Shri Stotra

Shri Stotra : श्री स्तोत्र….

Shri Stotra श्री स्तोत्र: श्री स्तोत्र का ज़िक्र श्री विष्णु पुराण और अग्नि पुराण में मिलता है। कहा जाता है कि महात्मा पुष्कर ने परशुराम को बताया था कि भगवान इंद्र ने इस श्री स्तोत्र का पाठ करके ही इंद्रलोक में देवी लक्ष्मी का वास कराया था और उनसे सुख-समृद्धि प्राप्त की थी। जो कोई भी श्री स्तोत्र का पाठ करता है या इसे सुनता है, उसे हमेशा माता श्री लक्ष्मी जी का आशीर्वाद मिलता है और सभी सुखों को भोगने के बाद अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्री नारायण स्तोत्र भगवान हरि विष्णु को समर्पित एक ग्रंथ है। विष्णु का अपने भक्तों के बीच एक सरल और लोकप्रिय नाम ‘नारायण’ है और इसी नाम से जुड़कर विष्णु के अन्य नाम जैसे लक्ष्मी-नारायण, शेष-नारायण और अनंत-नारायण आदि बने हैं। हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, रोज़ाना श्री नारायण स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य की हर इच्छा पूरी होती है। यह ग्रंथ विष्णु को बहुत प्रिय है और एक बहुत ही सरल पाठ है, जिससे हर कोई लाभ उठा सकता है। धन-संपत्ति पाने के लिए माता लक्ष्मी को प्रसन्न करना ज़रूरी है। विद्वानों ने ऐसे तीन कार्यों के बारे में बताया है Shri Stotra जिन्हें अपनी दिनचर्या में शामिल करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। भगवान के नाम में एक रहस्यमयी शक्ति होती है। मनुष्य केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता, लेकिन वह भगवान की मदद से जी सकता है। ब्रह्मचर्य से मन शुद्ध होता है। मन शुभ और पवित्र विचारों से भर जाता है। मंत्रों के जाप से रोज़ाना अच्छे संस्कार मज़बूत होते हैं। जो व्यक्ति अच्छी सोच और पवित्र विचारों का अभ्यास करता है, उसमें शुभता की प्रवृत्ति विकसित होती है। अच्छे विचारों का निरंतर प्रवाह उसके चरित्र को बदल देता है। Shri Stotra वेदों और पुराणों में भगवान विष्णु को ब्रह्मांड का आधार माना गया है। Shri Stotra मानव जीवन से जुड़े सुख और दुख का चक्र श्री हरि के हाथों में है। भगवान की पूजा में विष्णु सहस्रनाम का पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। श्री स्तोत्र के लाभ: श्री सूक्तम एक अचूक मंत्र है Shri Stotra जो व्यक्ति और उसके पूरे परिवार के लिए समृद्धि, अच्छाई, स्वास्थ्य, धन और कल्याण लाता है। Shri Stotra श्री सूक्तम पाठ के लाभ: श्री सूक्तम का पाठ देवी माँ को अत्यंत प्रसन्न करता है और वह अपने बच्चों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए: जो व्यक्ति धन-संपत्ति में सुख-समृद्धि चाहता है, उसे वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से इस Shri Stotra श्री स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Stotra in Hindi पुष्कर उवा – राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः ।स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ।। इन्द्र उवाच – नमस्ते सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् ।श्रियमुन्निन्द्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ।। त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि ।संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ।। यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने ।आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ।। आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च ।सौम्या सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवी पूरितम् ।। का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः ।अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ।। त्वया देवि परित्यक्तं सफलं भुवनत्रयम् ।विनष्टप्रायमभवत्वयेदानीं समेधिताम् ।। दाराः पुत्रस्तथाऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम् ।भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नॄणाम् ।। शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् ।देवि त्वददृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ।। त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता ।त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ।। मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् ।मा शरीरं कलत्रं च त्ययेथाः सर्वपावनि ।। मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशुन्मा विभूषणम् ।त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये ।। सत्येन समशौचाभ्यां तथा शिलादिभिर्गुणैः ।त्यज्यन्ते नराः सद्यः सन्त्यक्ताः ये त्वयामले ।। त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शिलाद्यैरखिलैर्गुणैः ।कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ।। स श्लाघ्यः सगुणी धन्यः सकुलीनः स बुद्धिमान् ।स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवी वीक्षितः ।। सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः ।पराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्ल्भे ।। न ते वर्णयितुं शक्ता गुणज्जिह्वाऽपि वेधसः ।प्रसीद देवि पद्माक्षि नास्माम्स्त्याक्षीः कदाचन ।। पुष्कर उवाच- एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् ।सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ।। स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् ।श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः ।। ।। इति श्री स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Ashtakam Stotram

Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram : श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम्….

श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram in Hindi नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाश हेतवे ।त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरञ्चि नारायण शंकरात्मने ॥ १ ॥ यन्मडलं दीप्तिकरं विशालं रत्नप्रभं तीव्रमनादिरुपम् ।दारिद्र्यदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥ यन्मण्डलं देवगणै: सुपूजितं विप्रैः स्तुत्यं भावमुक्तिकोविदम् ।तं देवदेवं प्रणमामि सूर्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ३ ॥ यन्मण्डलं ज्ञानघनं, त्वगम्यं, त्रैलोक्यपूज्यं, त्रिगुणात्मरुपम् ।समस्ततेजोमयदिव्यरुपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४ ॥ यन्मडलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य Ashtakam Stotram वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ५ ॥ यन्मडलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजु: सामसु सम्प्रगीतम् ।प्रकाशितं येन च भुर्भुव: स्व: पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ६ ॥ यन्मडलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति Ashtakam Stotram यच्चारणसिद्धसंघाः ।यद्योगितो योगजुषां च संघाः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७ ॥ यन्मडलं सर्वजनेषु पूजितं ज्योतिश्च Ashtakam Stotram कुर्यादिह मर्त्यलोके ।यत्कालकल्पक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८ ॥ यन्मडलं विश्वसृजां Ashtakam Stotram प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् ।यस्मिन् जगत् संहरतेऽखिलं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ९ ॥ यन्मडलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्ध तत्त्वम् ।सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १० ॥ यन्मडलं वेदविदि वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥ ॥ इति श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram Lyrics : श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् पाठ namah savitre jagadekchakshushejagatprasutisthitinash hetave ।trayimayay trigunatmadharineviranchi narayan shankaratmane ।। 1 ।। yanmadalam diptikaram vishalamratnaprabham tivramanadirupam ।daridryaduhkhakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 2 ।। yanmandalam devganai supujitamvipraih stutyam bhavamuktikovidam ।tam devdevam pranamaami suryampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 3 ।। yanmandalam dnyanaghanam, tvagamyam,trailokyapujyam, trigunatmarupam ।samastatejomayadivyarupampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 4 ।। yanmadalam gudhamatiprabodhamdharmasya vrudhim kurute jananam ।yatsarvapapakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 5 ।। yanmadalam vyadhivinashadakshamyadrigyaju samsu sampragitam ।prakashitam yen ch bhurbhuva svapunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 6 ।। yanmadalam vedvido vadantigayanti yacharansiddhasanghah ।yadyogito yogajusham ch sanghahpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 7 ।। yanmadalam sarvajaneshu pujitamjyotisch kuryadih martyaloke ।yatkalakalpakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 8 ।। yanmadalam vishvasrijamprasiddhamutpattirakshapralayapragalbham ।yasmin jagat sanharate̕khilam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 9 ।। yanmadalam sarvagatasya vishnoratmaparam dhaam vishuddh tatvam ।sukshmantarairyogapathanugamyampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 10 ।। yanmadalam vedvidi vadantigayanti yacharansiddhasanghah ।yanmandalam vedvidah smarantipunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 11 ।। ।। iti shri suryamandal ashtak stotram sampurnam ।।

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Smaran Stotram

Shri Surya Pratah-Smaran Stotram : श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम्…..

श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Surya Pratah-Smaran Stotram in Hindi प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यंरूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुंब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥ १ ॥ प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभि–र्ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैर्नतमर्चितं च ।वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतंत्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥ २ ॥ प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिंपापौघशत्रुभयरोगहरं परं च ।तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिंगोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥ ३ ॥ श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातः प्रातः पठेत्तु यः ।स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ ॥ इति श्री सूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Shri Surya Pratah-Smaran Stotram Lyrics : श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् पाठ Pratah smarami Khalu thath savithur varenyam,Roopam hi mandala mruchodha thanur yajjomshi,Samaani yasya kirana prabhavadhi hethum,Brahmaa harathma kamalakshya machinthya roopam ॥ 1 ॥ Pratnamami tharinam thanuvag manobhi,Brahmendra poorvaka surairnatha marchitham cha,Vrushti promachana vinigraha hethu bhootham,Trilokya palana param, trigunathmakam cha ॥ 2 ॥ Pratarbhajami savithara manantha shakthim,Papougha shathru bhaya roga haram param cha,Tham sarva loka kalanathmaka kala moorthim,Go khanda bandhana vimochanamadhi devam ॥ 3 ॥ Slokathrayamidham Bhano Pratha kale padethu ya,Sa sarva vyadhi nirmuktha prama sukhamavapnuyath ॥ 4 ॥ ॥ iti shri surya pratah smaran stotram sampurnam ॥ श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् विशेषताए: श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् के साथ-साथ यदि सूर्ये आरती या सूर्ये कवचका पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| Smaran Stotram अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| इस स्तोत्रम् के पाठ के साथ साथ सूर्ये चालीसा  और सूर्ये अष्टकम का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | Smaran Stotram और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही सूर्य देव की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Bhujanga Stotram

Sri Subramanya Bhujanga Stotram: श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत….

श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत हिंदी पाठ : Sri Subramanya Bhujanga Stotram in Hindi सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहंत्रीमहादंतिवक्त्राऽपि पंचास्यमान्या ।विधींद्रादिमृग्या गणेशाभिधा मेविधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः ॥ 1 ॥ न जानामि शब्दं न जानामि चार्थंन जानामि पद्यं न Bhujanga Stotram जानामि गद्यम् ।चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मेमुखान्निःसरंते गिरश्चापि चित्रम् ॥ 2 ॥ मयूराधिरूढं महावाक्यगूढंमनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम् ।महीदेवदेवं महावेदभावंमहादेवबालं भजे लोकपालम् ॥ 3 ॥ यदा संनिधानं गता मानवा मेभवांभोधिपारं गतास्ते तदैव ।इति व्यंजयन्सिंधुतीरे य आस्तेतमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम् ॥ 4 ॥ यथाब्धेस्तरंगा लयं यांति तुंगा-स्तथैवापदः संनिधौ सेवतां मे ।इतीवोर्मिपंक्तीर्नृणां दर्शयंतंसदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम् ॥ 5 ॥ गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः ।इतीव ब्रुवन्गंधशैलाधिरूढःस देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु ॥ 6 ॥ महांभोधितीरे महापापचोरेमुनींद्रानुकूले Bhujanga Stotram सुगंधाख्यशैले ।गुहायां वसंतं स्वभासा लसंतंजनार्तिं हरंतं श्रयामो गुहं तम् ॥ 7 ॥ लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहेसुमस्तोमसंछन्नमाणिक्यमंचे ।समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशंसदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम् ॥ 8 ॥ रणद्धंसके मंजुलेऽत्यंतशोणेमनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे ।मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तःसदा मोदतां स्कंद ते पादपद्मे ॥ 9 ॥ सुवर्णाभदिव्यांबरैर्भासमानांक्वणत्किंकिणीमेखलाशोभमानाम् ।लसद्धेमपट्टेन Bhujanga Stotram विद्योतमानांकटिं भावये स्कंद ते दीप्यमानाम् ॥ 10 ॥ पुलिंदेशकन्याघनाभोगतुंग-स्तनालिंगनासक्तकाश्मीररागम् ।नमस्याम्यहं तारकारे तवोरःस्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम् ॥ 11 ॥ विधौ क्लृप्तदंडान्स्वलीलाधृतांडा-न्निरस्तेभशुंडांद्विषत्कालदंडान् ।हतेंद्रारिषंडान्जगत्राणशौंडा-न्सदा ते प्रचंडान्श्रये बाहुदंडान् ॥ 12 ॥ सदा शारदाः षण्मृगांका यदि स्युःसमुद्यंत एव Bhujanga Stotram स्थिताश्चेत्समंतात् ।सदा पूर्णबिंबाः कलंकैश्च हीना-स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कंद साम्यम् ॥ 13 ॥ स्फुरन्मंदहासैः सहंसानि चंच-त्कटाक्षावलीभृंगसंघोज्ज्वलानि ।सुधास्यंदिबिंबाधराणीशसूनोतवालोकये षण्मुखांभोरुहाणि ॥ 14 ॥ विशालेषु कर्णांतदीर्घेष्वजस्रंदयास्यंदिषु Bhujanga Stotram द्वादशस्वीक्षणेषु ।मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः ॥ 15 ॥ सुतांगोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धाजपन्मंत्रमीशो मुदा जिघ्रते यान् ।जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यःकिरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः ॥ 16 ॥ स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-श्चलत्कुंडलश्रीलसद्गंडभागः ।कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिःपुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः ॥ 17 ॥ इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-ह्वयत्यादराच्छंकरे Bhujanga Stotram मातुरंकात् ।समुत्पत्य तातं श्रयंतं कुमारंहराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम् ॥ 18 ॥ कुमारेशसूनो गुह स्कंद सेना-पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ ।पुलिंदात्मजाकांत भक्तार्तिहारिन्प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम् ॥ 19 ॥ प्रशांतेंद्रिये नष्टसंज्ञे विचेष्टेकफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कंपिगात्रे ।प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानींद्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम् ॥ 20 ॥ कृतांतस्य दूतेषु चंडेषु कोपा-द्दहच्छिंद्धि भिंद्धीति मां तर्जयत्सु ।मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वंपुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम् ॥ 21 ॥ प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वाप्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम् ।न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धेन कार्यांतकाले मनागप्युपेक्षा ॥ 22 ॥ सहस्रांडभोक्ता त्वया शूरनामाहतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः ।ममांतर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकंन हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि ॥ 23 ॥ अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नोभवांदीनबंधुस्त्वदन्यं न याचे ।भवद्भक्तिरोधं सदा क्लृप्तबाधंममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम् ॥ 24 ॥ अपस्मारकुष्टक्षयार्शः प्रमेह-ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महांतः ।पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिंविलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवंते ॥ 25 ॥ दृशि स्कंदमूर्तिः श्रुतौ स्कंदकीर्ति-र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम् ।करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यंगुहे संतु लीना ममाशेषभावाः ॥ 26 ॥ मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-मभीष्टप्रदाः संति सर्वत्र देवाः ।नृणामंत्यजानामपि स्वार्थदानेगुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने ॥ 27 ॥ कलत्रं सुता बंधुवर्गः पशुर्वानरो वाथ नारी गृहे ये मदीयाः ।यजंतो नमंतः स्तुवंतो भवंतंस्मरंतश्च ते संतु सर्वे कुमार ॥ 28 ॥ मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-स्तथा व्याधयो बाधका ये मदंगे ।भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरेविनश्यंतु ते चूर्णितक्रौंचशैल ॥ 29 ॥ जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधंसहेते न किं देवसेनाधिनाथ ।अहं चातिबालो भवान् लोकतातःक्षमस्वापराधं समस्तं महेश ॥ 30 ॥ नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यंनमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय ।नमः सिंधवे सिंधुदेशाय तुभ्यंपुनः स्कंदमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु ॥ 31 ॥ जयानंदभूमं जयापारधामंजयामोघकीर्ते जयानंदमूर्ते ।जयानंदसिंधो जयाशेषबंधोजय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो ॥ 32 ॥ भुजंगाख्यवृत्तेन क्लृप्तं स्तवं यःपठेद्भक्तियुक्तो गुहं संप्रणम्य ।स पुत्रान्कलत्रं धनं दीर्घमायु-र्लभेत्स्कंदसायुज्यमंते नरः सः ॥ 33 ॥ ॥ इति श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत सम्पूर्णम् ॥

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Karavalamba

Sri Subramanya Karavalamba : श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम्….

श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Subramanya Karavalamba in Hindi हे स्वामिनाथ करुणाकर दीनबंधो,श्रीपार्वतीशमुखपंकज पद्मबंधो ।श्रीशादिदेवगणपूजितपादपद्म,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 1 ॥ देवादिदेवनुत देवगणाधिनाथ,देवेंद्रवंद्य मृदुपंकजमंजुपाद ।देवर्षिनारदमुनींद्रसुगीतकीर्ते,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 2 ॥ नित्यान्नदान निरताखिल रोगहारिन्,तस्मात्प्रदान परिपूरितभक्तकाम ।शृत्यागमप्रणववाच्यनिजस्वरूप,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 3 ॥ क्रौंचासुरेंद्र परिखंडन शक्तिशूल,पाशादिशस्त्रपरिमंडितदिव्यपाणे ।श्रीकुंडलीश धृततुंड शिखींद्रवाह,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 4 ॥ देवादिदेव रथमंडल मध्य वेद्य,देवेंद्र पीठनगरं Karavalamba दृढचापहस्तम् ।शूरं निहत्य सुरकोटिभिरीड्यमान,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 5 ॥ हारादिरत्नमणियुक्तकिरीटहार,केयूरकुंडललसत्कवचाभिराम ।हे वीर तारक Karavalamba जयाऽमरबृंदवंद्य,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 6 ॥ पंचाक्षरादिमनुमंत्रित गांगतोयैः,पंचामृतैः प्रमुदितेंद्रमुखैर्मुनींद्रैः ।पट्टाभिषिक्त हरियुक्त परासनाथ,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 7 ॥ श्रीकार्तिकेय करुणामृतपूर्णदृष्ट्या,कामादिरोगकलुषीकृतदुष्टचित्तम् ।भक्त्वा तु मामवकलाधर कांतिकांत्या,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 8 ॥ सुब्रह्मण्य करावलंबं पुण्यं ये पठंति द्विजोत्तमाः ।ते सर्वे मुक्ति मायांति सुब्रह्मण्य प्रसादतः ।सुब्रह्मण्य करावलंबमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।कोटिजन्मकृतं पापं तत्​क्षणादेव नश्यति ॥ ॥ इति श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Sri Subramanya Karavalamba Stotram Lyrics : श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् पाठ Hey Swaminatha karunakara deena bandhoSree Paravatheesa mukha pankaja padma bandhoSreesadhi deva gana poojitha pada padmaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 1 ॥ Devadhi deva sutha, deva ganadhi nadhaDevendra vandhya mrudu pankaja manju padaDevarshi narada muneendra sugeetha keertheValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 2 ॥ Nithyanna dana nirathakhila roga harinBhagya pradhana paripooritha bhaktha kamaSruthyagama pranava vachya nija swaroopaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 3 ॥ Krouncha surendra parigandana sakthi soolaChapa thi sasthra parimanditha divya panaiSree kundaleesa drutha thunda sikheendra vahaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 4 ॥ Devadhi deva radha mandala Madhya methyaDevendra peeda nagaram druda chapa hasthaSooram nihathya sura kotibhiradyamanaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 5 ॥ Heeradhi rathna vara yuktha kireeda haraKeyura kundala lasath kavachabhiramaHey Veera tharaka jayaa amara brunda vandhyaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 6 ॥ Panchaksharadhi manu manthritha ganga thoyaiPanchamruthai praudhithendra mukhair muneendryaiPattabhishiktha maghavatha nayasa nadhaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 7 ॥ Sree karthikeya karunamrutha poorna drushtyaKamadhi roga kalushi krutha drushta chithamSikthwa thu mamava kala nidhi koti kanthaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 8 ॥ Subrahmanyashtakam punyam yeh padanthi dwijothamaThey sarve mukthimayanthi subrahmanya prasadathaSubrahmanyashtakamidham prathar uthaya ya padethKodi janma krutham papam thath kshanad thasya nasyathi ॥ ॥ Iti sri subramanya karavalamba stotram sampurnam ॥

Sri Subramanya Karavalamba : श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम्…. Read More »

Saraswati Stotra

Shri Saraswati Stotra : श्री सरस्वती स्तोत्र….

Shri Saraswati Stotra श्री सरस्वती स्तोत्र: माता सरस्वती को प्रसन्न करने और उन पर व अपने परिवार पर उनकी कृपा पाने के कई तरीके हैं। सरस्वती हिंदू धर्म में ज्ञान, संगीत, कला, बुद्धि और प्रकृति की देवी हैं। वह सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की त्रिमूर्ति का एक हिस्सा हैं। ये तीनों रूप ब्रह्मांड की रचना, पालन और विनाश में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति की मदद करते हैं। पश्चिमी और मध्य भारत में जैन धर्म के अनुयायी भी देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। माता सरस्वती को ज्ञान और बुद्धि की जननी माना जाता है। उनकी पूजा के बिना कोई भी मानवीय ज्ञान संभव नहीं है। देवी सरस्वती वेदों की माता हैं। ज्ञान के बिना किसी को भी मोक्ष नहीं मिल सकता। पूजा के बाद, पूर्ण ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद पाने के लिए देवी सरस्वती की आरती की जाती है। Saraswati Stotra माता सरस्वती को सफेद रंग पसंद है, इसलिए माना जाता है कि उनका प्रिय वाहन हंस है। सरस्वती शिक्षा और ज्ञान की देवी हैं। संस्कृत शब्द ‘सर’ का अर्थ है “सार” और ‘स्व’ का अर्थ है “स्वयं”, इस प्रकार सरस्वती का अर्थ है “स्वयं का सार”। Saraswati Stotra देवी सरस्वती की पूजा वे सभी लोग करते हैं जिनकी ज्ञान में रुचि है, विशेषकर छात्र, शिक्षक, विद्वान और वैज्ञानिक। हिंदू पौराणिक कथाओं में सरस्वती को ब्रह्मांड के रचयिता भगवान ब्रह्मा की पत्नी के रूप में दर्शाया गया है। Saraswati Stotra चूंकि रचना के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है, इसलिए सरस्वती ब्रह्मा की रचनात्मक शक्ति का प्रतीक हैं। जिस तरह सरस्वती की पूजा महत्वपूर्ण है, उसी तरह बुद्धि और धन की निरंतर प्राप्ति के लिए श्री सरस्वती स्तोत्र का पाठ भी विशेष महत्व रखता है। सरस्वती मंत्र ज्ञान चाहने वालों के मन को प्रकाशित करता है, चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र से संबंधित हो या आध्यात्मिक दुनिया से। माना जाता है कि श्री Saraswati Stotra सरस्वती स्तोत्र आत्मविश्वास जगाता है और बातचीत करने की मजबूत क्षमता प्रदान करता है। Saraswati Stotra श्री सरस्वती स्तोत्र हमारी वाणी को बेहतर बनाने, वाणी दोष को दूर करने और शब्दों का सही उपयोग करने में भी मदद करता है। श्री सरस्वती स्तोत्र के लाभ: श्री सरस्वती स्तोत्र का पाठ Saraswati Stotra करने से व्यक्ति बहुत सारा ज्ञान प्राप्त करके प्रसिद्ध होता है। अर्थ: ‘हे वाग्देवी, मुझे बोलने की शक्ति प्रदान करें।’ लाभ: बोलने में अक्षमता वाले बच्चों के लिए, इस मंत्र का नियमित जाप करने से उन्हें सही ढंग से बोलने में मदद मिल सकती है और भविष्य में उनके बातचीत करने के कौशल (communication skills) में भी सुधार हो सकता है। यह स्तोत्र किसे जपना चाहिए: जो लोग ज्ञान का धन पाना चाहते हैं, Saraswati Stotra उन्हें नियमित रूप से श्री सरस्वती स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री सरस्वती स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Saraswati Stotra in Hindi या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रान्विताया वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दितासा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।। 1 ।। आशासु राशीभवदंगवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम ।मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम ।। 2 ।। शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात ।। 3 ।। सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम ।देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ।।4।। पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती ।प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।। 5 ।। शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनींवीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम ।हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितांवन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ।। 6 ।। वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले,भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये ।कीर्तिप्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे,विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।। 7 ।। श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे,श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे ।उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमंजुलास्ये,विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।। 8 ।। मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता,ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय ।ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण,भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ।। 9 ।। मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये,मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे ।स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि:,शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम ।। 10 ।। ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:,शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावै: ।न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे, न स्यु:कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षा: ।। 11 ।। लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: ।एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ।। 12 ।। सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: ।वेदवेदान्तवेदांगविद्यास्थानेभ्य: एव च ।।13।। सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोsस्तु ते ।। 14 ।। यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत ।तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।। 15 ।। ।। इति श्री सरस्वती स्तोत्रम सम्पूर्णम् ।।

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Gopal Stotra

Shri Santan Gopal Stotra : श्री सन्तानगोपाल स्तोत्र…

श्री सन्तानगोपाल स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Santan Gopal Stotra in Hindi श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ॥1॥ नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ॥2॥ अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ॥3॥ गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ॥4॥ पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम् ।देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ॥5॥ पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ॥6॥ यशोदांकगतं बालं Gopal Stotra गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ॥7॥ श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ॥8॥ भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥9॥ रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ॥10॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥11॥ वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥12॥ कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥13॥ लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥14॥ कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥15॥ राजीवनेत्र श्रीराम Gopal Stotra रावणारे हरे कवे ।तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥16॥ अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥17॥ श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥18॥ अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥19॥ वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥20॥ डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥21॥ नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥22॥ अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥23॥ यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥24॥ नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥25॥ पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥26॥ गोपालडिम्भ गोविन्द Gopal Stotra वासुदेव रमापते ।अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥27॥ मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥28॥ याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥29॥ आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥30॥ वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ॥31॥ ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥32॥ वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥33॥ राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥34॥ अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥35॥ नन्दपाल धरापाल Gopal Stotra गोविन्द यदुनन्दन ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥36॥ दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥37॥ यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥38॥ अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥39॥ रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥40॥ चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥41॥ कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥42॥ देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥43॥ भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ॥44॥ श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥45॥ जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥46॥ श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥47॥ दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥48॥ गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥49॥ श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥50॥ स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजंविलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ॥51॥ याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥52॥ अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥53॥ वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥54॥ कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ॥55॥ वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ॥56॥ पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ॥57॥ कंजाक्ष कृष्ण Gopal Stotra देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ॥58॥ देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ॥59॥ विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ॥60॥ भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ॥61॥ राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ॥62॥ राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ॥63॥ देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ॥64॥ कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥65॥ गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥66॥ दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयंदिशतु दिशतु शीघ्रं Gopal Stotra भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रोदिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ॥67॥ दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ॥68॥ राम राघव गोविन्द Gopal Stotra देवकीसुत माधव ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥69॥ वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥70॥ ममाभीष्टसुतं देहि Gopal Stotra कंसारे माधवाच्युत ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥71॥ चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥72॥ विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥73॥ नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥74॥ भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ॥75॥ स्वामिंस्त्वं भगवन् राम Gopal Stotra कृष्ण माधव कामद ।देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ॥76॥ तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥77॥ पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥78॥ शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥79॥ नारायण रमानाथ Gopal Stotra राजीवपत्रलोचन ।सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥80॥ राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥81॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥82॥ मुनिवन्दित गोविन्द Gopal Stotra रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥83॥ गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥84॥ रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥85॥ वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥86॥ कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥87॥ पुत्रप्रद मुकुन्देश Gopal Stotra रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥88॥ पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥89॥

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Mahimna Stotra

Shri Shiv Mahimna Stotra : श्री शिव महिम्न स्तोत्र….

अथ श्री शिव महिम्न स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Shiv Mahimna Stotra in Hindi पुष्पदंत उवाच – महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी ।स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ॥अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन् ।ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: श्री पुष्पदंत जी ने कहा है! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाए तो मैं तो एक साधारण बालक हूं, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें। अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो: ।रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।।स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः ।पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन और न ही वचन द्वारा संभव है। आपके संदर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा ‘नेति नेति’ का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्य भाव का परिणाम है। मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत: ।स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम् ।।मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः ।पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे वेद और भाषा के सृजन ! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अर्थात ज्ञान के अनुसार आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी। तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत् ।त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम् ।विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥ अर्थ: हे देव ! आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार अर्थात संहार करने वाले हैं। इस प्रकार आपके ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन स्वरूप हैं। तथा आप में सत्व, रज और तम तीन गुण भी हैं । वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। ऐसा करने से भले ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुंह नहीं मोड़ सकते। किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम् ।किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः ।कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥ अर्थ: हे महादेव ! मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े हैं और मेरी सीमित शक्ति से उसे व्यक्त करना असंभव है। अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां ।मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ॥अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो ।यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥ अर्थ: हे परमपिता! यह सात लोक आपके द्वारा ही बनाया गया है, इसके कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री दूसरे के पास होना असंभव है। इसलिए अज्ञानी लोग ही आपके विषय में संदेह करते हैं॥ त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां ।नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥ अर्थ: हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है। महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः ।कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम् ।न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।। 8 ।। अर्थ: हे शिव ! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता। ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम् ।परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव ।स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।। 9 ।। अर्थ: हे त्रिपुरहंता ! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं। तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः ।परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः ॥ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् ।स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।। 10 ।। अर्थ: हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों क्या ऐसा कभी हो सकता है भला। अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम् ।दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः ।स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥ अर्थ: हे त्रिपुरान्तक ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल

Shri Shiv Mahimna Stotra : श्री शिव महिम्न स्तोत्र…. Read More »

Shri Shivramashtakam

Shri Shivramashtakam Stotra : श्री शिवरामअष्टकम स्तोत्र….

Shri Shivramashtakam Stotra श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र: श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र भगवान शिव को समर्पित है। इस स्तोत्र का लगातार 11 बार पाठ करने से व्यक्ति की बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है और हर परीक्षा में बेहतरीन परिणाम मिलते हैं। तमिल इतिहास के शुरुआती मध्यकाल (सातवीं और दसवीं शताब्दी ईस्वी के बीच) में अलवार संतों ने अपने भजनों के माध्यम से भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा की। उनके भजनों के इस संग्रह को ‘दिव्य प्रबंधम’ के नाम से जाना जाता है। ‘मंगलशासनम’ का अर्थ है ‘पवित्र तीर्थस्थलों की स्तुति में गीत गाना’। Shivramashtakam Stotra जिन श्रीवैष्णव तीर्थस्थलों का गुणगान अलवार संतों ने किया, उन्हें ‘दिव्य देशम’ कहा जाता है। श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र में मुख्य रूप से ऋग्वेद से लिए गए श्लोक शामिल हैं। Shivramashtakam इन श्लोकों का गायन स्वर-लहरी के नियमों, विशेषकर सामवेद के नियमों के अनुसार किया जाता है। किसी भी शास्त्र-पाठ से पहले श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ किया जाता है। Shivramashtakam Stotra इसे अनगिनत धुनों में से किसी भी धुन में गाया जा सकता है और उपयुक्त स्थानों पर भजन जोड़े जाते हैं। इन शिवरामाष्टकम स्तोत्रों का विषय दर्शन की उच्च अवस्थाओं या भगवान शिव और भगवान राम के रहस्यमय अनुभवों से लेकर, वर्तमान जीवन की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं की प्रार्थना तक फैला हुआ है। Shivramashtakam Stotra लोग अपनी पत्नी और बच्चों, धन या संपत्ति के लिए खूब आँसू बहाते हैं, लेकिन भगवान के लिए कौन ऐसा करता है ? Shivramashtakam यदि कोई सच्चे मन से उनके लिए रोता है, तो वे निश्चित रूप से प्रकट होते हैं। Shivramashtakam Stotra इसलिए, श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ करने से भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है। श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र के लाभ:Benefits of the Shri Shivaramashtakam Stotram दिव्य दृष्टि में दिखाई देने वाले भगवान या देवता के स्वरूप का वर्णनजानबूझकर या अनजाने में किए गए पापों के लिए क्षमा-याचनासमस्याओं और कठिनाइयों को दूर करने और जीवन में अच्छी चीजें प्राप्त करने की प्रार्थनाभक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्राप्त करने की इच्छा, जो आध्यात्मिक जीवन में सहायक होंगहरे आध्यात्मिक अनुभव के बाद भावनाओं का स्वतः उमड़ना आदि।जो व्यक्ति सुबह एकाग्र भक्ति के साथ Shivramashtakam Stotra श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ करता है,वह हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है और उस भगवान विष्णु को प्राप्त करता है जिनकी वह पूजा करता है। यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए: Who should recite this Stotra जो लोग ज्ञान और जीवन में सफलता पाना चाहते हैं Shivramashtakam Stotra और भगवान की शरण में रहना चाहते हैं, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार ‘श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। श्री शिवरामाष्टक स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Shivramashtakam Stotra in Hindi शिव हरे शिव राम सखे प्रभोत्रिविधतापनिवारण हे विभो ।अज जनेश्वर यादव पाहि मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 1 ।। कमललोचन राम दयानिधेहरगुरो गजररक्षक गोपते ।शिवतनो भव शंकर पाहि मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 2 ।। सुजनरञ्जन मंगलमन्दिरंभजति ते पुरुष: परमं पदम् ।भवति तस्य सुखं परमद्भुतं शिव हरेविजयं कुरु मे वरम् ।। 3 ।। जय युधिष्ठिरवल्लभ भूपते जयजयार्जितपुण्यपयोनिधे ।जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तु ते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 4 ।। भवविमोचन माधव मापतेसुकविमानसहंस शिवारते ।जनकजारत राघव रक्ष मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 5 ।। अवनिमण्डलमंगल मापतेजलदसुंदर राम रमापते ।निगमकीर्तिगुणार्णव गोपते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 6 ।। पतितपावन नाममयी लतातवयशो विमलं परिगीयते ।तदपि माधव मां किमुपेक्षसे शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 7 ।। अमरतापरदेव रमापतेविजयतस्तव नामधनोपमा ।मयि कथं करुणार्णव जायते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 8 ।। हनुमत: प्रिय चापकर प्रभोसुरसरिद्धृतशेखर हे गुरो ।मम विभो किमु विस्मरणं कृतं शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 9 ।। अहरहर्जनरञ्जनसुन्दरं पठतिय: शिवरामकृतं स्तवम् ।विशति रामरमाचरणाम्बुजे शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 10 ।। प्रातरुत्थाय यो भक्त्या पठेदेकाग्रमानस: ।विजयो जायते तस्य विष्णुमाराध्यमाप्नुयात् ।। 11 ।। ।। इति श्री शिवरामअष्टकम स्तोत्र संपूर्णम् ।।

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Rudrashtakam

Shri Shiva Rudrashtakam : श्री शिव रुद्राष्टकम….

श्री शिव रुद्राष्टकम हिंदी पाठ : Shri Shiva Rudrashtakam in Hindi नमामीशमीशान निर्वाणरूपं ।विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं ।निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं ।चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं ॥ 1 ॥ निराकारमोंकारमूलं तुरीयं ।गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ।करालं महाकाल कालं कृपालं ।गुणागार संसारपारं नतो हं ॥ 2 ॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं ।मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ।स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा ।लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥ 3 ॥ चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं ।प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं ।मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं ।प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ 4 ॥ प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं ।अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं ।भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ 5 ॥ कलातीत कल्याण कल्पांतकारी ।सदासज्जनानन्ददाता पुरारी ।चिदानन्द संदोह मोहापहारी ।प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ 6 ॥ न यावद् उमानाथ पादारविंदं ।भजंतीह लोके परे वा नराणां ।न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं ।प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ 7 ॥ न जानामि योगं जपं नैव पूजां ।नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं ।जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं ।प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो ॥ 8 ॥ रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥ 9 ॥ ॥ इति श्री शिव रुद्राष्टकम संपूर्णम ॥ Shri Shiva Rudrashtakam Lyrics : श्री शिव रुद्राष्टकम पाठ Namami Shamishan Nirvan RoopamVibhum Vyapakam Brahma Veda Swaroopam ।Nijam Nirgunam Nirvikalpam NireehamChidakaash Maakash Vaasam Bhajeham ।। 1 ।। Nirakaar Omkar Moolam TuriyamGiragyaan Goteet Meesham Girisham ।Karaalam Mahakaal Kaalam KripalamGunagaar Sansaar Paaram Naatoham ।। 2 ।। Tusharaadri Sankaash Gauram GabheeramManobhoot Koti Prabha Shi Shareeram ।Sfooranmauli Kallolini Charu GangaLasadbhaal Baalendu Kanthe Bhujanga ।। 3 ।। Chalatkundalam Bhru Sunethram VishaalamPrasannananam Neelkantham Dayalam ।Mrigadheesh Charmaambaram MundamaalamPriyam Shankaram Sarvanaatham Bhajaami ।। 4 ।। Prachandam Prakrishtam Pragalbham PareshamAkhandam Ajambhaanukoti Prakaasham ।Trayahshool Nirmoolanam ShoolpaanimBhajeham Bhawani Patim Bhaav Gamyam ।। 5 ।। Kalateet Kalyaan KalpantkaariSada Sajjanaanand Daata Purari ।Chidaanand Sandoh MohapahariPraseed Praseed Prabho Manmathari ।। 6 ।। Nayaavad Umanath PaadaravindamBhajanteeha Lokey Parewa Naraanaam ।Na Tawatsukham ShaantisantapnaashamPraseed Prabho Sarvabhootadhivaasam ।। 7 ।। Na Jaanaami Yogam Japam Naiva PoojaamNa Toham Sada Sarvada Shambhu Tubhhyam ।Jarajanm Dukhhaudya TaapatyamaanamPrabho Paahi Aapan Namaami Shri Shambho ।। 8 ।। Rudrashtakamidam ProktamVipren Hartoshaye ।Ye Pathanti Naraa BhaktayaTeyshaam Shambhu Praseedati ।। ।। iti shri shiv rudrashtakam sampurnam ।।

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Shriganadhish Stotram

Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram : शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र….

शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र हिंदी पाठ : Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram ।। श्रीगणेशाय नमः ।। ।। श्रीशक्तिशिवावूचतुः ।। नमस्ते गणनाथाय गणानां पतये नमः ।भक्तिप्रियाय देवेश भक्तेभ्यः सुखदायक ॥ १ ॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च ।नाभिशेषाय देवाय ढुण्ढिराजाय ते नमः ॥ २ ॥ वरदाभयहस्ताय नमः परशुधारिणे ।नमस्ते सृणिहस्ताय नाभिशेषाय ते नमः ॥ ३ ॥ अनामयाय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नमः ।सगुणाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे निर्गुणाय च ॥ ४ ॥ ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च Shriganadhish Stotram गजानन नमोऽस्तु ते ।आदिपूज्याय ज्येष्ठाय ज्येष्ठराजाय ते नमः ॥ ५ ॥ मात्रे पित्रे च सर्वेषां हेरम्बाय नमो नमः ।अनादये च विघ्नेश विघ्नकर्त्रे नमो नमः ॥ ६ ॥ विघ्नहर्त्रे स्वभक्तानां Shriganadhish Stotram लम्बोदर नमोऽस्तु ते ।त्वदीयभक्तियोगेन योगीशाः शान्तिमागताः ॥ ७ ॥ किं स्तुवो योगरूपं तं प्रणमावश्च विघ्नपम् ।तेन तुष्टो भव स्वामिन्नित्युकत्वा तं प्रणेमतुः ॥ ८ ॥ तावुत्थाप्य गणाधीश उवाच तौ महेश्वरौ ।भवत्कृतमिदं स्तोत्रं मम भक्तिविवर्धनम् ॥ ९ ॥ भविष्यति च सौख्यस्य Shriganadhish Stotram पठते शुण्वते प्रदम् ।भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव पुत्रपौत्रादिकं तथा ॥ १० ॥ धनधान्यादिकं सर्वं लभते तेन निश्चितम् । ।। इति शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र संपूर्णम् ।। Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram Lyrics : शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र पाठ ।। shriganeshay namah ।। ।। shrishaktishivavuchatuh ।। namaste gananathay gananam pataye namah ।bhaktipriyay devesh bhaktebhyah sukhdayak ।। 1 ।। svanandavasine tubhyam siddhibuddhivaray ch ।nabhisheshay devay dhundhirajay te namah ।। 2 ।। varadabhayahastay namah parashudharine ।namaste srunihastay nabhisheshay te namah ।। 3 ।। anamayay sarvay sarvapujyay te namah ।sagunay namastubhyam bramane nirgunay ch ।। 4 ।। bramabhyo bramadatre ch gajanan namo̕stu te ।adipujyay jyeshthay jyeshtharajay te namah ।। 5 ।। matre pitre ch sarvesham herambaay namo namah ।anadaye ch vignesh vignakartre namo namah ।। 6 ।। vignahartre svabhaktanam lambodar namo̕stu te ।tvadiyabhaktiyogen yogishah shantimagatah ।। 7 ।। kim stuvo yogarupam tam pranamavasch vignapam ।ten tushto bhav svaaminnityukatva tam pranematuh ।। 8 ।। tavutthapya ganadhish uvach tau maheshvarau ।bhavatkrutamidam stotram mam bhaktivivardhanam ।। 9 ।। bhavishyati ch saukhyasya pathate shunvate pradam ।bhuktimuktipradam chaiv putrapautradikam tatha ।। 10 ।। dhandhanyadikam sarvam labhate ten nischitam । ।। iti shiv shakti-kritam shriganadhish stotram sampurnam ।।

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Nirjala Ekadashi 2026

Nirjala Ekadashi 2026 Date And Time : निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और दान का महत्व….

Nirjala Ekadashi 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और हमारी अत्यंत प्राचीन भारतीय संस्कृति में भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित व्रतों का अत्यधिक और गहरा आध्यात्मिक महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार मनाए जाने वाले तमाम उपवासों में एकादशी के व्रत को सर्वोपरि और सबसे श्रेष्ठ माना गया है। Nirjala Ekadashi 2026 शास्त्रों के अनुसार एक सामान्य वर्ष में कुल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन इन सभी में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को सबसे अधिक पुण्यकारी, शक्तिशाली और तपस्या के दृष्टिकोण से अत्यंत कठोर माना जाता है। इस साल Nirjala Ekadashi 2026 को लेकर देशभर के भक्तों के बीच काफी उत्साह और साथ ही तिथियों को लेकर थोड़ा असमंजस भी देखा जा रहा है। यह एक ऐसा जाग्रत उपवास है जो इंसान के शरीर और मन को गहरा संयम सिखाता है, विचारों को शुद्ध करता है और शरीर को एक नई सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। Nirjala Ekadashi 2026 आज के इस अत्यंत विस्तृत, एसईओ-फ्रेंडली (SEO Friendly) और शत-प्रतिशत मौलिक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि यह पवित्र व्रत कब रखा जाएगा, इसके नियम क्या हैं, और इसका इतना अधिक महत्व क्यों है। Nirjala Ekadashi 2026 Date And Time : निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त…. तिथि का असमंजस और पंचांग की एकदम सटीक गणना : Uncertainty regarding the date and the highly precise calculations of the almanac. अक्सर हिंदू त्योहारों में अलग-अलग पंचांगों के भेदों के कारण तिथियों को लेकर संशय बन जाता है। इस बार भी कई लोग इस बात को लेकर गहरी उलझन में हैं कि Nirjala Ekadashi 2026 का पवित्र व्रत 24 जून को रखा जाएगा या फिर 25 जून को। Nirjala Ekadashi 2026 द्रिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, एकादशी तिथि 24 जून 2026 की शाम 6 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो जाएगी और इसका पूर्ण समापन अगले दिन 25 जून को रात 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगा। (वहीं कुछ अन्य पंचांगों के अनुसार यह तिथि 24 जून को रात 8:09 बजे से शुरू होकर 25 जून रात 9:14 बजे तक मान्य रहेगी)। हमारे वैदिक और सनातन धर्म में किसी भी व्रत या त्योहार को मनाने के लिए ‘उदया तिथि’ (यानी सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) को ही मुख्य और सबसे प्रामाणिक माना जाता है। अतः उदया तिथि के सर्वमान्य नियम के अनुसार, Nirjala Ekadashi 2026 का यह अत्यंत फलदायी व्रत 25 जून 2026, दिन गुरुवार को ही पूरे भारतवर्ष में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ रखा जाएगा। पूजा के अत्यंत शुभ मुहूर्त और मंगलकारी योग : Highly auspicious timings and propitious celestial combinations for the worship. इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना और ध्यान के लिए पंचांग में कई अत्यंत शुभ मुहूर्त बन रहे हैं। पंचांग के अनुसार, इस दिन प्रातः काल का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 5 मिनट से लेकर 4 बजकर 45 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना और पूजा-पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है। इसके साथ ही, दिन के समय अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। सबसे खास और दुर्लभ बात यह है कि इस बार Nirjala Ekadashi 2026 के पावन दिन पर ‘रवि योग’ का भी अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। यह मंगलकारी रवि योग सुबह 5 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर शाम 4 बजकर 29 मिनट तक पूरी तरह प्रभावी रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में रवि योग को जीवन के सभी दोषों को नष्ट करने वाला और किसी भी नए व शुभ कार्य को करने के लिए बहुत अच्छा माना गया है। भीमसेनी एकादशी की रहस्यमयी और पौराणिक कथा : The Mysterious and Mythological Legend of Bhimseni Ekadashi इस परम पावन एकादशी को सनातन धर्म में ‘पांडव एकादशी’ या ‘भीमसेनी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे एक बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक धार्मिक कथा जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांचों पांडवों में से महाबली भीम को छोड़कर सभी भाई-बहन और माता कुंती एकादशी का उपवास पूरे नियम से रखते थे। भीम को बहुत अधिक भूख लगती थी और वे किसी भी कीमत पर भूखे नहीं रह सकते थे। अपने इस आचरण और व्रत न कर पाने के कारण भीम मन ही मन बहुत आत्मग्लानि महसूस करते थे। तब अपनी इस परेशानी को लेकर उन्होंने महर्षि वेद व्यास जी से कोई उचित उपाय पूछा। महर्षि व्यास ने उनकी समस्या को समझते हुए उन्हें सलाह दी कि वे साल भर की अन्य एकादशियां छोड़ दें और केवल ज्येष्ठ मास में आने वाली इस विशेष एकादशी का व्रत बिना जल पिए (निर्जला) करें। भीम ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया, लेकिन बिना भोजन और पानी के वे मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी अत्यंत कठोर तपस्या और भीम के समर्पण के कारण इस महान व्रत का नाम ‘भीमसेनी एकादशी’ पड़ गया। शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि जो व्यक्ति जीवन में केवल इस एक Nirjala Ekadashi 2026 का उपवास बिना जल पिए रख लेता है, उसे साल भर की सभी एकादशियों के बराबर महान पुण्य फल की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है। भगवान विष्णु की अचूक पूजा विधि : The infallible method of worshipping Lord Vishnu यदि आप इस अगामी Nirjala Ekadashi 2026 का पूरा, अचूक और चमत्कारी फल पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस पूजा विधि का कड़ाई से पालन करें: व्रत के शुभ दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें और उगते हुए भगवान सूर्य देव को जल अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए स्नान के बाद पीले या साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें और हाथ जोड़कर अपने निर्जल व्रत का दृढ़ संकल्प लें। घर के स्वच्छ पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की सुंदर प्रतिमा स्थापित करें। पूजा में भगवान को पीले फूल, कुमकुम, अक्षत, पंचामृत और पीले फल अर्पित करें। भगवान विष्णु को जो भी सात्विक भोग लगाएं, उसमें पवित्र तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य शामिल करें, क्योंकि तुलसी के बिना भगवान विष्णु कोई भी भोग स्वीकार नहीं करते। भगवान के समक्ष शुद्ध घी का दीपक

Nirjala Ekadashi 2026 Date And Time : निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और दान का महत्व…. Read More »