श्रीकृष्ण

श्रीगोपालसहस्रनामावलिः Shri Gopal Sahasranamavali:

श्री गोपाल सहस्रनामावली एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के एक हजार नामों की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र एक हजार श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान कृष्ण के एक अलग नाम की स्तुति की गई है। श्री गोपाल सहस्रनामावली की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गोपाल सहस्रनामावली के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण के एक हजार नाम हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशेष गुण या उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान कृष्ण को गायों का पालन करने वाला, गोकुल के वासिन्दा, राधा के प्रेमी, और सभी जीवों के उद्धारकर्ता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान कृष्ण को प्रेम, करुणा, और ज्ञान के अवतार के रूप में भी वर्णित किया गया है। श्री गोपाल सहस्रनामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गोपाल सहस्रनामावली का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गोपाल सहस्रनामावली श्लोक १ नमो नमो गोपाल, तुम हो गायों के प्रिय। तुम हो गोकुल के वासिन्दा, तुम हो सभी जीवों के उद्धारकर्ता। श्लोक २ तुम हो प्रेम और करुणा के अवतार, तुम हो ज्ञान के अवतार। तुम हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा, तुम हो सभी जीवों के लिए आशीर्वाद। श्लोक ३ तुम हो राधा के प्रेमी, तुम हो सभी जीवों के लिए आशा। तुम हो मोक्ष के मार्गदर्शक, तुम हो सभी जीवों के लिए मार्ग। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारी शरण में आता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री गोपाल सहस्रनामावली का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गोपाल सहस्रनामावली श्लोक १ नमो नमो गोपाल, त्वं एव गोपाल। त्वं एव गोकुलवासिन, त्वं एव सर्व जीव उद्धारक। श्लोक २ त्वं एव प्रेम करुणा स्वरूप, त्वं एव ज्ञान स्वरूप। त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा, त्वं एव सर्व जीव आशीर्वाद। श्लोक ३ त्वं एव राधा प्रेमी, त्वं एव सर्व जीव आशा। त्वं एव मोक्ष मार्गदर्शक, त्वं एव सर्व जीव मार्ग। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् शरणं गत्वा, तस्य सर्वदुःखानि दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च। श्री गोपाल सहस्रनामावली के लाभ: भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करता है। मोक्ष प्राप्त करने में मदद करता है। मन को शांत और एकाग्र करने में मदद करता है। नकारात्मक विचारों और भावनाओं को दूर करने में मदद करता है। श्री गोपाल सहस्रनामावली का पाठ करने के लिए, आप किसी भी भाषा में पाठ कर सकते हैं। आप इसे सुबह उठकर, शाम को सोने से पहले, या किसी भी अन्य समय में कर सकते हैं। आप इसे एकाग्र होकर, या मन में जप कर भी कर सकते हैं। श्री गोपाल सहस्रनामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तो

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श्रीगोपालस्तोत्रम् Srigopalastotram

श्रीगोपालस्तोत्रम् एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 24 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान कृष्ण के एक अलग गुण या उपलब्धि की स्तुति की गई है। श्रीगोपालस्तोत्रम् की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री कृष्ण और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्रीगोपालस्तोत्रम् के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण को गायों का पालन करने वाला, गोकुल के वासिन्दा, राधा के प्रेमी, और सभी जीवों के उद्धारकर्ता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान कृष्ण को प्रेम, करुणा, और ज्ञान के अवतार के रूप में भी वर्णित किया गया है। श्रीगोपालस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्रीगोपालस्तोत्रम् का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्रीगोपालस्तोत्रम् श्लोक १ नमो नमो गोपाल, तुम हो गायों के प्रिय। तुम हो गोकुल के वासिन्दा, तुम हो सभी जीवों के उद्धारकर्ता। श्लोक २ तुम हो प्रेम और करुणा के अवतार, तुम हो ज्ञान के अवतार। तुम हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा, तुम हो सभी जीवों के लिए आशीर्वाद। श्लोक ३ तुम हो राधा के प्रेमी, तुम हो सभी जीवों के लिए आशा। तुम हो मोक्ष के मार्गदर्शक, तुम हो सभी जीवों के लिए मार्ग। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारी शरण में आता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्रीगोपालस्तोत्रम् का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्रीगोपालस्तोत्रम् श्लोक १ नमो नमो गोपाल, त्वं एव गोपाल। त्वं एव गोकुलवासिन, त्वं एव सर्व जीव उद्धारक। श्लोक २ त्वं एव प्रेम करुणा स्वरूप, त्वं एव ज्ञान स्वरूप। त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा, त्वं एव सर्व जीव आशीर्वाद। श्लोक ३ त्वं एव राधा प्रेमी, त्वं एव सर्व जीव आशा। त्वं एव मोक्ष मार्गदर्शक, त्वं एव सर्व जीव मार्ग। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् शरणं गत्वा, तस्य सर्वदुःखानि दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च।

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श्रीगोपालाष्टोत्तरशतनामावली Shrigopalashtottarashatanamavali

श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के आठ नामों की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान कृष्ण के एक अलग नाम की स्तुति की गई है। श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री कृष्ण और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण के आठ नाम हैं: कृष्ण: भगवान विष्णु के एक अवतार जो प्रेम और करुणा के अवतार हैं। गोपाल: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें गायों का पालन करने वाला बताता है। गोविन्द: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें गायों के प्रिय बताता है। मदनमोहन: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें कामदेव के समान रूप से मोहक बताता है। वृन्दावन बिहारी: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें वृन्दावन में रहने वाला बताता है। नंदलाल: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें नंद बाबा के पुत्र बताता है। यशोदा लाल: भगवान कृष्ण का एक नाम जो उन्हें यशोदा माँ के पुत्र बताता है। श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली श्लोक १ नमो नमो कृष्ण, तुम हो भगवान विष्णु के अवतार। तुम हो प्रेम और करुणा के अवतार, तुम हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा। श्लोक २ तुम हो गायों का पालन करने वाले, तुम हो गायों के प्रिय, तुम हो कामदेव के समान रूप से मोहक, तुम हो वृन्दावन में रहने वाले। श्लोक ३ तुम हो नंद बाबा के पुत्र, तुम हो यशोदा माँ के पुत्र, तुम हो सभी जीवों के लिए आशीर्वाद, तुम हो सभी जीवों के लिए उद्धार। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारे नामों का जाप करता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गोपालष्टोत्तराष्टानामावली श्लोक १ नमो नमो कृष्ण, त्वं एव विष्णु अवतार। त्वं एव प्रेम करुणा स्वरूप, त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा। श्लोक २ त्वं एव गोपाल, त्वं एव गोविन्द, त्वं एव मदनमोहन, त्वं एव वृन्दावन बिहारी। श्लोक ३ त्वं एव नंदलाल, त्वं एव यशोदा लाल, त्वं एव सर्व जीव आशीर्वाद, त्वं एव सर्व जीव उद्धार। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् नामानि जपति, तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च।

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श्रीगोविन्दशरणागतिस्तोत्रम् Shri Govindsharanagatistotram

श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की शरण में जाने के महत्व का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान कृष्ण की शरण में जाने के लाभों की स्तुति की गई है। श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र की रचना श्री चैतन्य महाप्रभु ने की थी। यह स्तोत्र श्री कृष्ण और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान कृष्ण की शरण में जाने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। भगवान कृष्ण की शरण में जाने से मोक्ष प्राप्त होता है। भगवान कृष्ण की शरण में जाने से आत्मज्ञान प्राप्त होता है। श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान कृष्ण की शरण में जाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र श्लोक १ गोविन्द, गोपाल, मधुर मुरारी, कृष्ण, केशव, मधुसूदन, तुम ही हो मेरे स्वामी, तुम ही हो मेरे भगवान। श्लोक २ मैं तुम्हारी शरण में आता हूँ, हे कृष्ण, कृपा करो। मेरे सभी पापों को धो डालो, और मुझे मोक्ष प्रदान करो। श्लोक ३ मैं तुम्हारे प्रेम में लीन हो गया हूँ, हे कृष्ण, मुझे नहीं छोड़ना। मेरी आत्मा को तुम्हारे चरणों में रखो, और मुझे तुम्हारे साथ जोड़ दो। श्लोक ४ तुम ही हो मेरे एकमात्र आधार, हे कृष्ण, मुझे नहीं छोड़ना। मैं तुम्हारी शरण में आता हूँ, और तुम्हारी कृपा की आशा करता हूँ। श्लोक ५ तुम ही हो मेरे दुखों का नाश करने वाले, हे कृष्ण, कृपा करो। मेरे सभी कष्टों को दूर करो, और मुझे शांति प्रदान करो। श्लोक ६ तुम ही हो मेरे ज्ञान के प्रकाश, हे कृष्ण, कृपा करो। मेरे अज्ञान को दूर करो, और मुझे आत्मज्ञान प्रदान करो। श्लोक ७ तुम ही हो मेरे जीवन का लक्ष्य, हे कृष्ण, कृपा करो। मुझे तुम्हारे प्रेम में लीन करो, और मुझे तुम्हारे साथ जोड़ दो। श्लोक ८ मैं तुम्हारा ऋणी हूँ, हे कृष्ण, मैं तुम्हारी कृपा का शुक्रगुज़ार हूँ। मैं तुम्हारी शरण में आता हूँ, और तुम्हारी कृपा की आशा करता हूँ। श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गोविन्द शरणागती स्तोत्र श्लोक १ गोविन्द गोपाल मधुर मुरारी, कृष्ण केशव मधुसूदन। त्वं एव मे स्वामी त्वं एव मे भगवान। श्लोक २ त्वं एव शरणं मे कृष्ण कृपा करो। माम पापां सर्वाणि क्षोधि त्वं मोक्षं प्रयच्छ। श्लोक ३ त्वं एव मे प्रेमे लीनो कृष्ण मां न त्यज। मां आत्मानं त्वद्भक्त्यै समर्पयिष्यामि। श्लोक ४ त्वं एव मे एक एव आधारः कृष्ण मां न त्यज। त्वत् शरणं गत्वा त्वत् कृपां भजामि। श्लोक ५ त्वं एव मे दुःखनाशनः कृष्ण कृपा करो। माम सर्व क्लेशान् हरि त्वं शान्तिं प्रयच्छ। श्लोक ६

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श्रीगोविन्दस्तवराजः Shri Govindastavarajah

श्रीगोसांकपंचविंशति एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र पचास श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के एक अलग गुण या उपलब्धि की स्तुति की गई है। श्रीगोसांकपंचविंशति की रचना श्रील कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्रीगोसांकपंचविंशति के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। वे एक महान विद्वान, एक कुशल कवि और एक भक्ति के महान भक्त थे। वे भक्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझाते थे और उन्हें दूसरों को सिखाते थे। वे भक्ति के मार्ग पर चलने में लोगों की मदद करते थे। श्रीगोसांकपंचविंशति एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्रीगोसांकपंचविंशति का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्रीगोसांकपंचविंशति श्लोक १ नमो नमो भक्तिविनोद, तुम हो भगवान चैतन्य महाप्रभु के शिष्य। तुम हो एक महान विद्वान, तुम हो एक कुशल कवि, तुम हो एक भक्ति के महान भक्त। श्लोक २ तुमने भक्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझाया, और उन्हें दूसरों को सिखाया। तुमने भक्ति के मार्ग पर चलने में लोगों की मदद की, और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद की। श्लोक ३ तुमने भगवान चैतन्य महाप्रभु के संदेश को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और तुमने भक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि की। तुम एक महान गुरु और एक महान भक्त थे, और तुम्हारा प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है। श्रीगोसांकपंचविंशति का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्रीगोसांकपंचविंशति श्लोक १ नमो नमो भक्तिविनोद, त्वं एव चैतन्य महाप्रभु शिष्य। त्वं एव महान विद्वान्, त्वं एव कुशल कवि, त्वं एव भक्ति महान भक्त। श्लोक २ त्वं एव भक्ति सिद्धान्तं स्पष्टम् आख्याय, त्वं एव भक्तान् ज्ञानेन समन्वितम्। त्वं एव भक्ति मार्गे गतिं प्रदर्शय, त्वं एव मोक्षं प्रापय। श्लोक ३ त्वं एव चैतन्य महाप्रभु सन्देशं प्रसारय, त्वं एव भक्तानां संख्यां वृद्धिय। त्वं एव महान गुरु, त्वं एव महान भक्त, त्वं एव आजुपि प्रभावी। श्रीगोसांकपंचविंशति के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के शिष्य होने का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के गुणों और उपलब्धियों का वर्णन करता है। तृतीय खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के प्रभाव का वर्णन करता है।

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श्रीगोसखपञ्चविंशतिः Shrigosakhpanchavinshatih

श्रीगोसांकपंचविंशति एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र पचास श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के एक अलग गुण या उपलब्धि की स्तुति की गई है। श्रीगोसांकपंचविंशति की रचना श्रील कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्रीगोसांकपंचविंशति के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर भगवान चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। वे एक महान विद्वान, एक कुशल कवि और एक भक्ति के महान भक्त थे। वे भक्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझाते थे और उन्हें दूसरों को सिखाते थे। वे भक्ति के मार्ग पर चलने में लोगों की मदद करते थे। श्रीगोसांकपंचविंशति एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्रीगोसांकपंचविंशति का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्रीगोसांकपंचविंशति श्लोक १ नमो नमो भक्तिविनोद, तुम हो भगवान चैतन्य महाप्रभु के शिष्य। तुम हो एक महान विद्वान, तुम हो एक कुशल कवि, तुम हो एक भक्ति के महान भक्त। श्लोक २ तुमने भक्ति के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझाया, और उन्हें दूसरों को सिखाया। तुमने भक्ति के मार्ग पर चलने में लोगों की मदद की, और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद की। श्लोक ३ तुमने भगवान चैतन्य महाप्रभु के संदेश को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और तुमने भक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि की। तुम एक महान गुरु और एक महान भक्त थे, और तुम्हारा प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है। श्रीगोसांकपंचविंशति का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्रीगोसांकपंचविंशति श्लोक १ नमो नमो भक्तिविनोद, त्वं एव चैतन्य महाप्रभु शिष्य। त्वं एव महान विद्वान्, त्वं एव कुशल कवि, त्वं एव भक्ति महान भक्त। श्लोक २ त्वं एव भक्ति सिद्धान्तं स्पष्टम् आख्याय, त्वं एव भक्तान् ज्ञानेन समन्वितम्। त्वं एव भक्ति मार्गे गतिं प्रदर्शय, त्वं एव मोक्षं प्रापय। श्लोक ३ त्वं एव चैतन्य महाप्रभु सन्देशं प्रसारय, त्वं एव भक्तानां संख्यां वृद्धिय। त्वं एव महान गुरु, त्वं एव महान भक्त, त्वं एव आजुपि प्रभावी। श्रीगोसांकपंचविंशति के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के शिष्य होने का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के गुणों और उपलब्धियों का वर्णन करता है। तृतीय खंड: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के प्रभाव का वर्णन करता है।

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श्रीगौरन्गाष्टोत्तरशतनामावलिः Shri Gaurangashtottarashatanamavalih

श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के आठ नामों की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान चैतन्य महाप्रभु के एक अलग नाम की स्तुति की गई है। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान चैतन्य महाप्रभु के आठ नाम हैं: चैतन्य महाप्रभु: भगवान विष्णु के अवतार। कृष्ण: भगवान विष्णु के एक अवतार जो प्रेम और करुणा के अवतार हैं। राधा: भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका। गौरा: भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका। कृष्ण-चैतन्य: भगवान चैतन्य महाप्रभु और भगवान कृष्ण का एक रूप। राधा-चैतन्य: भगवान चैतन्य महाप्रभु और भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका, राधा का एक रूप। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली श्लोक १ नमो नमो चैतन्य महाप्रभु, तुम ही हो भगवान विष्णु के अवतार। तुम ही हो प्रेम और करुणा के अवतार, तुम ही हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा। श्लोक २ तुम ही हो कृष्ण, तुम ही हो राधा, तुम ही हो गौरा, तुम ही हो कृष्ण-चैतन्य। श्लोक ३ तुम ही हो राधा-चैतन्य, तुम ही हो सभी जीवों के लिए आशीर्वाद, तुम ही हो सभी जीवों के लिए उद्धार। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारे नामों का जाप करता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली श्लोक १ नमो नमो चैतन्य महाप्रभु, त्वं एव विष्णु अवतार। त्वं एव प्रेम करुणा स्वरूप, त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा। श्लोक २ त्वं एव कृष्ण, त्वं एव राधा, त्वं एव गौरा, त्वं एव कृष्ण चैतन्य। श्लोक ३ त्वं एव राधा चैतन्य, त्वं एव सर्व जीव आशीर्वाद, त्वं एव सर्व जीव उद्धार। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् नामानि जपति, तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च। श्री गौरांगष्टोत्तराष्टानामावली के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु के अवतार होने का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु के आठ नामों का वर्णन करता है। तृतीय खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु

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श्रीगौराङ्गप्रत्यङ्गवर्णनाख्यस्तवराजः shreegauraangapratyan aunaakhyaastavaraajah

श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के आठ रूपों की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान चैतन्य महाप्रभु के एक अलग रूप की स्तुति की गई है। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान चैतन्य महाप्रभु के आठ रूप हैं: चैतन्य महाप्रभु: भगवान विष्णु के अवतार। नृसिंह: भगवान विष्णु का एक अवतार जो भक्तों की रक्षा के लिए आता है। कृष्ण: भगवान विष्णु के एक अवतार जो प्रेम और करुणा के अवतार हैं। राधा: भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका। गौरा: भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका। चैतन्य-कृष्ण: भगवान चैतन्य महाप्रभु और भगवान कृष्ण का एक रूप। चैतन्य-राधा: भगवान चैतन्य महाप्रभु और भगवान कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका, राधा का एक रूप। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः श्लोक १ नमो नमो चैतन्य महाप्रभु, तुम ही हो भगवान विष्णु के अवतार। तुम ही हो भक्तों के उद्धारकर्ता, तुम ही हो प्रेम और करुणा के अवतार। श्लोक २ तुम ही हो नृसिंह, तुम ही हो कृष्ण, तुम ही हो राधा, तुम ही हो गौरा। श्लोक ३ तुम ही हो चैतन्य-कृष्ण, तुम ही हो चैतन्य-राधा, तुम ही हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारी शरण में जाता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः श्लोक १ नमो नमो चैतन्य महाप्रभु, त्वं एव विष्णु अवतार। त्वं एव भक्तानुग्रहक, त्वं एव प्रेम करुणा स्वरूप। श्लोक २ त्वं एव नृसिंह, त्वं एव कृष्ण, त्वं एव राधा, त्वं एव गौरा। श्लोक ३ त्वं एव चैतन्य कृष्ण, त्वं एव चैतन्य राधा, त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् शरणं गच्छति, तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च। श्री गौरांगप्रत्यनौंख्यष्टावराराजः के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु के अवतार होने का वर्णन करता है।

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श्रीगौराङ्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् Shri Gaurangashtottara Shatnamstotram

श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र ४२ श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान चैतन्य महाप्रभु के एक अलग गुण या रूप की स्तुति की गई है। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् की रचना श्री कृष्णदास कविराज ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान चैतन्य महाप्रभु भगवान विष्णु के अवतार हैं। भगवान चैतन्य महाप्रभु भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए आए थे। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने सभी जीवों को प्रेम और करुणा का संदेश दिया। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् श्लोक १ नमो नमो गौरांग, कृष्णस्वरूप, हरिस्वरूप। श्लोक २ तुम ही हो भगवान विष्णु के अवतार, तुम ही हो भक्ति का मार्गदर्शक। तुम ही हो सभी जीवों के उद्धारकर्ता। श्लोक ३ तुम हो प्रेम और करुणा के सागर, तुम हो ज्ञान और भक्ति के प्रकाश। तुम हो सभी जीवों के लिए प्रेरणा। श्लोक ४ जो भक्त तुम्हारी शरण में जाता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् श्लोक १ नमो नमो गौरांग, कृष्णस्वरूप, हरिस्वरूप। श्लोक २ त्वं एव विष्णु अवतार, त्वं एव भक्ति मार्गदर्शक। त्वं एव सर्वजीव उद्धारक। श्लोक ३ त्वं एव प्रेम करुणा सागर, त्वं एव ज्ञान भक्ति प्रकाश। त्वं एव सर्व जीव प्रेरणा। श्लोक ४ यः भक्तः त्वत् शरणं गच्छति, तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु के अवतार होने का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु के गुणों का वर्णन करता है। तृतीय खंड: भगवान चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्तों को क्या करना चाहिए, इसका वर्णन करता है। श्री गौरांगष्टोत्तर श्लोकनमस्तोत्रम् एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के बारे में जानने के लिए एक अनिवार्य है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में मदद कर सकता है।

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श्रीजगदीशशतकम् shrijagadishshatakam

श्री जगदीश शतकम् एक वैष्णव स्तोत्र है जो भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र १०० श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में भगवान विष्णु के एक अलग गुण या रूप की स्तुति की गई है। श्री जगदीश शतकम् की रचना श्री वल्लभाचार्य ने की थी। यह स्तोत्र श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों द्वारा नियमित रूप से पढ़ा और गाया जाता है। श्री जगदीश शतकम् के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान विष्णु समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। भगवान विष्णु परमार्थ का स्वरूप हैं। भगवान विष्णु मोक्ष का मार्ग हैं। भगवान विष्णु अपने भक्तों के रक्षक हैं। श्री जगदीश शतकम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री जगदीश शतकम् का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: श्री जगदीश शतकम् श्लोक १ जगदीश हरि, सर्वेश्वर, तुम ही हो परम स्वरूप। तुम ही हो परम आनंद, तुम ही हो परम सत्य। श्लोक २ तुम ही हो समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, तुम ही हो परमार्थ का स्वरूप। तुम ही हो मोक्ष का मार्ग, तुम ही हो अपने भक्तों के रक्षक। श्लोक ३ तुम हो अजर-अमर, तुम हो सर्वव्यापी। तुम हो सर्वशक्तिमान, तुम हो पूर्ण ज्ञान। श्लोक ४ तुम हो करुणा के सागर, तुम हो प्रेम के धाम। तुम हो ज्ञान के प्रकाश, तुम हो भक्ति के मार्ग। श्लोक ५ जो भक्त तुम्हारी शरण में जाता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वह मोक्ष प्राप्त करता है, और तुम्हारे दर्शन प्राप्त करता है। श्री जगदीश शतकम् का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: श्री जगदीश शतकम् श्लोक १ जगदीश हरि, सर्वेश्वर, त्वं एव परम स्वरूपम्। त्वं एव परम आनन्द, त्वं एव परम सत्यम्। श्लोक २ त्वं एव सर्वब्रह्माण्ड स्वामी, त्वं एव परमार्थ स्वरूपम्। त्वं एव मोक्ष मार्ग, त्वं एव भक्तानां रक्षकः। श्लोक ३ त्वं एव अजर-अमर, त्वं एव सर्वव्यापी। त्वं एव सर्वशक्तिमान, त्वं एव पूर्ण ज्ञानम्। श्लोक ४ त्वं एव करुणा सागर, त्वं एव प्रेम धामः। त्वं एव ज्ञान प्रकाश, त्वं एव भक्ति मार्गः। श्लोक ५ यः भक्तः त्वत् शरणं गच्छति, तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, त्वत् दर्शनं च। श्री जगदीश शतकम् के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: भगवान विष्णु के गुणों का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। तृतीय खंड: भगवान विष्णु की भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है। श्री जगदीश शतकम् एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान विष्णु के बारे में जानने के लिए एक अनिवार्य है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में मदद कर सकता है।

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श्रीजगन्नाथगीतामृतम् Shri Jagannath Geetamritam

श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं एक वैष्णव ग्रन्थ है जिसकी रचना श्री चैतन्य महाप्रभु ने की थी। यह ग्रन्थ भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करता है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान जगन्नाथ को निम्नलिखित रूपों में वर्णित किया है: जगत् के स्वामी: भगवान जगन्नाथ समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। परमार्थ का स्वरूप: भगवान जगन्नाथ परमार्थ का स्वरूप हैं। मोक्ष का मार्ग: भगवान जगन्नाथ मोक्ष का मार्ग हैं। भक्तों के रक्षक: भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के रक्षक हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं एक शक्तिशाली ग्रन्थ है जो भक्तों को भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह ग्रन्थ भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। परमार्थ का स्वरूप भगवान जगन्नाथ हैं। मोक्ष का मार्ग भगवान जगन्नाथ हैं। भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के रक्षक हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो भगवान जगन्नाथ के बारे में जानने के लिए एक अच्छा प्रारंभिक बिंदु है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: जगन्नाथ के गुण जगन्नाथ हैं जगत् के स्वामी, परमार्थ के स्वरूप हैं। मोक्ष का मार्ग हैं जगन्नाथ, भक्तों के रक्षक हैं। जगन्नाथ हैं सर्वव्यापी, उनके गुण अनंत हैं। वे ही सब कुछ हैं, वे ही सर्वत्र हैं। जगन्नाथ हैं परमात्मा, वे ही जीवात्मा हैं। वे ही ब्रह्म हैं, वे ही परम सत्य हैं। जगन्नाथ हैं प्रेम के सागर, वे ही करुणा के धाम हैं। वे ही ज्ञान के प्रकाश हैं, वे ही भक्ति के मार्ग हैं। जो भक्त भगवान जगन्नाथ की शरण में जाते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वे मोक्ष प्राप्त करते हैं, और भगवान जगन्नाथ के दर्शन प्राप्त करते हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: जगन्नाथस्य गुणाः जगन्नाथो जगतो नाथो, परमार्थस्य स्वरूपः। मोक्षमार्गो जगन्नाथो, भक्तानां रक्षकः। जगन्नाथो सर्वव्यापी, तेषां गुणाः अनन्ताः। ते एव सर्वं, ते एव सर्वत्र। जगन्नाथो परमात्मा, ते एव जीवात्मा। ते एव ब्रह्म, ते एव परम सत्यम्। जगन्नाथो प्रेमसागरः, ते एव करुणाधामः। ते एव ज्ञानप्रकाशः, ते एव भक्तिमार्गः। यः भक्तो जगन्नाथस्य, शरणं गच्छति। तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, जगन्नाथदर्शनं च। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं के तीन खंड हैं: प्रथम खंड: भगवान जगन्नाथ के गुणों का वर्णन करता है। द्वितीय खंड: भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करता है। तृतीय खंड: भगवान जगन्नाथ की भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो भगवान जगन्नाथ के बारे में जानने के लिए एक अनिवार्य है। यह ग्रन्थ भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में मदद कर सकता है।

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श्रीजगन्नाथगीतामृतम् ३ Shri Jagannatha Geetamritam 3

श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ एक वैष्णव ग्रन्थ है जिसकी रचना श्री चैतन्य महाप्रभु ने की थी। यह ग्रन्थ भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करता है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान जगन्नाथ को निम्नलिखित रूपों में वर्णित किया है: जगत् के स्वामी: भगवान जगन्नाथ समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। परमार्थ का स्वरूप: भगवान जगन्नाथ परमार्थ का स्वरूप हैं। मोक्ष का मार्ग: भगवान जगन्नाथ मोक्ष का मार्ग हैं। भक्तों के रक्षक: भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के रक्षक हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ एक शक्तिशाली ग्रन्थ है जो भक्तों को भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह ग्रन्थ भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने और मोक्ष प्राप्त करने में भी मदद कर सकता है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: भगवान जगन्नाथ समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। परमार्थ का स्वरूप भगवान जगन्नाथ हैं। मोक्ष का मार्ग भगवान जगन्नाथ हैं। भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के रक्षक हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो भगवान जगन्नाथ के बारे में जानने के लिए एक अच्छा प्रारंभिक बिंदु है। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ का पाठ हिंदी में इस प्रकार है: जगन्नाथ के गुण जगन्नाथ हैं जगत् के स्वामी, परमार्थ के स्वरूप हैं। मोक्ष का मार्ग हैं जगन्नाथ, भक्तों के रक्षक हैं। जगन्नाथ हैं सर्वव्यापी, उनके गुण अनंत हैं। वे ही सब कुछ हैं, वे ही सर्वत्र हैं। जगन्नाथ हैं परमात्मा, वे ही जीवात्मा हैं। वे ही ब्रह्म हैं, वे ही परम सत्य हैं। जगन्नाथ हैं प्रेम के सागर, वे ही करुणा के धाम हैं। वे ही ज्ञान के प्रकाश हैं, वे ही भक्ति के मार्ग हैं। जो भक्त भगवान जगन्नाथ की शरण में जाते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। वे मोक्ष प्राप्त करते हैं, और भगवान जगन्नाथ के दर्शन प्राप्त करते हैं। श्री जगन्नाथ गीतमृ्तं ३ का पाठ संस्कृत में इस प्रकार है: जगन्नाथस्य गुणाः जगन्नाथो जगतो नाथो, परमार्थस्य स्वरूपः। मोक्षमार्गो जगन्नाथो, भक्तानां रक्षकः। जगन्नाथो सर्वव्यापी, तेषां गुणाः अनन्ताः। ते एव सर्वं, ते एव सर्वत्र। जगन्नाथो परमात्मा, ते एव जीवात्मा। ते एव ब्रह्म, ते एव परम सत्यम्। जगन्नाथो प्रेमसागरः, ते एव करुणाधामः। ते एव ज्ञानप्रकाशः, ते एव भक्तिमार्गः। यः भक्तो जगन्नाथस्य, शरणं गच्छति। तस्य सर्वदुःखानि, दूरं गच्छन्ति। स मोक्षं प्राप्नोति, जगन्नाथदर्शनं च।

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