स्तोत्र

पाशुपतास्त्रस्तोत्रं Pashupatastrastotram

Pashupatastrastotram पशुपतास्त्रस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के पशुपतास्त्र रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 12 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक में 12 पद हैं। प्रत्येक पद में, स्तोत्रकार भगवान शिव के पशुपतास्त्र रूप की एक विशेषता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, स्तोत्रकार भगवान शिव के पशुपतास्त्र को सर्वशक्तिमान कहते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव का पशुपतास्त्र सभी प्रकार की शक्तियों से संपन्न है। दूसरे श्लोक में, वे भगवान शिव के पशुपतास्त्र को सर्वव्यापी कहते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव का पशुपतास्त्र सर्वत्र व्याप्त है। स्तोत्र के अंत में, स्तोत्रकार कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद: श्लोक 1 स्तोत्रकार कहते हैं, “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वशक्तिमान है। यह सभी प्रकार की शक्तियों से संपन्न है। यह सभी प्रकार के दुखों और कष्टों को दूर करने वाला है।” Pashupatastrastotram श्लोक 2 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वव्यापी है। यह सर्वत्र व्याप्त है। यह सभी प्राणियों के हृदयों में निवास करता है।” श्लोक 3 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वज्ञ है। यह सब कुछ जानता है। यह सभी प्राणियों के मन को जानता है।” श्लोक 4 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वकल्याणकारी है। यह सभी प्रकार की सुखों का प्रदान करने वाला है। यह सभी प्राणियों के कष्टों को दूर करने वाला है।” श्लोक 5 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वरक्षक है। यह सभी प्राणियों की रक्षा करने वाला है। यह सभी प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाला है।” श्लोक 6 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वशत्रुविनाशक है। यह सभी दुष्टों का नाश करने वाला है। यह सभी प्राणियों को सुख और समृद्धि प्रदान करने वाला है।” श्लोक 7 “हे शिव, तुम्हारा पशुपतास्त्र सर्वसिद्धिप्रद है। यह सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। यह सभी प्राणियों को मुक्ति प्रदान करने वाला है।” श्लोक 8 “हे शिव, जो कोई भी तुम्हारे पशुपतास्त्र की पूजा करता है, उसे तुम्हारी कृपा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है और उसे सभी प्रकार की सुख और मंगल प्राप्त होते हैं।” कुछ विशेष टिप्पणियां: पशुपतास्त्रस्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान शिव के पशुपतास्त्र रूप की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है। स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त हो सकती है। पशुपतास्त्र एक शक्तिशाली अस्त्र है जिसे भगवान शिव ने स्वयं बनाया था। यह अस्त्र सभी प्रकार के दुखों और कष्टों को दूर करने वाला है। यह सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। यह सभी प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाला है। बाणप्रार्थित गाणपत्यत्वप्राप्तिवर्णनम् Baanprarthit gaanpatyatvapraptivarannam

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ब्रह्मकृतं शिवस्तोत्रम् Brahmakritam Shivastotram

Brahmakritam Shivastotram ब्रह्मकृता शिवस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र ब्रह्मा द्वारा रचित है। स्तोत्र के 12 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में 12 पद हैं। प्रत्येक पद में, ब्रह्मा भगवान शिव की एक विशेषता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, ब्रह्मा भगवान शिव को सृष्टि के रचयिता के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव ने सृष्टि की रचना की है। दूसरे श्लोक में, वे भगवान शिव को संहारक के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव सृष्टि का संहार भी करते हैं। स्तोत्र के अंत में, ब्रह्मा कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद: श्लोक 1 ब्रह्मा ने कहा, “हे शिव, तुम ही सृष्टि के रचयिता हो। तुमने सृष्टि की रचना की है। तुम ही ब्रह्मांड के स्वामी हो।” श्लोक 2 “हे शिव, तुम ही संहारक हो। तुमने सृष्टि का संहार भी किया है। तुम ही सभी प्राणियों के पिता हो।” श्लोक 3 “हे शिव, तुम ही पालनहार हो। तुमने सृष्टि का पालन भी किया है। तुम ही सभी प्राणियों के रक्षक हो।” श्लोक 4 “हे शिव, तुम ही सर्वशक्तिमान हो। तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम ही सभी प्राणियों के स्वामी हो।” श्लोक 5 “हे शिव, तुम ही सर्वज्ञ हो। तुम सब कुछ जानते हो। तुम ही सभी प्राणियों के ज्ञान के दाता हो।” श्लोक 6 Brahmakritam Shivastotram “हे शिव, तुम ही सर्वव्यापी हो। तुम सर्वत्र व्याप्त हो। तुम ही सभी प्राणियों के हृदयों में निवास करते हो।” श्लोक 7 “हे शिव, तुम ही सर्वकल्याणकारी हो। तुम सभी प्रकार की सुखों का प्रदान करने वाले हो। तुम ही सभी प्राणियों के कष्टों को दूर करने वाले हो।” श्लोक 8 “हे शिव, तुम ही सर्वरक्षक हो। तुम सभी प्राणियों की रक्षा करने वाले हो। तुम ही सभी प्राणियों के मार्गदर्शक हो।” श्लोक 9 “हे शिव, तुम ही सर्वपापनाशक हो। तुम सभी पापों का नाश करने वाले हो। तुम ही सभी प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हो।” श्लोक 10 “हे शिव, तुम ही सर्वमंगलप्रद हो। तुम सभी प्रकार की मंगलों का प्रदान करने वाले हो। तुम ही सभी प्राणियों के सुख और समृद्धि के दाता हो।” श्लोक 11 “हे शिव, जो कोई भी तुम्हारी भक्ति करता है, उसे सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वह सभी प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है और उसे सभी प्रकार की सुख और मंगल प्राप्त होते हैं।” श्लोक 12 “हे शिव, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम मुझे अपनी कृपा प्रदान करो।” कुछ विशेष टिप्पणियां: ब्रह्मकृता शिवस्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान शिव की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है। स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त हो सकती है। ब्रह्माद्याकृता शिवस्तुतिरेवं शिवप्रोक्तं पुष्करेश्वरमहिमवर्णनम् Brahmadyakrita Shivastutirevan Shivaproktam Pushkareshwarmahimavarnanam

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मुनिभिः कृतं रुद्रस्तोत्रम् Munibhih Kritam Rudrastotram

Munibhih Kritam Rudrastotram मुनिभिः कृतं रुद्रस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के रुद्र रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र ऋषियों और मुनियों द्वारा रचित है। स्तोत्र के 12 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में 12 पद हैं। प्रत्येक पद में, ऋषियों और मुनियों भगवान शिव के रुद्र रूप की एक विशेषता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, ऋषियों और मुनियों भगवान शिव को रुद्र, यानी “उग्र” के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव उग्र रूप में सभी दुखों और कष्टों का नाश करते हैं। दूसरे श्लोक में, वे भगवान शिव को कपालधारी, यानी “कपाल धारण करने वाले” के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव का कपाल सभी पापों का नाश करता है। स्तोत्र के अंत में, ऋषियों और मुनियों कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। मुनिभिः कृतं रुद्रस्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान शिव के रुद्र रूप की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद: श्लोक 1 ऋषियों और मुनियों ने कहा, “हे रुद्र, तुम रुद्र हो, यानी तुम उग्र हो। तुम सभी दुखों और कष्टों का नाश करने वाले हो।” श्लोक 2 “हे रुद्र, तुम कपालधारी हो, यानी तुम कपाल धारण करते हो। तुम्हारा कपाल सभी पापों का नाश करता है।” श्लोक 3 “हे रुद्र, तुम त्रिशूलधारी हो, यानी तुम त्रिशूल धारण करते हो। तुम्हारा त्रिशूल सभी दुष्टों का नाश करता है।” श्लोक 4 “हे रुद्र, तुम त्रिनेत्रधारी हो, यानी तुम तीन नेत्र धारण करते हो। तुम्हारे तीन नेत्र समस्त ब्रह्मांड को देख सकते हैं।” श्लोक 5 “हे रुद्र, तुम अग्निरूपधारी हो, यानी तुम अग्नि के रूप में प्रकट होते हो। तुम्हारी अग्नि सभी प्रकार के विकार और अशुद्धि को नष्ट करती है।” श्लोक 6 Munibhih Kritam Rudrastotram “हे रुद्र, तुम जलरूपधारी हो, यानी तुम जल के रूप में प्रकट होते हो। तुम्हारा जल सभी प्रकार की पवित्रता और शुद्धता प्रदान करता है।” श्लोक 7 “हे रुद्र, तुम वायुरूपधारी हो, यानी तुम वायु के रूप में प्रकट होते हो। तुम्हारी वायु सभी प्रकार की गतिशीलता और जीवन शक्ति प्रदान करती है।” श्लोक 8 “हे रुद्र, तुम भूमिरूपधारी हो, यानी तुम भूमि के रूप में प्रकट होते हो। तुम्हारी भूमि सभी प्रकार की स्थिरता और स्थायीता प्रदान करती है।” श्लोक 9 “हे रुद्र, तुम आकाशरूपधारी हो, यानी तुम आकाश के रूप में प्रकट होते हो। तुम्हारा आकाश सभी प्रकार की विस्तार और अनंतता प्रदान करता है।” श्लोक 10 “हे रुद्र, तुम सर्वशक्तिमान हो, यानी तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम ब्रह्मांड के सभी प्राणियों के स्वामी हो।” श्लोक 11 “हे रुद्र, तुम सर्वज्ञ हो, यानी तुम सब कुछ जानते हो। तुम समस्त ज्ञान और भक्ति के भंडार हो।” श्लोक 12 “हे रुद्र, जो कोई भी तुम्हारे इस रूप की पूजा करता है, उसे तुम्हारी कृपा प्राप्त होती है।” मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् Munibhih Kritam Shivastotram

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मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् Munibhih Kritam Shivastotram

Munibhih Kritam Shivastotram मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र ऋषियों और मुनियों द्वारा रचित है। स्तोत्र के 12 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में 12 पद हैं। प्रत्येक पद में, ऋषियों और मुनियों भगवान शिव की एक विशेषता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, ऋषियों और मुनियों भगवान शिव को अनादि, यानी “अनादि” के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव सृष्टि से पहले से ही मौजूद थे। दूसरे श्लोक में, वे भगवान शिव को सर्वशक्तिमान, यानी “सर्वशक्तिमान” के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान शिव सब कुछ कर सकते हैं। स्तोत्र के अंत में, ऋषियों और मुनियों कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान शिव की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है। स्तोत्र का हिंदी अनुवाद: श्लोक 1 ऋषियों और मुनियों ने कहा, “हे शिव, तुम अनादि हो, यानी तुम सृष्टि से पहले से ही मौजूद थे। तुम सृष्टि के रचयिता और संहारक हो।” Munibhih Kritam Shivastotram श्लोक 2 “हे शिव, तुम सर्वशक्तिमान हो, यानी तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम ब्रह्मांड के सभी प्राणियों के स्वामी हो।” श्लोक 3 “हे शिव, तुम सर्वज्ञ हो, यानी तुम सब कुछ जानते हो। तुम समस्त ज्ञान और भक्ति के भंडार हो।” श्लोक 4 “हे शिव, तुम सर्वव्यापी हो, यानी तुम सर्वत्र व्याप्त हो। तुम समस्त ब्रह्मांड में मौजूद हो।” श्लोक 5 “हे शिव, तुम सर्वकल्याणकारी हो, यानी तुम सभी प्रकार की सुखों का प्रदान करने वाले हो। तुम अपने भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त करते हो।” श्लोक 6 “हे शिव, तुम सर्वरक्षक हो, यानी तुम अपने भक्तों की रक्षा करने वाले हो। तुम उन्हें सभी प्रकार के खतरों से बचाते हो।” श्लोक 7 “हे शिव, तुम सर्वपापनाशक हो, यानी तुम सभी पापों का नाश करने वाले हो। तुम अपने भक्तों को सभी पापों से मुक्त करते हो।” श्लोक 8 “हे शिव, तुम सर्वमंगलप्रद हो, यानी तुम सभी प्रकार की मंगलों को देने वाले हो। तुम अपने भक्तों को सभी प्रकार के सुखों और सौभाग्य प्रदान करते हो।” श्लोक 9 “हे शिव, तुम सर्वेश्वर हो, यानी तुम सर्वस्व के स्वामी हो। तुम ब्रह्मांड के सभी प्राणियों के स्वामी हो।” श्लोक 10 “हे शिव, तुम सर्वोत्तम हो, यानी तुम सर्वश्रेष्ठ हो। तुम सभी देवताओं और ऋषियों से श्रेष्ठ हो।” श्लोक 11 “हे शिव, तुम सर्वपूज्य हो, यानी तुम सर्वत्र पूजे जाते हो। तुम सभी देवताओं और ऋषियों द्वारा पूजे जाते हो।” श्लोक 12 “हे शिव, जो कोई भी तुम्हारे इस रूप की पूजा करता है, उसे तुम्हारी कृपा प्राप्त होती है।” कुछ विशेष टिप्पणियां: मुनिभिः कृतं शिवस्तोत्रम् में भगवान शिव की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त हो सकती है। रामनाथाष्टकम् Ramanathashtakam

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विचित्रचरितस्तोत्रम् Vichitracharitastotram

Vichitracharitastotram विचित्रचरितस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की विचित्र लीलाओं का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के मराठी कवि और संत माधव बापट आपटीकर द्वारा रचित है। स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में चार पद हैं। प्रत्येक पद में, आपटीकर शिव की किसी विचित्र लीला का वर्णन करते हैं। Vichitracharitastotram उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, आपटीकर शिव को एक भिक्षु के रूप में वर्णित करते हैं जो कण्ठ में विष धारण करते हैं। यह विचित्र विरोधाभास शिव के दोनों पहलुओं को दर्शाता है: एक ओर, वे मृत्यु और विनाश के देवता हैं, और दूसरी ओर, वे जीवन और कल्याण के देवता हैं। इसी तरह, दूसरे श्लोक में, आपटीकर शिव को एक कामाग्नि धारण करने वाले नर्तक के रूप में वर्णित करते हैं। यह विचित्र संयोजन शिव के दोनों पहलुओं को दर्शाता है: एक ओर, वे कामदेव के शत्रु हैं, और दूसरी ओर, वे प्रेम और सौंदर्य के देवता हैं। स्तोत्र के अंत में, आपटीकर कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसे शिव की कृपा प्राप्त होती है। विचित्रचरितस्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो शिव की विविधता और रहस्य को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है। यहां विचित्रचरितस्तोत्रम् के कुछ प्रमुख बिंदु दिए गए हैं: यह स्तोत्र भगवान शिव की विचित्र लीलाओं का वर्णन करता है। यह स्तोत्र शिव के दोनों पहलुओं को दर्शाता है: मृत्यु और विनाश के देवता, और जीवन और कल्याण के देवता। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है। शिव अपराधस्तवः Shiv aparaadhastavah

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श्रीचिदम्बरदीक्षितस्तोत्रम् Sri Chidambardikshit Stotram

Sri Chidambardikshit Stotram श्री चिदंबरदिक्षित स्तोत्रम एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के एक रूप, चिदंबरम के दीक्षित स्वामी की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के तमिल कवि मणीक्कवासिगर द्वारा लिखा गया था। स्तोत्र में, मणीक्कवासिगर चिदंबरम के दीक्षित स्वामी की महिमा का वर्णन करते हैं, और उन्हें भगवान शिव के अवतार के रूप में मानते हैं। श्री चिदंबरदिक्षित स्तोत्रम को अक्सर चिदंबरम के दीक्षित स्वामी की पूजा के दौरान गाया जाता है। यह स्तोत्र चिदंबरम के दीक्षित स्वामी के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। स्तोत्र के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं: “चिदंबरम के दीक्षित स्वामी, तुम हो भगवान शिव के अवतार, तुम ही हो ज्ञान का स्रोत, तुम ही हो प्रेम का स्रोत, तुम ही हो आनंद का स्रोत।” “तुमने सृष्टि को बनाया, तुमने संहार किया, तुमने पालन किया, तुम ही हो सब कुछ।” “तुम ही हो मोक्ष का मार्गदर्शक, तुम ही हो भक्तों के रक्षक, तुम ही हो सब कुछ।” श्री चिदंबरदिक्षित स्तोत्रम एक शक्तिशाली और भावपूर्ण स्तोत्र है जो चिदंबरम के दीक्षित स्वामी की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र चिदंबरम के दीक्षित स्वामी के भक्तों के लिए एक प्रेरणा है। स्तोत्र का एक अंग्रेजी अनुवाद निम्नलिखित है: Sri Chidambardikshit Stotram हे चिदम्बरम स्वामी, आप भगवान शिव के अवतार हैं, आप ज्ञान के स्रोत हैं, तुम प्रेम का स्रोत हो, आप आनंद का स्रोत हैं. आपने ब्रह्मांड बनाया, तुमने इसे नष्ट कर दिया, आपने इसे कायम रखा, आप सब कुछ हैं। आप मुक्ति के मार्गदर्शक हैं, आप भक्तों के रक्षक हैं, आप सब कुछ हैं। यह श्लोक एक शक्तिशाली और मार्मिक भजन है जो चिदम्बरम भगवान की महिमा का वर्णन करता है। यह भगवान चिदम्बरम के भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। श्रीचिदम्बराष्टकम् २ Srichidambarashtakam 2

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श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् Sridakshinamurthystotram

Sridakshinamurthystotram श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के दक्षिणामूर्ति रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक दक्षिणामूर्ति के एक विशेष गुण या स्वरूप की प्रशंसा करता है। श्लोक 1: नमस्ते दक्षिणामूर्ति नमस्ते नमस्ते । नमस्ते नमस्ते शिवाय नमस्ते नमस्ते ॥ १ ॥ अर्थ: हे दक्षिणामूर्ति, हे शिव, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 2: नमस्ते नमस्ते अर्धनारीश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ २ ॥ अर्थ: हे अर्धनारीश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 3: नमस्ते नमस्ते चंद्रशेखराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३ ॥ अर्थ: हे चंद्रशेखर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 4: नमस्ते नमस्ते गंगाधराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ४ ॥ अर्थ: हे गंगाधर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। Sridakshinamurthystotram श्लोक 5: नमस्ते नमस्ते त्रिशूलधारिणे । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ५ ॥ अर्थ: हे त्रिशूलधारी, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 6: नमस्ते नमस्ते नंदीश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ६ ॥ अर्थ: हे नंदीश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 7: नमस्ते नमस्ते सर्वदेवेश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ७ ॥ अर्थ: हे सर्वदेवेश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 8: नमस्ते नमस्ते सर्वज्ञाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वज्ञ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 9: नमस्ते नमस्ते सर्वशक्तिमानाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ९ ॥ अर्थ: हे सर्वशक्तिमान, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 10: नमस्ते नमस्ते जगन्नाथाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ १० ॥ अर्थ: हे जगन्नाथ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र के प्रमुख प्रसंग:** स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव के प्रमुख नामों से उनकी महिमा का वर्णन करता है। स्तोत्र के अगले नौ श्लोक भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और गुणों की प्रशंसा करते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की सर्वोच्चता की घोषणा करता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए सहायक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण नाम:** दक्षिणामूर्ति – दक्षिण दिशा में स्थित शिव अर्धनारीश्वर – अर्धा शरीर पुरुष और अर्धा शरीर स्त्री के रूप में शिव चंद्रशेखर – चंद्रमा को मुकुट में धारण करने वाले श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् २ Sridakshinamurthystotram 2

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Sridakshinamurthystotram 2 श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र 2 एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के दक्षिणामूर्ति रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक दक्षिणामूर्ति के एक विशेष गुण या स्वरूप की प्रशंसा करता है। श्लोक 1: नमस्ते दक्षिणामूर्ति नमस्ते नमस्ते । नमस्ते नमस्ते शिवाय नमस्ते नमस्ते ॥ १ ॥ अर्थ: हे दक्षिणामूर्ति, हे शिव, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 2: नमस्ते नमस्ते अर्धनारीश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ २ ॥ अर्थ: हे अर्धनारीश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 3: नमस्ते नमस्ते चंद्रशेखराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३ ॥ अर्थ: हे चंद्रशेखर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 4: नमस्ते नमस्ते गंगाधराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ४ ॥ अर्थ: हे गंगाधर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 5: नमस्ते नमस्ते त्रिशूलधारिणे । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ५ ॥ अर्थ: हे त्रिशूलधारी, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 6: नमस्ते नमस्ते नंदीश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ६ ॥ Sridakshinamurthystotram 2 अर्थ: हे नंदीश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 7: नमस्ते नमस्ते सर्वदेवेश्वराय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ७ ॥ अर्थ: हे सर्वदेवेश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 8: नमस्ते नमस्ते सर्वज्ञाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ८ ॥ अर्थ: हे सर्वज्ञ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 9: नमस्ते नमस्ते सर्वशक्तिमानाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ९ ॥ अर्थ: हे सर्वशक्तिमान, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 10: नमस्ते नमस्ते जगन्नाथाय । नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ १० ॥ अर्थ: हे जगन्नाथ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र 2 एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र 2 के प्रमुख प्रसंग:** स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव के प्रमुख नामों से उनकी महिमा का वर्णन करता है। स्तोत्र के अगले नौ श्लोक भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और गुणों की प्रशंसा करते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की सर्वोच्चता की घोषणा करता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र 2 का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए सहायक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र 2 के कुछ महत्वपूर्ण नाम:** दक्षिणामूर्ति – दक्षिण दिशा में स्थित शिव अर्धनारीश्वर – अर्धा शरीर पुरुष और अर्धा शरीर स्त्री के रूप में शिव श्रीदक्षिणामूर्त्यष्टकं Sridakshinamurtyashtakam

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श्रीदूर्वेशस्तोत्रम् Sridurveshastotram

Sridurveshastotram श्रीदुर्गेशस्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के दुर्गेश्वर रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक दुर्गेश्वर के एक विशेष गुण या स्वरूप की प्रशंसा करता है। श्लोक 1: नमस्ते दुर्गेश्वराय नमस्ते रुद्रवाहन । नमस्ते नमस्ते त्रिलोचन सर्वेश्वर नमस्ते ॥ १ ॥ अर्थ: हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, हे त्रिलोचन, हे सर्वेश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 2: सृष्टिकर्ता पालककर्ता संहारकर्ता च । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ २ ॥ अर्थ: सृष्टिकर्ता, पालककर्ता, और संहारकर्ता, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 3: गंगाधर धारी चंद्रशेखर चंद्रसूर्यधर । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ३ ॥ अर्थ: गंगाधार, चंद्रशेखर, चंद्रसूर्यधर, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 4: अमृतधाराधर पार्वतीधर कल्पवृक्षधारी । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ४ ॥ अर्थ: अमृतधाराधर, पार्वतीधर, कल्पवृक्षधारी, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 5: त्रैलोक्यनाथ सर्वदेवनाथ नमस्ते रुद्रवाहन । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय ॥ ५ ॥ अर्थ: त्रैलोक्यनाथ, सर्वदेवनाथ, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 6: भक्तजनोद्दारक भक्तजनोपास्य । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ६ ॥ अर्थ: भक्तजनों को उद्धार करने वाले, भक्तजनों के आराध्य, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। Sridurveshastotram श्लोक 7: ज्ञानीजनगणपरम पूज्य । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ७ ॥ अर्थ: ज्ञानीजनों के द्वारा परम पूज्य, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 8: भयनाशक सर्वविघ्नहारी । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ८ ॥ अर्थ: भयनाशक, सभी विघ्नों को दूर करने वाले, हे दुर्गेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 9: सर्वकामनापूर्ते नमस्ते रुद्रवाहन । नमस्ते नमस्ते दुर्गेश्वराय ॥ ९ ॥ अर्थ: सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले, हे रुद्र के वाहन, हे दुर्गेश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 10: इति श्रीदुर्गेशस्तोत्रम् समाप्तः ॥ अर्थ: इस प्रकार श्रीदुर्गेशस्तोत्र समाप्त होती है। श्रीदुर्गेशस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। श्रीदुर्गेशस्तोत्रम् के प्रमुख प्रसंग:** श्रीधीरगुरुभूतेश्वरस्तोत्रम् Sridheer Gurubhuteshwar Stotram

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श्रीधीरगुरुभूतेश्वरस्तोत्रम् Sridheer Gurubhuteshwar Stotram

Sridheer Gurubhuteshwar Stotram श्रीधीर गुरुभूतेश्वर स्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के धीरेश्वर रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 5 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक धीरेश्वर के एक विशेष गुण या स्वरूप की प्रशंसा करता है। श्लोक 1: नमस्ते धीरेश्वराय नमस्ते रुद्रवाहन । नमस्ते नमस्ते त्रिलोचन सर्वेश्वर नमस्ते ॥ १ ॥ अर्थ: हे धीरेश्वर, हे रुद्र के वाहन, हे त्रिलोचन, हे सर्वेश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 2: सृष्टिकर्ता पालककर्ता संहारकर्ता च । नमस्ते नमस्ते धीरेश्वराय रुद्रवाहन ॥ २ ॥ अर्थ: सृष्टिकर्ता, पालककर्ता, और संहारकर्ता, हे धीरेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 3: गंगाधर धारी चंद्रशेखर चंद्रसूर्यधर । नमस्ते नमस्ते धीरेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ३ ॥ अर्थ: गंगाधार, चंद्रशेखर, चंद्रसूर्यधर, हे धीरेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 4: अमृतधाराधर पार्वतीधर कल्पवृक्षधारी । नमस्ते नमस्ते धीरेश्वराय रुद्रवाहन ॥ ४ ॥ अर्थ: अमृतधाराधर, पार्वतीधर, कल्पवृक्षधारी, हे धीरेश्वर, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्लोक 5: त्रैलोक्यनाथ सर्वदेवनाथ नमस्ते रुद्रवाहन । नमस्ते नमस्ते धीरेश्वराय ॥ ५ ॥ अर्थ: त्रैलोक्यनाथ, सर्वदेवनाथ, हे रुद्र के वाहन, मैं आपको नमस्कार करता हूं। श्रीधीर गुरुभूतेश्वर स्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। श्रीधीर गुरुभूतेश्वर स्तोत्रम् के प्रमुख प्रसंग:** Sridheer Gurubhuteshwar Stotram स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। स्तोत्र के अगले चार श्लोक भगवान शिव के धीरेश्वर रूप की प्रशंसा करते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव से सभी कामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करता है। श्रीधीर गुरुभूतेश्वर स्तोत्रम् के कुछ महत्वपूर्ण नाम:** धीरेश्वर – धैर्य के स्वामी रुद्रवाहन – रुद्र के वाहन त्रिलोचन – तीन आंखों वाले सर्वेश्वर – सभी का स्वामी श्रीधीर गुरुभूतेश्वर स्तोत्रम् का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए सहायक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। श्रीनटराजस्तवः Shrinatarajstavah

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श्रीनागनाथस्तोत्रम् Srinaganathastotram

Srinaganathastotram श्री नागनाथ स्तोत्र एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव के नागनाथ रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 10 श्लोकों में विभाजित है, प्रत्येक श्लोक भगवान शिव के एक विशेष गुण या स्वरूप की प्रशंसा करता है। स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है: नमस्ते नागनाथाय नमस्ते रुद्राय महेश्वराय । नमस्ते त्रिलोचनाय सर्वेश्वराय शंभवे ॥ १ ॥ अर्थ: हे नागनाथ, हे रुद्र, हे महेश्वर, हे त्रिलोचन, हे सर्वेश्वर, हे शंभु, मैं आपको नमस्कार करता हूं। अगले श्लोकों में, स्तोत्र भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों की प्रशंसा करता है। उदाहरण के लिए, एक श्लोक में, स्तोत्र भगवान शिव को सृष्टिकर्ता के रूप में प्रशंसा करता है: सृष्टिकर्ता पालककर्ता संहारकर्ता च । नागनाथ नमस्ते ॥ २ ॥ अर्थ: सृष्टिकर्ता, पालककर्ता, और संहारकर्ता, नागनाथ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। एक अन्य श्लोक में, स्तोत्र भगवान शिव को भक्तों के रक्षक के रूप में प्रशंसा करता है: दुष्टानां भयं हर्ता भक्तानां रक्षकः । नागनाथ नमस्ते ॥ ३ ॥ अर्थ: दुष्टों का भय दूर करने वाले, भक्तों के रक्षक, नागनाथ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की शरण में आने की प्रार्थना करता है: यः पठेत् नागनाथस्तवम् । सर्वपापमोच्यते सः ॥ १० ॥ Srinaganathastotram अर्थ: जो भक्तिपूर्वक नागनाथ स्तोत्र का पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। श्री नागनाथ स्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। श्री नागनाथ स्तोत्र के प्रमुख प्रसंग: स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। स्तोत्र के अगले श्लोक भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों की प्रशंसा करते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की शरण में आने की प्रार्थना करता है। श्री नागनाथ स्तोत्र के लाभ: इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए सहायक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। श्री नागनाथ स्तोत्र के लेखक अज्ञात हैं। यह स्तोत्र प्राचीन काल से प्रचलित है। श्री नागनाथ स्तोत्र का सार: श्री नागनाथ स्तोत्र भगवान शिव के नागनाथ रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। यह स्तोत्र भगवान शिव को प्रसन्न करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। श्री नागनाथ स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण नाम: नागनाथ – नागों के स्वामी रुद्र – क्रोध के देवता महेश्वर – महान ईश्वर त्रिलोचन – तीन आंखों वाले सर्वेश्वर – सभी का स्वामी शंभु – आनंद का दाता श्रीनीलकण्ठस्तवः Shreeneelakanthastavah

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श्रीमदानन्दनटराजाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् Shrimadanandanatarajaashtottarashatanamastotram

Shrimadanandanatarajaashtottarashatanamastotram श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 108 नामों का एक वर्णन है जो भगवान शिव के विभिन्न गुणों और विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है: नमस्तेऽनंदनाथाय रुद्राय महेश्वराय । नमस्ते त्रिलोचनाय सर्वेश्वराय शंभवे ॥ १ ॥ अर्थ: हे आनंदनाथ, हे रुद्र, हे महेश्वर, हे त्रिलोचन, हे सर्वेश्वर, हे शंभु, मैं आपको नमस्कार करता हूं। अगले श्लोकों में, स्तोत्र भगवान शिव के विभिन्न नामों की व्याख्या करता है। उदाहरण के लिए, एक श्लोक में, स्तोत्र भगवान शिव को अनंदनाथ के रूप में वर्णन करता है: अनंदनाथाय नमः । आनंदरूपाय नमः । आनंददात्रे नमः । आनंदैकमूर्तये नमः । अर्थ: हे आनंदनाथ, मैं आपको नमस्कार करता हूं। आनंदरूप, मैं आपको नमस्कार करता हूं। आनंददाता, मैं आपको नमस्कार करता हूं। आनंदैकमूर्त, मैं आपको नमस्कार करता हूं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की शरण में आने की प्रार्थना करता है: यः पठेत् शिवस्तवम् भक्तिपूर्वकम् । तस्य सर्वकामार्थसिद्धिः भवति निश्चितम् ॥ १०८ ॥ अर्थ: जो भक्तिपूर्वक शिव स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी सभी कामनाओं की सिद्धि निश्चित होती है। श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र अक्सर प्रार्थना और ध्यान में किया जाता है। Shrimadanandanatarajaashtottarashatanamastotram श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् के प्रमुख प्रसंग: स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। स्तोत्र के अगले श्लोक भगवान शिव के विभिन्न नामों की व्याख्या करते हैं। स्तोत्र का अंतिम श्लोक भगवान शिव की शरण में आने की प्रार्थना करता है। श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् के लाभ: इस स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए सहायक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् के लेखक अज्ञात हैं। यह स्तोत्र प्राचीन काल से प्रचलित है। श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् का सार: श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। यह स्तोत्र भगवान शिव को प्रसन्न करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। श्रीमदानंदनटाराजाशोततरशतनामास्तोत्रम् के कुछ महत्वपूर्ण नाम: अनंदनाथ – आनंद के स्वामी रुद्र – क्रोध के देवता महेश्वर – महान ईश्वर त्रिलोचन – तीन आंखों वाले सर्वेश्वर – सभी देवताओं के स्वामी शंभु – शुभ के दाता श्रीमदानन्दनटराजाष्टोत्तरशतनामावलिः Srimadanandanatarajaashtottarashatanamavalih

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