। कवच को नियमित रूप से पढ़ने से आपको भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने और सभी प्रकार के संकटों से बचाने में मदद मिलेगी। महारुद्रस्तोत्रम् Maharudrastotram

महामृत्युञ्जयकवचम् २ Mahamrityunjayakavacham 2 Read More »

महारुद्रस्तोत्रम् Maharudrastotram

Maharudrastotram महारुद्रस्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के रुद्र रूप की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 12 श्लोकों का है और इसे 13वीं शताब्दी के एक महान वैष्णव संत, श्रीनिवासाचार्य ने लिखा था। स्तोत्र की शुरुआत में, भक्त भगवान शिव को नमस्कार करते हैं और उनकी महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव ही सृष्टि, पालन और संहार के देवता हैं। वे ही ब्रह्मांड के सर्वोच्च भगवान हैं। फिर, भक्त भगवान शिव के रुद्र रूप की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव का रुद्र रूप सभी दुखों और कष्टों को दूर करने वाला है। वे ही मोक्ष के मार्ग को दिखाने वाले हैं। स्तोत्र की अंतिम श्लोकों में, भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें अपने दर्शन दें और उन्हें अपने मार्ग पर चलने की शक्ति दें। महारुद्रस्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की भक्ति के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक है। यह स्तोत्र उन सभी लोगों के लिए उपयोगी है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है: Maharudrastotram महारुद्रस्तोत्र नमस्ते रुद्राय नमस्ते रुद्राय।नमस्ते शर्वाय नमस्ते शर्वाय। नमस्ते अघोराय नमस्ते अघोराय।नमस्ते भैरवाय नमस्ते भैरवाय। नमस्ते त्रिपुरान्तकाय नमस्ते त्रिपुरान्तकाय।नमस्ते त्रिनेत्राय नमस्ते त्रिनेत्राय। नमस्ते पंचमुखाय नमस्ते पंचमुखाय।नमस्ते त्रिशूलधारकाय नमस्ते त्रिशूलधारकाय। नमस्ते वृषभवाहकाय नमस्ते वृषभवाहकाय।नमस्ते चंद्रमौलिकाय नमस्ते चंद्रमौलिकाय। नमस्ते गंगाधारकाय नमस्ते गंगाधारकाय।नमस्ते मृत्युंजयाय नमस्ते मृत्युंजयाय। नमस्ते कालभैरवाय नमस्ते कालभैरवाय।नमस्ते सर्वभूतनाथाय नमस्ते सर्वभूतनाथाय। नमस्ते सर्वशक्तिमानाय नमस्ते सर्वशक्तिमानाय।नमस्ते सर्वकारणाय नमस्ते सर्वकारणाय। नमस्ते सर्वज्ञाय नमस्ते सर्वज्ञाय।नमस्ते सर्वशरणाय नमस्ते सर्वशरणाय। नमस्ते सर्वशक्तिदायकाय नमस्ते सर्वशक्तिदायकाय।नमस्ते सर्वदुःखनाशकाय नमस्ते सर्वदुःखनाशकाय। नमस्ते सर्वमोक्षदायकाय नमस्ते सर्वमोक्षदायकाय।प्रभो, दर्शनं देहि मे। Maharudrastotram अर्थ: हे रुद्र, आपको नमस्कार।हे शंकर, आपको नमस्कार। हे अघोर, आपको नमस्कार।हे भैरव, आपको नमस्कार। हे त्रिपुरान्तक, आपको नमस्कार।हे त्रिनेत्र, आपको नमस्कार। हे पंचमुख, आपको नमस्कार।हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार। हे वृषभवाहक, आपको नमस्कार।हे चंद्रमौली, आपको नमस्कार। हे गंगाधारी, आपको नमस्कार।हे मृत्युंजय, आपको नमस्कार। हे कालभैरव, आपको नमस्कार।हे सर्वभूतनाथ, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार।हे सर्वकारण, आपको नमस्कार। हे सर्वज्ञ, आपको नमस्कार।हे सर्वशरण, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिदायक, आपको नमस्कार।हे सर्वदुःखनाशक, आपको नमस्कार। हे सर्वमोक्षदायक, आपको नमस्कार।प्रभो, मुझे दर्शन दीजिए। मुनयःकृता महाकाललिङ्गस्तुतिः Munayahkrita Mahakaallingastutih

महारुद्रस्तोत्रम् Maharudrastotram Read More »

मुनयःकृता महाकाललिङ्गस्तुतिः Munayahkrita Mahakaallingastutih

 Munayahkrita Mahakaallingastutih मुनियकृत महाकाललिंगस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महाकाल रूप की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 12 पंक्तियों का है और इसे 7वीं शताब्दी के एक महान वैष्णव संत, मधुसूदनाचार्य ने लिखा था। स्तोत्र की शुरुआत में, मुनि (ऋषि) भगवान शिव को नमस्कार करते हैं और उनकी महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव ही सृष्टि, पालन और संहार के देवता हैं। वे ही ब्रह्मांड के सर्वोच्च भगवान हैं। फिर, मुनि भगवान शिव के महाकाल रूप की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव का महाकाल रूप सभी दुखों और कष्टों को दूर करने वाला है। वे ही मोक्ष के मार्ग को दिखाने वाले हैं। स्तोत्र की अंतिम पंक्तियों में, मुनि भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें अपने दर्शन दें और उन्हें अपने मार्ग पर चलने की शक्ति दें। मुनियकृत महाकाललिंगस्तुति एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की भक्ति के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक है। यह स्तोत्र उन सभी लोगों के लिए उपयोगी है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है: मुनियकृत महाकाललिंगस्तुति नमस्ते महादेवाय नमस्ते महाकालाय।नमस्ते शर्वाय नमस्ते रुद्राय नमस्ते। नमस्ते अघोराय नमस्ते भैरवाय।नमस्ते त्रिपुरान्तकाय नमस्ते। नमस्ते त्रिनेत्राय नमस्ते पंचमुखाय।नमस्ते त्रिशूलधारकाय नमस्ते। नमस्ते वृषभवाहकाय नमस्ते।नमस्ते चंद्रमौलिकाय नमस्ते। नमस्ते गंगाधारकाय नमस्ते।नमस्ते मृत्युंजयाय नमस्ते। नमस्ते कालभैरवाय नमस्ते।नमस्ते सर्वभूतनाथाय नमस्ते। नमस्ते सर्वशक्तिमानाय नमस्ते।नमस्ते सर्वकारणाय नमस्ते। नमस्ते सर्वज्ञाय नमस्ते।नमस्ते सर्वशरणाय नमस्ते। नमस्ते सर्वशक्तिदायकाय नमस्ते।नमस्ते सर्वदुःखनाशकाय नमस्ते। नमस्ते सर्वमोक्षदायकाय नमस्ते।प्रभो, दर्शनं देहि मे। Munayahkrita Mahakaallingastutih अर्थ: हे महादेव, आपको नमस्कार।हे महाकाल, आपको नमस्कार।हे शंकर, आपको नमस्कार।हे रुद्र, आपको नमस्कार। हे अघोर, आपको नमस्कार।हे भैरव, आपको नमस्कार।हे त्रिपुरान्तक, आपको नमस्कार। हे त्रिनेत्र, आपको नमस्कार।हे पंचमुख, आपको नमस्कार।हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार। हे वृषभवाहक, आपको नमस्कार।हे चंद्रमौली, आपको नमस्कार। हे गंगाधारी, आपको नमस्कार।हे मृत्युंजय, आपको नमस्कार। हे कालभैरव, आपको नमस्कार।हे सर्वभूतनाथ, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार।हे सर्वकारण, आपको नमस्कार। हे सर्वज्ञ, आपको नमस्कार।हे सर्वशरण, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिदायक, आपको नमस्कार।हे सर्वदुःखनाशक, आपको नमस्कार। हे सर्वमोक्षदायक, आपको नमस्कार।प्रभो, मुझे दर्शन दीजिए। मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् Munibhih Kritam Shivastotram

मुनयःकृता महाकाललिङ्गस्तुतिः Munayahkrita Mahakaallingastutih Read More »

मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् Munibhih Kritam Shivastotram

  Munibhih Kritam Shivastotram मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र एक हिंदू स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 100 श्लोकों में है, जो भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन करते हैं। मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं: श्लोक 1: नमोस्तु भगवते शर्वाय चतुर्मुखाय। सर्वव्यापिने सर्वशक्तये नमस्ते नमस्ते।। अर्थ: हे भगवन शिव, हे चारमुख वाले, हे सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार। श्लोक 2: ओंकारं नमस्तुभ्यं त्रिशूलधारिणे। सदा शुभं कुरु मे देव सर्वशक्तिमान।। अर्थ: हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिमान, हमेशा मेरे लिए शुभ करें। श्लोक 3: नमस्ते रुद्राय महेश्वराय चंद्रशेखराय। शिवाय नमस्ते नमस्ते नमस्ते।। अर्थ: हे रुद्र, हे महादेव, हे चंद्रशेखर, हे शिव, आपको नमस्कार। मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले किसी पवित्र स्थान पर बैठ जाएं। फिर, हाथ में जल लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद, स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का पाठ 108 बार करें। स्तोत्र का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। Munibhih Kritam Shivastotram मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत प्रभावी है। मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र के श्लोक 1 और 2 का अर्थ इस प्रकार है: श्लोक 1: हे भगवन शिव, हे चारमुख वाले, हे सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान, आपको नमस्कार। श्लोक 2: हे त्रिशूलधारी, आपको नमस्कार। हे सर्वशक्तिमान, हमेशा मेरे लिए शुभ करें। श्लोक 1 में, भक्त भगवान शिव को नमस्कार करते हैं। वे उन्हें ओंकार कहते हैं, जो एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “ॐ”। वे यह भी कहते हैं कि भगवान शिव चारमुख वाले हैं, जो उनके चार रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्लोक 2 में, भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे हमेशा उनके लिए शुभ करें। वे यह भी कहते हैं कि भगवान शिव सर्वशक्तिमान हैं और वे उनके सभी कष्ट दूर कर सकते हैं। मुनियों द्वारा रचित शिवस्तोत्र एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इसका पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युञ्जय चतुःषष्टिनामावलिः Mrityunjay Chaturashashtinamavalih

मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् Munibhih Kritam Shivastotram Read More »

मृत्युञ्जय चतुःषष्टिनामावलिः Mrityunjay Chaturashashtinamavalih

Mrityunjay Chaturashashtinamavalih मृत्युंजय चतुरशष्टीनामावली एक हिंदू स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 460 नामों का वर्णन करता है, जो भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मृत्युंजय चतुरशष्टीनामावली का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युंजय चतुरशष्टीनामावली के कुछ नाम इस प्रकार हैं: मृत्युंजय त्रिनेत्र शूलपाणि वृषभध्वज गंगाधर नीलकंठ शंभु रुद्र महादेव त्रिलोकनाथ ओंकार शिव आदिनाथ सदाशिव भव शर्व पशुपति भैरव महाकाल कर्पूरगौर चंद्रमौली Mrityunjay Chaturashashtinamavalih मृत्युंजय चतुरशष्टीनामावली का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले किसी पवित्र स्थान पर बैठ जाएं। फिर, हाथ में जल लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद, स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक नाम का पाठ 108 बार करें। स्तोत्र का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। मृत्युंजय चतुरशष्टीनामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत प्रभावी है। मृत्युञ्जयस्तोत्र १ मार्कण्डेयप्रोक्तं नरसिंहपुराणे Mrityunjay Stotra 1 Markandeyaproktam Narasinghapurane

मृत्युञ्जय चतुःषष्टिनामावलिः Mrityunjay Chaturashashtinamavalih Read More »

मृत्युञ्जयस्तोत्र १ मार्कण्डेयप्रोक्तं नरसिंहपुराणे Mrityunjay Stotra 1 Markandeyaproktam Narasinghapurane

Mrityunjay Stotra 1 Markandeyaproktam Narasinghapurane मृत्युंजय स्तोत्र 1 मार्कण्डेयप्रोक्ता एक हिंदू स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र नारायण पुराण में मिलता है। यह स्तोत्र मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित है। मृत्युंजय स्तोत्र 1 में 10 श्लोक हैं। इन श्लोकों में भगवान शिव को मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है। मृत्युंजय स्तोत्र 1 के अनुसार, भगवान शिव ही एकमात्र हैं जो मृत्यु को जीत सकते हैं। वे ही भक्तों के सभी कष्टों को दूर कर सकते हैं और उन्हें मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। मृत्युंजय स्तोत्र 1 का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युंजय स्तोत्र 1 के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं: श्लोक 1: ॥ मृत्युंजय स्तोत्र ॥ अर्थ: हे मृत्युंजय, हे शिव, आप सभी देवताओं के स्वामी हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं और आप सभी दुखों को दूर करने वाले हैं। श्लोक 2: त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् अर्थ: हम त्र्यंबक की पूजा करते हैं, जो सुगंधित और पुष्टिकारक हैं। जैसे कि ककड़ी लता अपनी नाभि से बंधी होती है, वैसे ही हमें मृत्यु से मुक्त कर दो, लेकिन अमरता से नहीं। श्लोक 3: ओं नमः शिवाय अर्थ: हे शिव, आपको नमस्कार। Mrityunjay Stotra 1 Markandeyaproktam Narasinghapurane मृत्युंजय स्तोत्र 1 का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले किसी पवित्र स्थान पर बैठ जाएं। फिर, हाथ में जल लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद, स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का पाठ 108 बार करें। स्तोत्र का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। मृत्युंजय स्तोत्र 1 के श्लोक 1 और 2 का अर्थ इस प्रकार है: श्लोक 1: हे मृत्युंजय, हे शिव, आप सभी देवताओं के स्वामी हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं और आप सभी दुखों को दूर करने वाले हैं। श्लोक 2: हम त्र्यंबक की पूजा करते हैं, जो सुगंधित और पुष्टिकारक हैं। जैसे कि ककड़ी लता अपनी नाभि से बंधी होती है, वैसे ही हमें मृत्यु से मुक्त कर दो, लेकिन अमरता से नहीं। श्लोक 1 में, भक्त भगवान शिव को मृत्युंजय के रूप में नमस्कार करते हैं। मृत्युंजय का अर्थ है “मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला”। भक्त यह प्रार्थना करते हैं कि भगवान शिव उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त करें। श्लोक 2 में, भक्त भगवान शिव की स्तुति करते हैं। वे उन्हें त्र्यंबक कहते हैं, जो एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “तीन नेत्र वाला”। वे यह भी कहते हैं कि भगवान शिव सुगंधित और पुष्टिकारक हैं। श्लोक 2 के अंत में, भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें मृत्यु से मुक्त करें, लेकिन अमरता नहीं दें। वे यह प्रार्थना करते हैं कि वे इस जीवन में ही मोक्ष प्राप्त करें। मृत्युंजय स्तोत्र 1 एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इसका पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युञ्जयस्तोत्रम् २ नरसिंहपुराणे Mrityunjayastotram 2 Narasinghpurane

मृत्युञ्जयस्तोत्र १ मार्कण्डेयप्रोक्तं नरसिंहपुराणे Mrityunjay Stotra 1 Markandeyaproktam Narasinghapurane Read More »

मृत्युञ्जयस्तोत्रम् २ नरसिंहपुराणे Mrityunjayastotram 2 Narasinghpurane

Mrityunjayastotram 2 Narasinghpurane मृत्युंजय स्तोत्र 2 एक हिंदू स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र नारायण पुराण में मिलता है। मृत्युंजय स्तोत्र 2 में 28 श्लोक हैं। इन श्लोकों में भगवान शिव को मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है। मृत्युंजय स्तोत्र 2 के अनुसार, भगवान शिव ही एकमात्र हैं जो मृत्यु को जीत सकते हैं। वे ही भक्तों के सभी कष्टों को दूर कर सकते हैं और उन्हें मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। मृत्युंजय स्तोत्र 2 का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युंजय स्तोत्र 2 के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं: Mrityunjayastotram 2 Narasinghpurane श्लोक 1: अथ मृत्युंजय स्तोत्रं अर्थ: अब मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करें। श्लोक 2: त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् अर्थ: हम त्र्यंबक की पूजा करते हैं, जो सुगंधित और पुष्टिकारक हैं। जैसे कि ककड़ी लता अपनी नाभि से बंधी होती है, वैसे ही हमें मृत्यु से मुक्त कर दो, लेकिन अमरता से नहीं। श्लोक 3: ओं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् अर्थ: हम तत्पुरुष को जानते हैं, हम महादेव को ध्यान में रखते हैं। हे रुद्र, हमें प्रेरित करें। मृत्युंजय स्तोत्र 2 एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत प्रभावी है। मृत्युंजय स्तोत्र 2 का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है सबसे पहले किसी पवित्र स्थान पर बैठ जाएं। फिर, हाथ में जल लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद, स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का पाठ 108 बार करें। स्तोत्र का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। मृत्युञ्जयाष्टोत्तरशतनामावलिः Mrityunjayashtottarashatanamavalih

मृत्युञ्जयस्तोत्रम् २ नरसिंहपुराणे Mrityunjayastotram 2 Narasinghpurane Read More »

मृत्युञ्जयाष्टोत्तरशतनामावलिः Mrityunjayashtottarashatanamavalih

Mrityunjayashtottarashatanamavalih मृत्युंजयष्टोत्तरशतनामावली एक स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 108 नामों का वर्णन करता है, जो भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मृत्युंजयष्टोत्तरशतनामावली का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। मृत्युंजयष्टोत्तरशतनामावली के कुछ नाम इस प्रकार हैं: मृत्युंजय त्रिनेत्र शूलपाणि वृषभध्वज गंगाधर नीलकंठ शंभु रुद्र महादेव त्रिलोकनाथ Mrityunjayashtottarashatanamavalih मृत्युंजयष्टोत्तरशतनामावली का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले किसी पवित्र स्थान पर बैठ जाएं। फिर, हाथ में जल लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद, स्तोत्र का पाठ करें। प्रत्येक नाम का पाठ 108 बार करें। स्तोत्र का पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें। मृत्युंजयष्टोत्तरशतनामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत प्रभावी है। मृत्युलाङ्गूलोपनिषत् Mrityulangulopanishat

मृत्युञ्जयाष्टोत्तरशतनामावलिः Mrityunjayashtottarashatanamavalih Read More »

मृत्युलाङ्गूलोपनिषत् Mrityulangulopanishat

Mrityulangulopanishat अथ मृत्युलाङ्गूलं व्याख्यास्यामः । अस्य मृत्युलाङ्गूलमन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । कालाग्निरुद्रो यमश्च देवता । मृत्यूपस्थाने विनियोगः । अथातो योगजिह्वः साधुमतियोजितं स मे वाह कालं पुरुषमूर्ध्वलिङ्गं विरूपाक्षं विश्वरूपाय नमो नमः । पशुपतये नमः । य इदं श‍ृणुयान्नित्यं मृत्युलाङ्गलं त्रिसन्ध्यं कीर्तयति वा स ब्रह्महत्यां व्यपोहति । सुवर्णस्तेय्यस्तेयी भवति । गुरुदाराभिगाम्यगामी भवति । सर्वेभ्यः पातकेभ्य उपपातकेभ्यश्च सद्यो विमुक्तो भवति । सकृज्जप्तेनानेन गायत्र्याः षष्टिसहस्राणि फलितानि भवन्ति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा ब्रह्मलोकमवाप्नोति । विश्वनाथाष्टकस्तोत्रम् Vishwanathashtakstotram  

मृत्युलाङ्गूलोपनिषत् Mrityulangulopanishat Read More »