राम

श्रीरामभद्रमङ्गलाशासनम् Srirambhadramangalashasanam

श्रीरामभद्र मंगलाशासनं एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान राम के भक्त श्रीरामभद्राचार्य की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 14वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास ने लिखा था। श्रीरामभद्र मंगलाशासनं के 8 श्लोक निम्नलिखित हैं: श्लोक 1: जय जय श्रीरामभद्र ! रामभक्तिविरुद्धदोष निवारक ! श्रीरामचरितमानस प्रणेता ! सर्व भक्तजनों के नाथ ! अर्थ: जय हो, जय हो, श्रीरामभद्र ! जो रामभक्ति के विरुद्ध दोषों को दूर करते हैं ! श्रीरामचरितमानस के प्रणेता ! सभी भक्तजनों के नाथ ! श्लोक 2: आपका जन्म अयोध्या में हुआ था, आपके पिता का नाम लक्ष्मणदास था, आपकी माता का नाम चम्पा देवी था, आपने रामभक्ति का प्रचार किया। अर्थ: आपका जन्म अयोध्या में हुआ था, आपके पिता का नाम लक्ष्मणदास था, आपकी माता का नाम चम्पा देवी था, आपने रामभक्ति का प्रचार किया। श्लोक 3: आपने रामभक्ति के प्रचार के लिए, अनेक ग्रंथों की रचना की, जिसमें श्रीरामचरितमानस सबसे प्रसिद्ध है, जो रामभक्ति का एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। अर्थ: आपने रामभक्ति के प्रचार के लिए, अनेक ग्रंथों की रचना की, जिसमें श्रीरामचरितमानस सबसे प्रसिद्ध है, जो रामभक्ति का एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। श्लोक 4: आपके दर्शन से, भक्तों के सभी दुख दूर हो जाते हैं, आपके आशीर्वाद से, भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अर्थ: आपके दर्शन से, भक्तों के सभी दुख दूर हो जाते हैं, आपके आशीर्वाद से, भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्लोक 5: आपकी कृपा से, भक्तों का जीवन सफल होता है, आपकी कृपा से, भक्तों को सभी सुख प्राप्त होते हैं। अर्थ: आपकी कृपा से, भक्तों का जीवन सफल होता है, आपकी कृपा से, भक्तों को सभी सुख प्राप्त होते हैं। श्लोक 6: आपकी स्तुति करने से, भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, आपकी स्तुति करने से, भक्तों के सभी पाप दूर हो जाते हैं। अर्थ: आपकी स्तुति करने से, भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, आपकी स्तुति करने से, भक्तों के सभी पाप दूर हो जाते हैं। श्लोक 7: हे श्रीरामभद्र ! आप हमारे गुरु हैं, आप हमारे आराध्य हैं, आपकी कृपा से, हमारा जीवन सफल हो। अर्थ: हे श्रीरामभद्र ! आप हमारे गुरु हैं, आप हमारे आराध्य हैं, आपकी कृपा से, हमारा जीवन सफल हो। श्लोक 8: जय जय श्रीरामभद्र ! जय जय श्रीरामभद्र ! जय जय श्रीरामभद्र ! अर्थ: जय हो, जय हो, श्रीरामभद्र ! जय हो, जय हो, श्रीरामभद्र ! **

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श्रीरामप्रातःस्मरणम् श्रीरामपञ्चकम् Shriramprathasmaranam Shrirampanchakam

श्रीराम प्रातः स्मरणम् और श्रीराम पंचकम् श्रीराम प्रातः स्मरणम् एक श्लोक है जो भगवान राम के चरण कमलों की पूजा करता है। यह श्लोक भगवान राम के चरणों की महिमा का वर्णन करता है। श्रीराम पंचकम् एक पाँच श्लोकों का स्तोत्र है जो भगवान राम की स्तुति करता है। यह स्तोत्र भगवान राम के विभिन्न पहलुओं की स्तुति करता है, जैसे कि उनके नाम, गुण, और कर्म। श्रीराम प्रातः स्मरणम् और श्रीराम पंचकम् दोनों ही भगवान राम की भक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन स्तोत्रों का पाठ करने से भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं। श्रीराम प्रातः स्मरणम् का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले, एक स्वच्छ स्थान पर बैठें और अपने सामने एक चित्र या मूर्ति रखें। फिर, अपने हाथों को जोड़कर भगवान राम को प्रणाम करें। अब, इस श्लोक का पाठ करें। अंत में, भगवान राम से अपने जीवन में सुख और शांति प्रदान करने की प्रार्थना करें। श्रीराम पंचकम् का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले, एक स्वच्छ स्थान पर बैठें और अपने सामने एक चित्र या मूर्ति रखें। फिर, अपने हाथों को जोड़कर भगवान राम को प्रणाम करें। अब, इन पाँच श्लोकों का पाठ करें। अंत में, भगवान राम से अपने जीवन में सुख और शांति प्रदान करने की प्रार्थना करें। आप इन स्तोत्रों का पाठ प्रतिदिन सुबह उठकर कर सकते हैं। श्रीराम प्रातः स्मरणम्: प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः। यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्यः ॥ अर्थ: मैं प्रातःकाल भगवान राम के चरण कमलों की पूजा करता हूँ, जो राक्षसों के लिए भयंकर और अपने भक्तों के लिए वर देने वाले हैं। जो चरण कमल अयोध्या के राजसभा में विभाजित होकर शिव के धनुष को तोड़ने वाले हैं, वे आज भी सीता के हाथ को ग्रहण करने के लिए मंगलकारी हैं। श्रीराम पंचकम्: 1. श्रीराम रामेति रघुपति रामेति सकल दुःख हरे रामेति जग में प्रसिद्ध रामेति सब सुख करौ रामेति 2. सीतापति रामेति भक्तन के नाथ रामेति दयानिधान रामेति सर्व रोग हरे रामेति 3. जानकी वल्लभ रामेति वनवासी रामेति कमल नयन रामेति अद्भुत रूप रामेति 4. शरीर श्याम रामेति मुख चंद्र रामेति नारद उवाच रामेति सर्व मनोरथ रामेति 5. लक्ष्मण सहित रामेति शेष सहित रामेति गरुड सहित रामेति सर्व सिद्धि रामेति अर्थ: 1. राम, राम, रघुपति राम, राम, सभी दुख हरते हैं राम, राम, जग में प्रसिद्ध हैं राम, राम, सब सुख करते हैं राम, राम। 2. सीता के पति राम, भक्तों के नाथ राम, दया के भंडार राम, सभी रोग हरते हैं राम। 3. सीता के प्रिय राम, वनवासी राम, कमल के समान नेत्रों वाले राम, अद्भुत रूप वाले राम। 4. श्याम वर्ण वाले राम, चंद्रमा के समान मुख वाले राम, नारद कहते हैं कि राम, सभी मनोरथों को पूर्ण करते हैं राम। 5. लक्ष्मण सहित राम, शेष नाग सहित राम, गरुड़ सहित राम, सभी सिद्धियों को देने वाले राम।

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श्रीरामप्रातःस्मरणम् Shri Ram Pratah Smaranam

श्रीराम प्रातः स्मरणम् प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्यः। यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सद्यः ॥ अर्थ: मैं प्रातःकाल भगवान राम के चरण कमलों की पूजा करता हूँ, जो राक्षसों के लिए भयंकर और अपने भक्तों के लिए वर देने वाले हैं। जो चरण कमल अयोध्या के राजसभा में विभाजित होकर शिव के धनुष को तोड़ने वाले हैं, वे आज भी सीता के हाथ को ग्रहण करने के लिए मंगलकारी हैं। इस श्लोक में, भक्त भगवान राम के चरणों की पूजा करते हैं और उनकी महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान राम के चरण कमल राक्षसों के लिए भयंकर हैं, लेकिन उनके भक्तों के लिए वर देने वाले हैं। वे कहते हैं कि भगवान राम के चरण कमल अयोध्या के राजसभा में विभाजित होकर शिव के धनुष को तोड़ने वाले थे, और वे आज भी सीता के हाथ को ग्रहण करने के लिए मंगलकारी हैं। श्रीराम प्रातः स्मरणम् एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं।** इस स्तोत्र का पाठ करने का तरीका निम्नलिखित है: सबसे पहले, एक स्वच्छ स्थान पर बैठें और अपने सामने एक चित्र या मूर्ति रखें। फिर, अपने हाथों को जोड़कर भगवान राम को प्रणाम करें। अब, इस श्लोक का पाठ करें। अंत में, भगवान राम से अपने जीवन में सुख और शांति प्रदान करने की प्रार्थना करें। आप इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह उठकर कर सकते हैं।

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श्रीरामपादुकास्तोत्रम् Srirampadukastotram

श्रीरामपादुकस्तोत्रम् अनन्तसंसारसमुद्रतार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ कवित्ववाराशिनिशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावांबुदमालिकाभ्यां दूरिकृतानम्र विपत्तिभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिद्पि दरिद्रवर्याः मूकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ नालीकनीकाशदाहृताभ्यां नानाविमोहादिनिवारिकाभ्यां नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ नृपालिमौलिब्रज रत्नकंति सरिद्विराज्जषकन्यकाभ्यां नृपत्वदाभ्यां नतलोकपंक्तेः नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ पापांधकारार्कपरंपराभ्यां तापत्रयाहीन्द्र खगेश्वराभ्यां जाड्याब्धिसंशोषणवाड्वाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ शमादिषट्कमप्रदवैभवाभ्यां समाधिदानव्रतदीक्षिताभ्यां रमाधवाङ्घ्रि स्थिरभक्तिदाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ स्वार्चापराणामखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्ष धुरंधराभ्यां स्वन्तच्छ भावप्रदपूजनाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ कामादि सर्पव्रजगारुडाभ्यां विवेकवैराग्य निधिप्रदाभ्यां बोधप्रदाभ्यां दृढ मोक्षदाभ्यां नमस्ते श्रीगुरुपादुकाभ्यां॥ अर्थ: हे श्रीराम के चरणों के जूते! आप अनंत संसार-सागर के पार ले जाने वाले नौकापालक हैं, आप गुरु-भक्ति के दाता हैं। आप कविता के बादल हैं, आप दुर्भाग्य के दामन हैं, आप अमर विपत्तियों को दूर करने वाले हैं। जो लोग आपके चरणों में नत हैं, वे भी श्रीपति के समान हैं, जो लोग आपके चरणों में नत हैं, वे भी मूक वाचस्पति के समान हैं। आप नली के समान कान के पास हैं, आप अनेक विकारों को दूर करने वाले हैं, आप सभी के अभीष्टों को पूरा करने वाले हैं। आप अयोध्या के राजा के माथे की मणि हैं, आप तापों को हरने वाले हैं, आप जड़ता के सागर को सूखाने वाले हैं। आप शांतिदायक हैं, आप समाधि प्रदान करने वाले हैं, आप रमाधव के चरणों में स्थिर भक्ति प्रदान करने वाले हैं। आप सभी की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, आप सभी के प्रिय हैं, आप सभी को रक्षा प्रदान करने वाले हैं। हे श्रीराम के चरणों के जूते! आप काम आदि सर्पों को मारने वाले हैं, आप विवेक और वैराग्य के भंडार हैं, आप ज्ञान और बोध प्रदान करने वाले हैं। आप दृढ मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, आप सभी के लिए आशीर्वाद हैं। श्रीरामपादुकस्तोत्रम् एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं। इस स्तोत्र की रचना 14वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास ने की थी। श्रीरामपादुकस्तोत्रम् के अर्थ का निम्नलिखित रूप से भी वर्णन किया जा सकता है: हे श्रीराम के चरणों के जूते! **आप अनंत संसार-सागर में भटक रहे लोगों को पार ले जाने वाले न

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श्रीरामनामस्तुतिः Shree Ramnamstuthi:

श्री रामनाम स्तुति जय राम जय राम जय राम, राम नाम सब सुखों का दाता। जो कोई भी राम नाम जपता है, उसके सभी दुख दूर होते हैं। राम नाम अमृत है, राम नाम सत्य है। राम नाम का जाप करने से, जीवन सफल होता है। राम नाम सार है, राम नाम आधार है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सुख आता है। राम नाम आराध्य है, राम नाम सर्वप्रिय है। राम नाम का स्मरण करने से, जीवन में शांति मिलती है। राम नाम शक्ति है, राम नाम प्रकाश है। राम नाम का गुणगान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। राम नाम भक्ति है, राम नाम मोक्ष है। राम नाम का आश्रय लेने से, जीवन में मुक्ति मिलती है। राम नाम वेद है, राम नाम पुराण है। राम नाम का अध्ययन करने से, जीवन में ज्ञान मिलता है। राम नाम मंत्र है, राम नाम साधना है। राम नाम का जाप करने से, जीवन में समृद्धि मिलती है। राम नाम भजन है, राम नाम प्रेम है। राम नाम का चिंतन करने से, जीवन में आनंद मिलता है। राम नाम जीवन है, राम नाम सत्य है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। अर्थ: इस स्तोत्र में भगवान राम के नाम की महिमा का वर्णन किया गया है। राम नाम सब सुखों का दाता है। जो कोई भी राम नाम जपता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। राम नाम अमृत है, राम नाम सत्य है। राम नाम का जाप करने से, जीवन सफल होता है। राम नाम सार है, राम नाम आधार है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सुख आता है। राम नाम आराध्य है, राम नाम सर्वप्रिय है। राम नाम का स्मरण करने से, जीवन में शांति मिलती है। राम नाम शक्ति है, राम नाम प्रकाश है। राम नाम का गुणगान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। राम नाम भक्ति है, राम नाम मोक्ष है। राम नाम का आश्रय लेने से, जीवन में मुक्ति मिलती है। राम नाम वेद है, राम नाम पुराण है। राम नाम का अध्ययन करने से, जीवन में ज्ञान मिलता है। राम नाम मंत्र है, राम नाम साधना है। राम नाम का जाप करने से, जीवन में समृद्धि मिलती है। राम नाम भजन है, राम नाम प्रेम है। राम नाम का चिंतन करने से, जीवन में आनंद मिलता है। राम नाम जीवन है, राम नाम सत्य है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं।

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श्रीरामनामदशश्लोकी Shriramnamdasashloki

श्रीरामनामदासशलोकी एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान राम के नामों की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान राम के एक अलग नाम की स्तुति की जाती है। श्रीरामनामदासशलोकी की रचना 17वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास के शिष्य, श्रीरामदास ने की थी। यह स्तोत्र तुलसीदास की रचनाओं में से एक है, और यह भगवान राम के नामों की स्तुति करने के लिए एक लोकप्रिय स्तोत्र है। श्रीरामनामदासशलोकी के 10 श्लोक निम्नलिखित हैं: श्लोक 1: राम नाम दास की स्तुति है, राम नाम सब सुखों का दाता है। जो कोई भी राम नाम जपता है, उसके सभी दुख दूर होते हैं। श्लोक 2: राम नाम अमृत है, राम नाम सत्य है। राम नाम का जाप करने से, जीवन सफल होता है। श्लोक 3: राम नाम सार है, राम नाम आधार है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सुख आता है। श्लोक 4: राम नाम आराध्य है, राम नाम सर्वप्रिय है। राम नाम का स्मरण करने से, जीवन में शांति मिलती है। श्लोक 5: राम नाम शक्ति है, राम नाम प्रकाश है। राम नाम का गुणगान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। श्लोक 6: राम नाम भक्ति है, राम नाम मोक्ष है। राम नाम का आश्रय लेने से, जीवन में मुक्ति मिलती है। श्लोक 7: राम नाम वेद है, राम नाम पुराण है। राम नाम का अध्ययन करने से, जीवन में ज्ञान मिलता है। श्लोक 8: राम नाम मंत्र है, राम नाम साधना है। राम नाम का जाप करने से, जीवन में समृद्धि मिलती है। श्लोक 9: राम नाम भजन है, राम नाम प्रेम है। राम नाम का चिंतन करने से, जीवन में आनंद मिलता है। श्लोक 10: राम नाम जीवन है, राम नाम सत्य है। राम नाम का ध्यान करने से, जीवन में सफलता मिलती है। श्रीरामनामदासशलोकी एक बहुत ही सरल और सुंदर स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान राम के नामों की महिमा को दर्शाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं।

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श्रीरामनवावरणस्तोत्रम् Sriramanavavaranastotram

श्रीरामनववर्णस्तोत्रम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान राम की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 9 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान राम के एक अलग पहलू की स्तुति की जाती है। श्रीरामनववर्णस्तोत्रम की रचना 14वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास ने की थी। यह स्तोत्र रामचरितमानस के बाद तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। श्रीरामनववर्णस्तोत्रम का पाठ करने से भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाता है। श्रीरामनववर्णस्तोत्रम के 9 श्लोक निम्नलिखित हैं: श्लोक 1: राम रामेति रघुपति रामेति सकल दुःख हरे रामेति जग में प्रसिद्ध रामेति सब सुख करौ रामेति अर्थ: राम, राम, रघुपति राम, राम, सभी दुख हरते हैं राम, राम, जग में प्रसिद्ध हैं राम, राम, सब सुख करते हैं राम, राम। श्लोक 2: सीतापति रामेति भक्तन के नाथ रामेति दयानिधान रामेति सर्व रोग हरे रामेति अर्थ: सीता के पति राम, भक्तों के नाथ राम, दया के भंडार राम, सभी रोग हरते हैं राम। श्लोक 3: जानकी वल्लभ रामेति वनवासी रामेति कमल नयन रामेति अद्भुत रूप रामेति अर्थ: सीता के प्रिय राम, वनवासी राम, कमल के समान नेत्रों वाले राम, अद्भुत रूप वाले राम। श्लोक 4: शरीर श्याम रामेति मुख चंद्र रामेति नारद उवाच रामेति सर्व मनोरथ रामेति अर्थ: श्यामवर्ण शरीर वाले राम, चंद्रमा के समान मुख वाले राम, नारद कहते हैं कि राम, सभी मनोरथों को पूर्ण करते हैं राम। श्लोक 5: लक्ष्मण सहित रामेति शेष सहित रामेति गरुड सहित रामेति सर्व सिद्धि रामेति अर्थ: लक्ष्मण सहित राम, शेषनाग सहित राम, गरुड़ सहित राम, सभी सिद्धियों को देने वाले राम। श्लोक 6: अग्नि परीक्षा रामेति रावण वध रामेति सीता दर्शन रामेति सुखदायक रामेति अर्थ: अग्नि परीक्षा में सफल राम, रावण का वध करने वाले राम, सीता के दर्शन देने वाले राम, सुख देने वाले राम। श्लोक 7: जन्म के समय रामेति अयोध्या के राजा रामेति सब सुखकारी रामेति भक्तन के प्यारे रामेति अर्थ: जन्म के समय राम, अयोध्या के राजा राम, सब सुखों को देने वाले राम, भक्तों के प्यारे राम। श्लोक 8: कलयुग के नाथ रामेति भक्तन के साथ रामेति सदा सर्वदा रामेति सर्व सुख दाता रामेति अर्थ: कलयुग के नाथ राम, भक्तों के साथ रहने वाले राम, सदा सर्वदा राम, सभी सुखों को देने वाले राम। श्लोक 9: जय श्रीराम जय श्रीराम जय श्रीराम अर्थ: जय श्रीराम, जय श्रीराम, जय श्रीराम।

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श्रीरामद्वादशनामस्तोत्रम् Shriramdvadashnamstotram

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में भगवान राम के जन्म के बाद नारद और देवताओं ने उनकी स्तुति करते हुए एक स्तोत्र गाया था, जिसे श्रीरामद्वादशनामस्तोत्रम कहा जाता है। इस स्तोत्र में भगवान राम के 12 नामों की स्तुति की गई है। राम, रघुपति, राघव, राजीवलोचन, श्रीराम, जानकीवल्लभ, दशरथात्मज। सीताराम, लक्ष्मणानुज, जगदीश, वैदेहीनाथ, जगन्नाथ, श्रीरामचंद्र। इस स्तोत्र में भगवान राम के 12 नामों का अर्थ निम्नलिखित है: राम: जिसके मन में शांति हो। रघुपति: रघुवंश के राजा। राघव: रघुवंश के वंशज। राजीवलोचन: कमल के समान सुंदर आंखों वाले। श्रीराम: समृद्धि और सौभाग्य के दाता राम। जानकीवल्लभ: सीता के पति राम। दशरथात्मज: दशरथ के पुत्र राम। सीताराम: सीता के साथ राम। लक्ष्मणानुज: लक्ष्मण के भाई राम। जगदीश: संसार के स्वामी राम। वैदेहीनाथ: सीता के पति राम। जगन्नाथ: संसार के नाथ राम। श्रीरामचंद्र: सुंदर चंद्रमा के समान राम। श्रीरामद्वादशनामस्तोत्रम एक बहुत ही शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार की विपत्तियों से मुक्ति मिलती है।

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श्रीरामजानकीस्तुतिः Shreeraamajaanakeestutih

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में भगवान राम के जन्म के बाद ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें स्तुति करते हुए कहा था: सुखमय, मंगलमय, मंगलकारी, जय श्रीराम, जय श्रीराम, जय श्रीराम। तुम हो ज्ञान के सागर, तुम हो नीति के आधार, तुम हो करुणा के सागर, तुम हो धर्म के आधार। तुम हो त्रेता के अवतार, तुम हो मर्यादा पुरुषोत्तम, तुम हो राम, तुम हो राम, तुम हो रामचंद्र। तुम हो लक्ष्मण के भाई, तुम हो सीता के पति, तुम हो अयोध्या के राजा, तुम हो अखिल सृष्टि के स्वामी। तुम हो सबके आराध्य, तुम हो सबके प्रिय, तुम हो सबके रक्षक, तुम हो सबके उद्धारक। श्रीराम, जय श्रीराम, जय श्रीराम, सुखमय, मंगलमय, मंगलकारी। इस स्तुति में, ऋषि वशिष्ठ ने भगवान राम के सभी गुणों की प्रशंसा की है। उन्होंने उन्हें ज्ञान, नीति, करुणा, धर्म, और मर्यादा के सागर बताया है। उन्होंने उन्हें त्रेता के अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम, राम, और रामचंद्र के नाम से भी संबोधित किया है। उन्होंने बताया है कि भगवान राम लक्ष्मण के भाई, सीता के पति, अयोध्या के राजा, और अखिल सृष्टि के स्वामी हैं। उन्होंने कहा है कि भगवान राम सभी के आराध्य, सभी के प्रिय, और सभी के रक्षक और उद्धारक हैं। श्रीरामचरितमानस में, भगवान राम को एक आदर्श पुरुष और एक आदर्श राजा के रूप में चित्रित किया गया है। वे सभी गुणों के सागर हैं, और वे सभी के लिए एक प्रेरणा हैं।

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श्रीरामचालीसा Sri Ram Chalisa

श्री रघुबीर भक्त हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥ निशि दिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥ जय जय जय रघुनाथ कृपाला । सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥ तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥ तुम अनाथ के नाथ गोसाईं । दीनन के हो सदा सहाई ॥ ब्रह्मादिक तव पार न पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥ गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ॥ राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥ शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ॥ फूल समान रहत सो भारा । पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥ भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुँ न रण में हारो ॥ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥ लषन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ॥ ताते रण जीते नहिं कोई । युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥ महा लक्श्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ॥ सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥ घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ॥ सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥ सिद्धि अठारह मंगल कारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ॥ औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥ इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ॥ जो तुम्हरे चरनन चित लावै । ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥ सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल-पूज्य प्रचारे ॥ तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥ जो कुछ हो सो तुमहीं राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ रामा आत्मा पोषण हारे । जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा । निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥ सत्य सत्य जय सत्य-ब्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥ सत्य-भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ॥ सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥ ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा । नमो नमो जय जापति भूपा ॥ धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ॥ सत्य शुद्ध देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥ सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥ याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिव मेरा ॥ और आस मन में जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥ साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्धता पावै ॥ अन्त समय रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥ श्री हरि दास कहै अरु गावै । सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥ दोहा सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय । हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥ राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय । जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ॥

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श्रीरामचन्द्राष्टकम् Sriramchandrashtakam

श्रीरामचंद्रष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान राम की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान राम के एक अलग पहलू की स्तुति की जाती है। श्रीरामचंद्रष्टकम की रचना 14वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास ने की थी। यह स्तोत्र रामचरितमानस के बाद तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने से भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाता है। श्रीरामचंद्रष्टकम के कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं: यह स्तोत्र भगवान राम को सर्वोच्च देवता के रूप में स्थापित करता है। यह स्तोत्र भगवान राम के सभी गुणों की प्रशंसा करता है, जैसे कि उनका करुणा, दया, और न्याय। यह स्तोत्र भगवान राम की भक्तों पर कृपा करने की प्रार्थना करता है। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने के लिए, भक्त को एक शांत और पवित्र स्थान पर बैठना चाहिए। फिर, भक्त को भगवान राम को प्रणाम करना चाहिए और उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके बाद, भक्त को स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: यह भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। यह भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाता है। यह भक्तों को शांति और सुख प्रदान करता है। श्रीरामचंद्रष्टकम एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद कर सकता है। श्रीरामचंद्रष्टकम के 8 श्लोक निम्नलिखित हैं: श्लोक 1: सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं सीताकलत्रं नवमेघगात्रम् । कारुण्यपात्रं शतपत्रनेत्रं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो सुग्रीव के मित्र, परम पवित्र, सीता के पति, नवमेघ के समान श्यामवर्ण, और करुणा के सागर हैं। उनके शत-पत्र रूपी नेत्र सभी जीवों पर दया करते हैं। श्लोक 2: संसारसारं निगमप्रचारं धर्मावतारं हृतभूमिभारम् । सदाऽविकारं सुखसिन्धुसारं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो संसार के सार, वेद-प्रचारक, धर्मावतार, और धरती के भार को हटाने वाले हैं। वे सदा अविचल हैं और सुख के सागर के समान हैं। श्लोक 3: लक्ष्मीविलासं जगतां निवासं लङ्काविनाशं भुवनप्रकाशम् । भूदेववासं शरदिन्दुहासं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो लक्ष्मी के विलास हैं, जगतों के निवास हैं, लङ्का के विनाशकर्ता हैं, और भुवन के प्रकाश हैं। वे भूदेवों के निवास हैं और शरद के चंद्रमा के समान हैं। श्लोक 4: मन्दारमालं वचने रसालं गुणैर्विशालं हतसप्ततालम् । क्रव्यादकालं सुरलोकपालं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जिनके मस्तक पर मन्दारमाला है, जिनके वचनों में रस है, जिनके गुणों की कोई सीमा नहीं है, और जिन्होंने रावण को सात तालों में मा

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श्रीरामचन्द्राष्टकम् Sriramchandrashtakam

श्रीरामचंद्रष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान राम की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान राम के एक अलग पहलू की स्तुति की जाती है। श्रीरामचंद्रष्टकम की रचना 14वीं शताब्दी के संत और कवि तुलसीदास ने की थी। यह स्तोत्र रामचरितमानस के बाद तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने से भगवान राम की कृपा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाता है। श्रीरामचंद्रष्टकम के कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं: यह स्तोत्र भगवान राम को सर्वोच्च देवता के रूप में स्थापित करता है। यह स्तोत्र भगवान राम के सभी गुणों की प्रशंसा करता है, जैसे कि उनका करुणा, दया, और न्याय। यह स्तोत्र भगवान राम की भक्तों पर कृपा करने की प्रार्थना करता है। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने के लिए, भक्त को एक शांत और पवित्र स्थान पर बैठना चाहिए। फिर, भक्त को भगवान राम को प्रणाम करना चाहिए और उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके बाद, भक्त को स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्रीरामचंद्रष्टकम का पाठ करने के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: यह भक्तों को भगवान राम की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। यह भक्तों को सभी प्रकार की विपत्तियों से बचाता है। यह भक्तों को शांति और सुख प्रदान करता है। श्रीरामचंद्रष्टकम एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद कर सकता है। श्रीरामचंद्रष्टकम के 8 श्लोक निम्नलिखित हैं: श्लोक 1: सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं सीताकलत्रं नवमेघगात्रम् । कारुण्यपात्रं शतपत्रनेत्रं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो सुग्रीव के मित्र, परम पवित्र, सीता के पति, नवमेघ के समान श्यामवर्ण, और करुणा के सागर हैं। उनके शत-पत्र रूपी नेत्र सभी जीवों पर दया करते हैं। श्लोक 2: संसारसारं निगमप्रचारं धर्मावतारं हृतभूमिभारम् । सदाऽविकारं सुखसिन्धुसारं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो संसार के सार, वेद-प्रचारक, धर्मावतार, और धरती के भार को हटाने वाले हैं। वे सदा अविचल हैं और सुख के सागर के समान हैं। श्लोक 3: लक्ष्मीविलासं जगतां निवासं लङ्काविनाशं भुवनप्रकाशम् । भूदेववासं शरदिन्दुहासं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जो लक्ष्मी के विलास हैं, जगतों के निवास हैं, लङ्का के विनाशकर्ता हैं, और भुवन के प्रकाश हैं। वे भूदेवों के निवास हैं और शरद के चंद्रमा के समान हैं। श्लोक 4: मन्दारमालं वचने रसालं गुणैर्विशालं हतसप्ततालम् । क्रव्यादकालं सुरलोकपालं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥ अर्थ: मैं श्रीरामचन्द्र को नमस्कार करता हूँ, जिनके मस्तक पर मन्दारमाला है, जिनके वचनों में रस है, जिनके गुणों की कोई सीमा नहीं है, और जिन्होंने रावण को सात तालों में मारा था। वे क्रव्यादकाल के भीतर ही स्वर्ग के अधिपति हैं।

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