Prapatti Stotram

Sri Narsimha Prapatti Stotram : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र…

श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Narsimha Prapatti Stotram in Hindi माता नृसिंहः पिता नृसिंहःभ्राता नृसिंहः सखा नृसिंहः ।विद्या नृसिंहो द्रविणं नृसिंहःस्वामी नृसिंहः सकलं नृसिंहः ॥ १ ॥ इतो नृसिंहः परतो नृसिंहः यतोयतो याहि(मि) ततो नृसिंहः ।नृसिंहदेवात्परो न Prapatti Stotram कश्चित्तस्मान्नृसिंहं शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥ इतो नृसिंहः परतो नृसिंहः यतोयतो यामि ततो नृसिंहः ।बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहोनृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥ ॥ इति श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥ Sri Narsimha Prapatti Stotram Lyrics : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र पाठ mata nrusinhah pita nrusinhahbhrata nrusinhah sakha nrusinhah ।vidya nrusinho dravinam nrusinhahsvaami nrusinhah sakalam nrusinhah ॥ 1 ॥ ito nrusinhah parato nrusinhah yatoyato yahi(mi) tato nrusinhah ।nrusinhadevatparo na kaschittasmannrusinham sharanam prapadye ॥ 2 ॥ ito nrusinhah parato nrusinhah yatoyato yami tato nrusinhah ।bahirnrusinho hridaye nrusinhonrusinhamadim sharanam prapadye ॥ 3 ॥ ॥ iti shri narasingh prapatti stotra sampurnam ॥ Narsimha Prapatti Stotram : श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र विशेषताएं: श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र के साथ-साथ यदि नरसिंह कवच या नरसिंह अष्टक कवच का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| श्री नरसिंह प्रपत्ति स्तोत्र के पाठ के साथ साथ नरसिंह अष्टकम का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है| और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही नरसिंह जी की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस स्तोत्र पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Panchamrutha Stotram

Sri Narasimha Panchamrutha Stotram : श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र….

श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Narasimha Panchamrutha Stotram in Hindi अहोबिलं नारसिंहं गत्वा रामः प्रतापवान् ।नमस्कृत्वा श्रीनृसिंहं अस्तौषीत् कमलापतिम् ॥ १ ॥ गोविन्द केशव जनार्दन वासुदेवविश्वेश विश्व मधुसूदन विश्वरूप ।श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम पुष्कराक्षनारायणाच्युत नृसिंह नमो नमस्ते ॥ २ ॥ देवाः समस्ताः खलु योगिमुख्याःगन्धर्व विद्याधर किन्नराश्च ।यत्पादमूलं सततं नमन्ति तंनारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ३ ॥ वेदान् समस्तान् खलु शास्त्रगर्भान्विद्याबले कीर्तिमतीं च लक्ष्मीम् ।यस्य प्रसादात् सततं लभन्ते तंनारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ४ ॥ ब्रह्मा शिवस्त्वं पुरुषोत्तमश्चनारायणोऽसौ Panchamrutha Stotram मरुतां पतिश्च ।चन्द्रार्क वाय्वग्नि मरुद्गणाश्च त्वमेव तंत्वां सततं नतोऽस्मि ॥ ५ ॥ स्वप्नेऽपि नित्यं जगतां त्रयाणाम्स्रष्टा च हन्ता विभुरप्रमेयः ।त्राता त्वमेकस्त्रिविधो विभिन्नः तंत्वां नृसिंहं सततं नतोऽस्मि ॥ ६ ॥ राघवेणकृतं स्तोत्रं पञ्चामृतमनुत्तमम् ।पठन्ति ये द्विजवराः तेषां स्वर्गस्तु शाश्वतः ॥ ७ ॥ ॥ इति श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Padmini Ekadashi

Padmini Ekadashi Vrat Katha : पद्मिनी एकादशी सम्पूर्ण व्रत कथा….

Padmini Ekadashi Vrat Katha: धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले- हे जनार्दन! अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए। श्री भगवान बोले, हे राजन्- अधिकमास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है वह पद्मिनी (कमला) एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिकमास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती हैं। ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा बताई थी। भगवान कृष्‍ण बोले- मलमास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है, जो मनुष्‍यों के लिए भी दुर्लभ है। यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके कांसे के पात्र में जौ-चावल आदि का भोजन करें तथा नमक न खाएं। भूमि पर सोएं और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दंतधावन करें और जल के 12 कुल्ले करके शुद्ध हो जाएं। सूर्य उदय होने के पूर्व उत्तम तीर्थ में स्नान करने जाएं। इसमें गोबर, मिट्‍टी, तिल तथा कुशा व आंवले के चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करें। Padmini Ekadashi श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करें। हे म‍ुनिवर! पूर्वकाल में त्रेयायुग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की 1,000 परम प्रिय स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राज्यभार को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब असफल रहे।  तब राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया। महाराज के साथ उनकी परम प्रिय रानी, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, राजा के साथ वन में जाने को तैयार हो गई। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए।  राजा ने उस पर्वत पर 10 हजार वर्ष तक तप किया, परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। Padmini Ekadashi तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे। रानी पद्मिनी Padmini Ekadashi ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍ती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। Padmini Ekadashi तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। सो हे नारद! जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं।…… Padmini Ekadashi की सम्पूर्ण जानकारी के लिए क्लिक करें…

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Dasavatara Stotra

Shri Dasavatara Stotra : श्री दसावतार स्तोत्र

Shri Dasavatara Stotra: श्री दशावतार स्तोत्र श्री दशावतार स्तोत्र का पाठ करने से साधक हर तरह की मुसीबतों से सुरक्षित रहता है और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके पहले भाग में भगवान विष्णु के दस अवतारों का गुणगान किया गया है। इसका मूल पाठ, लिप्यंतरण और अनुवाद यहाँ दिया गया है। श्री दशावतार स्तोत्र भगवान विष्णु की स्तुति में गाया जाने वाला एक भजन है। यह श्री जयदेव रचित ‘गीत-गोविंद’ का पहला भाग है। अवतार, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर का एक विशेष प्रकटीकरण होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि ईश्वर के अवतार असंख्य हैं। इनमें से कुछ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जबकि अन्य को भक्त की कल्पना पर छोड़ दिया गया है। इसका सामान्य सिद्धांत यह है कि जहाँ कहीं भी कोई भव्य, सुंदर या महिमामयी वस्तु दिखाई दे, उसे ईश्वर की महिमा का ही एक अंश समझना चाहिए। ‘भागवत पुराण’ में चौबीस अवतारों की गणना और उनका वर्णन किया गया है। Dasavatara Stotra इनमें महान ऋषि कपिल (जो सांख्य दर्शन के संस्थापक थे) और ऋषभ (जिन्हें जैन धर्म के अनुयायी अपना प्रथम तीर्थंकर मानते हैं) शामिल हैं। Dasavatara Stotra इसी तर्क का विस्तार करते हुए, उन सभी महान ऋषियों को भी ईश्वर का अवतार, अवतरण या उनकी महिमा का ही मूर्त रूप माना जाना चाहिए, जिनके जीवन और उपदेशों ने आध्यात्मिकता को सुदृढ़ किया है। सभी अवतारों का एक ही साझा उद्देश्य होता है—सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का संहार करना और धर्म की स्थापना करना। Dasavatara Stotra हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री दशावतार स्तोत्र का नियमित पाठ करना, भगवान दशावतार को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। जब हम सत्य की खोज में, ज्ञान की मथनी से अपने अनुभवों के सागर को मथने का प्रयास करते हैं, तो हमें यह ज्ञात होता है कि स्वयं ज्ञान को भी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए किसी आधार की आवश्यकता होती है। Dasavatara Stotra तर्क-वितर्क की अपनी संरचना को स्थापित करने हेतु किसी ‘परम आधार’ की खोज का यह प्रयास तब तक एक अंतहीन क्रम (infinite regress) में फँसा रह सकता है, Dasavatara Stotra जब तक कि इसे उस अचल, सर्व-समर्थ और सर्व-धारक आधार पर स्थापित न कर दिया जाए—जो ‘स्वयंसिद्ध सत्य’ का प्रतीक है और जिसे ईश्वर के ‘कच्छप’ (कछुए) अवतार के रूप में दर्शाया गया है। श्री दशावतार स्तोत्र के लाभ: श्री दशावतार स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है; यह आपके जीवन से समस्त बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन लोगों की मानसिक शांति भंग हो गई है, जिन्हें व्यापार में लगातार हानि हो रही है, और जो बुरी शक्तियों या गतिविधियों से प्रभावित हैं—उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से ‘श्री दशावतार स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। इससे उन्हें अवश्य ही राहत मिलेगी। श्री दसावतार स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Dasavatara Stotra in Hindi प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ।।केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।। 1 ।। क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ।।केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।। 2 ।। वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।शशिनि कलंकलेव निमग्ना ।।केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ।। 3 ।। तव करकमलवरे नखमद्भुतश्रृंगम् ।दलितहिरण्यकशिपुतनुभृंगम् ।।केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।। 4 ।। छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।पदनखनीरजनितजनपावन ।।केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।। 5 ।। क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।।केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।। 6 ।। वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।।केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ।। 7 ।। वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।।केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।। 8 ।। निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।सदयह्रदयदर्शितपशुधातम् ।।केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।। 9 ।। म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।।केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।। 10 ।। श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।।केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।। 11 ।। ।। इति श्री दसावतार स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Vamana Stotram

Sri Dadhi Vamana Stotram : श्री दधि वामन स्तोत्रम्

श्री दधि वामन स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Dadhi Vamana Stotram in Hindi हेमाद्रिशिखराकारं शुद्धस्फटिकसन्निभम् ।पूर्णचन्द्रनिभं देवं द्विभुजं वामनं स्मरेत् ॥ १ ॥ पद्मासनस्थं देवेशं चन्द्रमण्डलमध्यगम् ।ज्वलत्कालानलप्रख्यं तडित्कॊटिसमप्रभम् ॥ २ ॥ सुर्यकॊटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ।चन्द्रमण्डलमध्यस्थं विष्णुमव्ययमच्युतम् ॥ ३ ॥ श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं दिव्यरत्नविभूषितम् ।पीतांबरमुदाराङ्गं वनमालाविभूषितम् ॥ ४ ॥ सुन्दरं पुण्डरीकाक्षं किरीटेन विराजितम् ।षोडशस्त्रीयुतं संयगप्सरोगणसेवितम् ॥ ५ ॥ ऋग्यजुस्सामाथर्वाद्यैः गीयमानं जनार्दनम् ।चतुर्मुखाद्यैः देवेशैः स्तोत्राराधनतत्परैः ॥ ६ ॥ सनकाद्यैः मुनिगणैः स्तूयमानमहर्निशम् ।त्रियंबको महादेवो नृत्यते यस्य सन्निधौ ॥ ७ ॥ दधिमिश्रान्नकवलं रुक्मपात्रं च दक्षिणे ।करे तु चिन्तयेद्वामे पीयूषममलं सुधीः ॥ ८ ॥ साधकानाम् प्रयच्छन्तं अन्नपानमनुत्तमम् ।ब्राह्मे मुहूर्तेचोत्थाय ध्यायेद्देवमधोक्षजम् ॥ ९ ॥ अतिसुविमलगात्रं रुक्मपात्रस्थमन्नम्सुललितदधिभाण्डं पाणिना दक्षिणेन ।कलशममृतपूर्णं वामहस्ते दधानं तरतिसकलदुःखान् वामनं भावयेद्यः ॥ १० ॥ क्षीरमन्नमन्नदाता लभेदन्नाद एव च ।पुरस्तादन्नमाप्नोति पुनरावर्तिवर्जितम् ॥ ११ ॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यं लभते चान्नसंपदः ।इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु प्रातःकाले द्विजोत्तमः ॥ १२ ॥ अक्लेशादन्नसिध्यर्थं ज्ञानसिध्यर्थमेव च ।अभ्रश्यामः शुद्धयज्ञोपवीती सत्कौपीनः पीतकृष्णाजिनश्रीःछ्त्री दण्डी पुण्डरीकायताक्षः पायाद्देवो वामनो ब्रह्मचारी ॥ १३ ॥ अजिनदण्डकमण्डलुमेखलारुचिरपावनवामनमूर्तये ।मितजगत्त्रितयाय जितारये निगमवाक्पटवे वटवे नमः ॥ १४ ॥ श्रीभूमिसहितं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम् ।नमामि वामनं विष्णुं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १५ ॥ वामनो बुद्धिदाता च द्रव्यस्थो वामनः स्मृतः ।वामनस्तारकोभाभ्यां वामनाय नमो नमः ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री दधि वामन स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Shri Dattatreya Stotra

Shri Dattatreya Stotra : श्री दत्तात्रेय स्तोत्र….

Shri Dattatreya Stotra : श्री दत्तात्रेय स्तोत्र: भगवान दत्तात्रेय को हिंदू त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव – का एक ही रूप में अवतार माना जाता है। ‘दत्तात्रेय’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दत्त’ (दिया हुआ) और ‘आत्रेय’ (ऋषि अत्रि के पुत्र), जिसका तात्पर्य उस सत्ता से है जिसने स्वयं को ऋषि अत्रि के पुत्र के रूप में समर्पित कर दिया। Shri Dattatreya Stotra भगवान दत्तात्रेय का जन्म पवित्र दंपत्ति अनुसूया और अत्रि के यहाँ हुआ था। उन्हें तीन सिरों के साथ दर्शाया जाता है, जो हिंदू देवताओं की त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव – की एकता का प्रतीक हैं। दत्तात्रेय सभी देवताओं, पैगंबरों, संतों और योगियों के साक्षात् स्वरूप हैं। वे सभी गुरुओं के गुरु हैं। हम सभी को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें वे समस्याएं भी शामिल हैं जो दिवंगत पूर्वजों के कारण उत्पन्न होती हैं। Shri Dattatreya Stotra ऐसा कहा जाता है कि जो पूर्वज मृत्यु के उपरांत पितृलोक (जैसे मर्त्यलोक और भुवर्लोक) में अटके हुए हैं, यदि वे श्राद्ध कर्मों के माध्यम से दी गई हमारी आहुतियों से संतुष्ट नहीं होते, तो वे हमारे परिवार में समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। Shri Dattatreya Stotra इनमें से कुछ समस्याओं में विवाह में विलंब, घर में कलह, संतानहीनता, समय से पहले जन्मे बच्चे, शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित संतानें और अन्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं। इन सभी समस्याओं का समाधान श्रद्धा और भक्ति के साथ, निर्धारित विधि से, नियमित रूप से दत्तात्रेय स्तोत्र का पाठ करके किया जा सकता है। भगवान दत्तात्रेय, तीनों महान देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का एक ही रूप में समाहित स्वरूप हैं। Shri Dattatreya Stotra उनके साथ चार वेद, कुत्तों के रूप में चलते हैं। एक कथा के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने साध्वी अनुसूया की पवित्रता की परीक्षा लेने का निश्चय किया और उनसे नग्न अवस्था में उन्हें भोजन परोसने का आग्रह किया। अनुसूया ने अपनी शक्ति से उन तीनों देवताओं को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और उन्हें एक साथ गोद में उठा लिया। Shri Dattatreya Stotra दत्तात्रेय के प्राकट्य से जुड़ी यह एक प्रचलित कथा है। कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्यों में बड़ी संख्या में लोग भगवान दत्तात्रेय की पूजा-अर्चना करते हैं। श्री दत्तात्रेय स्तोत्र के लाभ: भगवान दत्तात्रेय अपने भक्तों पर आने वाली समस्याओं को तत्काल दूर कर देते हैं। अतः, गुरुवार के दिन, पूर्णिमा तिथि पर अथवा दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर, और विशेष रूप से प्रतिदिन 108 बार इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से, मनुष्य के समस्त कष्टों और दुखों का शीघ्र ही निवारण हो जाता है। Shri Dattatreya Stotra ये ऐसे स्तोत्र हैं, जिनका निरंतर जाप करने से न केवल व्यक्ति के जीवन की परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, बल्कि यदि आप पिता के किसी दोष के कारण परेशान हैं, तो वह समस्या भी तत्काल हल हो जाती है; साथ ही, ‘पिता-परमेश्वर’ की कृपा प्राप्त होने लगती है और जीवन सुखमय हो जाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति ‘पितृ दोष’ से पीड़ित हैं, उन्हें इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए इस ‘श्री दत्तात्रेय स्तोत्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री दत्तात्रेय स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Dattatreya Stotra in Hindi जटाधरं पाण्डुराङ्गं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ र्हस्वदीर्घकृशस्थूल-नामगोत्र-विवर्जित ।पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपध्राय च ।सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रमातापुरनिवासिने ।जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ अवधूतसदानन्दपरब्रह्मस्वरूपिणे ।विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ सत्यंरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ ॥ इति श्री दत्तात्रेय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Padmini Ekadashi 2026

Padmini Ekadashi 2026 Date And Time: पद्मिनी एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा…..

Padmini Ekadashi 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और भारतीय वैदिक पंचांग की अत्यंत रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक दुनिया में व्रतों का एक बहुत ही विशेष और गहरा आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। भगवान श्री हरि विष्णु, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार हैं, उन्हें समर्पित सभी व्रतों में एकादशी का व्रत सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है। लेकिन जब बात Padmini Ekadashi 2026 की आती है, तो इसका महत्व और इसकी अलौकिक शक्ति कई हजार गुना अधिक बढ़ जाती है। हिन्दू पंचांग की एकदम सटीक और वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, हर तीन साल या लगभग 32 महीनों के अंतराल पर एक अतिरिक्त मास जुड़ता है, जिसे हम अधिक मास, मलमास या फिर पुरुषोत्तम मास के नाम से जानते हैं। इसी अत्यंत पवित्र और दुर्लभ अधिक मास के शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के बढ़ते हुए चरण) में जो महान एकादशी आती है, उसे ही शास्त्रों में पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। Padmini Ekadashi 2026 Date And Time: पद्मिनी एकादशी की सही तिथि…. इस वर्ष Padmini Ekadashi 2026 का एक बहुत ही शुभ और शक्तिशाली संयोग मई के महीने में बन रहा है। जो भी भक्त पूरे सच्चे मन, अटूट श्रद्धा और पूर्ण निष्ठा के साथ इस दिन व्रत का कड़ाई से पालन करता है, उसके जीवन से सभी प्रकार के जाने-अनजाने किए गए पाप और भारी कष्ट हमेशा-हमेशा के लिए धुल जाते हैं और अंत में मृत्यु के पश्चात उसे साक्षात श्री विष्णु के परम धाम ‘वैकुंठ’ की प्राप्ति होती है। व्रत की एकदम सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त (Timings & Dates) किसी भी वैदिक व्रत या तांत्रिक पूजा का पूरा और सिद्ध फल इंसान को तभी प्राप्त होता है जब उसे सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का पूरा ज्ञान हो। इस वर्ष Padmini Ekadashi 2026 का पवित्र उपवास 27 मई, दिन बुधवार को पूरे भारतवर्ष में अत्यंत उल्लास और भक्ति-भाव के साथ रखा जाएगा। आइए Padmini Ekadashi 2026 के एकदम सटीक और प्रमाणित मुहूर्तों पर विस्तार से नजर डालते हैं ताकि आपसे पूजा में कोई भी भूल-चूक न हो: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: हिन्दू पंचांग के अनुसार 26 मई 2026 की सुबह 5:10 (या पंचांग भेद से उज्जैन के समय अनुसार 5:11) बजे से ही एकादशी तिथि शुरू हो जाएगी। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: इस पावन एकादशी तिथि का समापन अगले दिन यानी 27 मई 2026 को सुबह 6:21 (या 6:22) बजे होगा। व्रत का पारण (उपवास खोलने का शुभ समय): हिन्दू धर्म शास्त्रों के कड़े नियमों के अनुसार एकादशी व्रत का पारण हमेशा ‘हरि वासर’ की अवधि पूरी तरह समाप्त होने के बाद ही करना चाहिए। इसलिए व्रत के अगले दिन यानी 28 मई 2026 को सुबह 5:25 से 7:56 (उज्जैन के समय अनुसार 5:45 से 7:57) के बीच व्रत का पारण किया जाएगा। सनातन हिन्दू धर्म में ‘उदया तिथि’ (अर्थात सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है, इसलिए उदया तिथि के आधार पर Padmini Ekadashi 2026 का मुख्य व्रत 27 मई को ही पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न किया जाएगा। पद्मिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व (Significance) अधिक मास (लौंध का महीना या पुरुषोत्तम मास) को किसी भी तरह के नए भौतिक कार्यों या विवाह जैसे शुभ संस्कारों के लिए वर्जित और अशुभ माना गया है, लेकिन दूसरी ओर इसे कठोर आध्यात्मिक साधना, तपस्या, दान और ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति के लिए पूरे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, साधारण महीनों की एकादशी की तुलना में इस मलमास में आने वाली Padmini Ekadashi 2026 का व्रत करने से मनुष्य को कई गुना अधिक और चमत्कारी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। Padmini Ekadashi 2026 इस जाग्रत व्रत को लोक कथाओं में ‘कमला एकादशी’ के अत्यंत ही सुंदर और दिव्य नाम से भी जाना जाता है। इसका व्रत करने से इंसान के जीवन में अपार सुख-समृद्धि आती है, बरसों पुरानी रुकी हुई इच्छाओं की पूर्ति होती है और भगवान विष्णु के प्रति अत्यंत गहरी और निस्वार्थ भक्ति जागृत होती है। व्रत की पौराणिक और चमत्कारी कथा (Vrat Katha) व्रत की पूर्ण सफलता के लिए इसकी पौराणिक कथा को शांत मन से पढ़ना या एकाग्रता से सुनना बहुत जरूरी माना गया है। Padmini Ekadashi 2026 द्वापर युग में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह रहस्यमयी कथा विस्तार से सुनाई थी। प्राचीन काल (त्रेतायुग) में माहिष्मती नाम की एक बहुत ही विशाल और भव्य नगरी हुआ करती थी, जिस पर राजा कृतवीर्य (उपकृतवीर्य) का राज था। राजा की सौ सुंदर पत्नियां थीं, लेकिन इतने सारे विवाहों के बावजूद उनका कोई भी ऐसा योग्य और बलवान पुत्र नहीं था जो उनके बाद उनकी राजगद्दी संभाल सके। पुत्र प्राप्ति की भारी लालसा और घोर निराशा में राजा ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी प्रमदा के साथ अपना सारा राज-पाट और राजशाही वस्त्र त्याग दिए, और वे दोनों घने जंगलों में गंधमादन पर्वत पर कठिन तपस्या करने चले गए। Padmini Ekadashi 2026 वहां उन्होंने पूरे दस हजार वर्षों तक घोर तप किया, जिससे राजा का शरीर भूखा-प्यासा रहकर केवल हड्डियों का एक ढांचा मात्र रह गया। अपने पति की यह अत्यंत दयनीय दशा देखकर महारानी प्रमदा बहुत दुखी हुईं और उन्होंने आश्रम में जाकर परम सती महर्षि अनुसूया जी से मार्गदर्शन मांगा। माता अनुसूया ने उन्हें अत्यंत ज्ञानवर्धक रहस्य बताते हुए कहा कि हर 32 महीने बाद एक मलमास आता है और उसमें दो विशेष एकादशी होती हैं: शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी और कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी। महर्षि अनुसूया के बताए हुए कड़े नियमों के अनुसार रानी प्रमदा ने पूरे विधि-विधान से व्रत रखा और रात भर जागकर भगवान का एकाग्र ध्यान किया। रानी की इस गहरी और अटूट निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न होकर स्वयं श्री भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने रानी को मनचाहा वरदान मांगने को कहा। Padmini Ekadashi 2026 रानी ने बड़ी ही चतुराई और निस्वार्थ प्रेम से अपने पति के लिए एक ऐसा महान पुत्र मांगा जिसे भगवान विष्णु के अलावा इस ब्रह्मांड का कोई भी देवता, दानव या इंसान कभी न हरा सके। भगवान के असीम आशीर्वाद और व्रत के प्रबल प्रताप से रानी ने कार्तवीर्य अर्जुन नामक एक अत्यंत शक्तिशाली और अजेय

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Vat Savitri Vrat

Vat Savitri Vrat 2026 Date And Time : वट सावित्री व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मलमास का रहस्य और अचूक पूजा विधि….

Vat Savitri Vrat 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की अपार खुशहाली के लिए कई तरह के व्रत रखे जाते हैं। इन्हीं तमाम सुहाग व्रतों में से एक सबसे प्रमुख, शक्तिशाली और सौभाग्यदायी व्रत वट सावित्री का माना जाता है। यह पावन पर्व सदियों से हिंदू विवाहित स्त्रियों के लिए अटूट प्रेम और समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को यह महान व्रत पूरे विधि-विधान के साथ रखा जाता है। इस बार Vat Savitri Vrat 2026 को लेकर महिलाओं में काफी उत्साह और कुछ भ्रम भी देखने को मिल रहा है, जिसका मुख्य कारण है इसी समय लगने वाला ‘मलमास’। Vat Savitri Vrat 2026 Date And Time : वट सावित्री व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त…. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ दिन पर माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, निस्वार्थ प्रेम और कठोर तपस्या के बल पर स्वयं मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे। तब से लेकर आज तक हर सुहागिन स्त्री अपने दांपत्य जीवन की रक्षा के लिए इस प्राचीन परंपरा को पूरे समर्पण के साथ निभाती आ रही है। आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं इस व्रत की संपूर्ण जानकारी। व्रत की सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त : Exact date and auspicious time of fasting Vat Savitri Vrat की पूर्ण सफलता के लिए उसकी सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का ज्ञान होना बहुत ही ज्यादा आवश्यक है। पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस साल ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि का आरंभ 16 मई की सुबह 05 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है। वहीं, इस पवित्र अमावस्या तिथि का पूर्ण समापन अगले दिन यानी 17 मई को मध्य रात्रि के बाद 01 बजकर 30 मिनट पर होगा। हमारे हिंदू धर्म में ‘उदया तिथि’ (सूर्य उदय होने के समय जो तिथि मौजूद होती है) का सर्वाधिक महत्व होता है। इसलिए उदया तिथि के कड़े नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए Vat Savitri Vrat 2026 इस वर्ष 16 मई, दिन शनिवार को ही पूरे भारतवर्ष में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। जो महिलाएं महाराष्ट्र और गुजरात जैसे क्षेत्रों की परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखती हैं, उनके लिए ‘वट पूर्णिमा’ का व्रत 29 जून को रखा जाएगा। कई दुर्लभ और शुभ योगों का बन रहा है महासंयोग : A great coincidence of many rare and auspicious combinations is taking place इस साल का यह पर्व कोई साधारण व्रत नहीं है, बल्कि यह अपने साथ कई सारे अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी योग लेकर आ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार Vat Savitri Vrat 2026 के ही पावन दिन पर शनि जयंती का महान पर्व भी पड़ रहा है। शनिवार का दिन होने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या का भी अत्यंत शुभ नाम दिया गया है। इसके अलावा इस दिन मिथुन राशि में शुक्र और गुरु (बृहस्पति) ग्रह की एक बहुत ही दुर्लभ युति भी बन रही है, साथ ही दर्श अमावस्या और मासिक कार्तिगाई जैसे कई और शुभ योगों का महासंयोग भी इसी दिन देखने को मिलेगा। ये सारे दिव्य संयोग मिलकर इस व्रत के आध्यात्मिक फल को कई हजार गुना तक बढ़ा देते हैं। पहली बार व्रत करने वाली महिलाओं के लिए मलमास की दुविधा का समाधान : Solution to the dilemma of Malamas for women fasting for the first time अब हम उस सबसे बड़ी उलझन और सवाल पर आते हैं जो विशेष रूप से उन नवविवाहित महिलाओं के मन में है जो इस साल पहली बार यह व्रत उठाने (शुरू करने) की सोच रही हैं। सोशल मीडिया और कई अन्य माध्यमों पर यह चर्चा चल रही है कि इस साल मलमास लग रहा है, तो क्या नई सुहागिन स्त्रियों को यह व्रत इस साल शुरू करना शुभ होगा या अशुभ? पंचांग की सही और सटीक जानकारी के अनुसार, इस बार Vat Savitri Vrat 2026 के ठीक अगले दिन यानी 17 मई से मलमास आरंभ होने जा रहा है। चूंकि मलमास में कुछ विशेष नए व्रत-त्योहारों की शुरुआत वर्जित होती है (जैसे एकादशी, मंगलवार व्रत, छठ या जितिया), इसलिए लोगों के मन में शंका पैदा हो गई है। लेकिन धर्म शास्त्रों और सिद्ध पंडितों का एकदम स्पष्ट मत है कि नवविवाहित महिलाएं बिना किसी डर और शंका के इस साल से अपना व्रत पूरे उत्साह के साथ शुरू कर सकती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिस दिन व्रत रखा जा रहा है (16 मई), उस दिन मलमास की शुरुआत नहीं हुई है; इसलिए इस व्रत पर मलमास का कोई भी दोष या अशुभ प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ेगा। इसके अलावा, शास्त्रों के नियम यह भी बताते हैं कि सुहाग से जुड़े कुछ विशेष व्रत जैसे करवा चौथ, मधुश्रावणी और Vat Savitri Vrat 2026 को मलमास के दौरान भी शुरू करने पर कोई पाप या दोष नहीं लगता है। अतः नवविवाहिताएं अपने मायके से आए पूजा के सामान, वस्त्र और बायना के साथ पूरे हर्षोल्लास से इस व्रत का शुभारंभ कर सकती हैं। वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की ही पूजा क्यों की जाती है : Why is only the banyan tree worshipped ? इस पावन दिन पर बरगद (वट) के पेड़ की ही पूजा क्यों होती है, इसके पीछे एक बहुत गहरा रहस्य छिपा है। Vat Savitri Vrat हिंदू सनातन धर्म में बरगद के पेड़ को सबसे पवित्र, अत्यंत दीर्घायु और साक्षात देवतुल्य वृक्ष माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, वट वृक्ष की जड़ों में सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा, उसके तने में पालनहार भगवान विष्णु और पेड़ के ऊपरी हिस्से में देवों के देव महादेव (शिव) का साक्षात वास होता है। इतना ही नहीं, स्वयं देवी सावित्री भी इसी महान वृक्ष में निवास करती हैं। प्रलय काल के अंत में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण भी इसी वट वृक्ष के पत्ते पर बाल रूप में अवतरित हुए थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी रचना में वट वृक्ष को ‘तीर्थराज का छत्र’ कहकर पुकारा है। इसलिए जब सुहागिन महिलाएं Vat Savitri Vrat

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Kshamapan Stotra

Shri Dattatreya Apradh Kshamapan Stotra: श्रीदत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र….

Shri Dattatreya Apradh Kshamapan Stotra : श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र: भगवान दत्तात्रेय को हिंदू त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव का एक ही रूप में अवतार माना जाता है। ‘दत्तात्रेय’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘दत्त’ (दिया हुआ) और ‘आत्रेय’ (ऋषि अत्रि के पुत्र), जिसका तात्पर्य उस सत्ता से है जिसने स्वयं को ऋषि अत्रि के पुत्र के रूप में समर्पित कर दिया। भगवान दत्तात्रेय का जन्म पवित्र दंपति – अनुसूया और अत्रि के यहाँ हुआ था। उन्हें तीन सिरों के साथ दर्शाया जाता है, जो हिंदू देवताओं की त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और शिव की एकता का प्रतीक हैं। दत्तात्रेय सभी देवताओं, पैगंबरों, संतों और योगियों के साक्षात् स्वरूप हैं। वे सभी गुरुओं के गुरु हैं। हम सभी को जीवन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें वे समस्याएं भी शामिल हैं Kshamapan Stotra जो दिवंगत पूर्वजों के कारण उत्पन्न होती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो पूर्वज मृत्यु के उपरांत पितृ लोकों (जैसे कि मर्त्यलोक और भुवर्लोक) में अटके रह जाते हैं, यदि वे श्राद्ध कर्मों के माध्यम से हमारे द्वारा अर्पित की गई भेंट से संतुष्ट नहीं होते, तो वे हमारे परिवार में समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसी कुछ समस्याओं में विवाह में विलंब, घर में कलह, संतानहीनता, समय से पूर्व जन्मे शिशु, शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ संतानें, तथा अन्य प्रकार की बाधाएं शामिल हो सकती हैं। इन सभी समस्याओं का निवारण, श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र का श्रद्धा और भक्तिपूर्वक, तथा निर्धारित विधि के अनुसार नियमित रूप से पाठ करने से संभव है। यह स्तोत्र अत्यंत सरल है। इसका पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसके पाठ को लेकर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है; उदाहरणार्थ, स्त्रियां भी इसका पाठ निर्बाध रूप से कर सकती हैं। वस्तुतः, दत्तात्रेय का दिव्य स्वरूप उस परम सत्य का साक्षात् प्रतीक है जो किसी भी धर्म की सीमाओं से परे है। अतः, किसी भी धर्म को मानने वाले लोग दत्तात्रेय के नाम का स्मरण कर सकते हैं और उन्हें ‘गुरुओं के गुरु’ के रूप में पूज सकते हैं। Kshamapan Stotra दत्तात्रेय भगवान का एक अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप हैं, जो सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं और अत्यंत दयालु हैं। Kshamapan Stotra इसलिए, सच्ची निष्ठा और हृदय से की गई भक्ति की छोटी-छोटी चेष्टाओं को देखकर भी वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं। श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र के लाभ:Benefits of Shri Dattatreya Crime Kshamapana Stotra यह ‘श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र’ मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होता है। Kshamapan Stotra इस ‘श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र’ का नियमित पाठ करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, और जीवनकाल में यह सुख-समृद्धिपूर्ण जीवन प्रदान करता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:Who should recite this Stotra ? जिन व्यक्तियों का विवाह किसी कारणवश नहीं हो पा रहा है, जो घर-परिवार में कलह या अशांति का सामना कर रहे हैं, Kshamapan Stotra अथवा जो अपनी संतान के कल्याण की कामना रखते हैं—उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार इस ‘श्री दत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्रीदत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र पाठ: Shri Dattatreya Apradh Kshamapan Stotra in Hindi दत्तात्रेयं त्वां नमामि प्रसीद त्वं सर्वात्मा सर्वकर्ता न वेद ।कोऽप्यन्तं ते सर्वदेवाधिदेव ज्ञाताज्ञातान्मेऽपराधान् क्षमस्व ॥ १ ॥ त्वदुद्भवत्वात्त्वदधीनधीत्वा-त्त्वमेव मे वन्द्य उपास्य आत्मन् ।अथापि मौढ्यात् स्मरणं न ते मे कृतं क्षमस्व प्रियकृन्महात्मन् ॥ २ ॥ भोगापवर्गप्रदमार्तबन्धुं कारुण्यसिन्धुं परिहाय बन्धुम् ।हिताय चान्यं परिमार्गयन्ति हा मादृशो नष्टदृशो विमूढाः ॥ ३ ॥ न मत्समो यद्यपि पापकर्ता न त्वत्समोऽथापि हि पापहर्ता ।न मत्समोऽन्यो दयनीय आर्य न त्वत्समः क्वापि दयालुवर्यः ॥ ४ ॥ अनाथनाथोऽसि सुदीनबन्धो श्रीशाऽनुकम्पामृतपूर्णसिन्धो ।त्वत्पादभक्तिं तव दासदास्यं त्वदीयमन्त्रार्थदृढैकनिष्ठाम् ॥ ५ ॥ गुरुस्मृतिं निर्मलबुद्धिमाधि-व्याधिक्षयं मे विजयं च देहि ।इष्टार्थसिद्धिं वरलोकवश्यं धनान्नवृद्धिं वरगोसमृद्धिम् ॥ ६ ॥ पुत्रादिलब्धिं म उदारतां च देहीश मे चास्त्वभय हि सर्वतः ।ब्रह्माग्निभूम्यो नम ओषधीभ्यो वाचे नमो वाक्पतये च विष्णवे ॥ ७ ॥ शान्ताऽस्तु भूर्नः शिवमन्तरिक्षं द्यौश्चाऽभयं नोऽस्तु दिशः शिवाश्च ।आपश्च विद्युत्परिपान्तु देवाः शं सर्वतो मेऽभयमस्तु शान्तिः ॥ ८ ॥ ।। इति श्रीदत्तात्रेय अपराध क्षमापन स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Vedasara Stotram

Sri Tripurasundari Vedasara Stotram : श्रीत्रिपुर सुन्दरी वेदसार स्तोत्रम

श्रीत्रिपुर सुन्दरी वेदसार स्तोत्रम हिंदी पाठ : Sri Tripurasundari Vedasara Stotram in Hindi कस्तूरीपङ्कभास्वद्गलचलदमलस्थूलमुक्तावलीकाज्योत्स्नाशुद्धावदाता शशिशिशुमकुटालंकृता ब्रह्मपत्नी ।साहित्यांभोजभृङ्गी कविकुलविनुता Vedasara Stotram सात्विकीं वाग्विभूतिंदेयान्मे शुभ्रवस्त्रा करचलवलया वल्लकीं वादयन्ती ॥ १ ॥ एकान्ते योगिवृन्दैः प्रशमितकरणैः क्षुत्पिपासा विमुक्तैःसानन्दं ध्यानयोगाद्बिसगुणसदृशी दृश्यते चित्तमध्ये ।या देवी हंसरूपा भवभटहरणं साधकानां विधत्तेसा नित्यं नादरूपा त्रिभुवनजननी मोदमाविष्करोतु ॥ २ ॥ ईक्षित्री सृष्टिकाले त्रिभुवनमथ या तत्क्षणेऽनुप्रविश्यस्थेमानं प्रापयन्ती निजगुणविभवैः सर्वदा व्याप्य विश्वम् ।संहर्त्री सर्वभासां विलयनसमये स्वात्मनि स्वप्रकाशासा देवी कर्मबन्धं मम भवकरणं नाशयित्वादिशक्तिः ॥ ३ ॥ लक्ष्या या चक्रराजे नवपुरलसिते योगिनीवृन्दगुप्तेसौवर्णे शैलशृङ्गे सुरगणरचिते Vedasara Stotram तत्त्वसोपानयुक्ते ।मन्त्रिण्या मेचकाङ्ग्या कुचभरनतया कोलमुख्या च सार्धंसम्राज्ञी सा मदीयं मदगजगमना दीर्घमायुस्तनोतु ॥ ४ ॥ ह्रींकाराम्भोजभृङ्गी हयमुखविनुता हानिवृध्यादिहीनाहंसोऽहम् मन्त्रराज्ञी हरिहयवरदा हादिमन्त्राक्षरूपा ।हस्ते चिन्मुद्रिकाद्या हतबहुदनुजा हस्तिकृत्तिप्रिया मेहार्दं शोकातिरेकं शमयतु ललिताधीश्वरी पाशहस्ता ॥ ५ ॥ हस्ते पङ्केरुहाभे सरससरसिजं बिभ्रती लोकमाताक्षीरोदन्वत्सुकन्या करिवरविनुता Vedasara Stotram नित्यपुष्टाऽब्जगेहा ।पद्माक्षी हेमवर्णा मुररिपुदयिता शेवधिस्संपदां यासा मे दारिद्र्यदोषं दमयतु करुणादृष्टिपातैरजस्रम् ॥ ६ ॥ सच्चिद्ब्रह्मस्वरूपां सकलगुणयुतां निर्गुणां निर्विकारांरागद्वेषादिहन्त्रीं रविशशिनयनां राज्यदानप्रवीणाम् ।चत्वारिंशत्त्रिकोणे चतुरधिकसमे चक्रराजे लसन्तींकामाक्षीं कामितानां वितरणचतुरां चेतसा भावयामि ॥ ७ ॥ कन्दर्पे शान्तदर्पे त्रिनयनज्योतिषा देववृन्दैःसाशङ्कं साश्रुपातं सविनयकरुणं याचिता कामपत्न्या ।या देवी दृष्टिपातैः पुनरपि मदनं जीवयामास सद्यःसा नित्यं रोगशान्त्यै प्रभवतु ललिताधीश्वरी चित्प्रकाशा ॥ ८ ॥ हव्यैः कव्यैश्च सर्वैर्श्रुतिचयविहितैः कर्मभिः कर्मशीलाःध्यानाद्यैरष्टभिश्च प्रशमितकलुषा योगिनः पर्णभक्षाः ।यामेवानेकरूपां प्रतिदिनमवनौ संश्रयन्ते विधिज्ञासा मे मोहान्धकारं बहुभवजनितं नाशयत्वादिमाता ॥ ९ ॥ लक्ष्या मूलत्रिकोणे गुरुवरकरुणालेशतः कामपीठेयस्यां विश्वं समस्तं बहुतरविततं जायते कुण्डलिन्या ।यस्या शक्तिप्ररोहादविरलममृतं विन्दते योगिवृन्दंतां वन्दे नादरूपां प्रणवपदमयीं प्राणिनां प्राणधात्रीम् ॥ १० ॥ ह्रींकाराम्बोधिलक्ष्मीं हिमगिरितनयां ईश्वराणांह्रींमन्त्राराध्यदेवीं श्रुतिशतशिखरैर्मृग्यमाणां मृगाक्षीम् ।ह्रींमन्त्रान्तैस्त्रिकूटैः स्थिरतरमहिभिर्धार्यमाणां ज्वलन्तींह्रीं ह्रीं ह्रीमित्यजस्रं हृदयसरसिजे भावयेऽहं भवानीम् ॥ ११ ॥ सर्वेषां ध्यान मथ्रातः सविथुरु दरगं चोदयन्थि मनीषां,सविथ्री ततः पदर्त्ठ ससि युथ मकुट पञ्च शीर्षा त्रिनेथ्रा ।हस्थाग्रै शङ्ख चक्रध्य अखिल जन पर्थ्रण दक्षयुधानां,भिभ्रणा वृन्द मम्ब विसदयथु मथिं ममकीनां महेसि ॥ १२ ॥ कर्त्री लोकस्य लीलाविलसितविधिना कारयित्री क्रियाणांभर्त्री स्वानुप्रवेशाद्वियदनिलमुखैः पञ्चभूतैः स्वसृष्टैः ।हर्त्री स्वेनैवधाम्ना पुनरपि वलये कालरूपं दधानाहन्यादामूलमस्मत्कलुषभरमुमा भुक्तिमुक्तिप्रदात्री ॥ १३ ॥ लक्ष्या या पुण्यजालैः गुरुवरचरणाम्भोजसेवाविशेषात्दृश्या स्वान्ते सुधीभिर्दरदलितमहापद्मकोशेनतुल्ये ।लक्षं जप्त्वापि यस्या मनुवरमणिमादिसिद्धिमन्तो महान्तःसा नित्यं मामकीने हृदयसरसिजे वासमङ्गीकरोतु ॥ १४ ॥ ह्रीं श्रीं ऐं मन्त्ररूपा हरिहरविनुताऽगस्त्यपत्नीप्रतिष्ठाहादिकाद्यर्णतत्त्वा सुरपतिवरदा कामराजप्रतिष्ठा ।दुष्टानां दानवानां मनभरहरणा दुःखहन्त्री बुधानांसम्राज्ञी चक्रराज्ञी प्रदिशतु कुशलं मह्यमोंकाररूपा ॥ १५ ॥ श्रीमन्त्रार्थस्वरूपा श्रितजनदुरितध्वान्तहन्त्री शरण्याश्रौतस्मार्तक्रियाणामविकलफलदा फालनेत्रस्य धारा ।श्रीचक्रान्तर्निषण्णा गुहवरजननी दुष्टहन्त्री वरेण्याश्रीमत्सिंहासनेशी प्रदिशतु विपुलां कीर्तिमानन्दरूप ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीत्रिपुर सुन्दरी वेदसार स्तोत्रम सम्पूर्णम् ॥

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Ancestors Appear in Dreams

Ancestors Appear in Dreams: तो जानिए इसका आपके जीवन पर क्या गहरा प्रभाव पड़ता है….

Ancestors Appear in Dreams : नींद के आगोश में इंसान अक्सर एक ऐसी रहस्यमयी और जादुई दुनिया की लंबी यात्रा करता है, जहाँ उसका सामना कई तरह के अजीब, डरावने और कभी-कभी बेहद भावनात्मक दृश्यों से होता है। कई बार हमें ऐसे सुखद सपने आते हैं जो उठने के बाद भी हमें अपार खुशी देते हैं, तो कुछ सपने हमारे मन में गहरी उलझन और चिंता पैदा कर देते हैं। भारतीय स्वप्न शास्त्र (Swapna Shastra) के अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार, रात के समय देखे गए हर एक सपने का हमारे वास्तविक जीवन और आने वाले भविष्य से कोई न कोई गहरा नाता अवश्य होता है। इन्हीं अत्यधिक भावनात्मक, रहस्यमयी और सोचने पर मजबूर कर देने वाले सपनों में से एक वह होता है, Ancestors Appear in Dreams जब हमारे मृत पूर्वज या घर के बड़े-बुजुर्ग नींद में हमारे सामने आ जाते हैं। जब Ancestors appear in Dreams, तो नींद खुलने के बाद हमारे मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर जो लोग इस दुनिया से जा चुके हैं, वे हमें क्या विशेष संकेत देना चाहते हैं। सनातन धर्म की पुरानी मान्यताओं और विशेषकर 16 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष (Pitru Paksha) के पवित्र समय के दौरान यह मान्यता बहुत ही ज्यादा प्रबल हो जाती है कि हमारे पूर्वज सीधे पितृ लोक से धरती पर विचरण करने आते हैं और सपनों के विभिन्न माध्यमों से हमें अच्छे या बुरे भविष्य का आभास कराते हैं। आज के इस अत्यंत विस्तृत, शत-प्रतिशत मौलिक, एसईओ-फ्रेंडली (SEO friendly) और ज्ञानवर्धक ब्लॉग पोस्ट में हम बहुत ही गहराई से यह समझेंगे कि अलग-अलग अवस्थाओं और भाव-भंगिमाओं में जब Ancestors appear in Dreams, तो इसका आपके वर्तमान और भविष्य पर क्या शुभ या अशुभ प्रभाव पड़ता है। Ancestors Appear in Dreams: तो जानिए इसका आपके जीवन पर क्या गहरा प्रभाव पड़ता है…. पूर्वजों का सपने में आने का मुख्य कारण क्या है : What is the main reason for ancestors coming in dreams? मनोविज्ञान और स्वप्न शास्त्र दोनों ही इस विषय पर अपनी अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण राय रखते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, जब Ancestors appear in Dreams, तो यह आमतौर पर दो प्रमुख बातों का एक बहुत ही स्पष्ट संकेत होता है: या तो उनकी कोई बहुत बड़ी और विशेष इच्छा अभी भी अधूरी रह गई है, या फिर वे आपको भविष्य में होने वाली किसी बड़ी घटना या दुर्घटना के प्रति पहले से ही आगाह (अलर्ट) करना चाहते हैं। इसके अलावा, यदि आप सपने में किसी ऐसे मृत व्यक्ति को देखते हैं जिसे आप बहुत अच्छी तरह से जानते थे, Ancestors Appear in Dreams तो यह सपना इस बात का संकेत देता है कि आपके मन में उस व्यक्ति के प्रति अभी भी बहुत गहरा भावनात्मक लगाव मौजूद है और आप अपने अवचेतन मन में उसे कहीं ना कहीं बहुत ज्यादा याद कर रहे हैं। विभिन्न अवस्थाओं में पूर्वजों को देखने का अचूक स्वप्न फल : Infallible dream result of seeing ancestors in different states स्वप्न शास्त्र में पितरों के दिखाई देने की हर एक छोटी-बड़ी अवस्था का बहुत ही सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। आइए जानते हैं इनके सटीक अर्थ: 1. मुस्कुराते या प्रसन्न मुद्रा में देखना (अत्यंत शुभ संकेत) : Seeing someone smiling or in a happy mood (very auspicious sign) जब आपके Ancestors appear in Dreams और वे आपके सामने पूरी तरह से प्रसन्न मुद्रा में या मुस्कुराते हुए नजर आएं, तो आप खुद को बहुत भाग्यशाली मान सकते हैं क्योंकि इसे एक बेहद ही शुभ और सकारात्मक संकेत माना जाता है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि आपके परिवार के पितृ देव आपसे पूरी तरह प्रसन्न हैं और उनकी असीम कृपा से आपके घर-परिवार में जल्द ही सुख-समृद्धि कई गुना बढ़ने वाली है। वहीं पितृपक्ष के पावन दिनों के संदर्भ में इसका मतलब यह भी होता है कि उन्होंने आपके द्वारा पूरी श्रद्धा से किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया है और वे आपको आशीर्वाद दे रहे हैं। 2. गुस्से या क्रोधित अवस्था में देखना (अशुभ संकेत) : Seeing someone angry or angry (bad sign) इसके बिल्कुल विपरीत, यदि Ancestors appear in Dreams और आप उन्हें अपने ऊपर बहुत अधिक गुस्सा करते हुए या क्रोधित अवस्था में देखते हैं, तो यह स्वप्न शास्त्र के अनुसार एक भयंकर अशुभ संकेत माना जाता है। यह सपना चेतावनी देता है कि इसका अर्थ है आपके पितृ आपसे या आपके किसी काम से बिल्कुल खुश नहीं हैं। Ancestors Appear in Dreams ऐसा माना जाता है कि इस तरह के डरावने और क्रोधित सपने ज्यादातार उन लोगो को आते हैं जिनके घर में भयंकर ‘पितृ दोष’ (Pitra Dosh) लगा रहता है। 3. सपने में पूर्वजों को खुद से बातें करते हुए देखना : Seeing ancestors talking to themselves in dreams कई बार ऐसा होता है कि Ancestors appear in Dreams और वे आपसे कुछ कहने, आपको कोई सलाह देने या बातें करने की कोशिश करते हैं। स्वप्न शास्त्र में इस प्रकार के दुर्लभ सपने को भविष्य की किसी बड़ी दुर्घटना या अनहोनी से बचाने वाला एक अलर्ट माना गया है। इसका अर्थ है कि वे आपको भविष्य से जुड़ी किसी खतरनाक घटना के लिए पहले ही सचेत कर रहे हैं ताकि आप सावधानी बरत सकें। 4. बहुत करीब देखना या महसूस करना : see or feel very close यदि आप कभी सपने में अपने किसी मृत पूर्वज को अपने बहुत ही करीब खड़े देखते हैं या उनकी उपस्थिति को बहुत पास से महसूस करते हैं, तो इसका मतलब यह होता है कि आपके उन पूर्वजों का अपने परिवार के प्रति मोह अभी भी पूरी तरह से नहीं छूट पाया है। इस स्थिति में स्वप्न शास्त्र सलाह देता है कि आपको उनके नाम से अमावस्या के दिन घर में धूप दिखानी चाहिए और उनकी भटकी हुई आत्मा की शांति के लिए तुरंत कोई विशेष अनुष्ठान करवाना चाहिए। 5. बार-बार एक ही पूर्वज का सपने में आना : Seeing the same ancestor again and again in the dream जब एक ही मृत परिजन या Ancestors appear in Dreams लगातार कई दिनों तक आपके सपनों में आते रहें, तो इसका सीधा सा मतलब यह है

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Sundari Stotram

Shri Tripura Sundari Stotram: श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम्….

Shri Tripura Sundari Stotram : श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम्: त्रिपुरसुंदरी एक देवी हैं, जो सुंदरता का प्रतीक हैं। माना जाता है कि उनकी आयु सोलह वर्ष है, और इसीलिए उन्हें ‘षोडशी’ (सोलह वर्ष की कन्या) के नाम से भी जाना जाता है। वह देवी शक्ति के उग्र रूप ‘काली’ का ही एक स्वरूप हैं; देवी शक्ति को पार्वती, दुर्गा और भगवती जैसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। ‘त्रिपुरा’ शब्द का अर्थ है तीन नगर या तीन लोक, जबकि ‘सुंदरी’ का अर्थ है सुंदर स्त्री। इस प्रकार, यह देवी ‘तीनों नगरों या तीनों लोकों की सुंदरता’ का प्रतीक हैं। उन्हें ‘महा त्रिपुरसुंदरी’, ‘ललिता’ और ‘राजराजेश्वरी’ के नाम से भी पुकारा जाता है; Sundari Stotram उन्हें ‘दस महाविद्याओं’ में सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। शाक्त संप्रदाय की ‘श्रीकुल’ परंपरा के अनुसार, त्रिपुरसुंदरी सभी महाविद्याओं में अग्रणी हैं और देवी ‘आदि पराशक्ति’ का सर्वोच्च स्वरूप हैं। ‘त्रिपुरा उपनिषद’ में उन्हें इस ब्रह्मांड की ‘परम शक्ति’ (ऊर्जा और सामर्थ्य) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। उन्हें ‘परम चेतना’ के रूप में वर्णित किया गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओं से भी परे है। Sundari Stotram ऐसा माना जाता है कि त्रिपुरसुंदरी, भगवान शिव के उस स्वरूप की गोद में विराजमान रहती हैं, Sundari Stotram जिन्हें ‘कामेश्वर’ (अर्थात् ‘इच्छाओं के स्वामी’) के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरसुंदरी, शाक्त तांत्रिक परंपरा (जिसे ‘श्री विद्या’ के नाम से जाना जाता है) से जुड़ी हुई प्रमुख देवी भी हैं। इस देवी से जुड़ी एक पौराणिक कथा अत्यंत रोचक है। ‘भंडासुर’ नामक एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस के अत्याचारों से त्रस्त होकर, सभी देवताओं ने ‘परम ब्रह्म’ (सर्वोच्च ईश्वर) की आराधना की। तब, वही परम सत्ता ‘महा कामेश्वर’ और ‘ललिता त्रिपुरसुंदरी’ के रूप में प्रकट हुई। Sundari Stotram तत्पश्चात्, उन्होंने समस्त देवी-देवताओं की रचना की; वहीं दूसरी ओर, त्रिपुरसुंदरी ने राक्षस भंडासुर का सामना किया, उसका संहार किया और इस संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। ‘ललिता सहस्रनाम’ नामक पवित्र स्तोत्र में, जिसमें देवी के एक हज़ार नामों का वर्णन किया गया है, इसी कथा का उल्लेख मिलता है और उसमें देवी की महान महिमा का गुणगान किया गया है। श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् के लाभ: त्रिपुरसुंदरी जितनी सुंदरता की प्रतीक हैं, Sundari Stotram उतनी ही वह करुणा और कृपा की भी साक्षात् मूर्ति हैं। उनकी आराधना करने से भक्तों को उनका दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है और उन्हें अनेक प्रकार के लाभों की प्राप्ति होती है। भक्तगण विवाह में विलंब, वैवाहिक जीवन की समस्याओं और कलह, संतानहीनता (बांझपन), दरिद्रता, ऋण (कर्ज) और विभिन्न प्रकार के दुर्भाग्य जैसी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। उन्हें बुध ग्रह के बुरे प्रभावों से भी सुरक्षा मिल सकती है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन लोगों को विवाह में देरी, गरीबी, कर्ज़ आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार इस ‘श्री त्रिपुरा सुंदरी स्तोत्र’ का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Shri Tripura Sundari Stotram in Hindi कदंबवनचारिणीं मुनिकदम्बकादंविनीं,नितंबजितभूधरां सुरनितंबिनीसेविताम् ।नवंबुरुहलोचनामभिनवांबुदश्यामलां,त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ कदंबवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं,महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणींम् ।दया विभव कारिणी विशद लोचनी चारिणी,त्रिलोचन कुटुम्बिनी त्रिपुर सुंदरी माश्रये ॥ कदंबवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया,कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया ।मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया ,कयापि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥ कदंबवनमध्यगां कनकमंडलोपस्थितां,षडंबरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् ।विडंवितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं ,त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ कुचांचितविपंचिकां कुटिलकुंतलालंकृतां ,कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम् ।मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं ,मतंगमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥ स्मरेत्प्रथमपुष्प्णीं रुधिरबिन्दुनीलांबरां,गृहीतमधुपत्रिकां मधुविघूर्णनेत्रांचलाम्‌ ।घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां,त्रिलोचनकुटंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ सकुंकुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां ,समंदहसितेक्षणां सशरचापपाशांकुशाम् ।असेष जनमोहिनी मरूण माल्य भुषाम्बरा,जपाकुशुम भाशुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम ॥ पुरम्दरपुरंध्रिकां चिकुरबंधसैरंध्रिकां ,पितामहपतिव्रतां पटुपटीरचर्चारताम्‌ ।मुकुंदरमणीं मणिलसदलंक्रियाकारिणीं,भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम् ॥ ।। इति श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् संपूर्णम् ।।

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