अघनाशकगायत्रीस्तोत्रम् Aghanashak Gayatri Stotram
अघनाशक गायत्री स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक अर्थ और महत्व को समझने में मदद करता है। यह स्तोत्र गायत्री मंत्र के प्रत्येक अक्षर का वर्णन करता है और यह भी बताता है कि गायत्री मंत्र कैसे मनुष्य को आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर ले जा सकता है। अघनाशक गायत्री स्तोत्र का पाठ इस प्रकार है: श्लोक 1 भक्तानुकम्पिन्सर्वज्ञ हृदयं पापनाशनम् । गायत्र्याः कथितं तस्माद्गायत्र्याः स्तोत्रमीरय ॥ १॥ अर्थ हे नारद! गायत्री मंत्र सभी पापों को नष्ट करने वाला है। यह सभी ज्ञानियों द्वारा बताया गया है, इसलिए मैं आपको गायत्री स्तोत्र सुनाता हूं। श्लोक 2 आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि । सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसन्ध्ये ते नमोऽस्तु ते ॥ २॥ अर्थ हे आदिशक्ति! हे जगन्माता! हे भक्तों पर कृपा करने वाली! हे सर्वव्यापी! हे अनंत! हे श्रीसन्ध्ये! आपको मेरा नमस्कार है। श्लोक 3 त्वमेव सन्ध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती । ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा । अर्थ आप ही सन्ध्या हैं, गायत्री हैं, सावित्री हैं, और सरस्वती हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, और शिव की शक्ति हैं। आप लाल, सफेद, और पीली हैं। श्लोक 4 प्रातर्बालका च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः । ब्रह्मा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा । अर्थ आप सुबह एक छोटी बच्ची हैं, दोपहर में एक युवा महिला हैं, और शाम को एक बूढ़ी महिला हैं। ब्रह्माजी आपको शाम को ध्यान करते हैं। श्लोक 5 वृद्धा सायं हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहिनी । ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः । अर्थ आप शाम को एक बूढ़ी महिला हैं, जो एक हंस पर सवार हैं, एक गरुड़ पर सवार हैं, या एक बैल पर सवार हैं। आप ऋग्वेद का अध्ययन करने वाली हैं, और आप तपस्वियों द्वारा पृथ्वी पर देखी जाती हैं। श्लोक 6 यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते । सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि । अर्थ आप यजुर्वेद का अध्ययन करती हैं, और आकाश में विराजमान हैं। आप सामवेद का भी गायन करती हैं, और सभी लोकों में भ्रमण करती हैं। श्लोक 7 रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी । अर्थ आप रुद्रलोक में गई हैं, लेकिन आप विष्णुलोक में भी निवास करती हैं। आप ब्रह्मलोक में भी हैं, और आप अमर लोगों पर कृपा करती हैं। श्लोक 8 सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा । शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा । अर्थ आप सप्तर्षियों को प्रसन्न करने वाली हैं, और आप बहुत वरदान देती हैं। आप शिव के करों से निकली हुई हैं, और आप अश्रु और पसीने से बनी हैं। श्लोक 9 आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते । वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरवर्णिनी । अर्थ आप आनंद की जननी हैं, और दुर्गा के रूप में दस बार पढ़ी
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