Matangi Stotra

Shri Raj Matangi Stotra : श्री राज मातंगी स्तोत्र….

श्री राज मातंगी स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Raj Matangi Stotra in Hindi मातङ्गीं मधुपानमत्तनयनां मातङ्ग सञ्चारिणींकुम्भीकुम्भविवृत्तपीवरकुचां कुम्भादिपात्राञ्चिताम् ।ध्यायेऽहं मधुमारणैकसहजां ध्यातुस्सुपुत्रप्रदां ।शर्वाणीं सुरसिद्धसाध्यवनिता संसेविता पादुकाम् ॥ १ ॥ मातङ्गी महिषादिराक्षसकृतध्वान्तैकदीपो मणिःमन्वादिस्तुत मन्त्रराजविलसत्सद्भक्त चिन्तामणिः ।श्रीमत्कौलिकदानहास्यरचना चातुर्य राकामणिःदेवित्वं हृदये वसाद्यमहिमे मद्भाग्य रक्षामणिः ॥ २ ॥ जयदेवि विशालाक्षि जय सर्वेश्वरि जय ।जयाञ्जनगिरिप्रख्ये महादेव प्रियङ्करि ॥ ३ ॥ महाविश्वेश दयिते जय ब्रह्मादि पूजिते ।पुष्पाञ्जलिं प्रदास्यामि गृहाण कुलनायिके ॥ ४ ॥ जयमातर्महाकृष्णे जय नीलोत्पलप्रभे ।मनोहारि नमस्तेऽस्तु नमस्तुभ्यं वशङ्करि ॥ ५ ॥ जय सौभाग्यदे नॄणां Matangi Stotra लोकमोहिनि ते नमः ।सर्वैश्वर्यप्रदे पुंसां सर्वविद्याप्रदे नमः ॥ ६ ॥ सर्वापदां नाशकरीं सर्वदारिद्र्यनाशिनीम् ।नमो मातङ्गतनये नमश्चाण्डालि कामदे ॥ ७ ॥ नीलाम्बरे नमस्तुभ्यं नीलालकसमन्विते ।नमस्तुभ्यं महावाणि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ ८ ॥ महामातङ्गि पादाब्जं तव Matangi Stotra नित्यं नमाम्यहम् ।एतदुक्तं महादेव्या मातङ्गयाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ ९ ॥ सर्वकामप्रदं नित्यं यः पठेन्मानवोत्तमः ।विमुक्तस्सकलैः पापैः समग्रं पुण्यमश्नुते ॥ १० ॥ राजानो दासतां यान्ति नार्यो दासीत्वमाप्नुयुः ।दासीभूतं जगत्सर्वं शीघ्रं तस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ ११ ॥ महाकवीभवेद्वाग्भिः साक्षाद् वागीश्वरो भवेत् ।अचलां श्रियमाप्नोति अणिमाद्यष्टकं लभेत् ॥ १२ ॥ लभेन्मनोरथान् सर्वान् त्रैलोक्ये नापि दुर्लभान् ।अन्ते शिवत्वमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३ ॥ ॥ इति श्री राज मातंगी स्तोत्र सपूर्णम् ॥

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Radhakrishna Stotram

Shri Radhakrishna Stotram : श्री राधा कृष्ण स्तोत्र….

श्री राधा कृष्ण स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Radhakrishna Stotram in Hindi वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् ॥ १ ॥ राधेशं राधिकाप्राणवल्लभं वल्लवीसुतम् ।राधासेवितपादाब्जं राधावक्षस्थलस्थितम् ॥ २ ॥ राधानुगं राधिकेष्टं राधापहृतमानसम् ।राधाधारं भवाधारं सर्वाधारं नमामि तम् ॥ ३ ॥ राधाहृत्पद्ममध्ये च Radhakrishna Stotram वसन्तं सन्ततं शुभम् ।राधासहचरं शश्वत् राधाज्ञापरिपालकम् ॥ ४ ॥ ध्यायन्ते योगिनो योगान् सिद्धाः सिद्धेश्वराश्च यम् ।तं ध्यायेत् सततं शुद्धं भगवन्तं सनातनम् ॥ ५ ॥ निर्लिप्तं च निरीहं च परमात्मानमीश्वरम् ।नित्यं सत्यं च परमं भगवन्तं सनातनम् ॥ ६ ॥ यः सृष्टेरादिभूतं च सर्वबीजं परात्परम् ।योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम् ॥ ७ ॥ बीजं नानावताराणां सर्वकारणकारणम् ।वेदवेद्यं वेदबीजं वेदकारणकारणम् ॥ ८ ॥ योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम् ।गन्धर्वेण कृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।इहैव जीवन्मुक्तश्च परं याति परां गतिम् ॥ ९ ॥ हरिभक्तिं हरेर्दास्यं गोलोकं च निरामयम् ।पार्षदप्रवरत्वं च लभते नात्र संशयः ॥ १० ॥ ॥ इति श्री राधा कृष्ण स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Vat Purnima 2026

Vat Purnima 2026 Date And Time:वट पूर्णिमा की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा….

Vat Purnima 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और हमारी भारतीय संस्कृति में सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की अपार खुशहाली के लिए कई तरह के व्रत रखे जाते हैं। इन्हीं तमाम सुहाग व्रतों में से एक सबसे प्रमुख, शक्तिशाली और सौभाग्यदायी व्रत वट पूर्णिमा का माना जाता है। हिंदू वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को यह महान व्रत पूरे विधि-विधान और गहरी आस्था के साथ रखा जाता है। इस साल Vat Purnima 2026 का पर्व महिलाओं के लिए एक बहुत ही विशेष आध्यात्मिक अवसर लेकर आ रहा है। यह पावन पर्व सदियों से हिंदू विवाहित स्त्रियों के लिए अटूट प्रेम, त्याग और अपने जीवनसाथी के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है। अगर आप भी Vat Purnima 2026 की तैयारी कर रही हैं और अपने दांपत्य जीवन को सुख-समृद्धि से भरना चाहती हैं, तो पूजा की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और इसके पीछे छिपे गहरे धार्मिक महत्व को जान लेना आपके लिए बहुत जरूरी है। आज के इस विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में हम आपको इस व्रत से जुड़ी हर एक छोटी-बड़ी जानकारी बेहद सरल शब्दों में देंगे, ताकि आपकी पूजा बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। Vat Purnima 2026 की सटीक तिथि और एकदम शुभ मुहूर्त…. किसी भी व्रत का पूर्ण फल इंसान को तभी मिलता है जब वह सही तिथि और सटीक मुहूर्त पर किया जाए। पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 29 जून 2026 की सुबह 03 बजकर 07 मिनट पर हो जाएगा। वहीं, इस अत्यंत पवित्र पूर्णिमा तिथि का पूर्ण समापन अगले दिन यानी 30 जून को सुबह 05 बजकर 27 मिनट पर होगा। सनातन धर्म में ‘उदया तिथि’ (सूर्य उदय होने के समय जो तिथि मौजूद होती है) का सर्वाधिक महत्व होता है। इसलिए उदया तिथि के आधार पर Vat Purnima 2026 का यह पावन व्रत 29 जून, दिन सोमवार को ही पूरे हर्षोल्लास के साथ रखा जाएगा। इस बार का यह व्रत इसलिए भी बहुत खास है क्योंकि पंचांग के मुताबिक इस दिन दो बहुत ही दुर्लभ और शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस बार Vat Purnima 2026 के दिन सबसे पहले ‘शुक्ल योग’ बन रहा है, जो सुबह से शुरू होकर दोपहर 2 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। इसके ठीक बाद ‘ब्रह्म योग’ की शुरुआत हो जाएगी। धार्मिक दृष्टि से इन दोनों ही शुभ योगों में पूजा-अर्चना करना महिलाओं के लिए अत्यंत फलदायी साबित होगा और उनकी हर मनोकामना शीघ्र पूरी होगी। वट सावित्री और वट पूर्णिमा के बीच का मुख्य अंतर और मलमास का प्रभाव : Main difference between Vat Savitri and Vat Purnima and effect of Malamas अक्सर कई महिलाओं के मन में यह सवाल आता है कि वट सावित्री और Vat Purnima 2026 में क्या मुख्य अंतर है। Vat Purnima 2026 दरअसल, इन दोनों ही व्रतों का मुख्य उद्देश्य और इनका धार्मिक महत्व बिल्कुल एक समान होता है, फर्क केवल इनकी तिथियों का है। वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है, जबकि वट पूर्णिमा का व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि पर किया जाता है। आमतौर पर इन दोनों व्रतों के बीच केवल 15 दिनों का ही अंतर होता है, लेकिन इस साल पंचांग के अनुसार 17 मई से अधिक मास (मलमास) लग गया था। इसी अधिक मास के कारण इस वर्ष वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत के बीच लगभग डेढ़ महीने का लंबा अंतर आ गया है। भारत के विभिन्न राज्यों में अपनी-अपनी क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसे मनाया जाता है; विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में वट पूर्णिमा व्रत का चलन बहुत अधिक है। वट (बरगद) वृक्ष की ही पूजा क्यों की जाती है ?: Why is only the Banyan tree worshipped इस दिन बरगद के पेड़ (वट वृक्ष) की पूजा का बहुत गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य है। हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को सबसे पवित्र और अत्यंत दीर्घायु (लंबी उम्र वाला) वृक्ष माना गया है। पुराणों के अनुसार, वट वृक्ष में त्रिदेवों का साक्षात वास होता है; इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और ऊपरी हिस्से में देवों के देव महादेव (शिव) निवास करते हैं। Vat Purnima 2026 इसलिए जब सुहागिन महिलाएं इस वृक्ष की परिक्रमा कर पूजा करती हैं, तो उन्हें तीनों लोकों के देवताओं का एक साथ भरपूर आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उनके पति की आयु बरगद के पेड़ की तरह ही लंबी और उनका वैवाहिक रिश्ता बेहद मजबूत हो जाता है। Vat Purnima 2026 की संपूर्ण और सरल पूजा विधि व्रत का पूरा और श्रेष्ठ फल प्राप्त करने के लिए पूजा की इस अचूक विधि का क्रमबद्ध तरीके से पालन करना बहुत जरूरी है: स्नान और शृंगार: व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें। इसके बाद शुभ और लाल रंग के कपड़े पहनें तथा पूरे सोलह शृंगार करें, जो सौभाग्य का प्रतीक है। पूजा की थाली तैयार करना: अपनी पूजा की साफ थाली में ताजे फल, फूल, रोली, कुमकुम, हल्दी, शुद्ध घी का दीपक, कच्चा सूत (सफेद या लाल धागा), और भोग के लिए भीगा हुआ चना व गुड़ अवश्य रख लें। वृक्ष की परिक्रमा: शुभ मुहूर्त में किसी पुराने वट वृक्ष के पास जाएं। वहां दीपक प्रज्वलित करें, पेड़ के तने पर हल्दी और कुमकुम अर्पित करें और चना-गुड़ का मीठा भोग लगाएं। कच्चा सूत बांधना: पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वृक्ष की परिक्रमा करना है। अपने हाथ में कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की 7, 11 या फिर 21 बार परिक्रमा करते हुए उस धागे को पेड़ के तने पर अच्छी तरह से लपेटें। कथा का श्रवण: परिक्रमा पूर्ण होने के बाद वहीं पेड़ के नीचे शांति से बैठकर माता सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा को खुद पढ़ें या किसी से सुनें। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। अंत में आरती करके अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें। माता सावित्री और सत्यवान की पौराणिक व्रत कथा : Mythological fast story of Mata Savitri and Satyavan किसी भी उपवास की तरह Vat Purnima 2026 की पूजा भी

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Parma ekadashi

Parma ekadashi 2026 Vrat Significance Rules : परमा एकादशी की सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा….

Parma ekadashi 2026 Puja Vidhi : सनातन धर्म और वैदिक पंचांग की असीम व ज्ञानवर्धक दुनिया में भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित व्रतों का अत्यधिक महत्व है। हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले सभी प्रमुख व्रतों में एकादशी को सर्वोपरि और सबसे अधिक पुण्यकारी माना गया है। आम तौर पर एक सामान्य वर्ष में कुल 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन जब हिंदू पंचांग की सटीक ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार हर तीन साल के बाद एक अतिरिक्त मास (जिसे हम अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं) जुड़ता है, तो एकादशियों की कुल संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इसी अत्यंत पवित्र अधिकमास के कृष्ण पक्ष (जब चंद्रमा का आकार घटता है) में आने वाली पावन एकादशी को शास्त्रों में परमा एकादशी या कमला एकादशी के नाम से जाना जाता है। चूंकि यह दुर्लभ और दिव्य संयोग हर तीन साल में केवल एक ही बार बनता है, इसलिए इस वर्ष Parma Ekadashi 2026 का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अन्य सभी सामान्य व्रतों की तुलना में कई हजार गुना अधिक माना जा रहा है। भगवान विष्णु की अपार कृपा पाने और जीवन के हर बड़े कष्ट से मुक्ति के लिए यह दिन किसी महा उत्सव से कम नहीं है। Parma ekadashi 2026 Vrat Significance Rules : परमा एकादशी की सटीक तिथि….. पंचांग की सटीक गणना: तिथि और पारण का शुभ समय किसी भी वैदिक व्रत का शत-प्रतिशत और अचूक फल इंसान को तभी मिलता है, जब उसे व्रत की सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का पूर्ण ज्ञान हो। Parma ekadashi हिंदू पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष Parma Ekadashi 2026 का अत्यंत पावन उपवास 11 जून (गुरुवार) को पूरे भारतवर्ष में अपार श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ रखा जाएगा। व्रत की पवित्र तिथियों का एकदम विस्तृत और सटीक विवरण इस प्रकार है: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: हिंदू पंचांग के अनुसार, 10 जून की रात (या 11 जून की मध्यरात्रि) को ठीक 12 बजकर 57 मिनट (कुछ पंचांगों के अनुसार 12:59 बजे) से एकादशी तिथि की शुरुआत हो जाएगी। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: यह पावन तिथि अगले दिन यानी 11 जून को रात के 10 बजकर 36 या 37 मिनट पर अपना पूर्ण समापन करेगी। व्रत का पारण (उपवास खोलने का पवित्र समय): सनातन धर्म शास्त्रों के कड़े नियमों के अनुसार इस महान व्रत का पारण हमेशा अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। Parma ekadashi इसलिए 12 जून की सुबह 5 बजकर 23 मिनट से लेकर 8 बजकर 10 मिनट के बीच व्रत खोलना सबसे अधिक शुभ रहेगा। (उदया तिथि की सनातनी मान्यताओं का पूर्ण रूप से पालन करते हुए यह व्रत 11 जून को ही संपन्न होगा।) आध्यात्मिक महत्व और इसके गहरे रहस्य हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, मलमास में आने के कारण Parma Ekadashi 2026 के दिन भगवान श्री हरि विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की कृपा अपने चरम पर होती है। इस अद्भुत उपवास को इंसान को अत्यंत दुर्लभ सिद्धियां, मानसिक शांति और अपार धन-संपत्ति प्रदान करने वाला माना गया है। जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन और शुद्ध अंतरात्मा से भगवान श्री हरि की विधिवत पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन की घोर दरिद्रता हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। पौराणिक मान्यता तो यह भी है कि इस पावन दिन पर केवल पूरे नियम से उपवास रखने और इसकी कथा सुनने मात्र से ही मनुष्य को सैकड़ों महान यज्ञों को संपन्न करने के बराबर असीम फल प्राप्त हो जाता है और अंत में मृत्यु के पश्चात उसे सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। पौराणिक और चमत्कारी व्रत कथा कहा जाता है कि कथा के श्रवण के बिना एकादशी का उपवास बिल्कुल अधूरा रहता है। Parma Ekadashi 2026 की पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अवंतीपुर नामक एक अत्यंत ही सुंदर और समृद्ध गाँव में एक बहुत ही ज्ञानी और विद्वान ब्राह्मण रहा करते थे। Parma ekadashi उनके पाँच पुत्र थे; जिनमें से चार तो बहुत ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे, लेकिन उनका पाँचवाँ पुत्र, जिसका नाम जयशर्मा था, वह पूरी तरह से दुराचारों और पाप कर्मों के अंधेरे में डूबा हुआ था। उसके पापी आचरण और बुरे व्यवहार के कारण गाँव के आस-पास के सभी लोग हमेशा बहुत परेशान रहते थे। अंततः उसके दुराचरण से तंग आकर उसके सगे-संबंधियों और स्वयं उसके पिता ने भी उसे हमेशा के लिए अपने घर से निकाल दिया। अपनों के भारी तिरस्कार और सामाजिक अपमान से आहत होकर वह दुखी मन से गाँव छोड़कर एक घने जंगल की ओर चला गया। दर-दर भटकते हुए वह भूख-प्यास से बुरी तरह व्याकुल होकर प्रयाग के पवित्र तीर्थ स्थल पर जा पहुँचा। Parma ekadashi वहां उसे महर्षि हरिमित्र का शांत और आध्यात्मिक आश्रम दिखाई दिया। चूँकि वह पुरुषोत्तम मास (अधिकमास) का अत्यंत पवित्र समय था, इसलिए वहां बहुत से विद्वान ब्राह्मण और श्रद्धालु एकत्रित थे। वहां बैठकर सभी लोग भगवान विष्णु की महिमा गा रहे थे। Parma ekadashi महर्षि के मार्गदर्शन में Parma Ekadashi 2026 का यह कठिन व्रत पूरे विधि-विधान से संपन्न किया। उसके इस जाग्रत व्रत के प्रबल प्रभाव से उसी रात साक्षात देवी लक्ष्मी उसके समक्ष प्रकट हुईं और कहा, “हे ब्राह्मण पुत्र! तुमने यह व्रत पूरी श्रद्धा और नियम से किया है, इसलिए तुम्हें मेरा आशीर्वाद और महान सौभाग्य प्राप्त होगा”। माता लक्ष्मी के इस दिव्य वरदान से वह भटका हुआ युवक अपार धन और असीम समृद्धि से संपन्न होकर खुशी-खुशी अपने पिता के पास घर लौट आया। Parma ekadashi इसलिए कहा जाता है कि इस कथा को सुनने वाला हर इंसान पापों से मुक्त हो जाता है। अचूक पूजा विधि यदि आप Parma Ekadashi 2026 का पूरा, अचूक और चमत्कारी फल पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस पूजा विधि का कड़ाई से पालन करें: व्रत के शुभ दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर शुद्ध जल (यदि संभव हो तो गंगाजल मिलाकर) से स्नान करें और पूरी तरह साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। घर के स्वच्छ पूजा स्थल पर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ जोड़कर अपने निर्जल या फलाहार व्रत का दृढ़ संकल्प लें। भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियों को पंचामृत से आदरपूर्वक स्नान

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Mahatmya Stotram

Shri Radha Naam-Mahatmya Stotram : श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र….

Shri Radha Naam-Mahatmya Stotram in Hindi: श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र हिंदी पाठ रेफो हि कोटी जन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ।आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ।श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः ।रेफ़ो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे ।। सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् ।धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च । ददाति सार्ष्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् ।आकरस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ।  योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् ।श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ।रोगशोक मृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः ।  ।। इति श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Mrityunjay Stotra

Shri Mrityunjay Stotra : श्री मृत्युंजय स्तोत्र….

Shri Mrityunjay Stotra : श्री मृत्युंजय स्तोत्र: श्री मृत्युंजय स्तोत्र के बारे में माना जाता है कि महा मृत्युंजय मंत्र आपको गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकता है। वेदों के सबसे पुराने स्तोत्रों में से एक माने जाने वाले महामृत्युंजय जाप का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है; यह भगवान शिव के ‘रुद्र’ अवतार को समर्पित है। Mrityunjay Stotra यह आपकी आयु बढ़ाने में भी सहायक है। जब इस मंत्र का नियमित रूप से सच्ची श्रद्धा के साथ जाप किया जाता है, तो यह पारिवारिक कलह, संपत्ति के बंटवारे और वैवाहिक तनाव जैसी समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र में अद्भुत रोग-निवारक शक्तियाँ निहित हैं। हिंदुओं के बीच इसे सबसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना माना जाता है। शिव ही परम सत्य हैं और वे ही परमेश्वर हैं। शिव के अनुयायी मानते हैं कि वे ‘स्वयंभू’ (स्वयं प्रकट होने वाले) हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करना अत्यंत सरल है और वे अक्सर अपने भक्तों को वरदान देते हैं। Mrityunjay Stotra चाहे बात धन-संपत्ति, स्वास्थ्य या सुख-समृद्धि की हो—वे आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं और आपको आपके कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं। शिव पुराण में इस मंत्र के उल्लेख से जुड़ी दो कथाएँ प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार: यह मंत्र केवल ऋषि मार्कण्डेय को ज्ञात था, जिन्हें स्वयं भगवान शिव ने इस मंत्र का वरदान दिया था। अब प्रश्न यह उठता है कि शिव की आराधना किस प्रकार की जाए? सत्ययुग में मूर्ति-पूजा फलदायी थी, परंतु कलियुग में केवल मूर्ति के समक्ष प्रार्थना कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यहाँ तक कि भविष्य पुराण में भी सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति हेतु मंत्र-जाप के महत्व का वर्णन किया गया है। Mrityunjay Stotra इसी प्रकार, शिव के मंत्र—महामृत्युंजय मंत्र—का प्रतिदिन जाप करने से आपको उत्तम स्वास्थ्य, धन-संपत्ति, समृद्धि और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। यह मंत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और आपको विपत्तियों तथा संकटों से सुरक्षित रखता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र के लाभ: यदि आपकी जन्मकुंडली में मास, गोचर, दशा, अंतर्दशा अथवा किसी अन्य प्रकार का दोष विद्यमान है, तो श्री मृत्युंजय स्तोत्र आपको उससे मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होगा।यदि आप किसी रोग अथवा शारीरिक व्याधि से पीड़ित हैं, Mrityunjay Stotra तो यह मंत्र आपके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। Mrityunjay Stotra यह आयु वृद्धि में भी सहायक है; यदि आप पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ श्री मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो यह अकाल मृत्यु को टाल सकता है अथवा मृत्यु को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र का जाप पारिवारिक कलह, संपत्ति के बंटवारे और किसी महामारी के कारण लोगों की मृत्यु होने जैसी स्थितियों में सहायक होता है। यदि आप किसी आर्थिक परेशानी से गुज़र रहे हैं या व्यापार में घाटा उठा रहे हैं, तो श्री मृत्युंजय स्तोत्र का जाप आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगा।श्री मृत्युंजय स्तोत्र में रोग-निवारक शक्तियाँ निहित हैं; ऐसा माना जाता है कि Mrityunjay Stotra श्री मृत्युंजय स्तोत्र के पाठ से दिव्य तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो रोगों को दूर करती हैं और मृत्यु से जुड़े भय को समाप्त करने में सहायता करती हैं, जिससे आप जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। इसीलिए, इसे ‘मोक्ष मंत्र’ भी कहा जाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति किसी असाध्य या दीर्घकालिक रोग से पीड़ित हैं, अथवा जिनका स्वास्थ्य लगातार खराब बना रहता है, Mrityunjay Stotra उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार श्री मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री मृत्युंजय स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Mrityunjay Stotra in Hindi रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनंशिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् ।क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवंदितंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 1 ॥ पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितंभाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् ।भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 2 ॥ मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरंपंकजासनपद्मलोचनपूजितांगघ्रिसरोरुहम् ।देवसिद्धतरंगिणी करसिक्तशीतजटाधरंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 3 ॥ कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनंनारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।अंधकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 4 ॥ यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणंशैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम् ।क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 5 ॥ भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणंदक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 6 ॥ भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरंसर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम् ।भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 7 ॥ विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परंसंहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम् ।क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 8 ॥ रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 9 ॥ कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 10 ॥ नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 11 ॥ वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 12 ॥ देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 13 ॥ अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 14 ॥ आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 15 ॥ स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 16 ॥ ॥ इति श्री मृत्युंजय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Mahishasura

Sri Mahishasura Mardini Stotram : श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्….

श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Mahishasura Mardini Stotram in Hindi अयि गिरि नन्दिनी नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनी विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते ।दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रिय वासिनि हासरतेशिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभ गञ्जिनि कैटभ भञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुंड गजाधिपतेरिपुगजगण्ड विदारणचण्ड Mahishasura पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृतेचतुरविचार धुरीणमहाशिव Mahishasura दूतकृत प्रमथाधिपते ।दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरेत्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।दुमिदुमितामर धुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते ।शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटकेकनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके ।कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि Mahishasura रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥ जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत Mahishasura नूपुर शिञ्जितमोहित भूतपते ।नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनी रजनीरजनी Mahishasura रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरतेविरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपतेत्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललतेसकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित Mahishasura रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगुणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे ।जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये Mahishasura कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु षिञ्चति ते गुण रङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Hrudayam Stotram

Sri Mahalakshmi Hrudayam Stotram : श्री महालक्ष्मी हृदय स्तोत्र….

श्री महालक्ष्मी हृदय स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Mahalakshmi Hrudayam Stotram in Hindi श्रीमत सौभाग्यजननीं, स्तौमि लक्ष्मीं सनातनीं ।सर्वकामफलावाप्ति साधनैक सुखावहां ॥ 1 ॥ श्री वैकुंठ स्थिते लक्ष्मि, समागच्छ मम अग्रत: ।नारायणेन सह मां, कृपा दृष्ट्या अवलोकय ॥ 2 ॥ सत्यलोक स्थिते लक्ष्मि, त्वं समागच्छ सन्निधिम ।वासुदेवेन सहिता, प्रसीद वरदा भव ॥ 3 ॥ श्वेतद्वीपस्थिते लक्ष्मि, शीघ्रम आगच्छ सुव्रते ।विष्णुना सहिते देवि, जगन्मात: प्रसीद मे ॥ 4 ॥ क्षीराब्धि संस्थिते लक्ष्मि, समागच्छ समाधवे ।त्वत कृपादृष्टि सुधया, सततं मां विलोकय ॥ 5 ॥ रत्नगर्भ स्थिते लक्ष्मि, परिपूर्ण हिरण्यमयि ।समागच्छ समागच्छ, स्थित्वा सु पुरतो मम ॥ 6 ॥ स्थिरा भव महालक्ष्मि, निश्चला भव निर्मले ।प्रसन्ने कमले देवि, प्रसन्ना वरदा भव ॥ 7 ॥ श्रीधरे श्रीमहाभूते, त्वदंतस्य महानिधिम ।शीघ्रम उद्धृत्य पुरत, प्रदर्शय समर्पय ॥ 8 ॥ वसुंधरे श्री वसुधे, Hrudayam Stotram वसु दोग्ध्रे कृपामयि ।त्वत कुक्षि गतं सर्वस्वं, शीघ्रं मे त्वं प्रदर्शय ॥ 9 ॥ विष्णुप्रिये। रत्नगर्भे, समस्त फलदे शिवे ।त्वत गर्भ गत हेमादीन, संप्रदर्शय दर्शय ॥ 10 ॥ अत्रोपविश्य लक्ष्मि, त्वं स्थिरा भव हिरण्यमयि ।सुस्थिरा भव सुप्रीत्या, प्रसन्न वरदा भव ॥ 11 ॥ सादरे मस्तकं हस्तं, मम Hrudayam Stotram तव कृपया अर्पय ।सर्वराजगृहे लक्ष्मि, त्वत कलामयि तिष्ठतु ॥ 12 ॥ यथा वैकुंठनगर, यथैव क्षीरसागरे ।तथा मद भवने तिष्ठ, स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥ 13 ॥ आद्यादि महालक्ष्मि, विष्णुवामांक संस्थिते ।प्रत्यक्षं कुरु मे रुपं, रक्ष मां शरणागतं ॥ 14 ॥ समागच्छ महालक्ष्मि, धन्य धान्य समन्विते ।प्रसीद पुरत: स्थित्वा, प्रणतं मां विलोकय ॥ 15 ॥ दया सुदृष्टिं कुरुतां मयि श्री: ।सुवर्णदृष्टिं कुरु मे गृहे श्री: ॥ 16 ॥ ॥ इति श्री महालक्ष्मी हृदय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Ganesha Pancharatnam

Sri Maha Ganesha Pancharatnam Stotram : श्री महागणेश पंचरत्न स्तोत्र….

श्री महागणेश पंचरत्न स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Maha-Ganesha Pancharatnam Stotram in Hindi मुदाकरात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् ।कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् ।अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् ।नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥ नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् ।नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरम् ।महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरंतरम् ॥ 2 ॥ समस्त लोक शंकरं निरस्त दैत्य कुंजरम् ।दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् ।मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ 3 ॥ अकिंचनार्ति मार्जनं चिरंतनोक्ति भाजनम् ।पुरारि पूर्व नंदनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।प्रपंच नाश भीषणं धनंजयादि भूषणम् ।कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम् ॥ 4 ॥ नितांत कांति दंत कांति Ganesha Pancharatnam मंत कांति कात्मजम् ।अचिंत्य रूपमंत हीन मंतराय कृंतनम् ।हृदंतरे निरंतरं वसंतमेव योगिनाम् ।तमेकदंतमेव तं विचिंतयामि संततम् ॥ 5 ॥ महागणेश पंचरत्नमादरेण योऽन्वहम् ।प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ ॥ इति श्री महागणेश पंचरत्न स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Mayureshwar Stotra

Shri Mayureshwar Stotra : श्री मयूरेश्वर स्तोत्र…..

Shri Mayureshwar Stotraश्री मयूरेश्वर स्तोत्र: श्री मयूरेश्वर स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित है। इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान ब्रह्मा ने की है। यह भगवान गणेश की स्तुति है। ‘मयूरेश’ भगवान गणेश का ही एक नाम है। श्री मयूरेश्वर स्तोत्र का पाठ करने से साधक को ‘भुक्ति’ (सांसारिक सुख) और ‘मुक्ति’ (मोक्ष) दोनों की प्राप्ति होती है। यह सभी प्रकार की विपत्तियों और कठिनाइयों का नाश करता है। यह साधक की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। यह मानसिक और शारीरिक, दोनों प्रकार के रोगों और व्याधियों को दूर करता है। श्री मयूरेश्वर स्तोत्र अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली है। Mayureshwar Stotra भगवान गणपति ही एकमात्र ऐसे समर्थ देवता हैं जो सभी विघ्नों का नाश करते हैं और समस्त कार्यों को सिद्ध करते हैं। यदि किसी भी पूजा-पाठ या अनुष्ठान में उन्हें साक्षी (गवाह) बनाया जाए, तो वह पूजा या अनुष्ठान निश्चित रूप से सफल होता है। यद्यपि भगवान गणपति के अनेक स्तोत्र प्रचलित हैं, तथापि ‘श्री मयूरेश्वर स्तोत्र’ का महत्व सर्वोपरि माना जाता है। यह स्तोत्र अपने आप में पूर्ण और स्वयंसिद्ध है, अतः इसका पाठ करने से पूर्ण सफलता की प्राप्ति होती है। गृह-क्लेश निवारण, बच्चों के रोगों से मुक्ति, सुख-शांति, उन्नति और शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने हेतु इसका पाठ अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इस स्तोत्र का पाठ कोई भी पुरुष अथवा स्त्री कर सकता है। यदि आप प्रतिदिन अपने जीवन में इस स्तोत्र का पाठ करते हैं और भगवान गणपति की आराधना करते हैं, तो वे आपके जीवन में किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं आने देंगे। Mayureshwar Stotra सभी प्रकार के रोगों और चिंताओं से मुक्ति पाने के लिए, सुखी पारिवारिक जीवन के लिए, बच्चों के रोगों के निवारण के लिए, पूर्ण शांति के लिए तथा प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता और उन्नति प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। संसार के समस्त साधक इस बात को स्वीकार करते हैं कि किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न करने हेतु, सर्वप्रथम भगवान गणपति का ध्यान अथवा उनकी पूजा करना अनिवार्य है। Mayureshwar Stotra केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु स्वयं देवताओं ने भी सर्वप्रथम भगवान गणपति की पूजा को ही स्वीकार किया है। स्वयं भगवान शिव ने भी यह कहा है कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए ‘गणपति साधना’ ही सर्वप्रथम आवश्यक है। इस स्तोत्र का पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह किसी भी लिंग या आयु का हो। Mayureshwar Stotra भगवान शिव के पुत्र, गणेश जी को ‘शीघ्र फलदायी’ देवता माना जाता है। Mayureshwar Stotra इस स्तोत्र का पाठ किसी भी ‘चतुर्थी’ तिथि पर करना लाभकारी होता है, परंतु ‘अंगारक चतुर्थी’ के दिन इसका पाठ करने से प्राप्त होने वाला पुण्य-फल कई गुना बढ़ जाता है। राजा इंद्र, मयूरेश के गणेश की मधुरता से प्रसन्न हुए; उन्होंने सभी बाधाओं को पार कर लिया था। श्री मयूरेश्वर स्तोत्र के लाभ: श्री मयूरेश्वर स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है, यह आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है, और आपको स्वस्थ, धनवान तथा समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति कोई नया कार्य (प्रोजेक्ट) शुरू करना चाहता है Mayureshwar Stotra और उसमें सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसे श्री मयूरेश्वर स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री मयूरेश्वर स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Mayureshwar Stotra in Hindi ।। श्रीगणेशाय नम: ।। ब्रहोवाच – पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 1 ।। परातत्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् ।गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 2 ।। सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया ।सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 3 ।। नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् ।नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 4 ।। इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 5 ।। सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् ।सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 6 ।। पार्वतीनदनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 7 ।। मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् ।समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 8 ।। सर्वाज्ञाननिहान्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 9 ।। अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् ।अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 10 ।। इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम् ।सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ।। 11 ।। कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् ।आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ।। 12 ।। ।। इति श्री मयूरेश्वर स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Matangi Stotram

Shri Matangi Stotram : श्री मातंगी स्तोत्रम्….

श्री मातंगी स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Shri Matangi Stotram in Hindi ॥ ईश्वर उवाच ॥ आराध्य मातश्चरणाम्बुजे तेब्रह्मादयो विस्तृतकीर्तिमापुः ।अन्ये परं वा विभवं मुनीन्द्राः परां श्रियं भक्तिभरेण चान्ये ॥ १ ॥ नमामि देवीं नवचन्द्रमौले-र्मातङ्गिनीं चन्द्रकलावतंसाम् ।आम्नायप्राप्तिप्रतिपादितार्थं प्रबोधयन्तीं प्रियमादरेण ॥ २ ॥ विनम्रदेवासुरमौलिरत्नै-र्नीराजितं ते चरणारविन्दम् ।भजन्ति ये देवि महीपतीनां व्रजन्ति ते सम्पदमादरेण ॥ ३ ॥ कृतार्थयन्तीं पदवीं पदाभ्या-मास्फालयन्तीं कृतवल्लकीं ताम् ।मातङ्गिनीं सद्धृदयां धिनोमि लीलांशुकां शुद्धनितम्बबिम्बाम् ॥ ४ ॥ तालीदलेनार्पितकर्णभूषां माध्वीमदोद्घूर्णितनेत्रपद्माम् ।घनस्तनीं शम्भुवधूं नमामि तटिल्लताकान्तिमनर्घ्यभूषाम् ॥ ५ ॥ चिरेण लक्ष्यं नवलोमराज्या स्मरामि भक्त्या जगतामधीशे ।वलित्रयाढ्यं तम मध्यमम्ब नीलोत्पलांशुश्रियमावहन्त्याः ॥ ६ ॥ कान्त्या कटाक्षैः कमलाकराणां कदम्बमालाञ्चितकेशपाशम् ।मातङ्गकन्यां हृदि भावयामि ध्यायेयमारक्तकपोलबिम्बम् ॥ ७ ॥ बिम्बाधरन्यस्तललामवश्य-मालीललीलालकमायताक्षम् ।मन्दस्मितं ते वदनं महेशि स्तुत्यानया शङ्करधर्मपत्नीम् ॥ ८ ॥ मातङ्गिनीं वागधिदेवतां तां Matangi Stotram स्तुवन्ति ये भक्तियुता मनुष्याः ।परां श्रियं नित्यमुपाश्रयन्ति परत्र कैलासतले वसन्ति ॥ ९ ॥ उद्यद्भानुमरीचिवीचिविलसद्वासो वसानां परांगौरीं सङ्गतिपानकर्परकरामानन्दकन्दोद्भवाम् ।गुञ्जाहारचलद्विहारहृदयामापीनतुङ्गस्तनींमत्तस्मेरमुखीं नमामि सुमुखीं शावासनासेदुषीम् ॥ १० ॥ ॥ इति श्री मातंगी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Mangla Charan

Shri Mangla Charan Stotra : श्री मंगलचरण स्तोत्र…..

Mangla Charan Stotra श्री मंगलचरण स्तोत्र: मंगल ग्रह लगभग एक वर्ष और दो सौ बीस दिनों तक राशिचक्र में भ्रमण करता है। यह ग्रह प्रत्येक राशि में लगभग आठ सप्ताह तक रहता है। अग्नि इसका प्रतिनिधि तत्व है। मंगल उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो सेना, खेल, युद्ध, शल्य चिकित्सा (सर्जरी) और इसी तरह के कार्यों में संलग्न हैं। यह सुरक्षा के लिए एक मंत्र है। जब हम इन शक्तिशाली, पवित्र शब्दों का जाप करते हैं, तो हम परम सत्य को पहचानते हैं – कि युगों-युगों का ज्ञान हमारा मार्गदर्शन करता है, वह सदैव उपस्थित है, और इसलिए हर चीज़ का ध्यान रखा जाता है। Mangla Charan और इस पहचान के माध्यम से, चाहे सचेत रूप से हो या अवचेतन रूप से, हम ‘केवल होने’ (being) की स्वाभाविक शक्ति में विश्राम पाते हैं; हमारा आभा-मंडल (aura) विस्तृत होता है, जो हमारी रक्षा और सुरक्षा करता है। श्री मंगलचरण स्तोत्र के पाठ का उद्देश्य मन को शांत करना है – यह मन की बकबक को पूरी तरह रोककर नहीं, बल्कि हमें अपने रोज़मर्रा के विचारों को एक दर्शक की तरह देखने का अवसर देकर किया जाता है; इसके विपरीत, हम सामान्यतः हर विचार में पूरी तरह उलझ जाते हैं। अपने विचारों से कुछ दूरी बनाकर, हम निष्पक्षता और संतुलन की एक नई भावना प्राप्त करते हैं। Mangla Charan समय के साथ, हमारी रचनात्मकता बढ़ती है: जैसे ही हमारा मन हर समय एक ही विषयों पर केंद्रित रहना छोड़ देता है, हमारे विचारों में एक खुलापन आता है – कुछ नया जन्म लेने के लिए एक खाली जगह बन जाती है। यह पाठ उस द्वार को खोलता है जो हमें हमारी अंतर्ज्ञान शक्ति, आंतरिक मार्गदर्शन और रचनात्मक ‘स्व’ (creative self) से जोड़ता है। श्री मंगलचरण स्तोत्र के लाभ: यदि आपका मन विचलित है, तो इस पाठ के दौरान होने वाली शारीरिक हलचल और स्तोत्र के शब्दों पर ध्यान केंद्रित करने से आपका मन अन्य सभी बातों को भूलने के लिए विवश हो जाएगा। ऐसा इसलिए है Mangla Charan क्योंकि आप एक ही समय में स्तोत्र गाने और शारीरिक हलचल पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ अपनी किसी चिंता या परेशानी के बारे में सोचने के लिए मानसिक स्थान नहीं बना पाएंगे। जैसे ही आपका मन भटकता है, आप तुरंत ही स्तोत्र या शारीरिक हलचल का क्रम भूल जाएंगे; इस प्रकार, आप स्वयं को पुनः ध्यान की अवस्था में वापस ला सकेंगे। पारंपरिक ध्यान (meditation) के दौरान, यदि आप अपने विचारों में उलझ जाते हैं, तो आपको इसका भान होने में कुछ समय लग सकता है; परंतु इस विधि में, Mangla Charan जैसे ही मन भटकेगा, आपको तुरंत ही इसका आभास हो जाएगा। Mangla Charan अपनी सुबह की शुरुआत करने के लिए यह एक बेहतरीन तरीका है, क्योंकि इसकी कोमल शारीरिक हलचलें आपके पूरे शरीर को जगा देती हैं और आपको दिन की शुरुआत करने के लिए पूरी तरह तैयार कर देती हैं। श्री मंगला चरण स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिस व्यक्ति को मानसिक तनाव और पीड़ा हो, उसे नियमित रूप से इस श्री मंगला चरण स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री मंगलचरण स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Mangla Charan Stotra in Hindi ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥श्री चैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले ।स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम् ॥ वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुतपद-कमलं श्रीगुरुन्‌ वैष्णवांश्चश्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम् ।साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण-चैतन्य-देवम्‌श्रीराधा-कृष्ण-पादान्‌सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्विताश्च ॥ हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥ तप्तकाञ्चनगौराङ्गी राधेवृन्दावनेश्वरी ।वृषभानुसुते देवी प्रणमामी हरिप्रिये ॥ वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च ।पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः ॥ श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द ।श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौरभक्तवृन्द ॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥ नम ॐ विष्णु पादाय कृष्ण प्रेष्ठाय भूतले ।श्रीमते भक्तिवेदान्त स्वामिन् इति नामिने ।।नमस्ते सारस्वते देवे गौर वाणी प्रचारिणे ।निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देश तारिणे। । ।। इति श्री मंगलचरण स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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