Varnana Stotram

Srikrishna Keshadipadam Varnana Stotram : श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम्…

श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srikrishna Keshadipadam Varnana Stotram in Hindi अग्रे पश्यामि तेजो निबिडतरकलायावलीलोभनीयं,पीयूषाप्लावितोऽहं तदनु तदुदरे दिव्यकैशोरवेषम् ।तारुण्यारम्भरम्यं परमसुखरसास्वादरोमाञ्चिताङ्गै,रावीतं नारदाद्यैर्विलसदुपनिषद्सुन्दरीमण्डलैश्च ॥` १ ॥ नीलाभं कुञ्चिताग्रं घनममलतरं संयतं चारुभङ्ग्या,रत्नोत्तंसाभिरामं वलयितमुदयच्चन्द्रकैः पिञ्छजालैः ।मन्दारस्रङ्निवीतं तव पृथुकबरीभारमालोकयेऽहं,स्निग्द्धश्वेतोर्ध्वपुण्ड्रामपि च सुललितां फालबालेन्दुवीथीम् ॥ २ ॥ हृद्यं पूर्णानुकंपार्णवमृदुलहरी चञ्चलभ्रूविलासैः,आनीलस्निग्द्धपक्ष्मावलि परिलसितं नेत्रयुग्मं विभो ते ।सान्द्रच्छायं विशालारुणकमलदलाकारमामुग्धतारं,कारुण्यालोकलीला शिशिरितभुवनं क्षिप्यतां मय्यनाथे ॥ ३ ॥ उत्तुङ्गोल्लासिनासं Varnana Stotram हरिमणिमुकुरप्रोल्लसद्गण्डपाली,व्यालोलत् कर्णपाशाञ्चितमकरमणी कुण्डलद्वन्द्वदीप्रम् ।उन्मीलद्दन्तपङ्क्तिः स्फुरदरुणतरच्छाय बिम्बाधरान्तः,प्रीतिप्रस्यन्दिमन्दस्मितमधुरतरं वक्त्रमुद्भासतां मे ॥ ४ ॥ बाहुद्वन्द्वेन रत्नाङ्गुलिवलयभृता शोणपाणिप्रवाले,नोपात्तां वेणुनालीं प्रसृतनखमयूखाङ्गुलीसङ्गशाराम् ।कृत्वा वक्त्रारविन्दे Varnana Stotram सुमधुरविकसद्रागमुद्भाव्यमानैः,शब्दब्रह्मामृतैस्त्वं शिशिरितभुवनैः सिञ्च मे कर्णवीथीम् ॥ ५ ॥ उत्सर्पत्कौस्तुभश्रीततिभिररुणितं कोमलं कण्ठदेशं,वक्षः श्रीवत्सरम्यं तरलतरसमुद्दीप्तहारप्रतानम् ।नानावर्णप्रसूनावलिकिसलयिनीं वन्यमालां विलोल,ल्लोलम्बां लम्बमानामुरसि तव तथा भावये रत्नमालाम् ॥ ६ ॥ अंगे पंचांगरागैरतिशयविकसत्सौरभाकृष्टलोकं,लीनानेकत्रिलोकीविततिमपि कृशां बिभ्रतं मध्यवल्लीम् ।शक्राश्मन्यस्त तप्तोज्ज्वलकनकनिभं पीतचेलं दधानं,ध्यायामो दीप्तरश्मि स्फुटमणिरशनाकिङ्किणी मण्डितं त्वाम् ॥ ७ ॥ ऊरू चारू तवोरू घनमसृणरुचौ चित्तचोरौ रमायाः,विश्वक्षोभं विशङ्क्य Varnana Stotram ध्रुवमनिशमुभौ पीतचेलावृताङ्गौ ।आनम्राणां पुरस्तान्न्यसनधृतस्मस्तार्थपालीसमुद्ग,च्छायं जानुद्वयं च क्रमपृथुलमनोज्ञे च जङ्घे निषेवे ॥ ८ ॥ मञ्जीरं मञ्जुनादैरिव पदभजनं श्रेय इत्यालपन्तं,पादाग्रं भ्रान्तिमज्जत् प्रणतजनमनोमन्दरोद्धारकूर्मम् ।उत्तुङ्गाताम्रराजन्नखरहिमकरज्योत्स्नया चाश्रितानाम्,संताप ध्वान्तहन्त्रीं ततिमनुकलये मङ्गलामङ्गुलीनाम् ॥ ९ ॥ योगीन्द्राणां त्वदङ्गेष्वधिकसुमधुरं मुक्तिभाजां निवासो,भाक्तानां कामवर्षद्युतरुकिसलयं नाथ ते पादमूलम् ।नित्यं चित्तस्थितं मे पवनपुरपते कृष्ण कारुण्यसिन्धो,हृत्वा निश्शेषतापान् प्रदिशतु परमानन्दसन्दोहलक्ष्मीम्………..

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Durga Stotram

Srikrishna Krit Durga Stotram: श्रीकृष्ण कृतं दुर्गा स्तोत्रम्….

श्रीकृष्ण कृतं दुर्गा स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srikrishna Krit Durga Stotram in Hindi त्वमेवसर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका ॥ कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम् ।परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी ॥ तेज:स्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा ।सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा ॥ सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया ।सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला ॥ सर्वबुद्धिस्वरूपा च Durga Stotram सर्वशक्ति स्वरूपिणी ।सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी ॥ त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयम् ।दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्ति स्वरूपिणी ॥ निद्रा त्वं च दया त्वं च Durga Stotram तृष्णा त्वं चात्मन: प्रिया ।क्षुत्क्षान्ति: शान्तिरीशा च कान्ति: सृष्टिश्च शाश्वती ॥ श्रद्धा पुष्टिश्च तन्द्रा च लज्जा शोभा दया तथा ।सतां सम्पत्स्वरूपा श्रीर्विपत्तिरसतामिह ॥ प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहाङ्कुरा ।शश्वत्कर्ममयी शक्ति : सर्वदा सर्वजीविनाम् ॥ देवेभ्य: स्वपदो दात्री Durga Stotram धातुर्धात्री कृपामयी ।हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी ॥ योगनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम् ।सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदाता सिद्धियोगिनी ॥ माहेश्वरी च ब्रह्माणी विष्णुमाया च वैष्णवी ।भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयंकरी ॥ ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे ।सतां कीर्ति: प्रतिष्ठा च निन्दा त्वमसतां सदा ॥ महायुद्धे महामारी Durga Stotram दुष्टसंहाररूपिणी ।रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी ॥ वन्द्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा ।ब्राह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनाम् ॥ विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सताम् ।मेधास्मृतिस्वरूपा च प्रतिभा प्रतिभावताम् ॥ राज्ञां प्रतापरूपा च विशां वाणिज्यरूपिणी ।सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा त्वं रक्षारूपा च पालने ॥ तथान्ते त्वं महामारी विश्वस्य विश्वपूजिते ।कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी ॥ दुरत्यया मे माया त्वं यया सम्मोहितं जगत् ।यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्ग न पश्यति ॥ इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनम् ।पूजाकाले पठेद् यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्छिता ॥ वन्ध्या च काकवन्ध्या च मृतवत्सा च दुर्भगा ।श्रुत्वा स्तोत्रं वर्षमेकं सुपुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ कारागारे महाघोरे यो बद्धो दृढबन्धने ।श्रुत्वा स्तोत्रं मासमेकं बन्धनान्मुच्यते ध्रुवम् ॥ यक्ष्मग्रस्तो गलत्कुष्ठी महाशूली महाज्वरी ।श्रुत्वा स्तोत्रं वर्षमेकं सद्यो रोगात् प्रमुच्यते ॥ पुत्रभेदे प्रजाभेदे पत्‍‌नीभेदे च दुर्गत: ।श्रुत्वा स्तोत्रं मासमेकं लभते नात्र संशय: ॥

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Bhairav Stotra

Swarnakarshan Bhairav Stotra : स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र…

Swarnakarshan Bhairav Stotra in Hindi : स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र: शास्त्रों में श्री भैरव के कई रूपों और साधनाओं का वर्णन मिलता है। उन्हीं में से एक है स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र, जो साधक को गरीबी से मुक्ति दिलाता है। जैसा इनका नाम है, वैसा ही इनके स्तोत्र का प्रभाव भी है। ‘स्वर्णाकर्षण भैरव’ नाम इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि ये अपने भक्तों की गरीबी दूर करते हैं और उन्हें धन-संपन्न बनाते हैं। स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से स्वर्ण (सोना) प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह स्तोत्र रसकर्म (पारा बंधन) की मूल साधनाओं में से एक है। इसके माध्यम से साधक को सोना बनाने की प्रक्रिया और पारे को बांधने (स्थिर करने) की विद्या का ज्ञान प्राप्त होता है। इनकी साधना विशेष रूप से रात्रि के समय की जाती है। इनकी साधना सभी कार्यों, शांति-पुष्टि आदि में बहुत सफल मानी जाती है। शास्त्रों में इनके मंत्रों, स्तुतियों, कवच, सहस्रनाम और यंत्रों आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है। Bhairav Stotra यहाँ केवल धन-प्राप्ति से संबंधित विधि बताई जा रही है, ताकि आम लोगों को इसका लाभ मिल सके। स्वर्णाकर्षण भैरव महर्षि मार्कंडेय जी के आराध्य देव हैं। स्वर्णाकर्षण भैरव लाल रंग के वस्त्र धारण करते हैं। उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और उनकी चार भुजाएँ हैं। Bhairav Stotra श्री स्वर्णाकर्षण भैरव की पूजा से धन और विभिन्न सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। Bhairav Stotra यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में धन की कमी हो या धन से संबंधित कोई समस्या या शत्रु बाधा हो, तो स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का पाठ और 41 दिनों की साधना करने से धन संबंधी समस्या दूर हो जाती है। भगवान शिव ने ‘रुद्र यामल तंत्र’ में इस साधना का वर्णन किया है। Bhairav Stotra हमारी हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वर्णाकर्षण भैरव का निवास स्थान पाताल लोक माना गया है और उनकी पूजा का समय मध्यरात्रि 12 बजे से 3 बजे के बीच होता है। इनके उपासकों का कहना है कि उनकी उपस्थिति का अनुभव गंध (खुशबू) से होता है। Bhairav Stotra इसी कारण कुत्ते को उनकी सवारी के रूप में बताया गया है, क्योंकि कुत्ते में गंध पहचानने की तीव्र क्षमता होती है। स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र के लाभ: स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का नियमित पाठ करने से सभी दुख दूर हो सकते हैं और आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।इसकी साधना से आठ प्रकार की दरिद्रता (अष्ट-दरिद्रता) का अंत हो सकता है।जो साधक इसका अभ्यास करता है, उसे जीवन में कोई आर्थिक नुकसान नहीं होता और उसे केवल आर्थिक लाभ ही प्राप्त होते हैं। किसे करना चाहिए इस स्तोत्र का पाठ: जो लोग घोर गरीबी या आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं, उन्हें इस स्थिति से उबरने के लिए स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र हिंदी पाठ : Swarnakarshan Bhairav Stotra in Hindi मूल-मन्त्रः- “ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूंसः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धायलोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण-भैरवाय ममदारिद्र्य-विद्वेषणायश्रींमहा-भैरवायनमः ।” ।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।। भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम ।पूर्वमुक्तस्त्वयामन्त्रं, भैरवस्यमहात्मनः ।। इदानींश्रोतुमिच्छामि, तस्यस्तोत्रमनुत्तमं ।तत्केनोक्तंपुरास्तोत्रं, पठनात्तस्यकिंफलम् ।।तत्सर्वंश्रोतुमिच्छामि, ब्रूहिमेनन्दिकेश्वर ।। ।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।। इदंब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक ।स्तोत्रंवटुक-नाथस्य, दुर्लभंभुवन-त्रये ।। सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।दारिद्र्य-शमनंपुंसामापदा-भय-हारकम् ।। अष्टैश्वर्य-प्रदंनृणां, पराजय-विनाशनम् ।महा-कान्ति-प्रदंचैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।। महा-कीर्ति-प्रदंस्तोत्रं, भैरवस्यमहात्मनः ।नवक्तव्यंनिराचारे, हिपुत्रायचसर्वथा ।। शुचयेगुरु-भक्ताय, शुचयेऽपितपस्विने ।महा-भैरव-भक्ताय, सेवितेनिर्धनायच ।। निज-भक्तायवक्तव्यमन्यथाशापमाप्नुयात् ।स्तोत्रमेतत्भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।श्रृणुष्वब्रूहितोब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।। विनियोगः- सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे । ॐअस्यश्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्यब्रह्माऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रींबीजं, क्लींशक्ति, सःकीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थेपाठेविनियोगः । ध्यानः- मन्दार-द्रुम-मूल-भाजिविजितेरत्नासनेसंस्थिते ।दिव्यंचारुण-चञ्चुकाधर-रुचादेव्याकृतालिंगनः ।।…..

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Silver

Seeing Silver In a Dream : सपने में चांदी देखने का असली मतलब, लाभ और रहस्यमयी ज्योतिषीय महत्व….

Sapne Me Silver Dekhna : हर इंसान रात को सोते समय एक अलग ही रहस्यमयी दुनिया में सफर करता है, जिसे हम सपनों की दुनिया (World of dreams) कहते हैं। स्वप्न शास्त्र (Swapna Shastra) और प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अनुसार, हमारे द्वारा देखे गए हर एक सपने का हमारे वास्तविक जीवन, वर्तमान परिस्थितियों और आने वाले भविष्य से बहुत ही गहरा और सीधा संबंध होता है। कुछ सपने हमें सुखद एहसास कराते हैं, तो कुछ हमारे मन में एक अनजाना सा भय पैदा कर देते हैं। अक्सर लोग यह जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहते हैं कि अगर उन्हें सोते समय silver in a dream दिखाई दे, तो इसका उनके असल जीवन में क्या विशेष अर्थ होता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों और स्वप्न विज्ञान में इस अद्भुत धातु को बहुत ही शुभ, अत्यंत पवित्र और इंसान के लिए अत्यधिक लाभकारी माना गया है। Sapne Me Chandi Dekhna : चांदी देखने का सामान्य और सबसे शुभ अर्थ…. सोना और चांदी हमेशा से ही मानव समाज में अत्यधिक मूल्यवान और आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इनका उपयोग न केवल सुंदर आभूषणों के निर्माण और सजावट के लिए किया जाता है, बल्कि ये आपातकालीन स्थिति में एक सुरक्षित निवेश के रूप में भी बहुत सहायक साबित होते हैं। जब कोई इंसान silver in a dream देखता है, तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार इसे एक बेहद शुभ और सकारात्मक संकेत माना जाता है। यह सपना मुख्य रूप से व्यक्ति के जीवन में आने वाले अपार धन, समृद्धि, हृदय की शुद्धता और शानदार सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक होता है। इसका सीधा सा मतलब है कि आपको बहुत ही जल्द कोई अत्यंत शुभ सूचना मिल सकती है। साथ ही, भविष्य में अचानक धनलाभ (आकस्मिक धनलाभ) होने के प्रबल योग बन रहे हैं, जिससे आपकी जीवनशैली पूरी तरह से बदल सकती है। विभिन्न रूपों में चांदी देखने के सटीक और अचूक मतलब : The precise and unerring meanings of seeing silver in various forms.…. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपनों का सही अर्थ इस बात पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है कि आपने उस विशेष धातु को किस रूप, आकार या अवस्था में देखा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि अलग-अलग स्थितियों में silver in a dream देखने के क्या-क्या परिणाम हो सकते हैं: चांदी के सिक्के देखना: यदि आप गहरी नींद में चमकते हुए चांदी के सिक्के (Silver coins) देखते हैं, तो यह सीधे तौर पर आपके लिए एक बड़े धन लाभ का इशारा है। इस तरह के silver in a dream का अर्थ है कि आपको बहुत ही जल्द कोई बेहतरीन और नया अवसर प्राप्त होगा जो आपकी रुकी हुई आर्थिक स्थिति को बहुत तेजी से मजबूत करेगा। चांदी के सुंदर आभूषण देखना: यदि आप सपने में चांदी के आकर्षक गहने या आभूषण देखते हैं, तो यह आपके जीवन में शांति और एक नए स्थायित्व (Stability) को लाने का मंगलकारी संकेत है। आभूषणों के रूप में silver in a dream देखना यह भी स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आपकी पारिवारिक स्थिति भविष्य में बहुत मजबूत होगी और आपके सभी पारिवारिक रिश्तों में एक नई व गहरी मधुरता आएगी। चांदी के बर्तन देखना: अगर आप सपने में चांदी से बना हुआ कोई बर्तन देखते हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि समाज में आपके मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में भारी वृद्धि होने वाली है। यह आने वाली खुशियों और घर में शुभता का सबसे बड़ा प्रतीक है। टूटी हुई या खराब चांदी देखना: हर सपने का मतलब सिर्फ अच्छा ही नहीं होता; कुछ सपने हमें सतर्क भी करते हैं। अगर आप खराब या टूटी हुई स्थिति में silver in a dream देखते हैं, तो यह आपके लिए गहरी चिंता का विषय हो सकता है। यह सपना आपको यह स्पष्ट चेतावनी देता है कि आपको भविष्य की अपनी सभी योजनाओं और कार्यों में बहुत ही सावधानी बरतने की सख्त आवश्यकता है। चांदी खरीदना या बेचना: सपने में नई चांदी खरीदना आर्थिक स्थायित्व और भारी सुख-समृद्धि का प्रत्यक्ष प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर, अगर आप खुद को चांदी बेचते हुए देखते हैं, तो ऐसे silver in a dream का अर्थ है कि आपको अपने बेवजह के खर्चों पर तुरंत रोक लगानी चाहिए और अपने बजट को संभालना चाहिए। अविवाहित लोगों और आर्थिक स्थिति पर इस सपने का जादुई असर : The magical effect of this dream on unmarried people and financial status. यदि आप अभी तक अविवाहित (कुंवारे) हैं और आप silver in a dream देखते हैं, तो आपके लिए यह अब तक की सबसे बड़ी खुशखबरी साबित हो सकती है। स्वप्न शास्त्र साफ तौर पर यह कहता है कि अविवाहित लोगों को ऐसा सपना आने पर जल्द ही एक बहुत अच्छा विवाह का प्रस्ताव (Marriage proposal) आ सकता है या उनके विवाह की बात पक्की हो सकती है। आर्थिक रूप से जीवन में संघर्ष कर रहे लोगों के लिए भी यह एक नई आशा की किरण है। यदि आप पैसों की भारी तंगी से जूझ रहे हैं, तो ऐसा सपना आना इस बात की पूरी गारंटी देता है कि आपकी आर्थिक परिस्थितियां अब बहुत जल्द सुधरने वाली हैं। अगर आप आत्मविकास और प्रगति की ओर अग्रसर हैं, तो यह सपना आपके लिए बहुत ही शुभ फलदायी साबित होगा। सपनों का ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व : The Astrological and Spiritual Significance of Dreams स्वप्न विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र में चांदी धातु का सीधा संबंध नवग्रहों में ‘चंद्रमा’ (Moon) और स्त्रीत्व से माना गया है। जब आप silver in a dream देखते हैं, तो यह आपकी गहरी मानसिक शांति, आत्म-संतुलन और सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा के स्तर को दर्शाता है। यदि सपने में दिखने वाली चांदी बिल्कुल चमकदार और पूरी तरह से स्वच्छ है, तो यह आपके लिए एक अत्यंत सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसके विपरीत यदि वह धातु मैली या धुंधली दिखाई दे, तो यह आपके मन में चल रही भारी भावनात्मक और मानसिक परेशानियों को उजागर करता है। ज्योतिष के अनुसार, ऐसे सपने आपको यह याद दिलाते हैं कि आपको अपनी छिपी हुई भावनाओं को संतुलित करने और अपने मानसिक स्वास्थ्य (Mental health) पर ज्यादा ध्यान देने की बहुत जरूरत है। सुबह के समय (ब्रह्म मुहूर्त) देखे गए ऐसे सपने अक्सर सत्य साबित होते हैं।

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Rath Yatra

Jagannath Rath Yatra 2026 Date And Time : जगन्नाथ रथ यात्रा तिथि, 15 दिन बीमार पड़ने का रहस्य और रथों की भव्यता की पूरी जानकारी….

Jagannath Rath Yatra 2026 Mein Kab Hai: सनातन धर्म में कई महान और अलौकिक उत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन जब बात उड़ीसा के पुरी धाम की आती है, तो वहां आस्था का एक अलग ही जनसैलाब देखने को मिलता है। पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में हर साल आयोजित होने वाला यह भव्य समारोह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और समानता का एक असीम सागर माना गया है। साल 2026 में, बहुप्रतीक्षित Jagannath Rath Yatra का पावन अवसर 16 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस महायात्रा में शामिल होने और अपने आराध्य देव के दर्शन पाने के लिए हर साल पुरी की ओर खिंचे चले आते हैं। धार्मिक ग्रंथों में यह माना गया है कि इस Jagannath Rath Yatra में हिस्सा लेने और पूरे श्रद्धा भाव से भगवान के रथ की पवित्र रस्सी को खींचने मात्र से इंसान के सभी ज्ञात और अज्ञात पाप जड़ से कट जाते हैं और उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। Jagannath Rath Yatra 2026 Date And Time : जगन्नाथ रथ यात्रा तिथि….. Jagannath Rath Yatra 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग की एकदम सटीक गणना के अनुसार, इस वर्ष यह पवित्र पर्व आषाढ़ मास (जून-जुलाई) के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को अत्यंत ही भव्यता के साथ मनाया जाएगा। द्वितीया तिथि का विधिवत आरंभ 15 जुलाई 2026 को सुबह 11:50 बजे होगा और इस पावन तिथि का पूर्ण समापन अगले दिन 16 जुलाई 2026 को सुबह 08:52 बजे होगा। हमारे हिंदू धर्म में उदया तिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) की मान्यताओं का पूरी तरह से पालन किया जाता है, इसलिए मुख्य Jagannath Rath Yatra 16 जुलाई 2026, दिन गुरुवार को ही निकाली जाएगी। यह अलौकिक यात्रा 16 जुलाई से आरंभ होकर 24 जुलाई तक विभिन्न जाग्रत अनुष्ठानों के साथ पूरे विधि-विधान से संपन्न की जाएगी। भगवान जगन्नाथ का 15 दिनों तक बीमार पड़ना (रहस्यमयी परंपरा) : Lord Jagannath Falling Ill for 15 Days (A Mysterious Tradition) इस महायात्रा के शुरू होने से पहले मंदिर में एक बहुत ही रोचक और गहरी पारंपरिक विधि निभाई जाती है। मुख्य Jagannath Rath Yatra शुरू होने से ठीक पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर ‘स्नान पूर्णिमा’ या ‘स्नान यात्रा’ का बहुत बड़ा आयोजन किया जाता है। इस खास दिन पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन देवी सुभद्रा को 108 पवित्र कलशों के शुद्ध जल से विशेष महाअभिषेक कराया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इतने भारी जल से स्नान करने के कारण भगवान को बहुत तेज बुखार आ जाता है और वे बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद अगले 15 दिनों तक भगवान अस्वस्थ अवस्था में रहते हैं, जिसे मंदिर की भाषा में ‘अनसर’ या ‘अनवसर काल’ कहकर पुकारा जाता है। इस एकांतवास के दौरान श्री मंदिर के कपाट आम भक्तों के दर्शन के लिए पूरी तरह से बंद कर दिए जाते हैं और भगवान को केवल विशेष औषधीय (हर्बल) भोग ही अर्पित किया जाता है। जब 15 दिनों के विशेष उपचार के बाद भगवान पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते हैं, तब वे अपने भक्तों को दर्शन देते हैं और ठीक उसके बाद ही इस विशाल Jagannath Rath Yatra का शंखनाद होता है। रथों की भव्यता और उनकी अद्भुत संरचना : The grandeur of the chariots and their remarkable structure. इस अद्भुत Jagannath Rath Yatra का सबसे मुख्य आकर्षण वे तीन विशालकाय और रंग-बिरंगे रथ होते हैं, जिन्हें हर साल विशेष रूप से नई लकड़ियों से और बिना किसी कील के पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है। नंदीघोष (Nandighosa): यह साक्षात भगवान जगन्नाथ का अत्यंत विशाल रथ है। इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है और इसमें 16 बहुत ही बड़े पहिए लगे होते हैं। इस रथ को बेहद आकर्षक लाल और पीले रंग के सुंदर और पवित्र कपड़ों से सजाया जाता है। तालध्वज (Taladhwaja): यह भगवान बलभद्र (बलराम) जी का मजबूत रथ है, जो इस महायात्रा में सबसे आगे चलता है। लगभग 44 फीट ऊंचे इस भव्य रथ में 14 पहिए होते हैं और इसकी ध्वजा पर ताड़ के पेड़ (palm tree) का एक खास चिन्ह बना होता है। दर्पदलन (Dwarpadalana): यह माता सुभद्रा का पवित्र रथ है, जिसकी कुल ऊंचाई 43 फीट होती है। इसमें 12 पहिए लगे होते हैं और इसे लाल और काले रंग के चमकीले कपड़ों से सुशोभित किया जाता है। गुंडिचा माता मंदिर (मौसी का घर) की नौ दिवसीय यात्रा : The nine-day visit to the Gundicha Mata Temple (Aunt’s House) मुख्य रूप से Jagannath Rath Yatra भगवान जगन्नाथ की अपने घर (श्री मंदिर) से अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाने की एक बहुत ही भावनात्मक और सुंदर वार्षिक यात्रा है। यात्रा वाले शुभ दिन, उड़ीसा के शाही परिवार के उत्तराधिकारी द्वारा ‘छहेरा पहरा’ (Chera Pahara) नाम की विशेष शाही रस्म निभाई जाती है, जिसमें वे खुद अपने हाथों से भगवान के मार्ग और रथों को सोने की झाड़ू से साफ करते हैं। इसके बाद लाखों श्रद्धालु पूरी आस्था और उत्साह के साथ इन रथों की रस्सियों को खींचते हुए लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महारानी गुंडिचा की निस्वार्थ और असीम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कुछ दिनों के लिए उनके मंदिर में वास करते हैं। पूरे नौ दिनों तक वहां विशेष आतिथ्य स्वीकार करने के बाद, भगवान वापस श्री मंदिर की ओर लौट आते हैं। वापसी की इस पवित्र यात्रा को स्थानीय भाषा में ‘बहुदा जात्रा’ (Bahuda Jatra) कहा जाता है। मूर्तियों के निर्माण की पौराणिक कथा : The mythological story of the creation of the idols. क्या आपने कभी यह विचार किया है कि इस भव्य Jagannath Rath Yatra में शामिल होने वाली भगवान की मूर्तियां हमेशा अधूरी (बिना हाथ-पैर की) क्यों लगती हैं और वे पत्थर के बजाय केवल लकड़ी की ही क्यों बनी होती हैं? प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, एक बार राजा सुबल ने एक अत्यंत प्रसिद्ध मूर्तिकार से भगवान कृष्ण की कुरुक्षेत्र वाली छवि की मूर्ति बनाने का आग्रह किया। उस मूर्तिकार ने शर्त रखी कि वह एक बंद कमरे में अकेले ही यह मूर्ति बनाएगा और कोई भी उसे बीच में बिल्कुल

Jagannath Rath Yatra 2026 Date And Time : जगन्नाथ रथ यात्रा तिथि, 15 दिन बीमार पड़ने का रहस्य और रथों की भव्यता की पूरी जानकारी…. Read More »

Hanumat Stotra

Shri Hanumat Stotra : श्री हनुमत स्तोत्र…

Shri Hanumat Stotra श्री हनुमत स्तोत्र: श्री हनुमत स्तोत्र संस्कृत भाषा में है। यह परम पूज्य श्री आदि शंकर की एक सुंदर रचना है। यह भगवान हनुमान की स्तुति है। भगवान हनुमान हमेशा भगवान राम का नाम जपते रहते हैं। वे हमें भक्ति और मुक्ति प्रदान करते हैं। उनमें अपार शक्ति है और वे दुष्ट लोगों का विनाश करते हैं। Hanumat Stotra इसकी रचना जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य भगवत्पाद ने की है। श्री राम के प्रति अटूट भक्ति रखने वाले श्री हनुमान एक विनम्र भक्त हैं, जिन्हें राम में अपने अडिग विश्वास के कारण महान कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। कांची परमाचार्य ने एक बार कहा था कि हनुमान में बुद्धि और शारीरिक शक्ति दोनों हैं, इसलिए उनकी पूजा करने से सभी प्रकार की संपदा – जैसे ज्ञान, शक्ति, प्रसिद्धि, वीरता, निर्भयता, स्वास्थ्य, दृढ़ संकल्प और वाक्पटुता – प्राप्त होती है। श्री हनुमत स्तोत्र का फल-श्रुति यह है कि “जो व्यक्ति हनुमान के Hanumat Stotra श्री हनुमत स्तोत्र का पाठ करता है, वह इस संसार में लंबे समय तक सभी सुख-सुविधाओं का भोग करने के बाद श्री राम का भक्त बन जाता है।” श्री हनुमत स्तोत्र का प्रयोग आमतौर पर किसी बड़ी समस्या के समय किया जाता है। इसके पाठ से बड़ी-बड़ी समस्याएं और संकट दूर हो जाते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। Hanumat Stotra श्री हनुमत स्तोत्र के पाठ से शत्रुओं द्वारा उत्पन्न समस्याएं, षड्यंत्र, तंत्र-मंत्र, बंधन और शत्रु-जनित खतरे शांत हो जाते हैं Hanumat Stotra और सभी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। रामभक्त हनुमान ऐसे देवता हैं Hanumat Stotra जो थोड़ी सी पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं Hanumat Stotra और भक्तों के सभी कष्टों को दूर कर देते हैं। श्री हनुमत स्तोत्र में ऐसे उपाय बताए गए हैं जिनसे बजरंग बली को प्रसन्न किया जा सकता है और उनसे कृपा प्राप्त की जा सकती है। हनुमान जी की पूजा में स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है। Hanumat Stotra शरीर, विचारों या मन की किसी भी प्रकार की अपवित्रता को अक्षम्य माना जाता है। पूजा के दौरान मन में किसी भी प्रकार का बुरा या गलत विचार न आने दें और न ही कोई अप्रिय सोच रखें। अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के प्रति अनादर न करें और न ही दिव्यांगों, जानवरों या बच्चों पर किसी प्रकार की हिंसा करें। श्री हनुमत स्तोत्र के लाभ: श्री हनुमत स्तोत्र जीवन में आने वाली सभी परेशानियों और समस्याओं को दूर करता है। साथ ही, इसके पाठ से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है। किन्हें यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: जो लोग पुरानी बीमारियों से जूझ रहे हैं या बार-बार बीमार पड़ते हैं, उन्हें श्री हनुमत स्तोत्र का पाठ ज़रूर करना चाहिए। श्री हनुमत स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Hanumat Stotra in Hindi लांगूलमृष्टवियदम्बुधिमध्यमार्गमुत्प्लुत्ययान्तममरेन्द्रमुदो निदानम् ।आस्फालितस्वकभुजस्फुटिताद्रिकाण्डंद्रांगमैथिलीनयननन्दनमद्य वन्दे ।। 1 ।। मध्येनिशाचरमहाभयदुर्विषह्रांघोराद्भुतव्रतमियं यददश्चचार ।पत्ये तदस्य बहुधापरिणामदूतंसीतापुरस्कृततनुं हनुमन्तमीडे ।। 2 ।। य: पादपंकजयुगं रघुनाथपत्न्यानैराश्यरूषितविरक्तमपि स्वरागै: ।प्रागेव रागि विदधे बहु वन्दमानोवन्देऽञ्जनाजनुषमेष विशेषतुष्ट्यै ।। 3 ।। ताञ्जानकीविरहवेदनहेतुभूतान्द्रागाकलय्य सदशोकवनीयवृक्षान् ।लंकालकानिव घनानुदपाटयद्स्तंहेमसुंदरकपिं प्रणमामि पुष्ट्यै ।। 4 ।। घोषप्रतिध्वनितशैलगुहासहस्त्रसम्भ्रान्तनादितवलन्मृगनाथयूथम् ।अक्षक्षयक्षणविलक्षितराक्षसेन्द्रमिन्द्रंकपीन्द्रप्रतनावलयस्य वन्दे ।। 5 ।। हेलाविलन्घितमहार्णवमप्यमन्दंघूर्णद्गदाविहतिविक्षतराक्षसेषु ।स्वम्मोदवारिधिमपारमिवेक्षमाणंवन्देऽहमक्षयकुमारकमारकेशम् ।। 6 ।। जम्भारिजित्प्रसभलम्भितपाशबन्धंब्रह्मानुरोधमिव तत्क्षणमुद्वहन्तम् ।रौद्रावतारमपि रावणदीर्घदृष्टिसंकोचकारणमुदारहरिं भजामि ।। 7 ।। दर्पोन्नमन्निशिचरेश्वरमूर्धचञ्चत्कोटीरचुम्बिनिजबिम्बमुदीक्ष्य ह्रष्टम् ।पश्यन्तमात्मभुजयंत्रणपिष्यमाणतत्कायशोणितनिपातमपेक्षि वक्ष: ।। 8 ।। अक्षप्रभृत्यमरविक्रमवीरनाशक्रोधादिवद्रुतमुदञ्चितचन्द्रहासाम् ।निद्रापिताभ्रघनगर्जनघोरघोषै:संस्तम्भयन्तमभिनौमि दशास्यमूर्तिम् ।। 9 ।। आशंस्यमानविजयं रघुनाथधामशंसन्तमात्मकृतभूरिपराक्रमेण ।दौत्ये समागमसमन्वयमादिशन्तं वन्देहरे: क्षितिभृत: पृतनाप्रधानम् ।। 10 ।। यस्यौचितीं समुपदिष्टवतोऽधिपुच्छंदम्भान्धितां धियमपेक्ष्य विवर्धमान: ।नक्तञ्चराधिपतिरोषहिरण्यरेता लंकादिधक्षुरपतत्तमहं वृणोमि ।। 11 ।। क्रन्दन्निशाचरकुलां ज्वलनावलीढै:साक्षाद्ग्रहैरिव बहि: परिदेवमानाम् ।स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नक्रपीटयोनिदंदह्रामाननगरीं परिगाहमानाम् ।। 12 ।। मूर्तैर्ग्रहासुभिरिव द्युपुरं व्रजद्भिव्र्योम्निक्षणं परिगतं पतगैज्र्वलद्भि: ।पीताम्बरं दधतमुच्छ्रितदीप्ति पुच्छंसेनां वहद्विहगराजमिवाहमीडे ।। 13 ।। स्तम्भीभवत्स्वगुरुवालधिलग्नवहिनज्वालोल्ललद्ध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै ।वन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्तमद्यैवरामविजयाजिकवैजयन्तीम् ।। 14 ।। रक्षश्चयैकचितकक्षकपूश्चितौ य:सीताशुचो निजविलोकनतो मृताया: ।दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतंलांगगूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु ।। 15 ।। आशुद्धये रघुपतिप्रणयैकसाक्ष्येवैदेहराजदुहितु: सरिदीश्वराय ।न्यासं ददानमिव पावकमापतन्तमब्धौप्रभञ्जनतनूजनुषं भजामि ।। 16 ।। रक्षस्स्वतृप्तिरुडशान्तिविशेषशोणमक्षक्षयक्षणविधानुमितात्मदाक्ष्यम् ।भास्वत्प्रभातरविभानुभरावभासंलंकाभयंकरममुं भगवन्तमीडे ।। 17 ।। तित्र्वोदधिं जनकजार्पितमाप्यचूडारत्नं रिपोरपि पुरं परमस्य दग्ध्वा ।श्रीरामहर्षगलदश्र्वभिषिच्यमानं तंब्रह्मचारिवरवानरमाश्रयेऽहम् ।। 18 ।। य: प्राणवायुजनितो गिरिशस्य शांत:शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशंकरात्मा ।ह्रदयो हरस्य हरिवद्धरितां गतोऽपिधीधैर्यशास्त्रविभवेऽतुलमाश्रये तम् ।। 19 ।। स्कन्धेऽधिवाह्रा जगदुत्तरगीतिरीत्याय: पार्वतीश्वरमतोषयदाशुतोषम् ।तस्मादवाप च वरानपरानवाप्यान् तंवानरं परमवैष्णवमीशमीडे ।। 20 ।। उमापते: कविपते: स्तुतिर्बाल्यविज्रम्भिता ।हनूमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा ।। ।। इति श्री हनुमत स्तोत्र संपूर्णम् ।।

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Pancharatnam Stotram

Sri Hanumat Pancharatnam Stotram : श्री हनुमत पञ्चरत्नं स्तोत्र….

श्री हनुमत पञ्चरत्नं स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Hanumat Pancharatnam Stotram in Hindi वीताखिल-विषयेच्छं जातानन्दाश्र पुलकमत्यच्छम् ।सीतापति दूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम् ॥ १ ॥ तरुणारुण मुख-कमलं करुणा-रसपूर-पूरितापाङ्गम् ।सञ्जीवनमाशासे मञ्जुल-महिमानमञ्जना-भाग्यम् ॥ २ ॥ शम्बरवैरि-शरातिगमम्बुजदल-विपुल-लोचनोदारम् ।कम्बुगलमनिलदिष्टम् बिम्ब-ज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे ॥ ३ ॥ दूरीकृत-सीतार्तिः प्रकटीकृत-रामवैभव-स्फूर्तिः ।दारित-दशमुख-कीर्तिः पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्तिः ॥ ४ ॥ वानर-निकराध्यक्षं दानवकुल-कुमुद-रविकर-सदृशम् ।दीन-जनावन-दीक्षं पवन तपः पाकपुञ्जमद्राक्षम् ॥ ५ ॥ एतत्-एतत्पवन-सुतस्य स्तोत्रंयः पठति पञ्चरत्नाख्यम् ।चिरमिह-निखिलान् भोगान् भुङ्क्त्वाश्रीराम-भक्ति-भाग्-भवति ॥ ६ ॥ ॥ इति श्री हनुमत पञ्चरत्नं स्तोत्र संपूर्णम् ॥ Sri Hanumat Pancharatnam Stotram Lyrics : श्री हनुमत पञ्चरत्नं स्तोत्र पाठ vītākhilaviṣayēchChaṃ jātānandāśrupulakamatyachchamsītāpati dūtādyaṃ vātātmajamadya bhāvayē hṛdyam ॥ 1 ॥ taruṇāruṇamukhakamalaṃ karuṇārasapūrapūritāpāṅgamsañjīvanamāśāsē mañjulamahimānamañjanābhāgyam ॥ 2 ॥ śambaravairiśarātigamambujadala vipulalōchanōdāramkambugalamaniladiṣṭaṃ bimbajvalitōṣṭhamēkamavalambē ॥ 3 ॥ dūrīkṛtasītārtiḥ prakaṭīkṛtarāmavaibhavasphūrtiḥdāritadaśamukhakīrtiḥ puratō mama bhātu hanumatō mūrtiḥ ॥ 4 ॥ vānaranikarādhyakṣaṃ dānavakulakumudaravikarasadṛśamdīnajanāvanadīkṣaṃ pavanatapaḥ pākapuñjamadrākṣam ॥ 5 ॥ ētatpavanasutasya stōtraṃ yaḥ paṭhati pañcharatnākhyamchiramiha nikhilānbhōgānbhuṅktvā śrīrāmabhaktibhāgbhavati ॥ 6 ॥ ॥ iti sri hanumat pancharatnam stotram sampurnam ॥

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Shri Stotra

Shri Stotra : श्री स्तोत्र….

Shri Stotra श्री स्तोत्र: श्री स्तोत्र का ज़िक्र श्री विष्णु पुराण और अग्नि पुराण में मिलता है। कहा जाता है कि महात्मा पुष्कर ने परशुराम को बताया था कि भगवान इंद्र ने इस श्री स्तोत्र का पाठ करके ही इंद्रलोक में देवी लक्ष्मी का वास कराया था और उनसे सुख-समृद्धि प्राप्त की थी। जो कोई भी श्री स्तोत्र का पाठ करता है या इसे सुनता है, उसे हमेशा माता श्री लक्ष्मी जी का आशीर्वाद मिलता है और सभी सुखों को भोगने के बाद अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्री नारायण स्तोत्र भगवान हरि विष्णु को समर्पित एक ग्रंथ है। विष्णु का अपने भक्तों के बीच एक सरल और लोकप्रिय नाम ‘नारायण’ है और इसी नाम से जुड़कर विष्णु के अन्य नाम जैसे लक्ष्मी-नारायण, शेष-नारायण और अनंत-नारायण आदि बने हैं। हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, रोज़ाना श्री नारायण स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य की हर इच्छा पूरी होती है। यह ग्रंथ विष्णु को बहुत प्रिय है और एक बहुत ही सरल पाठ है, जिससे हर कोई लाभ उठा सकता है। धन-संपत्ति पाने के लिए माता लक्ष्मी को प्रसन्न करना ज़रूरी है। विद्वानों ने ऐसे तीन कार्यों के बारे में बताया है Shri Stotra जिन्हें अपनी दिनचर्या में शामिल करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। भगवान के नाम में एक रहस्यमयी शक्ति होती है। मनुष्य केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता, लेकिन वह भगवान की मदद से जी सकता है। ब्रह्मचर्य से मन शुद्ध होता है। मन शुभ और पवित्र विचारों से भर जाता है। मंत्रों के जाप से रोज़ाना अच्छे संस्कार मज़बूत होते हैं। जो व्यक्ति अच्छी सोच और पवित्र विचारों का अभ्यास करता है, उसमें शुभता की प्रवृत्ति विकसित होती है। अच्छे विचारों का निरंतर प्रवाह उसके चरित्र को बदल देता है। Shri Stotra वेदों और पुराणों में भगवान विष्णु को ब्रह्मांड का आधार माना गया है। Shri Stotra मानव जीवन से जुड़े सुख और दुख का चक्र श्री हरि के हाथों में है। भगवान की पूजा में विष्णु सहस्रनाम का पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। श्री स्तोत्र के लाभ: श्री सूक्तम एक अचूक मंत्र है Shri Stotra जो व्यक्ति और उसके पूरे परिवार के लिए समृद्धि, अच्छाई, स्वास्थ्य, धन और कल्याण लाता है। Shri Stotra श्री सूक्तम पाठ के लाभ: श्री सूक्तम का पाठ देवी माँ को अत्यंत प्रसन्न करता है और वह अपने बच्चों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए: जो व्यक्ति धन-संपत्ति में सुख-समृद्धि चाहता है, उसे वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से इस Shri Stotra श्री स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Stotra in Hindi पुष्कर उवा – राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः ।स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ।। इन्द्र उवाच – नमस्ते सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् ।श्रियमुन्निन्द्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ।। त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि ।संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ।। यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने ।आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ।। आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च ।सौम्या सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवी पूरितम् ।। का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः ।अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ।। त्वया देवि परित्यक्तं सफलं भुवनत्रयम् ।विनष्टप्रायमभवत्वयेदानीं समेधिताम् ।। दाराः पुत्रस्तथाऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम् ।भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नॄणाम् ।। शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् ।देवि त्वददृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ।। त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता ।त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ।। मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् ।मा शरीरं कलत्रं च त्ययेथाः सर्वपावनि ।। मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशुन्मा विभूषणम् ।त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये ।। सत्येन समशौचाभ्यां तथा शिलादिभिर्गुणैः ।त्यज्यन्ते नराः सद्यः सन्त्यक्ताः ये त्वयामले ।। त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शिलाद्यैरखिलैर्गुणैः ।कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ।। स श्लाघ्यः सगुणी धन्यः सकुलीनः स बुद्धिमान् ।स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवी वीक्षितः ।। सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः ।पराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्ल्भे ।। न ते वर्णयितुं शक्ता गुणज्जिह्वाऽपि वेधसः ।प्रसीद देवि पद्माक्षि नास्माम्स्त्याक्षीः कदाचन ।। पुष्कर उवाच- एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् ।सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ।। स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् ।श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः ।। ।। इति श्री स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Ashtakam Stotram

Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram : श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम्….

श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram in Hindi नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाश हेतवे ।त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरञ्चि नारायण शंकरात्मने ॥ १ ॥ यन्मडलं दीप्तिकरं विशालं रत्नप्रभं तीव्रमनादिरुपम् ।दारिद्र्यदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥ यन्मण्डलं देवगणै: सुपूजितं विप्रैः स्तुत्यं भावमुक्तिकोविदम् ।तं देवदेवं प्रणमामि सूर्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ३ ॥ यन्मण्डलं ज्ञानघनं, त्वगम्यं, त्रैलोक्यपूज्यं, त्रिगुणात्मरुपम् ।समस्ततेजोमयदिव्यरुपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४ ॥ यन्मडलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य Ashtakam Stotram वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ५ ॥ यन्मडलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजु: सामसु सम्प्रगीतम् ।प्रकाशितं येन च भुर्भुव: स्व: पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ६ ॥ यन्मडलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति Ashtakam Stotram यच्चारणसिद्धसंघाः ।यद्योगितो योगजुषां च संघाः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७ ॥ यन्मडलं सर्वजनेषु पूजितं ज्योतिश्च Ashtakam Stotram कुर्यादिह मर्त्यलोके ।यत्कालकल्पक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८ ॥ यन्मडलं विश्वसृजां Ashtakam Stotram प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् ।यस्मिन् जगत् संहरतेऽखिलं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ९ ॥ यन्मडलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्ध तत्त्वम् ।सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १० ॥ यन्मडलं वेदविदि वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥ ॥ इति श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Shri Surya Mandala-Ashtakam Stotram Lyrics : श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् पाठ namah savitre jagadekchakshushejagatprasutisthitinash hetave ।trayimayay trigunatmadharineviranchi narayan shankaratmane ।। 1 ।। yanmadalam diptikaram vishalamratnaprabham tivramanadirupam ।daridryaduhkhakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 2 ।। yanmandalam devganai supujitamvipraih stutyam bhavamuktikovidam ।tam devdevam pranamaami suryampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 3 ।। yanmandalam dnyanaghanam, tvagamyam,trailokyapujyam, trigunatmarupam ।samastatejomayadivyarupampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 4 ।। yanmadalam gudhamatiprabodhamdharmasya vrudhim kurute jananam ।yatsarvapapakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 5 ।। yanmadalam vyadhivinashadakshamyadrigyaju samsu sampragitam ।prakashitam yen ch bhurbhuva svapunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 6 ।। yanmadalam vedvido vadantigayanti yacharansiddhasanghah ।yadyogito yogajusham ch sanghahpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 7 ।। yanmadalam sarvajaneshu pujitamjyotisch kuryadih martyaloke ।yatkalakalpakshayakaranam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 8 ।। yanmadalam vishvasrijamprasiddhamutpattirakshapralayapragalbham ।yasmin jagat sanharate̕khilam chpunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 9 ।। yanmadalam sarvagatasya vishnoratmaparam dhaam vishuddh tatvam ।sukshmantarairyogapathanugamyampunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 10 ।। yanmadalam vedvidi vadantigayanti yacharansiddhasanghah ।yanmandalam vedvidah smarantipunatu maam tatsaviturvarenyam ।। 11 ।। ।। iti shri suryamandal ashtak stotram sampurnam ।।

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Smaran Stotram

Shri Surya Pratah-Smaran Stotram : श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम्…..

श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Surya Pratah-Smaran Stotram in Hindi प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यंरूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुंब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥ १ ॥ प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभि–र्ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैर्नतमर्चितं च ।वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतंत्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च ॥ २ ॥ प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिंपापौघशत्रुभयरोगहरं परं च ।तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिंगोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥ ३ ॥ श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातः प्रातः पठेत्तु यः ।स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ ॥ इति श्री सूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Shri Surya Pratah-Smaran Stotram Lyrics : श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् पाठ Pratah smarami Khalu thath savithur varenyam,Roopam hi mandala mruchodha thanur yajjomshi,Samaani yasya kirana prabhavadhi hethum,Brahmaa harathma kamalakshya machinthya roopam ॥ 1 ॥ Pratnamami tharinam thanuvag manobhi,Brahmendra poorvaka surairnatha marchitham cha,Vrushti promachana vinigraha hethu bhootham,Trilokya palana param, trigunathmakam cha ॥ 2 ॥ Pratarbhajami savithara manantha shakthim,Papougha shathru bhaya roga haram param cha,Tham sarva loka kalanathmaka kala moorthim,Go khanda bandhana vimochanamadhi devam ॥ 3 ॥ Slokathrayamidham Bhano Pratha kale padethu ya,Sa sarva vyadhi nirmuktha prama sukhamavapnuyath ॥ 4 ॥ ॥ iti shri surya pratah smaran stotram sampurnam ॥ श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् विशेषताए: श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् के साथ-साथ यदि सूर्ये आरती या सूर्ये कवचका पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| Smaran Stotram अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| इस स्तोत्रम् के पाठ के साथ साथ सूर्ये चालीसा  और सूर्ये अष्टकम का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | Smaran Stotram और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही सूर्य देव की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस श्रीसूर्य प्रातः स्मरण स्तोत्रम् पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Bhujanga Stotram

Sri Subramanya Bhujanga Stotram: श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत….

श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत हिंदी पाठ : Sri Subramanya Bhujanga Stotram in Hindi सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहंत्रीमहादंतिवक्त्राऽपि पंचास्यमान्या ।विधींद्रादिमृग्या गणेशाभिधा मेविधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः ॥ 1 ॥ न जानामि शब्दं न जानामि चार्थंन जानामि पद्यं न Bhujanga Stotram जानामि गद्यम् ।चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मेमुखान्निःसरंते गिरश्चापि चित्रम् ॥ 2 ॥ मयूराधिरूढं महावाक्यगूढंमनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम् ।महीदेवदेवं महावेदभावंमहादेवबालं भजे लोकपालम् ॥ 3 ॥ यदा संनिधानं गता मानवा मेभवांभोधिपारं गतास्ते तदैव ।इति व्यंजयन्सिंधुतीरे य आस्तेतमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम् ॥ 4 ॥ यथाब्धेस्तरंगा लयं यांति तुंगा-स्तथैवापदः संनिधौ सेवतां मे ।इतीवोर्मिपंक्तीर्नृणां दर्शयंतंसदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम् ॥ 5 ॥ गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः ।इतीव ब्रुवन्गंधशैलाधिरूढःस देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु ॥ 6 ॥ महांभोधितीरे महापापचोरेमुनींद्रानुकूले Bhujanga Stotram सुगंधाख्यशैले ।गुहायां वसंतं स्वभासा लसंतंजनार्तिं हरंतं श्रयामो गुहं तम् ॥ 7 ॥ लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहेसुमस्तोमसंछन्नमाणिक्यमंचे ।समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशंसदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम् ॥ 8 ॥ रणद्धंसके मंजुलेऽत्यंतशोणेमनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे ।मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तःसदा मोदतां स्कंद ते पादपद्मे ॥ 9 ॥ सुवर्णाभदिव्यांबरैर्भासमानांक्वणत्किंकिणीमेखलाशोभमानाम् ।लसद्धेमपट्टेन Bhujanga Stotram विद्योतमानांकटिं भावये स्कंद ते दीप्यमानाम् ॥ 10 ॥ पुलिंदेशकन्याघनाभोगतुंग-स्तनालिंगनासक्तकाश्मीररागम् ।नमस्याम्यहं तारकारे तवोरःस्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम् ॥ 11 ॥ विधौ क्लृप्तदंडान्स्वलीलाधृतांडा-न्निरस्तेभशुंडांद्विषत्कालदंडान् ।हतेंद्रारिषंडान्जगत्राणशौंडा-न्सदा ते प्रचंडान्श्रये बाहुदंडान् ॥ 12 ॥ सदा शारदाः षण्मृगांका यदि स्युःसमुद्यंत एव Bhujanga Stotram स्थिताश्चेत्समंतात् ।सदा पूर्णबिंबाः कलंकैश्च हीना-स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कंद साम्यम् ॥ 13 ॥ स्फुरन्मंदहासैः सहंसानि चंच-त्कटाक्षावलीभृंगसंघोज्ज्वलानि ।सुधास्यंदिबिंबाधराणीशसूनोतवालोकये षण्मुखांभोरुहाणि ॥ 14 ॥ विशालेषु कर्णांतदीर्घेष्वजस्रंदयास्यंदिषु Bhujanga Stotram द्वादशस्वीक्षणेषु ।मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः ॥ 15 ॥ सुतांगोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धाजपन्मंत्रमीशो मुदा जिघ्रते यान् ।जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यःकिरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः ॥ 16 ॥ स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-श्चलत्कुंडलश्रीलसद्गंडभागः ।कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिःपुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः ॥ 17 ॥ इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-ह्वयत्यादराच्छंकरे Bhujanga Stotram मातुरंकात् ।समुत्पत्य तातं श्रयंतं कुमारंहराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम् ॥ 18 ॥ कुमारेशसूनो गुह स्कंद सेना-पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ ।पुलिंदात्मजाकांत भक्तार्तिहारिन्प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम् ॥ 19 ॥ प्रशांतेंद्रिये नष्टसंज्ञे विचेष्टेकफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कंपिगात्रे ।प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानींद्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम् ॥ 20 ॥ कृतांतस्य दूतेषु चंडेषु कोपा-द्दहच्छिंद्धि भिंद्धीति मां तर्जयत्सु ।मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वंपुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम् ॥ 21 ॥ प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वाप्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम् ।न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धेन कार्यांतकाले मनागप्युपेक्षा ॥ 22 ॥ सहस्रांडभोक्ता त्वया शूरनामाहतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः ।ममांतर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकंन हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि ॥ 23 ॥ अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नोभवांदीनबंधुस्त्वदन्यं न याचे ।भवद्भक्तिरोधं सदा क्लृप्तबाधंममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम् ॥ 24 ॥ अपस्मारकुष्टक्षयार्शः प्रमेह-ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महांतः ।पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिंविलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवंते ॥ 25 ॥ दृशि स्कंदमूर्तिः श्रुतौ स्कंदकीर्ति-र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम् ।करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यंगुहे संतु लीना ममाशेषभावाः ॥ 26 ॥ मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-मभीष्टप्रदाः संति सर्वत्र देवाः ।नृणामंत्यजानामपि स्वार्थदानेगुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने ॥ 27 ॥ कलत्रं सुता बंधुवर्गः पशुर्वानरो वाथ नारी गृहे ये मदीयाः ।यजंतो नमंतः स्तुवंतो भवंतंस्मरंतश्च ते संतु सर्वे कुमार ॥ 28 ॥ मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-स्तथा व्याधयो बाधका ये मदंगे ।भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरेविनश्यंतु ते चूर्णितक्रौंचशैल ॥ 29 ॥ जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधंसहेते न किं देवसेनाधिनाथ ।अहं चातिबालो भवान् लोकतातःक्षमस्वापराधं समस्तं महेश ॥ 30 ॥ नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यंनमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय ।नमः सिंधवे सिंधुदेशाय तुभ्यंपुनः स्कंदमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु ॥ 31 ॥ जयानंदभूमं जयापारधामंजयामोघकीर्ते जयानंदमूर्ते ।जयानंदसिंधो जयाशेषबंधोजय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो ॥ 32 ॥ भुजंगाख्यवृत्तेन क्लृप्तं स्तवं यःपठेद्भक्तियुक्तो गुहं संप्रणम्य ।स पुत्रान्कलत्रं धनं दीर्घमायु-र्लभेत्स्कंदसायुज्यमंते नरः सः ॥ 33 ॥ ॥ इति श्री सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्त्रोत सम्पूर्णम् ॥

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Karavalamba

Sri Subramanya Karavalamba : श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम्….

श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Subramanya Karavalamba in Hindi हे स्वामिनाथ करुणाकर दीनबंधो,श्रीपार्वतीशमुखपंकज पद्मबंधो ।श्रीशादिदेवगणपूजितपादपद्म,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 1 ॥ देवादिदेवनुत देवगणाधिनाथ,देवेंद्रवंद्य मृदुपंकजमंजुपाद ।देवर्षिनारदमुनींद्रसुगीतकीर्ते,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 2 ॥ नित्यान्नदान निरताखिल रोगहारिन्,तस्मात्प्रदान परिपूरितभक्तकाम ।शृत्यागमप्रणववाच्यनिजस्वरूप,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 3 ॥ क्रौंचासुरेंद्र परिखंडन शक्तिशूल,पाशादिशस्त्रपरिमंडितदिव्यपाणे ।श्रीकुंडलीश धृततुंड शिखींद्रवाह,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 4 ॥ देवादिदेव रथमंडल मध्य वेद्य,देवेंद्र पीठनगरं Karavalamba दृढचापहस्तम् ।शूरं निहत्य सुरकोटिभिरीड्यमान,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 5 ॥ हारादिरत्नमणियुक्तकिरीटहार,केयूरकुंडललसत्कवचाभिराम ।हे वीर तारक Karavalamba जयाऽमरबृंदवंद्य,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 6 ॥ पंचाक्षरादिमनुमंत्रित गांगतोयैः,पंचामृतैः प्रमुदितेंद्रमुखैर्मुनींद्रैः ।पट्टाभिषिक्त हरियुक्त परासनाथ,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 7 ॥ श्रीकार्तिकेय करुणामृतपूर्णदृष्ट्या,कामादिरोगकलुषीकृतदुष्टचित्तम् ।भक्त्वा तु मामवकलाधर कांतिकांत्या,वल्लीसनाथ मम देहि करावलंबम् ॥ 8 ॥ सुब्रह्मण्य करावलंबं पुण्यं ये पठंति द्विजोत्तमाः ।ते सर्वे मुक्ति मायांति सुब्रह्मण्य प्रसादतः ।सुब्रह्मण्य करावलंबमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।कोटिजन्मकृतं पापं तत्​क्षणादेव नश्यति ॥ ॥ इति श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥ Sri Subramanya Karavalamba Stotram Lyrics : श्री सुब्रह्मण्य करावलम्ब स्तोत्रम् पाठ Hey Swaminatha karunakara deena bandhoSree Paravatheesa mukha pankaja padma bandhoSreesadhi deva gana poojitha pada padmaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 1 ॥ Devadhi deva sutha, deva ganadhi nadhaDevendra vandhya mrudu pankaja manju padaDevarshi narada muneendra sugeetha keertheValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 2 ॥ Nithyanna dana nirathakhila roga harinBhagya pradhana paripooritha bhaktha kamaSruthyagama pranava vachya nija swaroopaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 3 ॥ Krouncha surendra parigandana sakthi soolaChapa thi sasthra parimanditha divya panaiSree kundaleesa drutha thunda sikheendra vahaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 4 ॥ Devadhi deva radha mandala Madhya methyaDevendra peeda nagaram druda chapa hasthaSooram nihathya sura kotibhiradyamanaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 5 ॥ Heeradhi rathna vara yuktha kireeda haraKeyura kundala lasath kavachabhiramaHey Veera tharaka jayaa amara brunda vandhyaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 6 ॥ Panchaksharadhi manu manthritha ganga thoyaiPanchamruthai praudhithendra mukhair muneendryaiPattabhishiktha maghavatha nayasa nadhaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 7 ॥ Sree karthikeya karunamrutha poorna drushtyaKamadhi roga kalushi krutha drushta chithamSikthwa thu mamava kala nidhi koti kanthaValleesa nadha mama dehi karavalambham ॥ 8 ॥ Subrahmanyashtakam punyam yeh padanthi dwijothamaThey sarve mukthimayanthi subrahmanya prasadathaSubrahmanyashtakamidham prathar uthaya ya padethKodi janma krutham papam thath kshanad thasya nasyathi ॥ ॥ Iti sri subramanya karavalamba stotram sampurnam ॥

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