Shatanama Stotram

Sri Narasimhagiri Ashtottara-Shatanama Stotram : श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम्….

श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Narasimhagiri Ashtottara-Shatanama Stotram in Hindi ब्रह्मवर्ण समुद्भूतो Shatanama Stotram ब्रह्ममार्गप्रवर्द्धकः ।ब्रह्मज्ञानसदासक्तो व्रह्मज्ञानपरायणः ॥ १ ॥ शिवपञ्चाक्षररतोऽशिवज्ञानविनाशकः ।शिवाभिषेकनिरतः शिवपूजापरायणः ॥ २ ॥ नारायणप्रवचनो नारायणपरायणः ।नारायणप्रत्नतनुर्नारायणनयस्थितः ॥ ३ ॥ दक्षिणामूर्तिपीठस्थो दक्षिणामूर्तिदेवतः ।श्रीमेधादक्षिणामूर्तिमन्त्रयन्त्रसदारतः ॥ ४ ॥ मण्डलेशवरप्रेष्ठो मण्डलेशवरप्रदः ।मण्डलेशगुरुश्रेष्ठो मण्डलेशवरस्तुतः ॥ ५ ॥ निरञ्जनप्रपीठस्थो निरञ्जनविचारकः ।निरञ्जनसदाचारो निरञ्जनतनुस्थितः ॥ ६ ॥ वेदविद्वेदहृदयो वेदपाठप्रवर्तकः।वेदराद्धान्तसंविष्टोऽवेदपथप्रखण्डकः ॥ ७ ॥ शाङ्कराद्वैतव्याख्याता Shatanama Stotram शाङ्कराद्वैतसंस्थितः ।शाकराद्वैतविद्वेष्टृविनाशनपरायणः ॥ ८ ॥ अत्याश्रमाचाररतो भूतिधारणतत्परः ।सिद्धासनसमासीनो काञ्चनाभो मनोहरः ॥ ९ ॥ अक्षमालाधृतग्रीवः काषायपरिवेष्टितः ।ज्ञानमुद्रादक्षहस्तो वामहस्तकमण्डलुः ॥ १० ॥ सन्न्यासाश्रमनिर्भाता परहंसधुरन्धरः ।सन्न्यासिनयसंस्कर्ता परहंसप्रमाणकः ॥ ११ ॥ माधुर्यपूर्णचरितो मधुराकारविग्रहः ।मधुवाङ्निग्रहरतो मधुविद्याप्रदायकः ॥ १२ ॥ मधुरालापचतुरो निग्रहानुग्रहक्षमः ।आर्द्धरात्रध्यानरतस्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥ १३ ॥ आरण्यवार्तिकपरः पुष्पमालाविभूषितः ।वेदान्तवार्तानिरतः प्रस्थानत्रयभूषणः ॥ १४ ॥ सानन्दज्ञानभाष्यादिग्रन्थग्रन्थिप्रभेदकः ।दृष्टान्तानूक्तिकुशलो दृष्टान्तार्थनिरूपकः ॥ १५ ॥ वीकानेरगुरुर्वाग्मी Shatanama Stotram वङ्गदेशप्रपूजितः ।लाहौरसरगोदादौ हिन्दूधर्मप्रचारकः ॥ १६ ॥ गणेशजययात्रादिप्रतिष्ठापनतत्परः ।गणेशशक्तिसूर्येशविष्णुभक्तिप्रचारकः ॥ १७ ॥ सर्ववर्णसमाम्नातलिङ्गपूजाप्रवर्द्धकः ।गीतोत्सवसपर्यादिचित्रयज्ञप्रवर्तकः ॥ १८ ॥ लोकेश्वरानन्दप्रियो दयानन्दप्रसेवितः ।आत्मानन्दगिरिज्ञानसतीर्थ्यपरिवेष्टितः ॥ १९ ॥ अनन्तश्रद्धापरमप्रकाशानन्दपूजितः ।जूनापीठस्थरामेशवरानन्दगिरेर्गुरुः ॥ २० ॥ माधवानन्दसंवेष्टा काशिकानन्ददेशिकः ।वेदान्तमूर्तिराचार्यो शान्तो दान्तः प्रभुस्सुहृत् ॥ २१ ॥ निर्ममो विश्वतरणिः स्मितास्यो निर्मलो महान् ।तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थदिव्यज्ञानप्रदायकः ॥ २२ ॥ गिरीशानन्दसम्प्राप्तपरमहंसपरम्परा ।जनार्दनगिरिब्रह्यसंन्यासाश्रमदीक्षितः ॥ २३ ॥ मण्डलेशकुलश्रेष्ठजयेन्द्रपुरीसंस्तुतः ।रामानन्दगिरिस्थानस्थापितो मण्डलेश्वरः ॥ २४ ॥ शन्दमहेशानन्दाय स्वकीयपददायकः ।यतीन्द्रकृष्णानन्दैश्च पूजितपादपद्मक्ः ॥ २५ ॥ उषोत्थानस्नानपूजाजपध्यानप्रचोदकः ।तुरीयाश्रमसंविष्ठभाष्यपाठप्रवर्तकः ॥ २६ ॥ अष्टलक्ष्यीप्रदस्तृप्तः स्पर्शदीक्षाविधायकः ।अहैतुककृपासिन्धुरनघोभक्तवत्सलः ॥ २७ ॥ विकारशून्यो दुर्धर्षः शिवसक्तो वरप्रदः ।काशीवासप्रियो मुक्तो भक्तमुक्तिविधायकः ॥ २८ ॥ श्रीभत्परमहंसादिसमस्तबिरुदाङ्कितः ।नृसिंहब्रह्म वेदान्तजगत्यद्य जगद्गुरुः ॥ २९ ॥ विलयं यान्ति पापानि गुरुनामानुकीर्तनात् ।मुच्यते नात्र सन्देहः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥ ३० ॥ ॥ इति श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Narayana Stotra : नारायण स्तोत्र…..

Narayana Stotra : नारायण स्तोत्र : नारायण स्तोत्र भगवान श्री विष्णु को समर्पित एक भक्तिपूर्ण ग्रंथ है। भक्तों के बीच विष्णु का एक सरल और लोकप्रिय नाम ‘नारायण’ है, और इसी नाम को जोड़कर विष्णु के अन्य नाम जैसे लक्ष्मीनारायण, शेषनारायण और अनंतनारायण आदि बने हैं। हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, प्रतिदिन नियमित रूप से श्री नारायण स्तोत्र का पाठ करने से हर मनुष्य का मन पूर्णता को प्राप्त करता है। Narayana Stotra हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारायण स्तोत्र का नियमित जाप करना भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है। नारायण स्तोत्र भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह एक बहुत ही सरल पाठ है, जिससे हर कोई लाभान्वित हो सकता है। Narayana Stotra यह भगवान विष्णु के उन शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक है जिसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। Narayana Stotra नारायण स्तोत्र का नियमित पाठ एक सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जीने में सहायक होता है। Narayana Stotra लक्ष्मी नारायण स्तोत्र के बोल (Lyrics) और उनका अंग्रेजी अर्थ। श्री लक्ष्मी नारायण स्तोत्र एक महान प्रार्थना है, जिसका पाठ भगवान कृष्ण ने देवी लक्ष्मी और भगवान नारायण की स्तुति में किया था। नारायण स्तोत्र के लाभ:Benefits of the Narayan Stotra नारायण स्तोत्र Narayana Stotra का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है, और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है।ऐसे पवित्र और शक्तिशाली नारायण स्तोत्र Narayana Stotra का पूर्ण तल्लीनता और श्रद्धा के साथ जाप करना, वास्तव में अनेक प्रकार से एक वरदान के समान है।उपलब्ध हिंदू ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार, भगवान विष्णु को “मकर राशि” (“श्रवण नक्षत्र”) की दिशा में विराजमान माना जाता है, जो लगभग मकर तारामंडल (Capricorn constellation) के साथ मेल खाता है। कुछ उपलब्ध पुराणों और वैष्णव परंपराओं में, विष्णु की दृष्टि को अनंत दूरी पर स्थित ‘दक्षिणी खगोलीय ध्रुव’ (Southern Celestial Pole) पर स्थित माना गया है।नारायण स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है, और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए : Who should recite this Stotra ? जो व्यक्ति बार-बार असफल हो रहा हो और समाज में अपमान का सामना कर रहा हो, उसे अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने और एक सुगम जीवन जीने के लिए, वैदिक नियमों के अनुसार तथा किसी पूजा-पाठ के विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में, नियमित रूप से Narayana Stotra नारायण स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। नारायण स्तोत्र हिंदी पाठ : Narayana Stotra in Hindi नारायण नारायण जय गोविंद हरे ॥नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥ करुणापारावार वरुणालयगंभीर नारायण ॥ 1 ॥घननीरदसंकाश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥पीतांबरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… मंजुलगुंजाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 8 ॥[बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण]नारायण नारायण जय गोविंद हरे… जलरुहदलनिभनेत्र जगदारंभकसूत्र नारायण ॥ 9॥पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 10 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 11 ॥हाटकनिभपीतांबर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 12 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… सरयुतीरविहार सज्जन​ऋषिमंदार नारायण ॥ 16 ॥विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… ध्वजवज्रांकुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… दशरथवाग्धृतिभार दंडक वनसंचार नारायण ॥ 20 ॥मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… जलनिधि बंधन धीर रावणकंठविदार नारायण ॥ 24 ॥ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥संभ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… अचलोद्धृतचंचत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥[भारत यतवरशंकर नामामृतमखिलांतर नारायण] नारायण नारायण जय गोविंद हरे नारायण ॥नारायण नारायण जय गोपाल हरे नारायण नारायण नारायण ॥ ॥ इति नारायण स्तोत्र संपूर्णम् ॥

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Shri Navnaag Stotra : श्री नवनाग स्तोत्र…..

Shri Navnaag Stotra : श्री नवनाग स्तोत्र श्री नवनाग स्तोत्र एक दिव्य मंत्र है जो उस व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है जो इस मंत्र का पाठ अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ करता है। इस स्तोत्र का पाठ सभी प्रकार के बुरे प्रभावों, श्रापों, टोने-टोटकों और काले जादू से बचने तथा उन्हें समाप्त करने के लिए भी किया जाता है। यह एक दिव्य मंत्र है जो उस व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है जो इस मंत्र का पाठ अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से ईर्ष्या, आपसी रंजिश और नुकसान पहुँचाने वाले प्रतिद्वंद्वी भी समाप्त हो जाते हैं। अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को पहले नवनाग स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और उसके बाद नाग गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। श्री नवनाग स्तोत्र के लाभ:Benefits of Shri Navnag Stotra यह सभी प्रकार के नाग दोष, कालसर्प दोष, सर्प दोष, तथा राहु दोष और केतु दोष को दूर करने और समाप्त करने के लिए भी एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है। यह मंत्र आपको अपने शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करता है। Navnaag Stotra यह आपको अपने शत्रुओं का सामना करने के लिए शक्ति और साहस भी प्रदान करता है। Navnaag Stotra श्री नवनाग स्तोत्र दुर्भाग्य, बुरी नज़र, बुरे सपनों से बचाता है, तथा बुरी आत्माओं और श्रापों से सुरक्षा प्रदान करता है। श्री नवनाग स्तोत्र का पाठ करने से ईर्ष्या, आपसी रंजिश और नुकसान पहुँचाने वाले प्रतिद्वंद्वी भी समाप्त हो जाते हैं। नवनाग स्तोत्र का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति और उसके परिवार को सफलता, विजय, सौभाग्य, उत्तम स्वास्थ्य, प्रचुर धन-संपत्ति, संतान सुख और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अनेक पुराणों के अनुसार, जब देवी नागेश्वरी के मंत्रों का निरंतर पाठ किया जाता है, Navnaag Stotra तो पाठ करने वाले को सभी प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। Navnaag Stotra गर्भवती महिलाएँ भी गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा के लिए और सुरक्षित प्रसव के लिए इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं। जिन निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति की इच्छा है, वे भी इस मंत्र का अत्यंत भक्ति के साथ पाठ करके देवी नागेश्वरी का आशीर्वाद और कृपा प्राप्त कर सकते हैं। युवा और अविवाहित व्यक्ति भी नवनाग स्तोत्र का पाठ करके अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। Navnaag Stotra अविवाहित युवतियाँ देवी नागेश्वरी से उचित आयु में शीघ्र विवाह होने तथा एक सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त करने के लिए प्रार्थना कर सकती हैं। अविवाहित युवक भी देवी नागेश्वरी से एक सुयोग्य पत्नी प्राप्त करने के लिए, तथा उत्तम चरित्र वाली सुंदर कन्या से विवाह होने के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:Who should recite this Stotra ? जिन व्यक्तियों का भाग्य रूठा हुआ है, जिन्हें जीवन के हर क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, और जो शत्रुओं से परेशान हैं—उन्हें नियमित रूप से इस ‘श्री नवनाग स्तोत्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री नवनाग स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Navnaag Stotra in Hindi ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् ।शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥ 1 ॥ एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम् ।सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः ॥ 2 ॥ तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ 3 ॥ ॥ इति श्री नवनाग नाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Gayatri Jayanti 2026

Gayatri Jayanti 2026 Date And Time : गायत्री जयंती तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और चमत्कारी गायत्री मंत्र का रहस्य…

Gayatri Jayanti 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म के विस्तृत और रहस्यमयी ज्ञानकोश में माता गायत्री को सर्वोपरि और अत्यंत पवित्र स्थान प्राप्त है। उन्हें साक्षात ‘वेदों की माता’ (वेदमाता) कहकर पुकारा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का जो भी प्रकाश मौजूद है, वह सब माता गायत्री के असीम आशीर्वाद का ही परिणाम है। इस वर्ष Gayatri Jayanti 2026 का यह अत्यंत पावन पर्व हमारे जीवन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान और सत्य का दिव्य प्रकाश भरने का एक बहुत ही शानदार अवसर लेकर आ रहा है। यह वह परम दिन है जब ब्रह्मा जी ने अपने चार मुखों से चार वेदों के माध्यम से गायत्री मंत्र का ज्ञान पूरे संसार को दिया था। आज हम गहराई से जानेंगे कि Gayatri Jayanti 2026 कब मनाई जाएगी, इसके शुभ मुहूर्त क्या हैं, माता की उत्पत्ति की रोचक पौराणिक कथा क्या है, और इस दिन किस विशेष विधि से पूजा व मंत्र जाप करके आप अपने जीवन को पूरी तरह से सफल बना सकते हैं। Gayatri Jayanti 2026 की सही तिथि और एकदम सटीक शुभ मुहूर्त….. हिन्दू वैदिक पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, मुख्य रूप से यह पावन जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को बहुत ही भव्यता और भक्ति-भाव के साथ मनाई जाती है। साल 2026 में Gayatri Jayanti 2026 का मुख्य पर्व 25 जून 2026, दिन गुरुवार को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाएगा। आइए इसके एकदम सटीक मुहूर्तों पर नजर डालते हैं ताकि आपसे पूजा में कोई चूक न हो: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: 24 जून 2026 की शाम 06:14 बजे से। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: 25 जून 2026 की रात 08:10 बजे पर। उदया तिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के पवित्र सनातन नियमों का पालन करते हुए, Gayatri Jayanti 2026 का यह व्रत 25 जून को ही रखा जाएगा, और इसी दिन निर्जला एकादशी का महान पर्व भी पूरे भक्ति-भाव के साथ मनाया जाएगा। श्रावण मास की Gayatri Jayanti 2026 का विशेष महत्व भारत के कई अलग-अलग हिस्सों और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार, गायत्री जयंती का पर्व श्रावण मास (सावन के महीने) की पूर्णिमा तिथि के दिन भी अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस पवित्र दिन भी वेदमाता गायत्री का प्राकट्य हुआ था। श्रावण मास वाली Gayatri Jayanti 2026 का आयोजन इस वर्ष 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को किया जाएगा। पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 27 अगस्त 2026 की सुबह 09:10 बजे। पूर्णिमा तिथि का समापन: 28 अगस्त 2026 की सुबह 09:49 बजे। यह दिन इसलिए भी अत्यंत खास बन जाता है क्योंकि 28 अगस्त को ही रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा जैसे बड़े त्योहार भी एक साथ मनाए जाएंगे। माता गायत्री का दिव्य स्वरूप और उनकी रहस्यमयी शक्ति क्या आप जानते हैं कि माता गायत्री का स्वरूप इतना शक्तिशाली क्यों माना जाता है? धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, वेदमाता गायत्री त्रिदेवों—यानी भगवान ब्रह्मा, श्री विष्णु और देवों के देव महादेव (शिव)—इन तीनों की सम्मिलित ऊर्जा और परम शक्तियों से मिलकर बनी हैं। Gayatri Jayanti 2026 के शुभ अवसर पर उनके इस दिव्य रूप का ध्यान करना मन को असीम शांति देता है। शास्त्रों के अनुसार, माता गायत्री के पांच मुख और दस हाथ हैं। उनके चार मुख साक्षात हमारे चार वेदों का प्रतीक माने जाते हैं, जबकि उनका पांचवां मुख परम शक्ति और दिव्यता को दर्शाता है। उनके दस हाथों में भगवान विष्णु के प्रतीक मौजूद हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के पालन-पोषण का संकेत देते हैं। उन्हें साक्षात भगवान ब्रह्मा जी की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है। ब्रह्मा जी के यज्ञ और माता गायत्री के विवाह की पौराणिक कथा आखिर माता गायत्री का विवाह भगवान ब्रह्मा से कैसे हुआ? इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है। प्राचीन काल में एक बार भगवान ब्रह्मा जी संसार के कल्याण के लिए एक बहुत ही विशाल और पवित्र यज्ञ का आयोजन कर रहे थे। हिंदू धर्म के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी यज्ञ की पूर्णता के लिए पत्नी का पति के साथ बैठना अनिवार्य होता है। ब्रह्मा जी को इस यज्ञ में अपनी पत्नी माता सावित्री के साथ बैठना था, लेकिन किसी कारणवश माता सावित्री को वहां पहुंचने में बहुत देर हो गई और यज्ञ का शुभ मुहूर्त तेजी से बीत रहा था। यज्ञ को अधूरा छोड़ने का मतलब सृष्टि में असंतुलन पैदा करना था। इस घोर संकट को टालने और यज्ञ को सही समय पर पूर्ण करने के लिए, भगवान ब्रह्मा जी ने वहां उपस्थित अत्यंत तेजस्विनी माता गायत्री को अपनी पत्नी का स्थान दिया और उनके साथ बैठकर उस महान यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न किया। Gayatri Jayanti 2026 पर इस कथा को पढ़ने या सुनने से इंसान के सभी वैवाहिक कष्ट दूर होते हैं और उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। महामंत्र: गायत्री मंत्र की उत्पत्ति, अर्थ और इसके चमत्कारी लाभ ऋग्वेद में वर्णित मूल गायत्री मंत्र मुख्य रूप से सूर्य देव (सविता) को समर्पित है, जो इंसान को सत्य, चेतना और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। विश्वामित्र जी की कठोर तपस्या के बाद ही यह महान मंत्र आम जनमानस के कल्याण के लिए उपलब्ध हो पाया था। मूल गायत्री मंत्र: “ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।” इसका गहरा अर्थ: हम उस परम सत्य, चेतना और आनंद के प्रतीक, सृष्टि के रचयिता और प्रकाशवान ईश्वर के उस महान तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को हमेशा सत्य और सही दिशा की ओर प्रेरित करे। Gayatri Jayanti 2026 के दिन इस महामंत्र का जाप करने से व्यक्ति को कई असीम लाभ मिलते हैं: मानसिक शांति और वैज्ञानिक लाभ: विज्ञान भी यह मानता है कि गायत्री मंत्र का स्पष्ट उच्चारण हमारे दिमाग में ‘अल्फा ब्रेन वेव्स’ (alpha brain waves) को बढ़ाता है, जिससे गहरे ध्यान और असीम शांति की अनुभूति होती है। कामधेनु की प्राप्ति: जो भी व्यक्ति पूरे नियम से इसका जाप करता है, उसे ‘कामधेनु’ के समान फल मिलता है—अर्थात उसकी सभी उचित और सकारात्मक इच्छाएं अपने आप पूरी होने लगती हैं। सही मार्ग का दर्शन: यह मंत्र इंसान को कभी भी गलत

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Prapatti Stotram

Sri Narsimha Prapatti Stotram : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र…

श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Narsimha Prapatti Stotram in Hindi माता नृसिंहः पिता नृसिंहःभ्राता नृसिंहः सखा नृसिंहः ।विद्या नृसिंहो द्रविणं नृसिंहःस्वामी नृसिंहः सकलं नृसिंहः ॥ १ ॥ इतो नृसिंहः परतो नृसिंहः यतोयतो याहि(मि) ततो नृसिंहः ।नृसिंहदेवात्परो न Prapatti Stotram कश्चित्तस्मान्नृसिंहं शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥ इतो नृसिंहः परतो नृसिंहः यतोयतो यामि ततो नृसिंहः ।बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहोनृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥ ॥ इति श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥ Sri Narsimha Prapatti Stotram Lyrics : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र पाठ mata nrusinhah pita nrusinhahbhrata nrusinhah sakha nrusinhah ।vidya nrusinho dravinam nrusinhahsvaami nrusinhah sakalam nrusinhah ॥ 1 ॥ ito nrusinhah parato nrusinhah yatoyato yahi(mi) tato nrusinhah ।nrusinhadevatparo na kaschittasmannrusinham sharanam prapadye ॥ 2 ॥ ito nrusinhah parato nrusinhah yatoyato yami tato nrusinhah ।bahirnrusinho hridaye nrusinhonrusinhamadim sharanam prapadye ॥ 3 ॥ ॥ iti shri narasingh prapatti stotra sampurnam ॥ Narsimha Prapatti Stotram : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र विशेषताएं: श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र के साथ-साथ यदि नरसिंह कवच या नरसिंह अष्टक कवच का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र के पाठ के साथ साथ नरसिंह अष्टकम का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है| और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही नरसिंह जी की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस स्तोत्र पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Panchamrutha Stotram

Sri Narasimha Panchamrutha Stotram : श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र….

श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Narasimha Panchamrutha Stotram in Hindi अहोबिलं नारसिंहं गत्वा रामः प्रतापवान् ।नमस्कृत्वा श्रीनृसिंहं अस्तौषीत् कमलापतिम् ॥ १ ॥ गोविन्द केशव जनार्दन वासुदेवविश्वेश विश्व मधुसूदन विश्वरूप ।श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम पुष्कराक्षनारायणाच्युत नृसिंह नमो नमस्ते ॥ २ ॥ देवाः समस्ताः खलु योगिमुख्याःगन्धर्व विद्याधर किन्नराश्च ।यत्पादमूलं सततं नमन्ति तंनारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ३ ॥ वेदान् समस्तान् खलु शास्त्रगर्भान्विद्याबले कीर्तिमतीं च लक्ष्मीम् ।यस्य प्रसादात् सततं लभन्ते तंनारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ४ ॥ ब्रह्मा शिवस्त्वं पुरुषोत्तमश्चनारायणोऽसौ Panchamrutha Stotram मरुतां पतिश्च ।चन्द्रार्क वाय्वग्नि मरुद्गणाश्च त्वमेव तंत्वां सततं नतोऽस्मि ॥ ५ ॥ स्वप्नेऽपि नित्यं जगतां त्रयाणाम्स्रष्टा च हन्ता विभुरप्रमेयः ।त्राता त्वमेकस्त्रिविधो विभिन्नः तंत्वां नृसिंहं सततं नतोऽस्मि ॥ ६ ॥ राघवेणकृतं स्तोत्रं पञ्चामृतमनुत्तमम् ।पठन्ति ये द्विजवराः तेषां स्वर्गस्तु शाश्वतः ॥ ७ ॥ ॥ इति श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Padmini Ekadashi

Padmini Ekadashi Vrat Katha : पद्मिनी एकादशी सम्पूर्ण व्रत कथा….

Padmini Ekadashi Vrat Katha: धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले- हे जनार्दन! अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए। श्री भगवान बोले, हे राजन्- अधिकमास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है वह पद्मिनी (कमला) एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिकमास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती हैं। ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा बताई थी। भगवान कृष्‍ण बोले- मलमास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है, जो मनुष्‍यों के लिए भी दुर्लभ है। यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके कांसे के पात्र में जौ-चावल आदि का भोजन करें तथा नमक न खाएं। भूमि पर सोएं और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दंतधावन करें और जल के 12 कुल्ले करके शुद्ध हो जाएं। सूर्य उदय होने के पूर्व उत्तम तीर्थ में स्नान करने जाएं। इसमें गोबर, मिट्‍टी, तिल तथा कुशा व आंवले के चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करें। Padmini Ekadashi श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करें। हे म‍ुनिवर! पूर्वकाल में त्रेयायुग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की 1,000 परम प्रिय स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राज्यभार को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब असफल रहे।  तब राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया। महाराज के साथ उनकी परम प्रिय रानी, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, राजा के साथ वन में जाने को तैयार हो गई। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए।  राजा ने उस पर्वत पर 10 हजार वर्ष तक तप किया, परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। Padmini Ekadashi तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे। रानी पद्मिनी Padmini Ekadashi ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍ती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। Padmini Ekadashi तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। सो हे नारद! जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं।…… Padmini Ekadashi की सम्पूर्ण जानकारी के लिए क्लिक करें…

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Dasavatara Stotra

Shri Dasavatara Stotra : श्री दसावतार स्तोत्र

Shri Dasavatara Stotra: श्री दशावतार स्तोत्र श्री दशावतार स्तोत्र का पाठ करने से साधक हर तरह की मुसीबतों से सुरक्षित रहता है और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके पहले भाग में भगवान विष्णु के दस अवतारों का गुणगान किया गया है। इसका मूल पाठ, लिप्यंतरण और अनुवाद यहाँ दिया गया है। श्री दशावतार स्तोत्र भगवान विष्णु की स्तुति में गाया जाने वाला एक भजन है। यह श्री जयदेव रचित ‘गीत-गोविंद’ का पहला भाग है। अवतार, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर का एक विशेष प्रकटीकरण होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि ईश्वर के अवतार असंख्य हैं। इनमें से कुछ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जबकि अन्य को भक्त की कल्पना पर छोड़ दिया गया है। इसका सामान्य सिद्धांत यह है कि जहाँ कहीं भी कोई भव्य, सुंदर या महिमामयी वस्तु दिखाई दे, उसे ईश्वर की महिमा का ही एक अंश समझना चाहिए। ‘भागवत पुराण’ में चौबीस अवतारों की गणना और उनका वर्णन किया गया है। Dasavatara Stotra इनमें महान ऋषि कपिल (जो सांख्य दर्शन के संस्थापक थे) और ऋषभ (जिन्हें जैन धर्म के अनुयायी अपना प्रथम तीर्थंकर मानते हैं) शामिल हैं। Dasavatara Stotra इसी तर्क का विस्तार करते हुए, उन सभी महान ऋषियों को भी ईश्वर का अवतार, अवतरण या उनकी महिमा का ही मूर्त रूप माना जाना चाहिए, जिनके जीवन और उपदेशों ने आध्यात्मिकता को सुदृढ़ किया है। सभी अवतारों का एक ही साझा उद्देश्य होता है—सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का संहार करना और धर्म की स्थापना करना। Dasavatara Stotra हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री दशावतार स्तोत्र का नियमित पाठ करना, भगवान दशावतार को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। जब हम सत्य की खोज में, ज्ञान की मथनी से अपने अनुभवों के सागर को मथने का प्रयास करते हैं, तो हमें यह ज्ञात होता है कि स्वयं ज्ञान को भी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए किसी आधार की आवश्यकता होती है। Dasavatara Stotra तर्क-वितर्क की अपनी संरचना को स्थापित करने हेतु किसी ‘परम आधार’ की खोज का यह प्रयास तब तक एक अंतहीन क्रम (infinite regress) में फँसा रह सकता है, Dasavatara Stotra जब तक कि इसे उस अचल, सर्व-समर्थ और सर्व-धारक आधार पर स्थापित न कर दिया जाए—जो ‘स्वयंसिद्ध सत्य’ का प्रतीक है और जिसे ईश्वर के ‘कच्छप’ (कछुए) अवतार के रूप में दर्शाया गया है। श्री दशावतार स्तोत्र के लाभ: श्री दशावतार स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है; यह आपके जीवन से समस्त बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन लोगों की मानसिक शांति भंग हो गई है, जिन्हें व्यापार में लगातार हानि हो रही है, और जो बुरी शक्तियों या गतिविधियों से प्रभावित हैं—उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से ‘श्री दशावतार स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। इससे उन्हें अवश्य ही राहत मिलेगी। श्री दसावतार स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Dasavatara Stotra in Hindi प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ।।केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।। 1 ।। क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ।।केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।। 2 ।। वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।शशिनि कलंकलेव निमग्ना ।।केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ।। 3 ।। तव करकमलवरे नखमद्भुतश्रृंगम् ।दलितहिरण्यकशिपुतनुभृंगम् ।।केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।। 4 ।। छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।पदनखनीरजनितजनपावन ।।केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।। 5 ।। क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।।केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।। 6 ।। वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।।केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ।। 7 ।। वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।।केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।। 8 ।। निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।सदयह्रदयदर्शितपशुधातम् ।।केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।। 9 ।। म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।।केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।। 10 ।। श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।।केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।। 11 ।। ।। इति श्री दसावतार स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Vamana Stotram

Sri Dadhi Vamana Stotram : श्री दधि वामन स्तोत्रम्

श्री दधि वामन स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Dadhi Vamana Stotram in Hindi हेमाद्रिशिखराकारं शुद्धस्फटिकसन्निभम् ।पूर्णचन्द्रनिभं देवं द्विभुजं वामनं स्मरेत् ॥ १ ॥ पद्मासनस्थं देवेशं चन्द्रमण्डलमध्यगम् ।ज्वलत्कालानलप्रख्यं तडित्कॊटिसमप्रभम् ॥ २ ॥ सुर्यकॊटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ।चन्द्रमण्डलमध्यस्थं विष्णुमव्ययमच्युतम् ॥ ३ ॥ श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं दिव्यरत्नविभूषितम् ।पीतांबरमुदाराङ्गं वनमालाविभूषितम् ॥ ४ ॥ सुन्दरं पुण्डरीकाक्षं किरीटेन विराजितम् ।षोडशस्त्रीयुतं संयगप्सरोगणसेवितम् ॥ ५ ॥ ऋग्यजुस्सामाथर्वाद्यैः गीयमानं जनार्दनम् ।चतुर्मुखाद्यैः देवेशैः स्तोत्राराधनतत्परैः ॥ ६ ॥ सनकाद्यैः मुनिगणैः स्तूयमानमहर्निशम् ।त्रियंबको महादेवो नृत्यते यस्य सन्निधौ ॥ ७ ॥ दधिमिश्रान्नकवलं रुक्मपात्रं च दक्षिणे ।करे तु चिन्तयेद्वामे पीयूषममलं सुधीः ॥ ८ ॥ साधकानाम् प्रयच्छन्तं अन्नपानमनुत्तमम् ।ब्राह्मे मुहूर्तेचोत्थाय ध्यायेद्देवमधोक्षजम् ॥ ९ ॥ अतिसुविमलगात्रं रुक्मपात्रस्थमन्नम्सुललितदधिभाण्डं पाणिना दक्षिणेन ।कलशममृतपूर्णं वामहस्ते दधानं तरतिसकलदुःखान् वामनं भावयेद्यः ॥ १० ॥ क्षीरमन्नमन्नदाता लभेदन्नाद एव च ।पुरस्तादन्नमाप्नोति पुनरावर्तिवर्जितम् ॥ ११ ॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यं लभते चान्नसंपदः ।इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु प्रातःकाले द्विजोत्तमः ॥ १२ ॥ अक्लेशादन्नसिध्यर्थं ज्ञानसिध्यर्थमेव च ।अभ्रश्यामः शुद्धयज्ञोपवीती सत्कौपीनः पीतकृष्णाजिनश्रीःछ्त्री दण्डी पुण्डरीकायताक्षः पायाद्देवो वामनो ब्रह्मचारी ॥ १३ ॥ अजिनदण्डकमण्डलुमेखलारुचिरपावनवामनमूर्तये ।मितजगत्त्रितयाय जितारये निगमवाक्पटवे वटवे नमः ॥ १४ ॥ श्रीभूमिसहितं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम् ।नमामि वामनं विष्णुं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १५ ॥ वामनो बुद्धिदाता च द्रव्यस्थो वामनः स्मृतः ।वामनस्तारकोभाभ्यां वामनाय नमो नमः ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री दधि वामन स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Shri Dattatreya Stotra

Shri Dattatreya Stotra : श्री दत्तात्रेय स्तोत्र….

Shri Dattatreya Stotra : श्री दत्तात्रेय स्तोत्र: भगवान दत्तात्रेय को हिंदू त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव – का एक ही रूप में अवतार माना जाता है। ‘दत्तात्रेय’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दत्त’ (दिया हुआ) और ‘आत्रेय’ (ऋषि अत्रि के पुत्र), जिसका तात्पर्य उस सत्ता से है जिसने स्वयं को ऋषि अत्रि के पुत्र के रूप में समर्पित कर दिया। Shri Dattatreya Stotra भगवान दत्तात्रेय का जन्म पवित्र दंपत्ति अनुसूया और अत्रि के यहाँ हुआ था। उन्हें तीन सिरों के साथ दर्शाया जाता है, जो हिंदू देवताओं की त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव – की एकता का प्रतीक हैं। दत्तात्रेय सभी देवताओं, पैगंबरों, संतों और योगियों के साक्षात् स्वरूप हैं। वे सभी गुरुओं के गुरु हैं। हम सभी को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें वे समस्याएं भी शामिल हैं जो दिवंगत पूर्वजों के कारण उत्पन्न होती हैं। Shri Dattatreya Stotra ऐसा कहा जाता है कि जो पूर्वज मृत्यु के उपरांत पितृलोक (जैसे मर्त्यलोक और भुवर्लोक) में अटके हुए हैं, यदि वे श्राद्ध कर्मों के माध्यम से दी गई हमारी आहुतियों से संतुष्ट नहीं होते, तो वे हमारे परिवार में समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। Shri Dattatreya Stotra इनमें से कुछ समस्याओं में विवाह में विलंब, घर में कलह, संतानहीनता, समय से पहले जन्मे बच्चे, शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित संतानें और अन्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं। इन सभी समस्याओं का समाधान श्रद्धा और भक्ति के साथ, निर्धारित विधि से, नियमित रूप से दत्तात्रेय स्तोत्र का पाठ करके किया जा सकता है। भगवान दत्तात्रेय, तीनों महान देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का एक ही रूप में समाहित स्वरूप हैं। Shri Dattatreya Stotra उनके साथ चार वेद, कुत्तों के रूप में चलते हैं। एक कथा के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने साध्वी अनुसूया की पवित्रता की परीक्षा लेने का निश्चय किया और उनसे नग्न अवस्था में उन्हें भोजन परोसने का आग्रह किया। अनुसूया ने अपनी शक्ति से उन तीनों देवताओं को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और उन्हें एक साथ गोद में उठा लिया। Shri Dattatreya Stotra दत्तात्रेय के प्राकट्य से जुड़ी यह एक प्रचलित कथा है। कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्यों में बड़ी संख्या में लोग भगवान दत्तात्रेय की पूजा-अर्चना करते हैं। श्री दत्तात्रेय स्तोत्र के लाभ: भगवान दत्तात्रेय अपने भक्तों पर आने वाली समस्याओं को तत्काल दूर कर देते हैं। अतः, गुरुवार के दिन, पूर्णिमा तिथि पर अथवा दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर, और विशेष रूप से प्रतिदिन 108 बार इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से, मनुष्य के समस्त कष्टों और दुखों का शीघ्र ही निवारण हो जाता है। Shri Dattatreya Stotra ये ऐसे स्तोत्र हैं, जिनका निरंतर जाप करने से न केवल व्यक्ति के जीवन की परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, बल्कि यदि आप पिता के किसी दोष के कारण परेशान हैं, तो वह समस्या भी तत्काल हल हो जाती है; साथ ही, ‘पिता-परमेश्वर’ की कृपा प्राप्त होने लगती है और जीवन सुखमय हो जाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति ‘पितृ दोष’ से पीड़ित हैं, उन्हें इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए इस ‘श्री दत्तात्रेय स्तोत्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री दत्तात्रेय स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Dattatreya Stotra in Hindi जटाधरं पाण्डुराङ्गं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ र्हस्वदीर्घकृशस्थूल-नामगोत्र-विवर्जित ।पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपध्राय च ।सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रमातापुरनिवासिने ।जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ अवधूतसदानन्दपरब्रह्मस्वरूपिणे ।विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ सत्यंरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ ॥ इति श्री दत्तात्रेय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Padmini Ekadashi 2026

Padmini Ekadashi 2026 Date And Time: पद्मिनी एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा…..

Padmini Ekadashi 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और भारतीय वैदिक पंचांग की अत्यंत रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक दुनिया में व्रतों का एक बहुत ही विशेष और गहरा आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। भगवान श्री हरि विष्णु, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार हैं, उन्हें समर्पित सभी व्रतों में एकादशी का व्रत सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है। लेकिन जब बात Padmini Ekadashi 2026 की आती है, तो इसका महत्व और इसकी अलौकिक शक्ति कई हजार गुना अधिक बढ़ जाती है। हिन्दू पंचांग की एकदम सटीक और वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, हर तीन साल या लगभग 32 महीनों के अंतराल पर एक अतिरिक्त मास जुड़ता है, जिसे हम अधिक मास, मलमास या फिर पुरुषोत्तम मास के नाम से जानते हैं। इसी अत्यंत पवित्र और दुर्लभ अधिक मास के शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के बढ़ते हुए चरण) में जो महान एकादशी आती है, उसे ही शास्त्रों में पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। Padmini Ekadashi 2026 Date And Time: पद्मिनी एकादशी की सही तिथि…. इस वर्ष Padmini Ekadashi 2026 का एक बहुत ही शुभ और शक्तिशाली संयोग मई के महीने में बन रहा है। जो भी भक्त पूरे सच्चे मन, अटूट श्रद्धा और पूर्ण निष्ठा के साथ इस दिन व्रत का कड़ाई से पालन करता है, उसके जीवन से सभी प्रकार के जाने-अनजाने किए गए पाप और भारी कष्ट हमेशा-हमेशा के लिए धुल जाते हैं और अंत में मृत्यु के पश्चात उसे साक्षात श्री विष्णु के परम धाम ‘वैकुंठ’ की प्राप्ति होती है। व्रत की एकदम सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त (Timings & Dates) किसी भी वैदिक व्रत या तांत्रिक पूजा का पूरा और सिद्ध फल इंसान को तभी प्राप्त होता है जब उसे सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का पूरा ज्ञान हो। इस वर्ष Padmini Ekadashi 2026 का पवित्र उपवास 27 मई, दिन बुधवार को पूरे भारतवर्ष में अत्यंत उल्लास और भक्ति-भाव के साथ रखा जाएगा। आइए Padmini Ekadashi 2026 के एकदम सटीक और प्रमाणित मुहूर्तों पर विस्तार से नजर डालते हैं ताकि आपसे पूजा में कोई भी भूल-चूक न हो: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: हिन्दू पंचांग के अनुसार 26 मई 2026 की सुबह 5:10 (या पंचांग भेद से उज्जैन के समय अनुसार 5:11) बजे से ही एकादशी तिथि शुरू हो जाएगी। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: इस पावन एकादशी तिथि का समापन अगले दिन यानी 27 मई 2026 को सुबह 6:21 (या 6:22) बजे होगा। व्रत का पारण (उपवास खोलने का शुभ समय): हिन्दू धर्म शास्त्रों के कड़े नियमों के अनुसार एकादशी व्रत का पारण हमेशा ‘हरि वासर’ की अवधि पूरी तरह समाप्त होने के बाद ही करना चाहिए। इसलिए व्रत के अगले दिन यानी 28 मई 2026 को सुबह 5:25 से 7:56 (उज्जैन के समय अनुसार 5:45 से 7:57) के बीच व्रत का पारण किया जाएगा। सनातन हिन्दू धर्म में ‘उदया तिथि’ (अर्थात सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है, इसलिए उदया तिथि के आधार पर Padmini Ekadashi 2026 का मुख्य व्रत 27 मई को ही पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न किया जाएगा। पद्मिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व (Significance) अधिक मास (लौंध का महीना या पुरुषोत्तम मास) को किसी भी तरह के नए भौतिक कार्यों या विवाह जैसे शुभ संस्कारों के लिए वर्जित और अशुभ माना गया है, लेकिन दूसरी ओर इसे कठोर आध्यात्मिक साधना, तपस्या, दान और ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति के लिए पूरे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, साधारण महीनों की एकादशी की तुलना में इस मलमास में आने वाली Padmini Ekadashi 2026 का व्रत करने से मनुष्य को कई गुना अधिक और चमत्कारी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। Padmini Ekadashi 2026 इस जाग्रत व्रत को लोक कथाओं में ‘कमला एकादशी’ के अत्यंत ही सुंदर और दिव्य नाम से भी जाना जाता है। इसका व्रत करने से इंसान के जीवन में अपार सुख-समृद्धि आती है, बरसों पुरानी रुकी हुई इच्छाओं की पूर्ति होती है और भगवान विष्णु के प्रति अत्यंत गहरी और निस्वार्थ भक्ति जागृत होती है। व्रत की पौराणिक और चमत्कारी कथा (Vrat Katha) व्रत की पूर्ण सफलता के लिए इसकी पौराणिक कथा को शांत मन से पढ़ना या एकाग्रता से सुनना बहुत जरूरी माना गया है। Padmini Ekadashi 2026 द्वापर युग में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह रहस्यमयी कथा विस्तार से सुनाई थी। प्राचीन काल (त्रेतायुग) में माहिष्मती नाम की एक बहुत ही विशाल और भव्य नगरी हुआ करती थी, जिस पर राजा कृतवीर्य (उपकृतवीर्य) का राज था। राजा की सौ सुंदर पत्नियां थीं, लेकिन इतने सारे विवाहों के बावजूद उनका कोई भी ऐसा योग्य और बलवान पुत्र नहीं था जो उनके बाद उनकी राजगद्दी संभाल सके। पुत्र प्राप्ति की भारी लालसा और घोर निराशा में राजा ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी प्रमदा के साथ अपना सारा राज-पाट और राजशाही वस्त्र त्याग दिए, और वे दोनों घने जंगलों में गंधमादन पर्वत पर कठिन तपस्या करने चले गए। Padmini Ekadashi 2026 वहां उन्होंने पूरे दस हजार वर्षों तक घोर तप किया, जिससे राजा का शरीर भूखा-प्यासा रहकर केवल हड्डियों का एक ढांचा मात्र रह गया। अपने पति की यह अत्यंत दयनीय दशा देखकर महारानी प्रमदा बहुत दुखी हुईं और उन्होंने आश्रम में जाकर परम सती महर्षि अनुसूया जी से मार्गदर्शन मांगा। माता अनुसूया ने उन्हें अत्यंत ज्ञानवर्धक रहस्य बताते हुए कहा कि हर 32 महीने बाद एक मलमास आता है और उसमें दो विशेष एकादशी होती हैं: शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी और कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी। महर्षि अनुसूया के बताए हुए कड़े नियमों के अनुसार रानी प्रमदा ने पूरे विधि-विधान से व्रत रखा और रात भर जागकर भगवान का एकाग्र ध्यान किया। रानी की इस गहरी और अटूट निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न होकर स्वयं श्री भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने रानी को मनचाहा वरदान मांगने को कहा। Padmini Ekadashi 2026 रानी ने बड़ी ही चतुराई और निस्वार्थ प्रेम से अपने पति के लिए एक ऐसा महान पुत्र मांगा जिसे भगवान विष्णु के अलावा इस ब्रह्मांड का कोई भी देवता, दानव या इंसान कभी न हरा सके। भगवान के असीम आशीर्वाद और व्रत के प्रबल प्रताप से रानी ने कार्तवीर्य अर्जुन नामक एक अत्यंत शक्तिशाली और अजेय

Padmini Ekadashi 2026 Date And Time: पद्मिनी एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा….. Read More »

Vat Savitri Vrat

Vat Savitri Vrat 2026 Date And Time : वट सावित्री व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मलमास का रहस्य और अचूक पूजा विधि….

Vat Savitri Vrat 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की अपार खुशहाली के लिए कई तरह के व्रत रखे जाते हैं। इन्हीं तमाम सुहाग व्रतों में से एक सबसे प्रमुख, शक्तिशाली और सौभाग्यदायी व्रत वट सावित्री का माना जाता है। यह पावन पर्व सदियों से हिंदू विवाहित स्त्रियों के लिए अटूट प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को यह महान व्रत पूरे विधि-विधान के साथ रखा जाता है। इस बार Vat Savitri Vrat 2026 को लेकर महिलाओं में काफी उत्साह और कुछ भ्रम भी देखने को मिल रहा है, जिसका मुख्य कारण है इसी समय लगने वाला ‘मलमास’। Vat Savitri Vrat 2026 Date And Time : वट सावित्री व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त…. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ दिन पर माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, निस्वार्थ प्रेम और कठोर तपस्या के बल पर स्वयं मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे। तब से लेकर आज तक हर सुहागिन स्त्री अपने दांपत्य जीवन की रक्षा के लिए इस प्राचीन परंपरा को पूरे समर्पण के साथ निभाती आ रही है। आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं इस व्रत की संपूर्ण जानकारी। व्रत की सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त : Exact date and auspicious time of fasting Vat Savitri Vrat की पूर्ण सफलता के लिए उसकी सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का ज्ञान होना बहुत ही ज्यादा आवश्यक है। पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस साल ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि का आरंभ 16 मई की सुबह 05 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है। वहीं, इस पवित्र अमावस्या तिथि का पूर्ण समापन अगले दिन यानी 17 मई को मध्य रात्रि के बाद 01 बजकर 30 मिनट पर होगा। हमारे हिंदू धर्म में ‘उदया तिथि’ (सूर्य उदय होने के समय जो तिथि मौजूद होती है) का सर्वाधिक महत्व होता है। इसलिए उदया तिथि के कड़े नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए Vat Savitri Vrat 2026 इस वर्ष 16 मई, दिन शनिवार को ही पूरे भारतवर्ष में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। जो महिलाएं महाराष्ट्र और गुजरात जैसे क्षेत्रों की परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखती हैं, उनके लिए ‘वट पूर्णिमा’ का व्रत 29 जून को रखा जाएगा। कई दुर्लभ और शुभ योगों का बन रहा है महासंयोग : A great coincidence of many rare and auspicious combinations is taking place इस साल का यह पर्व कोई साधारण व्रत नहीं है, बल्कि यह अपने साथ कई सारे अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी योग लेकर आ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार Vat Savitri Vrat 2026 के ही पावन दिन पर शनि जयंती का महान पर्व भी पड़ रहा है। शनिवार का दिन होने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या का भी अत्यंत शुभ नाम दिया गया है। इसके अलावा इस दिन मिथुन राशि में शुक्र और गुरु (बृहस्पति) ग्रह की एक बहुत ही दुर्लभ युति भी बन रही है, साथ ही दर्श अमावस्या और मासिक कार्तिगाई जैसे कई और शुभ योगों का महासंयोग भी इसी दिन देखने को मिलेगा। ये सारे दिव्य संयोग मिलकर इस व्रत के आध्यात्मिक फल को कई हजार गुना तक बढ़ा देते हैं। पहली बार व्रत करने वाली महिलाओं के लिए मलमास की दुविधा का समाधान : Solution to the dilemma of Malamas for women fasting for the first time अब हम उस सबसे बड़ी उलझन और सवाल पर आते हैं जो विशेष रूप से उन नवविवाहित महिलाओं के मन में है जो इस साल पहली बार यह व्रत उठाने (शुरू करने) की सोच रही हैं। सोशल मीडिया और कई अन्य माध्यमों पर यह चर्चा चल रही है कि इस साल मलमास लग रहा है, तो क्या नई सुहागिन स्त्रियों को यह व्रत इस साल शुरू करना शुभ होगा या अशुभ? पंचांग की सही और सटीक जानकारी के अनुसार, इस बार Vat Savitri Vrat 2026 के ठीक अगले दिन यानी 17 मई से मलमास आरंभ होने जा रहा है। चूंकि मलमास में कुछ विशेष नए व्रत-त्योहारों की शुरुआत वर्जित होती है (जैसे एकादशी, मंगलवार व्रत, छठ या जितिया), इसलिए लोगों के मन में शंका पैदा हो गई है। लेकिन धर्म शास्त्रों और सिद्ध पंडितों का एकदम स्पष्ट मत है कि नवविवाहित महिलाएं बिना किसी डर और शंका के इस साल से अपना व्रत पूरे उत्साह के साथ शुरू कर सकती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिस दिन व्रत रखा जा रहा है (16 मई), उस दिन मलमास की शुरुआत नहीं हुई है; इसलिए इस व्रत पर मलमास का कोई भी दोष या अशुभ प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ेगा। इसके अलावा, शास्त्रों के नियम यह भी बताते हैं कि सुहाग से जुड़े कुछ विशेष व्रत जैसे करवा चौथ, मधुश्रावणी और Vat Savitri Vrat 2026 को मलमास के दौरान भी शुरू करने पर कोई पाप या दोष नहीं लगता है। अतः नवविवाहिताएं अपने मायके से आए पूजा के सामान, वस्त्र और बायना के साथ पूरे हर्षोल्लास से इस व्रत का शुभारंभ कर सकती हैं। वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की ही पूजा क्यों की जाती है : Why is only the banyan tree worshipped ? इस पावन दिन पर बरगद (वट) के पेड़ की ही पूजा क्यों होती है, इसके पीछे एक बहुत गहरा रहस्य छिपा है। Vat Savitri Vrat हिंदू सनातन धर्म में बरगद के पेड़ को सबसे पवित्र, अत्यंत दीर्घायु और साक्षात देवतुल्य वृक्ष माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, वट वृक्ष की जड़ों में सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, उसके तने में पालनहार भगवान विष्णु और पेड़ के ऊपरी हिस्से में देवों के देव महादेव (शिव) का साक्षात वास होता है। इतना ही नहीं, स्वयं देवी सावित्री भी इसी महान वृक्ष में निवास करती हैं। प्रलय काल के अंत में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण भी इसी वट वृक्ष के पत्ते पर बाल रूप में अवतरित हुए थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी रचना में वट वृक्ष को ‘तीर्थराज का छत्र’ कहकर पुकारा है। इसलिए जब सुहागिन महिलाएं Vat Savitri Vrat

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