Gopal Stotra

Shri Santan Gopal Stotra : श्री सन्तानगोपाल स्तोत्र…

श्री सन्तानगोपाल स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Santan Gopal Stotra in Hindi श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ॥1॥ नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ॥2॥ अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ॥3॥ गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ॥4॥ पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम् ।देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ॥5॥ पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ॥6॥ यशोदांकगतं बालं Gopal Stotra गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ॥7॥ श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ॥8॥ भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥9॥ रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ॥10॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥11॥ वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥12॥ कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥13॥ लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥14॥ कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥15॥ राजीवनेत्र श्रीराम Gopal Stotra रावणारे हरे कवे ।तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥16॥ अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥17॥ श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥18॥ अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥19॥ वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥20॥ डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥21॥ नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥22॥ अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥23॥ यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥24॥ नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥25॥ पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥26॥ गोपालडिम्भ गोविन्द Gopal Stotra वासुदेव रमापते ।अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥27॥ मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥28॥ याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥29॥ आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥30॥ वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ॥31॥ ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥32॥ वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥33॥ राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥34॥ अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥35॥ नन्दपाल धरापाल Gopal Stotra गोविन्द यदुनन्दन ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥36॥ दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥37॥ यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥38॥ अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥39॥ रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥40॥ चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥41॥ कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥42॥ देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥43॥ भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ॥44॥ श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥45॥ जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥46॥ श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥47॥ दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥48॥ गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥49॥ श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥50॥ स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजंविलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ॥51॥ याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥52॥ अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥53॥ वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥54॥ कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ॥55॥ वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ॥56॥ पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ॥57॥ कंजाक्ष कृष्ण Gopal Stotra देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ॥58॥ देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ॥59॥ विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ॥60॥ भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ॥61॥ राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ॥62॥ राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ॥63॥ देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ॥64॥ कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥65॥ गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥66॥ दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयंदिशतु दिशतु शीघ्रं Gopal Stotra भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रोदिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ॥67॥ दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ॥68॥ राम राघव गोविन्द Gopal Stotra देवकीसुत माधव ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥69॥ वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥70॥ ममाभीष्टसुतं देहि Gopal Stotra कंसारे माधवाच्युत ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥71॥ चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥72॥ विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥73॥ नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥74॥ भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ॥75॥ स्वामिंस्त्वं भगवन् राम Gopal Stotra कृष्ण माधव कामद ।देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ॥76॥ तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥77॥ पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥78॥ शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥79॥ नारायण रमानाथ Gopal Stotra राजीवपत्रलोचन ।सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥80॥ राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥81॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥82॥ मुनिवन्दित गोविन्द Gopal Stotra रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥83॥ गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥84॥ रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥85॥ वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥86॥ कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥87॥ पुत्रप्रद मुकुन्देश Gopal Stotra रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥88॥ पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥89॥

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Mahimna Stotra

Shri Shiv Mahimna Stotra : श्री शिव महिम्न स्तोत्र….

अथ श्री शिव महिम्न स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Shiv Mahimna Stotra in Hindi पुष्पदंत उवाच – महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी ।स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ॥अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन् ।ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: श्री पुष्पदंत जी ने कहा है! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाए तो मैं तो एक साधारण बालक हूं, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें। अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो: ।रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।।स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः ।पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन और न ही वचन द्वारा संभव है। आपके संदर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा ‘नेति नेति’ का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्य भाव का परिणाम है। मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत: ।स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम् ।।मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः ।पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥ श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे वेद और भाषा के सृजन ! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अर्थात ज्ञान के अनुसार आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी। तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत् ।त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम् ।विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥ अर्थ: हे देव ! आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार अर्थात संहार करने वाले हैं। इस प्रकार आपके ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन स्वरूप हैं। तथा आप में सत्व, रज और तम तीन गुण भी हैं । वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। ऐसा करने से भले ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुंह नहीं मोड़ सकते। किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम् ।किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः ।कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥ अर्थ: हे महादेव ! मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े हैं और मेरी सीमित शक्ति से उसे व्यक्त करना असंभव है। अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां ।मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ॥अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो ।यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥ अर्थ: हे परमपिता! यह सात लोक आपके द्वारा ही बनाया गया है, इसके कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री दूसरे के पास होना असंभव है। इसलिए अज्ञानी लोग ही आपके विषय में संदेह करते हैं॥ त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां ।नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥ अर्थ: हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है। महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः ।कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम् ।न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।। 8 ।। अर्थ: हे शिव ! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता। ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम् ।परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव ।स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।। 9 ।। अर्थ: हे त्रिपुरहंता ! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं। तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः ।परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः ॥ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् ।स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।। 10 ।। अर्थ: हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों क्या ऐसा कभी हो सकता है भला। अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम् ।दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः ।स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥ अर्थ: हे त्रिपुरान्तक ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल

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Shri Shivramashtakam

Shri Shivramashtakam Stotra : श्री शिवरामअष्टकम स्तोत्र….

Shri Shivramashtakam Stotra श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र: श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र भगवान शिव को समर्पित है। इस स्तोत्र का लगातार 11 बार पाठ करने से व्यक्ति की बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है और हर परीक्षा में बेहतरीन परिणाम मिलते हैं। तमिल इतिहास के शुरुआती मध्यकाल (सातवीं और दसवीं शताब्दी ईस्वी के बीच) में अलवार संतों ने अपने भजनों के माध्यम से भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा की। उनके भजनों के इस संग्रह को ‘दिव्य प्रबंधम’ के नाम से जाना जाता है। ‘मंगलशासनम’ का अर्थ है ‘पवित्र तीर्थस्थलों की स्तुति में गीत गाना’। Shivramashtakam Stotra जिन श्रीवैष्णव तीर्थस्थलों का गुणगान अलवार संतों ने किया, उन्हें ‘दिव्य देशम’ कहा जाता है। श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र में मुख्य रूप से ऋग्वेद से लिए गए श्लोक शामिल हैं। Shivramashtakam इन श्लोकों का गायन स्वर-लहरी के नियमों, विशेषकर सामवेद के नियमों के अनुसार किया जाता है। किसी भी शास्त्र-पाठ से पहले श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ किया जाता है। Shivramashtakam Stotra इसे अनगिनत धुनों में से किसी भी धुन में गाया जा सकता है और उपयुक्त स्थानों पर भजन जोड़े जाते हैं। इन शिवरामाष्टकम स्तोत्रों का विषय दर्शन की उच्च अवस्थाओं या भगवान शिव और भगवान राम के रहस्यमय अनुभवों से लेकर, वर्तमान जीवन की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं की प्रार्थना तक फैला हुआ है। Shivramashtakam Stotra लोग अपनी पत्नी और बच्चों, धन या संपत्ति के लिए खूब आँसू बहाते हैं, लेकिन भगवान के लिए कौन ऐसा करता है ? Shivramashtakam यदि कोई सच्चे मन से उनके लिए रोता है, तो वे निश्चित रूप से प्रकट होते हैं। Shivramashtakam Stotra इसलिए, श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ करने से भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है। श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र के लाभ:Benefits of the Shri Shivaramashtakam Stotram दिव्य दृष्टि में दिखाई देने वाले भगवान या देवता के स्वरूप का वर्णनजानबूझकर या अनजाने में किए गए पापों के लिए क्षमा-याचनासमस्याओं और कठिनाइयों को दूर करने और जीवन में अच्छी चीजें प्राप्त करने की प्रार्थनाभक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्राप्त करने की इच्छा, जो आध्यात्मिक जीवन में सहायक होंगहरे आध्यात्मिक अनुभव के बाद भावनाओं का स्वतः उमड़ना आदि।जो व्यक्ति सुबह एकाग्र भक्ति के साथ Shivramashtakam Stotra श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र का पाठ करता है,वह हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है और उस भगवान विष्णु को प्राप्त करता है जिनकी वह पूजा करता है। यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए: Who should recite this Stotra जो लोग ज्ञान और जीवन में सफलता पाना चाहते हैं Shivramashtakam Stotra और भगवान की शरण में रहना चाहते हैं, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार ‘श्री शिवरामाष्टकम स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। श्री शिवरामाष्टक स्तोत्र हिंदी पाठ: Shri Shivramashtakam Stotra in Hindi शिव हरे शिव राम सखे प्रभोत्रिविधतापनिवारण हे विभो ।अज जनेश्वर यादव पाहि मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 1 ।। कमललोचन राम दयानिधेहरगुरो गजररक्षक गोपते ।शिवतनो भव शंकर पाहि मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 2 ।। सुजनरञ्जन मंगलमन्दिरंभजति ते पुरुष: परमं पदम् ।भवति तस्य सुखं परमद्भुतं शिव हरेविजयं कुरु मे वरम् ।। 3 ।। जय युधिष्ठिरवल्लभ भूपते जयजयार्जितपुण्यपयोनिधे ।जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तु ते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 4 ।। भवविमोचन माधव मापतेसुकविमानसहंस शिवारते ।जनकजारत राघव रक्ष मां शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 5 ।। अवनिमण्डलमंगल मापतेजलदसुंदर राम रमापते ।निगमकीर्तिगुणार्णव गोपते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 6 ।। पतितपावन नाममयी लतातवयशो विमलं परिगीयते ।तदपि माधव मां किमुपेक्षसे शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 7 ।। अमरतापरदेव रमापतेविजयतस्तव नामधनोपमा ।मयि कथं करुणार्णव जायते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 8 ।। हनुमत: प्रिय चापकर प्रभोसुरसरिद्धृतशेखर हे गुरो ।मम विभो किमु विस्मरणं कृतं शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 9 ।। अहरहर्जनरञ्जनसुन्दरं पठतिय: शिवरामकृतं स्तवम् ।विशति रामरमाचरणाम्बुजे शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। 10 ।। प्रातरुत्थाय यो भक्त्या पठेदेकाग्रमानस: ।विजयो जायते तस्य विष्णुमाराध्यमाप्नुयात् ।। 11 ।। ।। इति श्री शिवरामअष्टकम स्तोत्र संपूर्णम् ।।

Shri Shivramashtakam Stotra : श्री शिवरामअष्टकम स्तोत्र…. Read More »

Rudrashtakam

Shri Shiva Rudrashtakam : श्री शिव रुद्राष्टकम….

श्री शिव रुद्राष्टकम हिंदी पाठ : Shri Shiva Rudrashtakam in Hindi नमामीशमीशान निर्वाणरूपं ।विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं ।निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं ।चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं ॥ 1 ॥ निराकारमोंकारमूलं तुरीयं ।गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ।करालं महाकाल कालं कृपालं ।गुणागार संसारपारं नतो हं ॥ 2 ॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं ।मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ।स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा ।लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥ 3 ॥ चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं ।प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं ।मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं ।प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ 4 ॥ प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं ।अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं ।भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ 5 ॥ कलातीत कल्याण कल्पांतकारी ।सदासज्जनानन्ददाता पुरारी ।चिदानन्द संदोह मोहापहारी ।प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ 6 ॥ न यावद् उमानाथ पादारविंदं ।भजंतीह लोके परे वा नराणां ।न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं ।प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ 7 ॥ न जानामि योगं जपं नैव पूजां ।नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं ।जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं ।प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो ॥ 8 ॥ रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥ 9 ॥ ॥ इति श्री शिव रुद्राष्टकम संपूर्णम ॥ Shri Shiva Rudrashtakam Lyrics : श्री शिव रुद्राष्टकम पाठ Namami Shamishan Nirvan RoopamVibhum Vyapakam Brahma Veda Swaroopam ।Nijam Nirgunam Nirvikalpam NireehamChidakaash Maakash Vaasam Bhajeham ।। 1 ।। Nirakaar Omkar Moolam TuriyamGiragyaan Goteet Meesham Girisham ।Karaalam Mahakaal Kaalam KripalamGunagaar Sansaar Paaram Naatoham ।। 2 ।। Tusharaadri Sankaash Gauram GabheeramManobhoot Koti Prabha Shi Shareeram ।Sfooranmauli Kallolini Charu GangaLasadbhaal Baalendu Kanthe Bhujanga ।। 3 ।। Chalatkundalam Bhru Sunethram VishaalamPrasannananam Neelkantham Dayalam ।Mrigadheesh Charmaambaram MundamaalamPriyam Shankaram Sarvanaatham Bhajaami ।। 4 ।। Prachandam Prakrishtam Pragalbham PareshamAkhandam Ajambhaanukoti Prakaasham ।Trayahshool Nirmoolanam ShoolpaanimBhajeham Bhawani Patim Bhaav Gamyam ।। 5 ।। Kalateet Kalyaan KalpantkaariSada Sajjanaanand Daata Purari ।Chidaanand Sandoh MohapahariPraseed Praseed Prabho Manmathari ।। 6 ।। Nayaavad Umanath PaadaravindamBhajanteeha Lokey Parewa Naraanaam ।Na Tawatsukham ShaantisantapnaashamPraseed Prabho Sarvabhootadhivaasam ।। 7 ।। Na Jaanaami Yogam Japam Naiva PoojaamNa Toham Sada Sarvada Shambhu Tubhhyam ।Jarajanm Dukhhaudya TaapatyamaanamPrabho Paahi Aapan Namaami Shri Shambho ।। 8 ।। Rudrashtakamidam ProktamVipren Hartoshaye ।Ye Pathanti Naraa BhaktayaTeyshaam Shambhu Praseedati ।। ।। iti shri shiv rudrashtakam sampurnam ।।

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Shriganadhish Stotram

Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram : शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र….

शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र हिंदी पाठ : Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram ।। श्रीगणेशाय नमः ।। ।। श्रीशक्तिशिवावूचतुः ।। नमस्ते गणनाथाय गणानां पतये नमः ।भक्तिप्रियाय देवेश भक्तेभ्यः सुखदायक ॥ १ ॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च ।नाभिशेषाय देवाय ढुण्ढिराजाय ते नमः ॥ २ ॥ वरदाभयहस्ताय नमः परशुधारिणे ।नमस्ते सृणिहस्ताय नाभिशेषाय ते नमः ॥ ३ ॥ अनामयाय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नमः ।सगुणाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे निर्गुणाय च ॥ ४ ॥ ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च Shriganadhish Stotram गजानन नमोऽस्तु ते ।आदिपूज्याय ज्येष्ठाय ज्येष्ठराजाय ते नमः ॥ ५ ॥ मात्रे पित्रे च सर्वेषां हेरम्बाय नमो नमः ।अनादये च विघ्नेश विघ्नकर्त्रे नमो नमः ॥ ६ ॥ विघ्नहर्त्रे स्वभक्तानां Shriganadhish Stotram लम्बोदर नमोऽस्तु ते ।त्वदीयभक्तियोगेन योगीशाः शान्तिमागताः ॥ ७ ॥ किं स्तुवो योगरूपं तं प्रणमावश्च विघ्नपम् ।तेन तुष्टो भव स्वामिन्नित्युकत्वा तं प्रणेमतुः ॥ ८ ॥ तावुत्थाप्य गणाधीश उवाच तौ महेश्वरौ ।भवत्कृतमिदं स्तोत्रं मम भक्तिविवर्धनम् ॥ ९ ॥ भविष्यति च सौख्यस्य Shriganadhish Stotram पठते शुण्वते प्रदम् ।भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव पुत्रपौत्रादिकं तथा ॥ १० ॥ धनधान्यादिकं सर्वं लभते तेन निश्चितम् । ।। इति शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र संपूर्णम् ।। Shiv Shakti-Kritam Shriganadhish Stotram Lyrics : शिवशक्ति कृत श्रीगणाधीश स्तोत्र पाठ ।। shriganeshay namah ।। ।। shrishaktishivavuchatuh ।। namaste gananathay gananam pataye namah ।bhaktipriyay devesh bhaktebhyah sukhdayak ।। 1 ।। svanandavasine tubhyam siddhibuddhivaray ch ।nabhisheshay devay dhundhirajay te namah ।। 2 ।। varadabhayahastay namah parashudharine ।namaste srunihastay nabhisheshay te namah ।। 3 ।। anamayay sarvay sarvapujyay te namah ।sagunay namastubhyam bramane nirgunay ch ।। 4 ।। bramabhyo bramadatre ch gajanan namo̕stu te ।adipujyay jyeshthay jyeshtharajay te namah ।। 5 ।। matre pitre ch sarvesham herambaay namo namah ।anadaye ch vignesh vignakartre namo namah ।। 6 ।। vignahartre svabhaktanam lambodar namo̕stu te ।tvadiyabhaktiyogen yogishah shantimagatah ।। 7 ।। kim stuvo yogarupam tam pranamavasch vignapam ।ten tushto bhav svaaminnityukatva tam pranematuh ।। 8 ।। tavutthapya ganadhish uvach tau maheshvarau ।bhavatkrutamidam stotram mam bhaktivivardhanam ।। 9 ।। bhavishyati ch saukhyasya pathate shunvate pradam ।bhuktimuktipradam chaiv putrapautradikam tatha ।। 10 ।। dhandhanyadikam sarvam labhate ten nischitam । ।। iti shiv shakti-kritam shriganadhish stotram sampurnam ।।

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Nirjala Ekadashi 2026

Nirjala Ekadashi 2026 Date And Time : निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और दान का महत्व….

Nirjala Ekadashi 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और हमारी अत्यंत प्राचीन भारतीय संस्कृति में भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित व्रतों का अत्यधिक और गहरा आध्यात्मिक महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार मनाए जाने वाले तमाम उपवासों में एकादशी के व्रत को सर्वोपरि और सबसे श्रेष्ठ माना गया है। Nirjala Ekadashi 2026 शास्त्रों के अनुसार एक सामान्य वर्ष में कुल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन इन सभी में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को सबसे अधिक पुण्यकारी, शक्तिशाली और तपस्या के दृष्टिकोण से अत्यंत कठोर माना जाता है। इस साल Nirjala Ekadashi 2026 को लेकर देशभर के भक्तों के बीच काफी उत्साह और साथ ही तिथियों को लेकर थोड़ा असमंजस भी देखा जा रहा है। यह एक ऐसा जाग्रत उपवास है जो इंसान के शरीर और मन को गहरा संयम सिखाता है, विचारों को शुद्ध करता है और शरीर को एक नई सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। Nirjala Ekadashi 2026 आज के इस अत्यंत विस्तृत, एसईओ-फ्रेंडली (SEO Friendly) और शत-प्रतिशत मौलिक लेख में हम गहराई से जानेंगे कि यह पवित्र व्रत कब रखा जाएगा, इसके नियम क्या हैं, और इसका इतना अधिक महत्व क्यों है। Nirjala Ekadashi 2026 Date And Time : निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त…. तिथि का असमंजस और पंचांग की एकदम सटीक गणना : Uncertainty regarding the date and the highly precise calculations of the almanac. अक्सर हिंदू त्योहारों में अलग-अलग पंचांगों के भेदों के कारण तिथियों को लेकर संशय बन जाता है। इस बार भी कई लोग इस बात को लेकर गहरी उलझन में हैं कि Nirjala Ekadashi 2026 का पवित्र व्रत 24 जून को रखा जाएगा या फिर 25 जून को। Nirjala Ekadashi 2026 द्रिक पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, एकादशी तिथि 24 जून 2026 की शाम 6 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो जाएगी और इसका पूर्ण समापन अगले दिन 25 जून को रात 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगा। (वहीं कुछ अन्य पंचांगों के अनुसार यह तिथि 24 जून को रात 8:09 बजे से शुरू होकर 25 जून रात 9:14 बजे तक मान्य रहेगी)। हमारे वैदिक और सनातन धर्म में किसी भी व्रत या त्योहार को मनाने के लिए ‘उदया तिथि’ (यानी सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) को ही मुख्य और सबसे प्रामाणिक माना जाता है। अतः उदया तिथि के सर्वमान्य नियम के अनुसार, Nirjala Ekadashi 2026 का यह अत्यंत फलदायी व्रत 25 जून 2026, दिन गुरुवार को ही पूरे भारतवर्ष में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ रखा जाएगा। पूजा के अत्यंत शुभ मुहूर्त और मंगलकारी योग : Highly auspicious timings and propitious celestial combinations for the worship. इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना और ध्यान के लिए पंचांग में कई अत्यंत शुभ मुहूर्त बन रहे हैं। पंचांग के अनुसार, इस दिन प्रातः काल का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 5 मिनट से लेकर 4 बजकर 45 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना और पूजा-पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है। इसके साथ ही, दिन के समय अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। सबसे खास और दुर्लभ बात यह है कि इस बार Nirjala Ekadashi 2026 के पावन दिन पर ‘रवि योग’ का भी अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। यह मंगलकारी रवि योग सुबह 5 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर शाम 4 बजकर 29 मिनट तक पूरी तरह प्रभावी रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में रवि योग को जीवन के सभी दोषों को नष्ट करने वाला और किसी भी नए व शुभ कार्य को करने के लिए बहुत अच्छा माना गया है। भीमसेनी एकादशी की रहस्यमयी और पौराणिक कथा : The Mysterious and Mythological Legend of Bhimseni Ekadashi इस परम पावन एकादशी को सनातन धर्म में ‘पांडव एकादशी’ या ‘भीमसेनी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे एक बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक धार्मिक कथा जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांचों पांडवों में से महाबली भीम को छोड़कर सभी भाई-बहन और माता कुंती एकादशी का उपवास पूरे नियम से रखते थे। भीम को बहुत अधिक भूख लगती थी और वे किसी भी कीमत पर भूखे नहीं रह सकते थे। अपने इस आचरण और व्रत न कर पाने के कारण भीम मन ही मन बहुत आत्मग्लानि महसूस करते थे। तब अपनी इस परेशानी को लेकर उन्होंने महर्षि वेद व्यास जी से कोई उचित उपाय पूछा। महर्षि व्यास ने उनकी समस्या को समझते हुए उन्हें सलाह दी कि वे साल भर की अन्य एकादशियां छोड़ दें और केवल ज्येष्ठ मास में आने वाली इस विशेष एकादशी का व्रत बिना जल पिए (निर्जला) करें। भीम ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया, लेकिन बिना भोजन और पानी के वे मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी अत्यंत कठोर तपस्या और भीम के समर्पण के कारण इस महान व्रत का नाम ‘भीमसेनी एकादशी’ पड़ गया। शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि जो व्यक्ति जीवन में केवल इस एक Nirjala Ekadashi 2026 का उपवास बिना जल पिए रख लेता है, उसे साल भर की सभी एकादशियों के बराबर महान पुण्य फल की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है। भगवान विष्णु की अचूक पूजा विधि : The infallible method of worshipping Lord Vishnu यदि आप इस अगामी Nirjala Ekadashi 2026 का पूरा, अचूक और चमत्कारी फल पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस पूजा विधि का कड़ाई से पालन करें: व्रत के शुभ दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें और उगते हुए भगवान सूर्य देव को जल अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए स्नान के बाद पीले या साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें और हाथ जोड़कर अपने निर्जल व्रत का दृढ़ संकल्प लें। घर के स्वच्छ पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की सुंदर प्रतिमा स्थापित करें। पूजा में भगवान को पीले फूल, कुमकुम, अक्षत, पंचामृत और पीले फल अर्पित करें। भगवान विष्णु को जो भी सात्विक भोग लगाएं, उसमें पवित्र तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य शामिल करें, क्योंकि तुलसी के बिना भगवान विष्णु कोई भी भोग स्वीकार नहीं करते। भगवान के समक्ष शुद्ध घी का दीपक

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Kavacha Stotram

Sri Venkateswara Vajra-Kavacha Stotram : श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र…

श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Venkateswara Vajra-Kavacha Stotram in Hindi ।। मार्कण्डेय उवाच ।। नारायणं परब्रह्म सर्वकारणकारणम् ।प्रपद्ये वेङ्कटेशाख्यं तदेव कवचं मम ॥ 1 ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषो Kavacha Stotram वेङ्कटेशश्शिरोऽवतु ।प्राणेशः प्राणनिलयः प्राणान् रक्षतु मे हरिः ॥ 2 ॥ आकाशराट्सुतानाथ आत्मानं मे सदावतु ।देवदेवोत्तमो पायाद्देहं मे वेङ्कटेश्वरः ॥ 3 ॥ सर्वत्र सर्वकालेषु Kavacha Stotram मङ्गाम्बाजानिरीश्वरः ।पालयेन्मां सदा कर्मसाफल्यं नः प्रयच्छतु ॥ 4 ॥ य एतद्वज्रकवचमभेद्यं वेङ्कटेशितुः ।सायं प्रातः पठेन्नित्यं मृत्युं तरति निर्भयः ॥ 5 ॥ ।। इति श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र संपूर्णम् ।। Sri Venkateswara Vajra-Kavacha Stotram :श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र  ।। markandeya uvach ।। narayanam parabram sarvakaranakaranam ।prapadye venkateshakhyam tadev kavacham mam ॥ 1 ॥ sahasrashirsha purusho venkateshashshiro̕vatu ।praneshah prananilayah pranan rakshatu me harih ॥ 2 ॥ akasharatsutanath aatmanam me sadavatu ।devdevottamo payaddeham me venkateshvarah ॥ 3 ॥ sarvatra sarvakaleshu mangambajanirishvarah ।palayenmaam sada karmasafalyam nah prayachatu ॥ 4 ॥ ya etadvajrakavachamabhedyam venkateshituh ।sayam pratah pathennityam mrutyum tarati nirbhayah ॥ 5 ॥ ।। iti sri venkateswara vajra-kavach stotram sampurnam ।। श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र विशेषताए: श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र के साथ-साथ यदि श्री वेंकटेश्वर अष्टकम का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| श्रीवेंकटेश्वर वज्र कवच स्तोत्र के पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही श्री वेंकटेश जी की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Mangala Stotram

Sri Venkateswara Mangala Stotram: श्री वेंकटेश मंगल स्तोत्र….

श्री वेंकटेश मंगल स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Venkateswara Mangala Stotram in Hindi श्रियः कान्ताय कल्याणनिधये निधयेऽर्थिनाम् ।श्रीवेङ्कटनिवासाय श्रीनिवासाय मङ्गलम् ॥ १ ॥ लक्ष्मीसविभ्रमालोकसद्मविभ्रमचक्षुषे ।चक्षुषे सर्वलोकानां वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ २ ॥ श्रीवेङ्कटाद्रिशृङ्गाय मङ्गलाभराणाङ्घ्रये ।मङ्गलानां निवासाय वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ३ ॥ सर्वावयवसौन्दर्यसंपदा सर्वचेतसाम् ।सदा सम्मोहनायास्तु वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ४ ॥ नित्याय निरवद्याय Mangala Stotram सत्यानन्द चिदात्मने ।सर्वान्तरात्मने श्रीमद् वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ५ ॥ स्वतः सर्वविदे सर्वशक्तये सर्वशेषिणे ।सुलभाय सुशीलाय वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ६ ॥ परस्मै ब्रह्मणे Mangala Stotram पूर्णकामाय परमात्मने ।प्रपन्नपरतत्वाय वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ७ ॥ अकालतत्वविश्रान्तावात्मानमनुपश्यताम् ।अतृप्तामृतरूपाय वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ८ ॥ प्रायः स्वचरणौ पुंसां शरण्यत्वेन पाणिना ।कृपया दर्शयते श्रीमद् वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ९ ॥ दयामृततरङ्गिण्याः तरङ्गैरतिशीतलैः ।अपाङ्गैः सिञ्चते विश्वं वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ १० ॥ स्रग्भूषाम्बरहेतीनां सुषमावहमूर्तये ।सर्वार्तिशमनायास्तु वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ ११ ॥ श्रीवैकुण्ठविरक्ताय स्वामिपुष्करणीतटे ।रमया रममाणाय वेङ्कटेशाय मङ्गलम् ॥ १२ ॥ श्रीमद् सुन्दरजामातृमुनिमानसवासिने ।सर्वलोकनिवासाय श्रीनिवासाय मङ्गलम् ॥ १३ ॥ नमः श्रीवेङ्कटेशाय शुद्धज्ञानस्वरूपिणे ।वासुदेवाय शान्ताय श्रीनिवासाय मङ्गलम् ॥ १४ ॥ ॥ इति श्री वेंकटेश मंगल स्तोत्र संपूर्णम् ॥

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Dwadasa Nama Stotram

Srivenkatesa Dwadasa Nama Stotram: श्रीवेंकटेश द्वादश नाम स्तोत्रम्…

श्रीवेंकटेश द्वादश नाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srivenkatesa Dwadasa Nama Stotram in Hindi वेङ्कटेशो वासुदेवः वारिजासनवन्दितः,स्वामिपुष्करणीवासः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १ ॥ पीतांबरधरो देवः गरुडारूढशोभितः,विश्वात्मा विश्वलोकेशः विजयो वेङ्कटेश्वरः ॥ २ ॥ एतत् द्वादश नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः,सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णोस्सायुज्यमाप्नुयात् ॥ ३ ॥ ॥ इति श्रीवेंकटेश द्वादश नाम स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥ Srivenkatesa Dwadasa Stotram Lyrics : श्रीवेंकटेश द्वादश नाम स्तोत्रम् पाठ venkatesho vasudevahvarijasanavanditah,svaamipuskaranivasahshankhchakragadadharah ।। 1 ।। pitambaradharo devahgarudarudhashobhitah,vishvatma vishvalokeshahvijayo venkateshvarah ।। 2 ।। etat dvadash namanitrisandhyam yah pathennarah,sarvapapavinirmuktovishnossayujyamaapnuyat ।। 3 ।। ।। iti sri venkatesa dwadasa nama stotram sampurnam ।।

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Venkateswara Stotram

Sri Venkateswara Stotram : श्री वेंकटेश्वर स्तोत्र….

श्री वेंकटेश्वर स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Venkateswara Stotram in Hindi कमलाकुच चूचुक कुंकमतोनियतारुणि तातुल नीलतनो ।कमलायत लोचन लोकपतेविजयीभव वेंकट शैलपते ॥ सचतुर्मुख षण्मुख पंचमुखप्रमुखा खिलदैवत मौलिमणे ।शरणागत वत्सल सारनिधेपरिपालय मां वृष शैलपते ॥ अतिवेलतया तव दुर्विषहैरनु वेलकृतै Venkateswara Stotram रपराधशतैः ।भरितं त्वरितं वृष शैलपतेपरया कृपया परिपाहि हरे ॥ अधि वेंकट शैल मुदारमते-र्जनताभि मताधिक दानरतात् ।परदेवतया गदितानिगमैःकमलादयितान्न परंकलये ॥ कल वेणुर वावश गोपवधूशत कोटि वृतात्स्मर कोटि समात् ।प्रति पल्लविकाभि मतात्-सुखदात्वसुदेव सुतान्न परंकलये ॥ अभिराम गुणाकर दाशरधेजगदेक धनुर्थर धीरमते ।रघुनायक राम रमेश विभोवरदो भव देव दया जलधे ॥ अवनी तनया कमनीय करंरजनीकर चारु Venkateswara Stotram मुखांबुरुहम् ।रजनीचर राजत मोमि हिरंमहनीय महं रघुराममये ॥ सुमुखं सुहृदं सुलभं सुखदंस्वनुजं च सुकायम मोघशरम् ।अपहाय रघूद्वय मन्यमहंन कथंचन कंचन जातुभजे ॥ विना वेंकटेशं न नाथो न नाथःसदा वेंकटेशं स्मरामि स्मरामि ।हरे वेंकटेश प्रसीद प्रसीदप्रियं वेंकटॆश प्रयच्छ प्रयच्छ ॥ अहं दूरदस्ते पदां भोजयुग्मप्रणामेच्छया गत्य सेवां करोमि ।सकृत्सेवया नित्य सेवाफलं त्वंप्रयच्छ पयच्छ प्रभो वेंकटेश ॥ अज्ञानिना मया दोषा न शेषान्विहितान् हरे ।क्षमस्व त्वं क्षमस्व त्वं शेषशैल शिखामणे ॥ ॥ इति श्री वेंकटेश्वर स्तोत्र संपूर्णम् ॥

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Venkatesa Stotram

Shri Venkatesa Stotram : श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम्….

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् हिन्दी पाठ : Shri Venkatesa Stotram in Hindi वेङ्कटेशो वासुदेवः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।सङ्कर्षणोऽनिरुद्धश्च शेषाद्रिपतिरेव च ॥ १ ॥ जनार्दनः पद्मनाभो वेङ्कटाचलवासनः ।सृष्टिकर्ता जगन्नाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ २ ॥ गोविन्दो गोपतिः कृष्णः केशवो गरुडध्वजः ।वराहो वामनश्चैव नारायण अधोक्षजः ॥ ३ ॥ श्रीधरः पुण्डरीकाक्षः सर्वदेवस्तुतो हरिः ।श्रीनृसिंहो महासिंहः सूत्राकारः पुरातनः ॥ ४ ॥ रमानाथो महीभर्ता Venkatesa Stotram भूधरः पुरुषोत्तमः ।चोळपुत्रप्रियः शान्तो ब्रह्मादीनां वरप्रदः ॥ ५ ॥ श्रीनिधिः सर्वभूतानां भयकृद्भयनाशनः ।श्रीरामो रामभद्रश्च भवबन्धैकमोचकः ॥ ६ ॥ भूतावासो गिरावासः श्रीनिवासः श्रियःपतिः ।अच्युतानन्तगोविन्दो विष्णुर्वेङ्कटनायकः ॥ ७ ॥ सर्वदेवैकशरणं सर्वदेवैकदैवतम् ।समस्तदेवकवचं सर्वदेवशिखामणिः ॥ ८ ॥ इतीदं कीर्तितं यस्य Venkatesa Stotram विष्णोरमिततेजसः ।त्रिकाले यः पठेन्नित्यं पापं तस्य न विद्यते ॥ ९ ॥ राजद्वारे पठेद्घोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे ।भूतसर्पपिशाचादिभयं नास्ति कदाचन ॥ १० ॥ अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो धनवान् भवेत् ।रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११ ॥ यद्यदिष्टतमं लोके तत्तत्प्राप्नोत्यसंशयः ।ऐश्वर्यं राजसम्मानं भक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १२ ॥ विष्णोर्लोकैकसोपानं सर्वदुःखैकनाशनम् ।सर्वैश्वर्यप्रदं नॄणां सर्वमङ्गलकारकम् ॥ १३ ॥ मायावी परमानन्दं त्यक्त्वा वैङ्कुण्ठमुत्तमम् ।स्वामिपुष्करिणीतीरे रमया सह मोदते ॥ १४ ॥ कल्याणाद्भुतगात्राय कामितार्थप्रदायिने ।श्रीमद्वेङ्कटनाथाय श्रीनिवासाय ते नमः ॥ १५ ॥ वेङ्कटाद्रिसमं स्थानं ब्रह्माण्डे नास्ति किञ्चन ।वेङ्कटेशसमो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Ganesh Stotram

Shri Vishnu krutam-Ganesh Stotram : श्रीविष्णु कृतं गणेश स्तोत्र….

श्रीविष्णु कृतं गणेश स्तोत्र हिंदी:Shri Vishnu krutam-Ganesh Stotram ॥ श्रीविष्णुरुवाच ॥ ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि ब्रह्मज्योतिः सनातनम् ।निरुपितुमशक्तोsहमनुरुपमनीहकम् ॥ १ ॥ प्रवरं सर्वदेवानां सिद्धानां योगिनां गुरुम् ।सर्वस्वरुपं सर्वेशं ज्ञानराशिस्वरुपिणम् ॥ २ ॥ अव्यक्तमक्षरं नित्यं सत्यमात्मस्वरुपिणम् ।वायुतुल्यातिनिर्लिप्तं चाक्षतं सर्वसाक्षिणम् ॥ ३ ॥ संसारार्णवपारे च मायापोते सुदुर्लभे ।कर्णधारस्वरुपं च भक्तानुग्रहकारकम् ॥ ४ ॥ वरं वरेण्यं वरदं वरदानामपीश्र्वरम् ।सिद्धं सिद्धिस्वरुपं च सिद्धिदं सिद्धिसाधनम् ॥ ५ ॥ ध्यानातिरिक्तं ध्येयं च Ganesh Stotram ध्यानासाध्यं च धार्मिकम् ।धर्मस्वरुपं धर्मज्ञं धर्माधर्मफलप्रदम् ॥ ६ ॥ बीजं संसारवृक्षाणामङकुरं च तदाश्रयम् ।स्त्रीपुत्रपुंसकानां च रुपमेतदतीन्द्रियम् ॥ ७ ॥ सर्वाद्यमग्रपूज्यं च सर्वपूज्यं गुणार्णवम् ।स्वेच्छया सगुणं ब्रह्म निर्गुणं चापि स्वेच्छया ॥ ८ ॥ स्वयं प्रकृतिरुपं च प्राकृतं प्रकृतेः परम् ।त्वां स्तोतुमक्षमोsनन्तः सहस्त्रवदनेन च ॥ ९ ॥ न क्षमः पञ्चवक्त्रश्र्च न क्षमश्र्चतुराननः ।सरस्वती न शक्ता च न शक्तोsहं तव स्तुतौ ।न शक्ताश्र्च चतुर्वेदाः के वा ते वेदवादिनः ॥ १० ॥ इत्येवं स्तवनं कृत्वा सुरेशं सुरसंसदि ।सुरेशश्र्च सुरैः सार्द्धं विरराम रमापतिः ॥ ११ ॥ इदं विष्णुकृतं स्तोत्रं Ganesh Stotram गणेशस्य च यः पठेत् ।सायंप्रातश्र्च मध्याह्ने भक्तियुक्तः समाहितः ॥ १२ ॥ तद्विघ्ननिघ्नं कुरुते विघ्नेशः सततं मुने ।वर्धते सर्वकल्याणं कल्याणजनकः सदा ॥ १३ ॥ यात्राकाले पठित्वा तु यो याति भक्तिपूर्वकम् ।तस्य सर्वाभीष्टसिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ १४ ॥ तेन दृष्टं च दुःस्वप्नं सुस्वप्नमुपजायते ।कदापि न भवेत्तस्य ग्रहपीडा च दारुणा ॥ १५ ॥ भवेद् विनाशः शत्रूणां बन्धूनां च विवर्धनम् । शश्र्वदिघ्नविनाशश्र्च शश्र्वत् सम्पद्विवर्धनम् ॥ १६ ॥ स्थिरा भवेद् गृहे लक्ष्मीः पुत्रपौत्रविवर्धिनी ।सर्वैश्र्वर्यमिह प्राप्य ह्यन्ते विष्णुपदं लभेत् ॥ १७ ॥ फलं चापि च तीर्थानां यज्ञानां यद् भवेद् ध्रुवम् ।महतां सर्वदानानां श्रीगणेशप्रसादतः ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीविष्णुकृतं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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