Bhagwati Devi

Shri Bhagwati Devi Stotram : श्री भगवती देवी स्तोत्रम्….

Shri Bhagwati Devi Stotram : श्री भगवती देवी स्तोत्रम्: देवी भगवती ममतामयी हैं। वे सदैव अपने भक्तों पर करुणा बरसाती हैं। जिस प्रकार एक माँ का अपने पुत्रों के प्रति सदैव स्नेह रहता है, उसी प्रकार देवी भी उन धर्मात्मा लोगों को आशीर्वाद देती हैं जो उनकी शरण में आते हैं। श्री भगवती स्तोत्र, देवी शक्ति—अर्थात् देवी भगवती या दुर्गा—की स्तुति करने वाला एक पवित्र ग्रंथ है। देवी भगवती, देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। श्री भगवती स्तोत्र की रचना महर्षि व्यास जी ने की है। इसका वर्णन ‘दुर्गा सप्तशती’ में मिलता है; यह अत्यंत प्रभावशाली और परम कल्याणकारी स्तोत्र है। जो व्यक्ति संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हैं, यदि वे केवल श्री भगवती स्तोत्र का ही पाठ कर लें, तो उन्हें भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान ही फल प्राप्त होता है। यदि आप समस्त बाधाओं से मुक्ति, शत्रुओं पर विजय, ऋण-मुक्ति, करियर में सफलता, उत्तम शिक्षा, तथा शारीरिक एवं मानसिक सुख की प्राप्ति चाहते हैं, Shri Bhagwati Devi Stotram तो इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। यह अध्याय ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का ही एक अंग है। Shri Bhagwati Devi Stotram यदि आपके पास समय का अभाव है, तो केवल इस स्तोत्र का पाठ करके भी आप संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान ही पुण्य अर्जित कर सकते हैं। जब किसी प्रश्न का उत्तर न मिल रहा हो अथवा कोई समस्या हल न हो रही हो, तब इस स्तोत्र का पाठ करें। देवी भगवती आपकी रक्षा करेंगी। जिन लोगों को सदैव धन का अभाव रहता है, Shri Bhagwati Devi Stotram जिन्हें निरंतर आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, अथवा जिनका धन अनावश्यक कार्यों में व्यय होता रहता है, उन्हें देवी भगवती के इस स्तोत्र के पाठ से विशेष लाभ प्राप्त होता है। इसके पाठ से धन-प्राप्ति के नवीन मार्ग खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। शत्रुओं से मुक्ति पाने और मुकदमों में विजय प्राप्त करने के लिए श्री भगवती स्तोत्र एक चमत्कार की तरह कार्य करता है। Shri Bhagwati Devi Stotram यदि नवरात्रि के अतिरिक्त अन्य दिनों में भी इसका नियमित पाठ किया जाए, तो शत्रु जीवन में कभी बाधा उत्पन्न नहीं कर पाते। Shri Bhagwati Devi Stotram इसके प्रभाव से न्यायालयीन मुकदमों में भी विजय प्राप्त होती है। यदि कोई व्यक्ति ऋण के बोझ तले दबा हो, अथवा उसे अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी ऋण (कर्ज) लेना पड़ता हो, तो इस स्तोत्र का नियमित पाठ उसे ऋण-मुक्त कर देता है। वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी श्री भगवती स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, यह स्तोत्र आकर्षण-शक्ति को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होता है। श्री भगवती स्तोत्र के लाभ: इसके पाठ से धन-प्राप्ति के नवीन मार्ग खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।शत्रुओं से मुक्ति पाने और मुकदमों में विजय प्राप्त करने के लिए श्री भगवती स्तोत्र एक चमत्कार की तरह कार्य करता है। Shri Bhagwati Devi Stotram धन कमाने के नए रास्ते खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो लोग कर्ज़ में डूबे हुए हैं, उन्हें नियमित रूप से ‘श्री भगवती स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। श्री भगवती देवी स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Shri Bhagwati Devi Stotram in Hindi जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे,प्रणमामि तु देवी नरार्तिहरे ।। 1 ।। जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे,जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।जय भैरवदेहनिलीन हरे,जय अंधकदैत्यविशोषकरे ।। 2 ।। जय महिषविमर्दिनि शूलकरे,जय लोकसमस्तकपापहरे ।जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।। 3 ।। जय षण्मुखसायुधईशनुते,जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।जय दुःखदरिद्रविनाशकरे,जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ।। 4 ।। जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।जय देवि समस्तशरीरधरे,जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।। 5 ।। जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे,जय वांछितदायिनि सिद्धिवरे ।जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।। 6 ।। एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि: ।ग्रहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ।। 7 ।। ।। इति श्री भगवती देवी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।

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Parama Ekadashi 2026

Parama Ekadashi 2026 Date And Time : परम एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, व्रत कथा और अचूक पूजा विधि….

Parama Ekadashi 2026 Mein Kab Hai: सनातन धर्म और भारतीय वैदिक पंचांग की रहस्यमयी एवं अत्यंत ज्ञानवर्धक दुनिया में एकादशी के व्रत का स्थान सबसे श्रेष्ठ और परम पुण्यदायी माना गया है। वैसे तो हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर साल कुल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन जब हर तीन साल में एक बार अतिरिक्त मास यानी अधिक मास (मलमास) लगता है, तो एकादशियों की संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, मलमास के कृष्ण पक्ष (चंद्रमा के घटते चरण) में पड़ने वाली एकादशी को बहुत ही खास और दुर्लभ माना गया है। इस वर्ष Parama Ekadashi 2026 का यह पवित्र अवसर जीवन में उन्नति और विकास प्राप्त करने का एक बहुत ही शानदार मौका लेकर आ रहा है। Parama Ekadashi 2026 चूँकि यह महान व्रत हर तीन साल में केवल एक ही बार आता है, इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व अन्य सभी साधारण व्रतों की तुलना में कई हजार गुना अधिक बढ़ जाता है और यह भगवान विष्णु के भक्तों के लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता। Parama Ekadashi 2026 का आध्यात्मिक महत्व और इसके गहरे रहस्य…. हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इस अत्यंत शुभ दिन को कमला एकादशी या पुरुषोत्तम एकादशी के मंगलकारी नामों से भी पुकारा जाता है। मलमास के दौरान आने के कारण भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा इस दिन अपने चरम पर होती है। पुराणों की गहरी मान्यताओं के अनुसार, यह अद्भुत उपवास इंसान को अत्यंत दुर्लभ सिद्धियां प्रदान करने वाला है। जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से भगवान श्री हरि विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करता है, Parama Ekadashi 2026 उसके जीवन की घोर दरिद्रता हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाती है और अंततः उसे सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। ऐसा भी दृढ़ता से माना जाता है कि इस पावन दिन पर केवल पूरे नियम से व्रत रखने और इसकी कथा सुनने मात्र से ही इंसान को 100 बड़े यज्ञों को संपन्न करने के बराबर महान फल और अपार पुण्य प्राप्त हो जाता है। पंचांग की सटीक गणना: तिथि और पारण का शुभ समय : Accurate calculation of Panchang: Tithi and auspicious time of Paran किसी भी वैदिक व्रत का शत-प्रतिशत और अचूक फल इंसान को तभी मिलता है, जब उसे व्रत की सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का पूरा ज्ञान हो। वैदिक पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष Parama Ekadashi 2026 का पावन उपवास 11 जून, 2026 (गुरुवार) को पूरे देश में अपार श्रद्धा भाव के साथ रखा जाएगा। व्रत की सही तिथियों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ 10 जून की रात (या 11 जून की मध्यरात्रि) को ठीक 12 बजकर 58 मिनट से हो जाएगा (कुछ पंचांगों के अनुसार यह 12:59 बजे से शुरू होगी)। यह पावन तिथि अगले दिन 11 जून, 2026 को रात के 10 बजकर 37 मिनट पर अपना पूर्ण समापन करेगी। व्रत का पारण (उपवास खोलने का पवित्र समय): धर्म शास्त्रों के कड़े नियमों के अनुसार इस व्रत का पारण अगले दिन यानी 12 जून, 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। पारण के लिए सबसे शुभ मुहूर्त 12 जून की सुबह 5 बजकर 23 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। Parama Ekadashi 2026 की अचूक और सिद्ध पूजा विधि : Surefire and proven method of worship for Parama Ekadashi 2026 इस महान व्रत का पूरा, अचूक और चमत्कारी फल पाने के लिए आपको शास्त्रों में बताई गई इस पूजा विधि का क्रमबद्ध तरीके से ज्ञान होना बेहद आवश्यक है। व्रत के शुभ दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें और पूरी तरह साफ-सुथरे व पवित्र वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात अपने घर के शांत पूजा स्थल पर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ जोड़कर इस व्रत का दृढ़ संकल्प लें। पूजा की शुरुआत में भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियों को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का शुद्ध मिश्रण) से स्नान कराएं। अब पूरी अटूट श्रद्धा के साथ भगवान को पीले फूल, सुगंधित धूप, शुद्ध घी का दीप और सात्विक नैवेद्य अर्पित करें। Parama Ekadashi 2026 आपको इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि नैवेद्य या प्रसाद चढ़ाते समय उसमें पवित्र तुलसी का पत्ता अवश्य शामिल हो, क्योंकि इसके बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते। पूजा के अंतिम चरण में भगवान की भव्य आरती उतारें और ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ का एकाग्रता से पाठ करें। इस दिन व्रत की कथा का पाठ करना या उसे किसी ब्राह्मण के मुख से शांत मन से सुनना अनिवार्य माना गया है। इसके बाद अगले दिन सुबह बताए गए शुभ मुहूर्त में ही अपने व्रत का पारण करें। Parama Ekadashi 2026 की पौराणिक और चमत्कारी व्रत कथा :Mythological and miraculous fasting story of Parama Ekadashi 2026 व्रत की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि आपने इसकी कथा को कितने गहरे ध्यान से सुना है। Parama Ekadashi 2026 प्राचीन काल में अवंतीपुर नाम का एक बहुत ही सुंदर और समृद्ध गाँव हुआ करता था, जहाँ एक अत्यंत ही विद्वान और ज्ञानी ब्राह्मण निवास करते थे। उस ब्राह्मण के कुल पाँच पुत्र थे, जिनमें से चार बहुत ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे; पूरे गाँव में उन चारों पुत्रों की काफी प्रशंसा होती थी। परंतु उनके एक पुत्र का नाम जयशर्मा था, जो पूरी तरह से दुराचारों और पाप कर्मों के अंधेरे में डूबा हुआ था। उसके बुरे और पापी व्यवहार के कारण आस-पास के सभी लोग हमेशा बहुत परेशान रहते थे। अंततः उसके दुराचरण से तंग आकर उसके सभी रिश्तेदारों ने और यहाँ तक कि उसके अपने पिता ने भी उसे हमेशा के लिए त्याग दिया। अपनों के भारी तिरस्कार, सामाजिक अपमान और भूख से तड़पते हुए वह दुखी होकर गाँव छोड़कर एक घने जंगल की ओर भटकने चला गया और वहीं स्थायी रूप से अपना जीवन बिताने लगा। एक दिन जंगलों में दर-दर भटकते हुए वह संयोगवश प्रयाग के महान और पवित्र तीर्थ स्थल पर जा पहुँचा। भूख और प्यास से बुरी तरह व्याकुल होकर वह किसी आश्रम की तलाश कर रहा था, तभी उसकी नजर महर्षि हरिमित्र के शांत और आध्यात्मिक आश्रम पर पड़ी;

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Devi Stotram

Shri Bhagwati Devi Stotram : श्री भगवती देवी स्तोत्रम्

Shri Bhagwati Devi Stotram : श्री भगवती देवी स्तोत्रम्: देवी भगवती ममतामयी हैं। वे सदैव अपने भक्तों पर करुणा बरसाती हैं। जिस प्रकार एक माँ का अपने पुत्रों के प्रति सदैव स्नेह रहता है, उसी प्रकार देवी भी उन धर्मात्मा लोगों को आशीर्वाद देती हैं जो उनकी शरण में आते हैं। श्री भगवती स्तोत्र, देवी शक्ति—अर्थात् देवी भगवती या दुर्गा—की स्तुति करने वाला एक पवित्र ग्रंथ है। देवी भगवती, देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। श्री भगवती स्तोत्र की रचना महर्षि व्यास जी ने की है। इसका वर्णन ‘दुर्गा सप्तशती’ में मिलता है; यह अत्यंत प्रभावशाली और परम कल्याणकारी स्तोत्र है। जो व्यक्ति संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हैं, यदि वे केवल श्री भगवती स्तोत्र का ही पाठ कर लें, तो उन्हें संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान ही फल प्राप्त होता है। यदि आप समस्त बाधाओं से मुक्ति, शत्रुओं पर विजय, ऋण-मुक्ति, करियर में सफलता, उत्तम शिक्षा, तथा शारीरिक एवं मानसिक सुख की प्राप्ति चाहते हैं, तो इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। यह अध्याय ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का ही एक अंग है। Devi Stotram यदि आपके पास समय का अभाव है, तो केवल इस स्तोत्र का पाठ करके भी आप संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान ही पुण्य अर्जित कर सकते हैं। जब किसी प्रश्न का उत्तर न मिल रहा हो अथवा कोई समस्या हल न हो रही हो, तब इस स्तोत्र का पाठ करें। देवी भगवती आपकी रक्षा करेंगी। जिन लोगों को सदैव धन का अभाव रहता है, जिन्हें निरंतर आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, अथवा जिनका धन अनावश्यक कार्यों में व्यय होता रहता है—ऐसे लोगों को श्री भगवती स्तोत्र के पाठ से विशेष लाभ प्राप्त होता है। इसके पाठ से धन-प्राप्ति के नवीन मार्ग खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। शत्रुओं से मुक्ति पाने और मुकदमों में विजय प्राप्त करने के लिए श्री भगवती स्तोत्र एक चमत्कार की तरह कार्य करता है। Devi Stotram यदि नवरात्रि के अतिरिक्त भी, नियमित रूप से इसका पाठ किया जाए, तो शत्रु जीवन में कभी बाधा उत्पन्न नहीं कर पाते। इसके प्रभाव से न्यायालयीन मुकदमों में विजय प्राप्त होती है। यदि कोई व्यक्ति ऋण के बोझ तले दबा हो, अथवा उसे अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी ऋण लेना पड़ता हो, तो इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से वह ऋण-मुक्त हो जाता है। वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी श्री भगवती स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। Devi Stotram इसके अतिरिक्त, यह स्तोत्र आकर्षण-शक्ति को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होता है। श्री भगवती स्तोत्र के लाभ: Shri Bhagwati Devi Stotram धन-प्राप्ति के नवीन मार्ग खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।शत्रुओं से मुक्ति पाने और मुकदमों में विजय प्राप्त करने के लिए श्री भगवती स्तोत्र एक चमत्कार की तरह कार्य करता है। Devi Stotram धन कमाने के नए रास्ते खुल जाते हैं और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:Who should recite this Stotra? जो लोग कर्ज़ में डूबे हुए हैं, उन्हें नियमित रूप से ‘श्री भगवती स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। श्री भगवती देवी स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Shri Bhagwati Devi Stotram in Hindi जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे,प्रणमामि तु देवी नरार्तिहरे ।। 1 ।। जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे,जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।जय भैरवदेहनिलीन हरे,जय अंधकदैत्यविशोषकरे ।। 2 ।। जय महिषविमर्दिनि शूलकरे,जय लोकसमस्तकपापहरे ।जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।। 3 ।। जय षण्मुखसायुधईशनुते,जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।जय दुःखदरिद्रविनाशकरे,जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ।। 4 ।। जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।जय देवि समस्तशरीरधरे,जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।। 5 ।। जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे,जय वांछितदायिनि सिद्धिवरे ।जय भगवति देवी नमो वरदे,जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।। 6 ।। एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि: ।ग्रहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ।। 7 ।। ।। इति श्री भगवती देवी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।

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Ganesha Stotram

Shri Prahlad Kritam-Ganesha Stotram : श्री प्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र…..

श्रीप्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Prahlad Kritam-Ganesha Stotram in Hindi ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अधुना शृणु देवस्य साधनं योगदं परम् ।साधयित्वा स्वयं योगी भविष्यसि न संशयः ॥ १ ॥ स्वानन्दः स्वविहारेण संयुक्तश्च विशेषतः ।सर्वसंयोगकारित्वाद् गणेशो मायया युतः ॥ २ ॥ विहारेण विहीनश्चाऽयोगो निर्मायिकः स्मृतः ।संयोगाभेद हीनत्वाद् भवहा गणनायकः ॥ ३ ॥ संयोगाऽयोगयोर्योगः पूर्णयोगस्त्वयोगिनः ।प्रह्लाद गणनाथस्तु पूर्णो ब्रह्ममयः परः ॥ ४ ॥ योगेन तं गणाधीशं प्राप्नुवन्तश्च दैत्यप ।बुद्धिः सा पञ्चधा जाता चित्तरूपा स्वभावतः ॥ ५ ॥ तस्य माया द्विधा प्रोक्ता प्राप्नुवन्तीह योगिनः ।तं विद्धि पूर्णभावेन संयोगाऽयोगर्वजितः ॥ ६ ॥ क्षिप्तं मूढं च विक्षिप्तमेकाग्रं च निरोधकम् ।पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च सा माया गणपस्य वै ॥ ७ ॥ क्षिप्तं मूढं च चित्तं च यत्कर्मणि च विकर्मणि ।संस्थितं तेन विश्वं वै चलति स्व-स्वभावतः ॥ ८ ॥ अकर्मणि च विक्षिप्तं चित्तं जानीहि मानद ।तेन मोक्षमवाप्नोति शुक्लगत्या न संशयः ॥ ९ ॥ एकाग्रमष्टधा चित्तं तदेवैकात्मधारकम् ।सम्प्रज्ञात समाधिस्थम् जानीहि साधुसत्तम ॥ १० ॥ निरोधसंज्ञितं चित्तं निवृत्तिरूपधारकम् ।असम्प्रज्ञातयोगस्थं जानीहि योगसेवया ॥ ११ ॥ सिद्धिर्नानाविधा प्रोक्ता भ्रान्तिदा तत्र सम्मता ।माया सा गणनाथस्य त्यक्तव्या योगसेवया ॥ १२ ॥ पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च Ganesha Stotram बुद्धिरूपा प्रकीर्तिता ।सिद्ध्यर्थं सर्वलोकाश्च भ्रमयुक्ता भवन्त्यतः ॥ १३ ॥ धर्मा-ऽर्थ-काम-मोक्षाणां सिद्धिर्भिन्ना प्रकीर्तिता ।ब्रह्मभूतकरी सिद्धिस्त्यक्तव्या पंचधा सदा ॥ १४ ॥ मोहदा सिद्धिरत्यन्तमोहधारकतां गता ।बुद्धिश्चैव स सर्वत्र ताभ्यां खेलति विघ्नपः ॥ १५ ॥ बुद्ध्या यद् बुद्ध्यते तत्र Ganesha Stotram पश्चान् मोहः प्रवर्तते ।अतो गणेशभक्त्या स मायया वर्जितो भवेत् ॥ १६ ॥ पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च पञ्चधा सिद्धिमादरात् ।त्यक्वा गणेशयोगेन गणेशं भज भावतः ॥ १७ ॥ ततः स गणराजस्य मन्त्रं तस्मै ददौ स्वयम् ।गणानां त्वेति वेदोक्तं स विधिं मुनिसत्तम ॥ १८ ॥ तेन सम्पूजितो योगी Ganesha Stotram प्रह्लादेन महात्मना ।ययौ गृत्समदो दक्षः स्वर्गलोकं विहायसा ॥ १९ ॥ प्रह्लादश्च तथा साधुः साधयित्वा विशेषतः ।योगं योगीन्द्रमुख्यं स शान्तिसद्धारकोऽभवत् ॥ २० ॥ विरोचनाय राज्यं स ददौ पुत्राय दैत्यपः ।गणेशभजने योगी स सक्तः सर्वदाऽभवत् ॥ २१ ॥ सगुणं विष्णु रूपं च निर्गुणं ब्रह्मवाचकम् ।गणेशेन धृतं सर्वं कलांशेन न संशयः ॥ २२ ॥ एवं ज्ञात्वा महायोगी Ganesha Stotram प्रह्लादोऽभेदमाश्रितः ।हृदि चिन्तामणिम् ज्ञात्वाऽभजदनन्यभावनः ॥ २३ ॥ स्वल्पकालेन दैत्येन्द्रः शान्तियोगपरायणः ।शान्तिं प्राप्तो गणेशेनैकभावोऽभवतत्परः ॥ २४ ॥ शापश्चैव गणेशेन प्रह्लादस्य निराकृतः ।न पुनर्दुष्टसंगेन भ्रान्तोऽभून्मयि मानद ॥ २५ ॥ एवं मदं परित्यज Ganesha Stotram ह्येकदन्तसमाश्रयात् ।असुरोऽपि महायोगी प्रह्लादः स बभूव ह ॥ २६ ॥ एतत् प्रह्लादमाहात्म्यं यः शृणोति नरोत्तमः ।पठेद् वा तस्य सततं भवेदोप्सितदायकम् ॥ २७ ॥ ॥ इति श्रीप्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Prapanna Gitam

Shri Prapanna Gitam : श्री प्रपन्ना गीतम….

Shri Prapanna Gitam : श्री प्रपन्न गीतम: ‘प्रपन्न’ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है पूर्ण समर्पण या निष्ठा। विशिष्ट अद्वैत संप्रदाय के रामानुज ने कहा है कि व्यक्ति को केवल ‘प्रपन्न’ होना चाहिए, जिसका अर्थ है ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना। इसे ‘प्रपत्ति’ कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखता है और अपने विचारों, शब्दों तथा कर्मों से स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तो वह सर्वोच्च स्थिति—”विष्णोः परमं पदम्”—को प्राप्त कर सकता है। भागवत पुराण में ‘प्रपन्न’ शब्द का उल्लेख कई बार किया गया है। एक प्रपन्न से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रपत्ति को प्राप्त करने के लिए पाँच अंगों (साधनों) में से कुछ या सभी का पालन करे। ‘प्रपन्न’ वह व्यक्ति है जो स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है और पवित्रता के मार्ग पर चलते हुए जीवन का सामना करता है। ‘श्री प्रपन्न गीतम’ (जिसे ‘पांडव गीता’ के नाम से भी जाना जाता है) पुराणों के युग की अनेक महान विभूतियों के वचनों का एक सुंदर संग्रह है, जो अत्यंत अनुपम शैली में भगवान की महिमा का गुणगान करता है। यह ग्रंथ प्रार्थनाओं के रूप में रचित है। यद्यपि यह आकार में छोटा है, क्योंकि इसमें केवल 83 श्लोक हैं। Prapanna Gitam श्री प्रपन्न गीतम का प्रत्येक श्लोक भक्ति और पूर्ण समर्पण की इतनी गहराई समेटे हुए है कि यह किसी भी आध्यात्मिक साधक को भगवान के प्रेम-सागर में पूर्ण रूप से डूब जाने के लिए प्रेरित करता है। इस ग्रंथ का नाम ‘पांडव गीता’ इसलिए पड़ा, क्योंकि इसमें संकलित प्रार्थना-श्लोक संपूर्ण पांडव कुल—अर्थात् पाँचों भाइयों और उनके सगे-संबंधियों—द्वारा उच्चारित किए गए थे। भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण के भाव की प्रधानता होने के कारण इसे ‘श्री प्रपन्न गीतम’ के नाम से भी जाना जाता है। Prapanna Gitam ‘पांडव गीता’ विभिन्न भक्तों द्वारा परमेश्वर (नारायण) को समर्पित की गई विविध प्रार्थनाओं का एक संग्रह है। इसे ‘श्री प्रपन्न गीतम’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘श्री प्रपन्न गीतम’ को ‘समर्पण का गीत’ कहा जाता है। यह विभिन्न स्रोतों से संकलित सुंदर श्लोकों का एक संग्रह है। गीता में वर्णित इस स्तोत्र का गान पांडवों द्वारा किया गया था; ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। Prapanna Gitam इस रचना की एक और सुंदर विशेषता यह है Prapanna Gitam कि यह प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुंडरीक, व्यासदेव, अंबरीष, सुखदेव, शौनक, भीष्म, ऋषि दाल्भ्य, राजर्षि रुक्मांगद, अर्जुन, वशिष्ठ, विभीषण और कई अन्य लोगों के नामों का गुणगान करती है, और उनकी निष्ठा तथा भक्ति की प्रशंसा करती है। इस ग्रंथ में कौरव भाइयों में सबसे बड़े दुर्योधन की प्रार्थनाएँ भी शामिल हैं, और उसके चरित्र की कमियों के बावजूद, ईश्वर के प्रति उसके प्रेम की सुंदरता का भी वर्णन है। श्री प्रपन्न गीताम् के लाभ: चूँकि यह साधक की पूर्ण भक्ति का प्रतीक है, Prapanna Gitam इसलिए भगवान प्रसन्न होते हैं और उसे आशीर्वाद तथा वरदान प्रदान करते हैं। इस गीताम् का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है, Prapanna Gitam उसे इस ‘श्री प्रपन्न गीताम्’ का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। श्री प्रपन्न गीतम् हिंदी पाठ : Shri Prapanna Gitam in Hindi (पंचमस्वरमेकतालं भजनम्, विहागरागेण गीयते) परमसखे श्रीकृष्ण भयंकरभवार्णवेऽव्यय विनिमग्नम् ।मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ।। (ध्रुवपद्म) गुणमृगतृष्णाचलितधियं विषयार्थसमुत्सुकदशकरणम् ।परिभूतं दुर्मतिनरनिकरैर्मतिभ्रमार्जितगुणशरणम् ।। सततं सभयमनो निवहन्तं षड्रिपुभिर्निखिलेडयगुरुम् ।कालिन्दीह्रदयप्रियविष्णोश्चरणकमलरजसो विधुरम् ।। मन: शोकमतिमोहक्षतयेऽभिकांक्षन्तमजमुखपदम् ।मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ।। 1 ।। कालिन्दीरुक्मिणीराधिकासत्याजाम्बवतीसुह्रदम् ।निजशरणागतभक्तजनेभ्य: कृपया गतभवभयवरदम् ।। गोपीजनवल्लभरासेश्वरगोवर्धनधरमधुमथनम् ।वन्देऽहं निखिलाधिपतिं त्वामतिशयसुंदरगुणभवनम् ।। कृष्णलालजीद्विजाधिपं हे मनोऽनिशं त्वं भज यज्ञम् ।मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ।। 2 ।। ।। इति श्री प्रपन्ना गीतम सम्पूर्णम् ।।

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Pandurang Stotra

Shri Pandurang Stotra : श्री पांडुरंग स्तोत्र……

श्री पांडुरंग स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Pandurang Stotra in Hindi ।। श्री गणेशाय नमः ।।।। श्री सरस्वत्यै.नमः ।।।। श्री पांडुरंगाय नमः ।। ॐ नमोजी उदारा । ॐ नमोजी मयुरेश्वरा । महामंगला अघमलहरा ।सर्वांगसुंदरा गणपती । अंगी सिंदुराचे भूषण । भाली शोभो मृगलांछन ।दोंदिलतनच गजवदन । दुर्वा़कुर मस्तकी । तु ऋदिसिद्धिचा नायक ।मंगलदाता विनायक । तु अर्पेणेचा बालक । मंगल माझे करावे । हे सर्वांग सुंदरे सरस्वती । तु श्वतवसना आद्य ज्योती ।मम जिव्हाग्री करुन वसती । स्तोत्र वदवी अमोघ ।तुझ्या कृपेचा महिमान । आगळे आहे सर्वाहुन ।मुकाही वदे वेदांत ग्रहण । पंगु लंघी पर्वता ।। ऐशी तुझी गाजते कीर्ती । प्रचिती दावी.मजप्रती ।हे कविजनांचे ध्येयमुर्ती । अंत माझा पाहु नको ।। आता वंदन सद्गगुरुराया । श्रीरामदास सदया ।लेकरावरी करून दया । कोडकौतुक पुरवा हे ।। आता वंदु सिद्ध महंत । जे क्षमा शांतिचे कोश सत्य ।जे कबीर अवतार साक्षात । साईबाबा शिर्डिचे ।। ज्यांचे घेता दर्शन। पापा ताप पळेल दैन्य ।ते नरदेहधारी भगवान । Pandurang Stotra पगवतो मशी सर्वदा ।आता वंदु सज्जना तैसच । श्री गुरू वामना ।मातापितरा विद्वज्जना । तैसच अवघ्या भाविकांसी ।। हे चंद्रभातटविहारा । हे सच्चिदानंदा सर्वेश्वरा ।हे चराचरव्यापका उदारा । Pandurang Stotra सर्वाद्या विश्वपती ।। हे केशवा केशीमर्दना। हे माधवा मधुसुदना ।हे भक्तमानसरंजना । पांडुरंगा रुक्मिणीपती ।। तु मत्स्य कच्छ वराह नरहरी । वामन परशुराम अवतारीकृष्ण बैद्ध कलंकी या परी । नाना रूप धरीलीसजैसे जैसे भेटती भक्त । तैसा तु नटसी अनंत ।वेदाही श लागला अंत । तुझा बापा नारायणा ।। मत्स्य होऊन शंखासुरा । त्वा मर्दिले रमावरा ।दंतावरी धरिली धरा । वराह अवतारी पांडुरंगे ।।निजभक्तरक्षण्यासाठी । स्तंभी प्रगटाला जगजेठी ।। हिरण्यकश्यपु उठाउठी । Pandurang Stotra वधिला उदर विदारून ।वामन होऊन बळीस । त्वा घातिले पाताळासी ।। अभिमान होता क्षत्रयिसी । निवटिला भार्गव रुपे तोदशीग्रीव लंकानाथ । कुंभकर्णादि इंद्रजीत ।दवरथाचा होवुन सुत । सुवेळाचली मर्दियेले ।। कंस शिशुपाल वक्रदंता । त्वा वधिले कृष्णनाथा ।बौध्द होवुनिया आता । बसलास येथे भिमातटी ।करावया पतितोध्दार । हा त्वदीय अवतार साचार ।पुंडलिके विटेवर । उभे केले तुज लागी ।। जगदारंभापासुन । Pandurang Stotra भक्त तुझे गाती गुण ।तू भक्तवत्सल परिपूर्ण । ब्रीद गाजते पांडुऱगा ।प्रल्हाद कयाधुसुता । पर्वातावरुन लोटिता ।त्या ठायी संयरक्षिता । तुच झालासि दीनबंधु ।। सुधन्वा भक्त निर्वाण । तप्त तैली टाकता जाण ।केलेस त्याचे संरक्षण । महिमा वानु कोठवरी ।। शबरी भक्तणी प्रेमळ । तिने उष्टे बदरीफळ ।अर्पण केले सोज्जवळ । भाव चित्ती धरोनी ।त्या बदरफळाप्रती । त्वा सेविले रमापती ।।रामायणी त्वदीय कीर्ती । ही गायली वाल्मिके ।। जटायुनळनीळअंगदा । त्वा तारिले गोविंदा ।महाबळीस आनंद कंदा । केलेस की रे चिरायु ।। निजनाम महिमा अद्भुत ।दाविला तु जगतात ।शिळारामनामांकीत । तरत्यख झाल्या सागरी ।लंका घेतली वानरा हाती । ऐसा तु प्रतापज्योती ।। हे रामचंद्रा रघुपती । माझी उपेक्षा करू नको ।नंदगृही नंदनंदना । अगम्य लीला नारायणा ।केल्यास गोकुळवृंदावना । गोपगोपी उद्धराया ।। श्री यशोदा नंदराणी । करीता संकष्टीव्रत जाणी ।तुच गणानाथा होवुन । मोदक अवघे भक्षिले ।। जननीचा मोह हरावया । मुख पसरून देवराय ।विश्वरुप दाविले ते ठाया । यशोदेसी विठ्ठले ।। कालिया मर्दियला यमुना तिरी । करनखाग्री धरली गिरीपेंद्याची बुरशी भाकर । परमादरे सेविलीस ।। धेनुवत्स गोपगण । हरण करीता चतुरानन ।दुसरे तैसेच निर्माण । केले आपल्या मायेने ।। हमामा घालुध हुंबरी । रंजविल्या व्रजसुंदरी ।कु़जवनाभितरी । षण्मासीची करुनी निशा ।। भीमार्जुन युधिष्टिर । जे पंडुराजाचे कचमार ।त्यांचे साह्य निरंतर । केलेस की कमलनाभा ।। द्रौपदी पांडवांची कांता। भीष्मशिबिराप्रती जाता ।पादरक्षा घेवुन अनंता । गडी तियेचा झालासी ।। सांडुन पंचपक्वान । Pandurang Stotra विदुराचे सेविलेत्रकदान्नतु भक्तवत्सल दयाघन । श्रीमुरारी पुरुषोत्तमा ।।ध्रव स्थापिला अढळपदा । तु परम उदार गोविंदा ।।भक्तांच्या वारीस आपदा । दर्शनभावे श्रीहरी ।। खजामीळ पापराशी । त्वा उध्दरिल्या ऋषिकेशी ।सुवर्णपुरी सुदाम्यासी । दिधलीस नारायणा ।।अपरोक्षज्ञानभांडार । उद्ववादिधले साचार ।मुळ येता अक्रुर । मथुरे गेलास अधोक्षजा ।। नाना मते नाना पंथ । जरी जगती अस्तित्वात ।परी अवघ्यांचे.सार सत्य । एक तुच अससी की ।निजभक्तांच्या संसरक्षणा । नाना रूपे कमल वदना ।धारण करुन मनकामना । पूर्ण.केल्यास तयांच्या ।। ज्यांना संमत शैव मत । ते तूज म्हणती.उमनाथ ।वैष्णव वदती लक्ष्मीकांत । यवन इलाही बोलती ।चष्मे जरी भिन्न भिन्न । परी प्रकाशी न फरक जाण ।। तैसा तु रुक्मिणीरमण । वंद सेव्य सकलासी ।क्षेत्रे अपार भूमिवरी । परी अघ्या ठिकाणी तु हरी ।विश्वनाथ होवुन । काशीपुरी पूजा घेसी भक्तांच्या ।। तूच ॐकार केदार । सोमनाथ सर्वेश्वर ।त्र्यंबकराज कर्पूरगौर । घृष्णेश्वर तुच पै ।। महंकाल कालातीत । तू मलिल्कार्जून नागनाथ ।वैद्यानाथ गिरीजाकांत । गोकर्ण रामेश्वर तुच पै ।।अमृतवाहिनीचे तीर । तु मोहीनिराज निर्धारी ।। ज्ञानेश्वरांची ज्ञानेश्वरी । निजकृपये पूर्ण केलीस ‌।अयोध्या गोकुळ वृंदावनी । तुच अससी चक्रपाणी ।आलास देवा द्वारकूहुनी । डाकुरी भक्ताकारणे ।। भिलवडी करवीर ओंदुबर । माहुर वाडी गाणगापुर ।येथे अत्रीचा होऊन कुमर । निजभक्तांना भेटसी ।। मैलार मालेगाव जेजुरी । माया कांची व्यंकटगिरी ।ऐशा क्षेत्रा तूच हरी । वससी अनंत रुपानी ।। आब्रम्हस्तंभापर्यंत । तूच एक रुक्मिणीकांत ।तुच सगुणगुणातीत । मायाबापा विठ्ठला ।। घटटाच्या ठिकाणी । Pandurang Stotra तुझे अस्तित्व चक्रपाणी ।तूच अनंत होऊनी ।जग आणीले आकार ।। जडमूढ जीवा कारण । तू देवा झालीस सगणु ।अनंत लीला दावुन । निजभक्तीसी लाविसी ।। ते हे रुपडे मनोहर । गळाघवघवीत तुळसीहार ।सर्वांगश्यामसुंदर । कटी कर धरियेले ।। पायतळा शोभते विट । वरी आपण उभा नीट ।बहु आतुरते पाहे वाट । आपुल्या भक्तवरांची ।। कासे पीत पितांबर । मस्तकी शोभे मुगुठ थोर ।दृष्टी गोजिरी निसाग्र । भाली कस्तुरे विराजिते ।। पुष्पहार नाना जाती । आपाद देवा तुझ्या रुळती ।सन्मुख उभा मारुती । कर संपुटे जोडुन ।। पुंडलिके उपकार केला । Pandurang Stotra म्हणुन तुझा लाभ झाला ।त्या पंढरी क्षेत्रा भला । पांडुरंगे विठ्ठाबाई ।जयदेवाचियासाठी । वृंदावनी तू जगजेठी ।प्रगटोनिया उठा उठी । तदीय कांता जिवविली ।। कबिराचा वेणुन शेला । त्वा बाजारी वोपिलादर्शन तुलसीदासल । दिधले र मरूपानज ।।जनाबाईचे दळण दळिले ।नामदेवगृह शाकारिले ।।पंतदामाजीस्तव भले । धरिले रुप महाराचे ।। निवृत्ती ज्ञानेश सोपान । तुझे भक्त निर्वाण ।तूच एख पतितपावन । जगत्त्रयी विठ्ला ।। मिराबाईस देता विष । ते तु सेविलेस श्रीनिवास ।साह्य केलेस विशेष । भक्त चोख्याचे नारायणा ।जुनागडीचा नरसी मेहेता । नागर ब्राम्हण तत्वता ।।त्याचा मुलीसआहेर नेता । तुच झाला पांडुरंगा ।।पिपाजी नानक सुरदास तुझ आवडती विशेष ।।सजीव केले कमालास । आपूल्या कृपाप्रसादे ।। तेरढोकीचा कुंभार । Pandurang Stotra भक्तगोरोबा महाथोर ।त्या कीर्तने.फुटती कर । थोटेपण हरपले ।। न कळता मांजरिची । पिले आव्यात जळाली साची ।तयी राखा कुंभाराची Pandurang Stotra । बाणी राखीली दिनबंधो

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Shatanama Stotram

Shri Parashuram Ashtottara-Shatanama Stotram : श्री परशुराम अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम्….

श्री परशुराम अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Parashuram Ashtottara-Shatanama Stotram in Hindi रामो राजाटवीवह्नि रामचन्द्रप्रसादकः ।राजरक्तारुणस्नातो राजीवायतलोचनः ॥ १ ॥ रैणुकेयो रुद्रशिष्यो रेणुकाच्छेदनो रयी ।रणधूतमहासेनो रुद्राणीधर्मपुत्रकः ॥ २ ॥ राजत्परशुविच्छिन्नकार्तवीर्यार्जुनद्रुमः ।राताखिलरसो रक्तकृतपैतृकतर्पणः ॥ ३ ॥ रत्नाकरकृतावासो Shatanama Stotram रतीशकृतविस्मयः ।रागहीनो रागदूरो रक्षितब्रह्मचर्यकः ॥ ४ ॥ राज्यमत्तक्षत्त्रबीज भर्जनाग्निप्रतापवान् ।राजद्भृगुकुलाम्बोधिचन्द्रमा रञ्जितद्विजः ॥ ५ ॥ रक्तोपवीतो रक्ताक्षो रक्तलिप्तो रणोद्धतः ।रणत्कुठारो रविभूदण्डायित महाभुजः ॥ ६ ॥ रमानाधधनुर्धारी रमापतिकलामयः ।रमालयमहावक्षा रमानुजलसन्मुखः ॥ ७ ॥ रसैकमल्लो रसनाऽविषयोद्दण्ड पौरुषः ।रामनामश्रुतिस्रस्तक्षत्रियागर्भसञ्चयः ॥ ८ ॥ रोषानलमयाकारो रेणुकापुनराननः ।राधेयचातकाम्भोदो रुद्धचापकलापगः ॥ ९॥ राजीवचरणद्वन्द्वचिह्नपूतमहेन्द्रकः ।रामचन्द्रन्यस्ततेजा राजशब्दार्धनाशनः ॥ १० ॥ राद्धदेवद्विजव्रातो रोहिताश्वाननार्चितः ।रोहिताश्वदुराधर्षो रोहिताश्वप्रपावनः ॥ ११ ॥ रामनामप्रधानार्धो रत्नाकरगभीरधीः ।राजन्मौञ्जीसमाबद्ध सिंहमध्यो रविद्युतिः ॥ १२ ॥ रजताद्रिगुरुस्थानो रुद्राणीप्रेमभाजनम् ।रुद्रभक्तो रौद्रमूर्ती रुद्राधिकपराक्रमः ॥ १३ ॥ रविताराचिरस्थायी रक्तदेवर्षिभावनः ।रम्यो रम्यगुणो रक्तो रातभक्ताखिलेप्सितः ॥ १४ ॥ रचितस्वर्णसोपानो रन्धिताशयवासनः ।रुद्धप्राणादिसञ्चारो राजद्ब्रह्मपदस्थितः ॥ १५ ॥ रत्नसूनुमहाधीरो रसासुरशिखामणिः ।रक्तसिद्धी रम्यतपा राततीर्थाटनो रसी ॥ १६ ॥ रचितभ्रातृहननो रक्षितभातृको रणी ।राजापहृततातेष्टिधेन्वाहर्ता रसाप्रभुः ॥ १७ ॥ रक्षितब्राह्म्यसाम्राज्यो रौद्राणेयजयध्वजः ।राजकीर्तिमयच्छत्रो रोमहर्षणविक्रमः ॥ १८ ॥ राजशौर्यरसाम्भोधिकुम्भसम्भूतिसायकः ।रात्रिन्दिवसमाजाग्र त्प्रतापग्रीष्मभास्करः ॥ १९ ॥ राजबीजोदरक्षोणीपरित्यागी रसात्पतिः ।रसाभारहरो रस्यो राजीवजकृतक्षमः ॥ २० ॥ रुद्रमेरुधनुर्भङ्ग कृद्धात्मा रौद्रभूषणः ।रामचन्द्रमुखज्योत्स्नामृतक्षालितहृन्मलः ॥ २१ ॥ रामाभिन्नो रुद्रमयो Shatanama Stotram रामरुद्रो भयात्मकः ।रामपूजितपादाब्जो रामविद्वेषिकैतवः ॥ २२ ॥ रामानन्दो रामनामो रामो रामात्मनिर्भिदः ।रामप्रियो रामतृप्तो रामगो रामविश्रमः ॥ २३ ॥ रामज्ञानकुठारात्त राजलोकमहातमाः ।रामात्ममुक्तिदो रामो रामदो राममङ्गलः ॥ २४ ॥ मङ्गलं जामदग्न्याय Shatanama Stotram कार्तवीर्यार्जुनच्छिदे ।मङ्गलं परमोदार सदा परशुराम ते ॥ २५ ॥ मङ्गलं राजकालाय दुराधर्षाय मङ्गलं ।मङ्गलं महनीयाय जामदग्न्याय मङ्गलम् ॥ २६ ॥ जमदग्नि तनूजाय जिताखिलमहीभृते ।जाज्वल्यमानायुधाय जामदग्न्याय मङ्गलम् ॥ २७ ॥ ॥ इति श्री परशुराम अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Parshuram Stotram

Shri Parshuram Stotram: श्री परशुराम स्तोत्र….

श्री परशुराम स्तोत्र : (Shri Parshuram Stotram) कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजं ।जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकं ॥१॥ नमामि भार्गवं रामं रेणुका चित्तनन्दनं ।मोचितंबार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम् ॥२॥ भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम् ।गतगर्वप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम् ॥३॥ वशीकृतमहादेवं दृप्त भूप कुलान्तकम् ।तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम् ॥४॥ परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः ।रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम् ॥५॥ शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञापण्डितं रणपण्डितं ।रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररंजनम् ॥६॥ मार्गणाशोषिताभ्ध्यंशं पावनं चिरजीवनम् ।य एतानि जपेन्द्रामनामानि स कृति भवेत् ॥७॥ ॥ इति श्री परशुराम स्तोत्र संपूर्णम् ॥

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Shatanama Stotram

Sri Narasimhagiri Ashtottara-Shatanama Stotram : श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम्….

श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Narasimhagiri Ashtottara-Shatanama Stotram in Hindi ब्रह्मवर्ण समुद्भूतो Shatanama Stotram ब्रह्ममार्गप्रवर्द्धकः ।ब्रह्मज्ञानसदासक्तो व्रह्मज्ञानपरायणः ॥ १ ॥ शिवपञ्चाक्षररतोऽशिवज्ञानविनाशकः ।शिवाभिषेकनिरतः शिवपूजापरायणः ॥ २ ॥ नारायणप्रवचनो नारायणपरायणः ।नारायणप्रत्नतनुर्नारायणनयस्थितः ॥ ३ ॥ दक्षिणामूर्तिपीठस्थो दक्षिणामूर्तिदेवतः ।श्रीमेधादक्षिणामूर्तिमन्त्रयन्त्रसदारतः ॥ ४ ॥ मण्डलेशवरप्रेष्ठो मण्डलेशवरप्रदः ।मण्डलेशगुरुश्रेष्ठो मण्डलेशवरस्तुतः ॥ ५ ॥ निरञ्जनप्रपीठस्थो निरञ्जनविचारकः ।निरञ्जनसदाचारो निरञ्जनतनुस्थितः ॥ ६ ॥ वेदविद्वेदहृदयो वेदपाठप्रवर्तकः।वेदराद्धान्तसंविष्टोऽवेदपथप्रखण्डकः ॥ ७ ॥ शाङ्कराद्वैतव्याख्याता Shatanama Stotram शाङ्कराद्वैतसंस्थितः ।शाकराद्वैतविद्वेष्टृविनाशनपरायणः ॥ ८ ॥ अत्याश्रमाचाररतो भूतिधारणतत्परः ।सिद्धासनसमासीनो काञ्चनाभो मनोहरः ॥ ९ ॥ अक्षमालाधृतग्रीवः काषायपरिवेष्टितः ।ज्ञानमुद्रादक्षहस्तो वामहस्तकमण्डलुः ॥ १० ॥ सन्न्यासाश्रमनिर्भाता परहंसधुरन्धरः ।सन्न्यासिनयसंस्कर्ता परहंसप्रमाणकः ॥ ११ ॥ माधुर्यपूर्णचरितो मधुराकारविग्रहः ।मधुवाङ्निग्रहरतो मधुविद्याप्रदायकः ॥ १२ ॥ मधुरालापचतुरो निग्रहानुग्रहक्षमः ।आर्द्धरात्रध्यानरतस्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥ १३ ॥ आरण्यवार्तिकपरः पुष्पमालाविभूषितः ।वेदान्तवार्तानिरतः प्रस्थानत्रयभूषणः ॥ १४ ॥ सानन्दज्ञानभाष्यादिग्रन्थग्रन्थिप्रभेदकः ।दृष्टान्तानूक्तिकुशलो दृष्टान्तार्थनिरूपकः ॥ १५ ॥ वीकानेरगुरुर्वाग्मी Shatanama Stotram वङ्गदेशप्रपूजितः ।लाहौरसरगोदादौ हिन्दूधर्मप्रचारकः ॥ १६ ॥ गणेशजययात्रादिप्रतिष्ठापनतत्परः ।गणेशशक्तिसूर्येशविष्णुभक्तिप्रचारकः ॥ १७ ॥ सर्ववर्णसमाम्नातलिङ्गपूजाप्रवर्द्धकः ।गीतोत्सवसपर्यादिचित्रयज्ञप्रवर्तकः ॥ १८ ॥ लोकेश्वरानन्दप्रियो दयानन्दप्रसेवितः ।आत्मानन्दगिरिज्ञानसतीर्थ्यपरिवेष्टितः ॥ १९ ॥ अनन्तश्रद्धापरमप्रकाशानन्दपूजितः ।जूनापीठस्थरामेशवरानन्दगिरेर्गुरुः ॥ २० ॥ माधवानन्दसंवेष्टा काशिकानन्ददेशिकः ।वेदान्तमूर्तिराचार्यो शान्तो दान्तः प्रभुस्सुहृत् ॥ २१ ॥ निर्ममो विश्वतरणिः स्मितास्यो निर्मलो महान् ।तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थदिव्यज्ञानप्रदायकः ॥ २२ ॥ गिरीशानन्दसम्प्राप्तपरमहंसपरम्परा ।जनार्दनगिरिब्रह्यसंन्यासाश्रमदीक्षितः ॥ २३ ॥ मण्डलेशकुलश्रेष्ठजयेन्द्रपुरीसंस्तुतः ।रामानन्दगिरिस्थानस्थापितो मण्डलेश्वरः ॥ २४ ॥ शन्दमहेशानन्दाय स्वकीयपददायकः ।यतीन्द्रकृष्णानन्दैश्च पूजितपादपद्मक्ः ॥ २५ ॥ उषोत्थानस्नानपूजाजपध्यानप्रचोदकः ।तुरीयाश्रमसंविष्ठभाष्यपाठप्रवर्तकः ॥ २६ ॥ अष्टलक्ष्यीप्रदस्तृप्तः स्पर्शदीक्षाविधायकः ।अहैतुककृपासिन्धुरनघोभक्तवत्सलः ॥ २७ ॥ विकारशून्यो दुर्धर्षः शिवसक्तो वरप्रदः ।काशीवासप्रियो मुक्तो भक्तमुक्तिविधायकः ॥ २८ ॥ श्रीभत्परमहंसादिसमस्तबिरुदाङ्कितः ।नृसिंहब्रह्म वेदान्तजगत्यद्य जगद्गुरुः ॥ २९ ॥ विलयं यान्ति पापानि गुरुनामानुकीर्तनात् ।मुच्यते नात्र सन्देहः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥ ३० ॥ ॥ इति श्री नृसिंहगिरि अष्टोत्तर-शतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Narayana Stotra : नारायण स्तोत्र…..

Narayana Stotra : नारायण स्तोत्र : नारायण स्तोत्र भगवान श्री विष्णु को समर्पित एक भक्तिपूर्ण ग्रंथ है। भक्तों के बीच विष्णु का एक सरल और लोकप्रिय नाम ‘नारायण’ है, और इसी नाम को जोड़कर विष्णु के अन्य नाम जैसे लक्ष्मीनारायण, शेषनारायण और अनंतनारायण आदि बने हैं। हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, प्रतिदिन नियमित रूप से श्री नारायण स्तोत्र का पाठ करने से हर मनुष्य का मन पूर्णता को प्राप्त करता है। Narayana Stotra हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारायण स्तोत्र का नियमित जाप करना भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है। नारायण स्तोत्र भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह एक बहुत ही सरल पाठ है, जिससे हर कोई लाभान्वित हो सकता है। Narayana Stotra यह भगवान विष्णु के उन शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक है जिसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। Narayana Stotra नारायण स्तोत्र का नियमित पाठ एक सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जीने में सहायक होता है। Narayana Stotra लक्ष्मी नारायण स्तोत्र के बोल (Lyrics) और उनका अंग्रेजी अर्थ। श्री लक्ष्मी नारायण स्तोत्र एक महान प्रार्थना है, जिसका पाठ भगवान कृष्ण ने देवी लक्ष्मी और भगवान नारायण की स्तुति में किया था। नारायण स्तोत्र के लाभ:Benefits of the Narayan Stotra नारायण स्तोत्र Narayana Stotra का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है, और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है।ऐसे पवित्र और शक्तिशाली नारायण स्तोत्र Narayana Stotra का पूर्ण तल्लीनता और श्रद्धा के साथ जाप करना, वास्तव में अनेक प्रकार से एक वरदान के समान है।उपलब्ध हिंदू ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार, भगवान विष्णु को “मकर राशि” (“श्रवण नक्षत्र”) की दिशा में विराजमान माना जाता है, जो लगभग मकर तारामंडल (Capricorn constellation) के साथ मेल खाता है। कुछ उपलब्ध पुराणों और वैष्णव परंपराओं में, विष्णु की दृष्टि को अनंत दूरी पर स्थित ‘दक्षिणी खगोलीय ध्रुव’ (Southern Celestial Pole) पर स्थित माना गया है।नारायण स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है, और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए : Who should recite this Stotra ? जो व्यक्ति बार-बार असफल हो रहा हो और समाज में अपमान का सामना कर रहा हो, उसे अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने और एक सुगम जीवन जीने के लिए, वैदिक नियमों के अनुसार तथा किसी पूजा-पाठ के विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में, नियमित रूप से Narayana Stotra नारायण स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। नारायण स्तोत्र हिंदी पाठ : Narayana Stotra in Hindi नारायण नारायण जय गोविंद हरे ॥नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥ करुणापारावार वरुणालयगंभीर नारायण ॥ 1 ॥घननीरदसंकाश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥पीतांबरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… मंजुलगुंजाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 8 ॥[बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण]नारायण नारायण जय गोविंद हरे… जलरुहदलनिभनेत्र जगदारंभकसूत्र नारायण ॥ 9॥पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 10 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 11 ॥हाटकनिभपीतांबर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 12 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… सरयुतीरविहार सज्जन​ऋषिमंदार नारायण ॥ 16 ॥विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… ध्वजवज्रांकुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… दशरथवाग्धृतिभार दंडक वनसंचार नारायण ॥ 20 ॥मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… जलनिधि बंधन धीर रावणकंठविदार नारायण ॥ 24 ॥ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥संभ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥नारायण नारायण जय गोविंद हरे… अचलोद्धृतचंचत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥[भारत यतवरशंकर नामामृतमखिलांतर नारायण] नारायण नारायण जय गोविंद हरे नारायण ॥नारायण नारायण जय गोपाल हरे नारायण नारायण नारायण ॥ ॥ इति नारायण स्तोत्र संपूर्णम् ॥

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Shri Navnaag Stotra : श्री नवनाग स्तोत्र…..

Shri Navnaag Stotra : श्री नवनाग स्तोत्र श्री नवनाग स्तोत्र एक दिव्य मंत्र है जो उस व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है जो इस मंत्र का पाठ अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ करता है। इस स्तोत्र का पाठ सभी प्रकार के बुरे प्रभावों, श्रापों, टोने-टोटकों और काले जादू से बचने तथा उन्हें समाप्त करने के लिए भी किया जाता है। यह एक दिव्य मंत्र है जो उस व्यक्ति को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है जो इस मंत्र का पाठ अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से ईर्ष्या, आपसी रंजिश और नुकसान पहुँचाने वाले प्रतिद्वंद्वी भी समाप्त हो जाते हैं। अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को पहले नवनाग स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और उसके बाद नाग गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। श्री नवनाग स्तोत्र के लाभ:Benefits of Shri Navnag Stotra यह सभी प्रकार के नाग दोष, कालसर्प दोष, सर्प दोष, तथा राहु दोष और केतु दोष को दूर करने और समाप्त करने के लिए भी एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है। यह मंत्र आपको अपने शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करता है। Navnaag Stotra यह आपको अपने शत्रुओं का सामना करने के लिए शक्ति और साहस भी प्रदान करता है। Navnaag Stotra श्री नवनाग स्तोत्र दुर्भाग्य, बुरी नज़र, बुरे सपनों से बचाता है, तथा बुरी आत्माओं और श्रापों से सुरक्षा प्रदान करता है। श्री नवनाग स्तोत्र का पाठ करने से ईर्ष्या, आपसी रंजिश और नुकसान पहुँचाने वाले प्रतिद्वंद्वी भी समाप्त हो जाते हैं। नवनाग स्तोत्र का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति और उसके परिवार को सफलता, विजय, सौभाग्य, उत्तम स्वास्थ्य, प्रचुर धन-संपत्ति, संतान सुख और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अनेक पुराणों के अनुसार, जब देवी नागेश्वरी के मंत्रों का निरंतर पाठ किया जाता है, Navnaag Stotra तो पाठ करने वाले को सभी प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। Navnaag Stotra गर्भवती महिलाएँ भी गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा के लिए और सुरक्षित प्रसव के लिए इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं। जिन निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति की इच्छा है, वे भी इस मंत्र का अत्यंत भक्ति के साथ पाठ करके देवी नागेश्वरी का आशीर्वाद और कृपा प्राप्त कर सकते हैं। युवा और अविवाहित व्यक्ति भी नवनाग स्तोत्र का पाठ करके अत्यधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। Navnaag Stotra अविवाहित युवतियाँ देवी नागेश्वरी से उचित आयु में शीघ्र विवाह होने तथा एक सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त करने के लिए प्रार्थना कर सकती हैं। अविवाहित युवक भी देवी नागेश्वरी से एक सुयोग्य पत्नी प्राप्त करने के लिए, तथा उत्तम चरित्र वाली सुंदर कन्या से विवाह होने के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:Who should recite this Stotra ? जिन व्यक्तियों का भाग्य रूठा हुआ है, जिन्हें जीवन के हर क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, और जो शत्रुओं से परेशान हैं—उन्हें नियमित रूप से इस ‘श्री नवनाग स्तोत्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री नवनाग स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Navnaag Stotra in Hindi ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् ।शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥ 1 ॥ एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम् ।सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः ॥ 2 ॥ तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ 3 ॥ ॥ इति श्री नवनाग नाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Gayatri Jayanti 2026

Gayatri Jayanti 2026 Date And Time : गायत्री जयंती तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और चमत्कारी गायत्री मंत्र का रहस्य…

Gayatri Jayanti 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म के विस्तृत और रहस्यमयी ज्ञानकोश में माता गायत्री को सर्वोपरि और अत्यंत पवित्र स्थान प्राप्त है। उन्हें साक्षात ‘वेदों की माता’ (वेदमाता) कहकर पुकारा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का जो भी प्रकाश मौजूद है, वह सब माता गायत्री के असीम आशीर्वाद का ही परिणाम है। इस वर्ष Gayatri Jayanti 2026 का यह अत्यंत पावन पर्व हमारे जीवन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान और सत्य का दिव्य प्रकाश भरने का एक बहुत ही शानदार अवसर लेकर आ रहा है। यह वह परम दिन है जब ब्रह्मा जी ने अपने चार मुखों से चार वेदों के माध्यम से गायत्री मंत्र का ज्ञान पूरे संसार को दिया था। आज हम गहराई से जानेंगे कि Gayatri Jayanti 2026 कब मनाई जाएगी, इसके शुभ मुहूर्त क्या हैं, माता की उत्पत्ति की रोचक पौराणिक कथा क्या है, और इस दिन किस विशेष विधि से पूजा व मंत्र जाप करके आप अपने जीवन को पूरी तरह से सफल बना सकते हैं। Gayatri Jayanti 2026 की सही तिथि और एकदम सटीक शुभ मुहूर्त….. हिन्दू वैदिक पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, मुख्य रूप से यह पावन जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को बहुत ही भव्यता और भक्ति-भाव के साथ मनाई जाती है। साल 2026 में Gayatri Jayanti 2026 का मुख्य पर्व 25 जून 2026, दिन गुरुवार को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाएगा। आइए इसके एकदम सटीक मुहूर्तों पर नजर डालते हैं ताकि आपसे पूजा में कोई चूक न हो: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: 24 जून 2026 की शाम 06:14 बजे से। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: 25 जून 2026 की रात 08:10 बजे पर। उदया तिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के पवित्र सनातन नियमों का पालन करते हुए, Gayatri Jayanti 2026 का यह व्रत 25 जून को ही रखा जाएगा, और इसी दिन निर्जला एकादशी का महान पर्व भी पूरे भक्ति-भाव के साथ मनाया जाएगा। श्रावण मास की Gayatri Jayanti 2026 का विशेष महत्व भारत के कई अलग-अलग हिस्सों और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार, गायत्री जयंती का पर्व श्रावण मास (सावन के महीने) की पूर्णिमा तिथि के दिन भी अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस पवित्र दिन भी वेदमाता गायत्री का प्राकट्य हुआ था। श्रावण मास वाली Gayatri Jayanti 2026 का आयोजन इस वर्ष 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को किया जाएगा। पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 27 अगस्त 2026 की सुबह 09:10 बजे। पूर्णिमा तिथि का समापन: 28 अगस्त 2026 की सुबह 09:49 बजे। यह दिन इसलिए भी अत्यंत खास बन जाता है क्योंकि 28 अगस्त को ही रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा जैसे बड़े त्योहार भी एक साथ मनाए जाएंगे। माता गायत्री का दिव्य स्वरूप और उनकी रहस्यमयी शक्ति क्या आप जानते हैं कि माता गायत्री का स्वरूप इतना शक्तिशाली क्यों माना जाता है? धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, वेदमाता गायत्री त्रिदेवों—यानी भगवान ब्रह्मा, श्री विष्णु और देवों के देव महादेव (शिव)—इन तीनों की सम्मिलित ऊर्जा और परम शक्तियों से मिलकर बनी हैं। Gayatri Jayanti 2026 के शुभ अवसर पर उनके इस दिव्य रूप का ध्यान करना मन को असीम शांति देता है। शास्त्रों के अनुसार, माता गायत्री के पांच मुख और दस हाथ हैं। उनके चार मुख साक्षात हमारे चार वेदों का प्रतीक माने जाते हैं, जबकि उनका पांचवां मुख परम शक्ति और दिव्यता को दर्शाता है। उनके दस हाथों में भगवान विष्णु के प्रतीक मौजूद हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के पालन-पोषण का संकेत देते हैं। उन्हें साक्षात भगवान ब्रह्मा जी की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है। ब्रह्मा जी के यज्ञ और माता गायत्री के विवाह की पौराणिक कथा आखिर माता गायत्री का विवाह भगवान ब्रह्मा से कैसे हुआ? इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है। प्राचीन काल में एक बार भगवान ब्रह्मा जी संसार के कल्याण के लिए एक बहुत ही विशाल और पवित्र यज्ञ का आयोजन कर रहे थे। हिंदू धर्म के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी यज्ञ की पूर्णता के लिए पत्नी का पति के साथ बैठना अनिवार्य होता है। ब्रह्मा जी को इस यज्ञ में अपनी पत्नी माता सावित्री के साथ बैठना था, लेकिन किसी कारणवश माता सावित्री को वहां पहुंचने में बहुत देर हो गई और यज्ञ का शुभ मुहूर्त तेजी से बीत रहा था। यज्ञ को अधूरा छोड़ने का मतलब सृष्टि में असंतुलन पैदा करना था। इस घोर संकट को टालने और यज्ञ को सही समय पर पूर्ण करने के लिए, भगवान ब्रह्मा जी ने वहां उपस्थित अत्यंत तेजस्विनी माता गायत्री को अपनी पत्नी का स्थान दिया और उनके साथ बैठकर उस महान यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न किया। Gayatri Jayanti 2026 पर इस कथा को पढ़ने या सुनने से इंसान के सभी वैवाहिक कष्ट दूर होते हैं और उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। महामंत्र: गायत्री मंत्र की उत्पत्ति, अर्थ और इसके चमत्कारी लाभ ऋग्वेद में वर्णित मूल गायत्री मंत्र मुख्य रूप से सूर्य देव (सविता) को समर्पित है, जो इंसान को सत्य, चेतना और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। विश्वामित्र जी की कठोर तपस्या के बाद ही यह महान मंत्र आम जनमानस के कल्याण के लिए उपलब्ध हो पाया था। मूल गायत्री मंत्र: “ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।” इसका गहरा अर्थ: हम उस परम सत्य, चेतना और आनंद के प्रतीक, सृष्टि के रचयिता और प्रकाशवान ईश्वर के उस महान तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को हमेशा सत्य और सही दिशा की ओर प्रेरित करे। Gayatri Jayanti 2026 के दिन इस महामंत्र का जाप करने से व्यक्ति को कई असीम लाभ मिलते हैं: मानसिक शांति और वैज्ञानिक लाभ: विज्ञान भी यह मानता है कि गायत्री मंत्र का स्पष्ट उच्चारण हमारे दिमाग में ‘अल्फा ब्रेन वेव्स’ (alpha brain waves) को बढ़ाता है, जिससे गहरे ध्यान और असीम शांति की अनुभूति होती है। कामधेनु की प्राप्ति: जो भी व्यक्ति पूरे नियम से इसका जाप करता है, उसे ‘कामधेनु’ के समान फल मिलता है—अर्थात उसकी सभी उचित और सकारात्मक इच्छाएं अपने आप पूरी होने लगती हैं। सही मार्ग का दर्शन: यह मंत्र इंसान को कभी भी गलत

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