STOTRAM

Angaraka Stotram Lyrics:श्री अंगारक स्तोत्रम् हिंदी,मंगल दोष निवारण के लिए: श्री अंगारक स्तोत्रम् का चमत्कारी पाठ

Angaraka Stotram:श्री अंगारक स्तोत्रम् हिंदी (Angaraka Stotram) एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है इसका नित्य पाठ करने से जातक की जन्मकुंडली में मंगल दोष या मांगलिक दोष भी दूर हो जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता का नाश व कर्ज से भी छुटकारा मिलता है और धन समृधि का आगमन होने लगता है। अंगारक स्तोत्रम् का पाठ करने से जातक की हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। Angaraka Stotram:श्री अंगारक स्तोत्रम् भगवान मंगलदेव (अंगारक) को समर्पित एक स्तोत्र है, जो उनकी कृपा प्राप्त करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए पढ़ा जाता है। मंगल ग्रह का हिंदू ज्योतिष में विशेष महत्व है, और यह स्तोत्र उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी है जो मंगल दोष से प्रभावित हैं या जिनके जीवन में संघर्ष, रोग, या अन्य समस्याएं चल रही हैं। Angaraka Stotram:श्री अंगारक स्तोत्रम् का पाठ विधि Angaraka Stotram kab karna chahiye:कब करना चाहिए? Angaraka Stotram kese kare:कैसे करें? Angaraka Stotram Lyrics:श्री अंगारक स्तोत्रम् हिंदी अंगारकः शक्तिधरो लोहितांगो धरासुतः। कुमारो मंगलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥१॥ ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृत् रोगनाशनः। विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥२॥ सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः। लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥३॥ रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः। नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत् सततं नरः॥४॥ ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति। धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् ॥५॥ वंशोद्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः, योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मङ्गलं बहुपुष्पकैः। सर्वं नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् ॥६॥

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Anadi Kalpeshwar Stotra Lyrics:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र हिंदी

Anadi Kalpeshwar Stotra:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र हिंदी (Anadi Kalpeshwar Stotra) एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, इसका नियमित रूप से पाठ करने से जातक को सभी प्रकार के डर, भय, रोग और तनाव से मुक्ति प्राप्त होने लगती है। अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र का पाठ रोजाना करने से मनुष्य को सभी तीर्थों का फल भी शीघ्र ही प्राप्त होता हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद बना रहता है। Anadi Kalpeshwar Stotra:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति में रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो उनके अनादि और सर्वशक्तिमान स्वरूप का वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनके अनंत आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा जाता है। इसका पाठ जीवन में शांति, समृद्धि, और संकटों से मुक्ति के लिए किया जाता है। Anadi Kalpeshwar Stotra:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र का महत्व कब और कैसे करें पाठ? कब करना चाहिए? कैसे करें? Anadi Kalpeshwar Stotra Lyrics:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र हिंदी कर्पूरगौरो भुजगेन्द्रहारो गङ्गाधरो लोकहितावहः सः । सर्वेश्र्वरो देववरोऽप्यघोरो योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ १ ॥ कैलासवासी गिरिजाविलासी श्मशानवासी सुमनोनिवासी । काशीनिवासी विजयप्रकाशी योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ २ ॥ त्रिशूलधारी भवदुःखहारी कन्दर्पवैरी रजनीशधारी । कपर्दधारी भजकानुसारी योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ३ ॥ लोकाधिनाथः प्रमथाधिनाथः कैवल्यनाथः श्रुतिशास्त्रनाथः । विद्यार्थनाथः पुरुषार्थनाथो योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ४ ॥ लिङ्गं परिच्छेत्तुमधोगतस्य नारायणश्र्चोपरि लोकनाथः । बभूवतुस्तावपि नो समर्थौ योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ५ ॥ यं रावणस्ताण्डवकौशलेन गीतेन चातोषयदस्य सोऽत्र । कृपाकटाक्षेण समृद्धिमाप योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ६ ॥ सकृच्च बाणोऽवनमय्यशीर्षं यस्याग्रतः सोप्यलभत्समृद्धिम् । देवेन्द्रसम्पत्त्यधिकां गरिष्ठां योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ७ ॥ गुणान्विमातुं न समर्थ एष वेषश्र्च जीवोऽपि विकुण्ठितोऽस्य । श्रुतिश्र्च नूनं चलितं बभाषे योऽनादिकल्पेश्र्वर एव सोऽसौ ॥ ८ ॥ अनादिकल्पेश उमेश एतत् स्तवाष्टकं यः पठति त्रिकालम् । स धौतपापोऽखिललोकवन्द्यं शैवं पदं यास्यति भक्तिमांश्र्चेत् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीकृतमनादिकल्पेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ Anadi Kalpeshwar Stotra:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र विशेषताऐ: Anadi Kalpeshwar Stotra:अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र के साथ-साथ यदि श्री नारायण अष्टकम का पाठ किया जाए तो, अनादि कल्पेश्वर स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाता है। शिव अमोघ कवच का पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है। मन की शांति और जीवन में से सभी बुराईयों को दूर रखने के लिए लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। स्तोत्र का महत्व समझने के लिए स्तोत्र शक्ति पुस्तक को पढना चाहिए। सूर्य ग्रह के अशुभ फल से बचने के लिए सूर्य मंत्र  सबसे अच्छा उपाय है।

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Agney Stotra Lyrics:आग्नेय स्तोत्र हिंदी,महत्व और इसके पाठ से लाभ

Agney Stotra:आग्नेय स्तोत्र विशेषताऐ आग्नेय स्तोत्र (Agney Stotra) के साथ-साथ यदि दुर्गा कवच और चंडी कवच का पाठ किया जाए तो, आग्नेय स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है। यह कवच शीघ्र ही फल देने लग जाता है। नारायणास्त्र कवच का पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है। अगर आपका मन पढाई में नही लग पा रहा है, तो आपको सरस्वती सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। जीवन में शांति प्राप्त करने के लिए नृसिंह विजय कवच का पाठ करना चाहिए। संतान या पुत्र प्राप्ति के लिए गोपाल कवच का पाठ करना चाहिए। Agney Stotra:आग्नेय स्तोत्र भगवान अग्नि को समर्पित एक पवित्र स्तोत्र है, जो विशेष रूप से अग्नि देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसे जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य, और शुद्धि के लिए पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र वैदिक और पौराणिक ग्रंथों से लिया गया है और अग्नि तत्व की उपासना में सहायक है। Agney Stotra ke Labh:लाभ: कैसे करें? Agney Stotra:आग्नेय स्तोत्र Agney Stotra:आग्नेय स्तोत्र हिंदी (Agney Stotra) एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, इसका नित्य पाठ करने से सभी प्रकार की तंत्र-मन्त्र-यंत्र और ग्रह पीड़ा से रक्षा होती है। इस आग्नेय स्तोत्र का पाठ बोलकर यानि वाचिक, उच्च स्वर में करना चाहियें, जिससें आपको इस स्तोत्र का शीघ्र लाभ मिलें। अधुना गिरिजानन्द आञ्जनेयास्त्रमुत्तमम् । समन्त्रं सप्रयोगं च वद मे परमेश्वर ।।१।। ।।ईश्वर उवाच।। ब्रह्मास्त्रं स्तम्भकाधारि महाबलपराक्रम् । मन्त्रोद्धारमहं वक्ष्ये श्रृणु त्वं परमेश्वरि ।।२।। आदौ प्रणवमुच्चार्य मायामन्मथ वाग्भवम् । शक्तिवाराहबीजं व वायुबीजमनन्तरम् ।।३।। विषयं द्वितीयं पश्चाद्वायु-बीजमनन्तरम् । ग्रसयुग्मं पुनर्वायुबीजं चोच्चार्य पार्वति ।।४।। स्फुर-युग्मं वायु-बीजं प्रस्फुरद्वितीयं पुनः । वायुबीजं ततोच्चार्य हुं फट् स्वाहा समन्वितम् ।।५।। आञ्जनेयास्त्रमनघे पञ्चपञ्चदशाक्षरम् । कालरुद्रो ऋषिः प्रोक्तो गायत्रीछन्द उच्यते ।।६।। देवता विश्वरुप श्रीवायुपुत्रः कुलेश्वरि । ह्रूं बीजं कीलकं ग्लौं च ह्रीं-कार शक्तिमेव च ।।७।। प्रयोगं सर्वकार्येषु चास्त्रेणानेन पार्वति । विद्वेषोच्चाटनेष्वेव मारणेषु प्रशस्यते ।।८।। सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे। विनियोगः- ॐ अस्य श्रीहनुमाद्-आञ्जनेयास्त्र-विद्या-मन्त्रस्य कालरुद्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, विश्वरुप-श्रीवायुपुत्रो देवता, ह्रूं बीजं, ग्लौं कीलकं, ह्रीं शक्तिः, मम शत्रुनिग्रहार्थे हनुमन्नस्त्र जपे विनियोगः। मन्त्रः- “ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सौं ग्लौं यं शोषय शोषय यं ग्रस ग्रस यं विदारय विदारय यं भस्मी कुरु कुरु यं स्फुर स्फुर यं प्रस्फुर प्रस्फुर यं सौं ग्लौं हुं फट् स्वाहा ।” ।। विधान ।। नामद्वयं समुच्चार्यं मन्त्रदौ कुलसुन्दरि । प्रयोगेषु तथान्येषु सुप्रशस्तो ह्ययं मनुः ।।९।। आदौ विद्वेषणं वक्ष्ये मन्त्रेणानेन पार्वति । काकोलूकदलग्रन्थी पवित्रीकृत-बुद्धिमान् ।।१०।। तर्पयेच्छतवारं तु त्रिदिनाद्द्वेषमाप्नुयात् । ईक्ष्यकर्ममिदं म मन्त्रांते त्रिशतं जपेत् ।।११।। वसिष्ठारुन्धतीभ्यां च भवोद्विद्वेषणं प्रिये । महद्विद्वेषणं भूत्वा कुरु शब्दं विना प्रिये ।।१२।। मन्त्रं त्रिशतमुच्चार्य नित्यं मे कलहप्रिये । ग्राहस्थाने ग्रामपदे उच्चार्याष्ट शतं जपेत् ।।१३।। ग्रामान्योन्यं भवेद्वैरमिष्टलाभो भवेत् प्रिये । देशशब्द समुच्चार्य द्विसहस्त्रं जपेन्मनुम् ।।१४।। देशो नाशं समायाति अन्योन्यं क्लेश मे वच । रणशब्दं समुच्चार्य जपेदष्टोत्तरं शतम् ।।१५।। अग्नौ नता तदा वायुदिनान्ते कलहो भवेत् । उच्चाटन प्रयोगं च वक्ष्येऽहं तव सुव्रते ।।१६।। उच्चाटन पदान्तं च अस्त्रमष्टोत्तरं शतम् । तर्पयेद्भानुवारे यो निशायां लवणांबुना ।।१७।। त्रिदिनादिकमन्त्रांते उच्चाटनमथो भवेत् । भौमे रात्रौ तथा नग्नो हनुमन् मूलमृत्तिकाम् ।।१८।। नग्नेन संग्रहीत्वा तु स्पष्ट वाचाष्टोत्तरं जपेत् । समांशं च प्रेतभस्म शल्यचूर्णे समांशकम् ।।१९।। यस्य मूर्ध्नि क्षिपेत्सद्यः काकवद्-भ्रमतेमहीम् । विप्रचाण्डालयोः शल्यं चिताभस्म तथैव च ।।२०।। हनुमन्मूलमृद्ग्राह्या बध्वा प्रेतपटेन तु । गृहे वा ग्राममध्ये वा पत्तने रणमध्यमे ।।२१।। निक्षिपेच्छत्रुगर्तेषु सद्यश्चोच्चाटनं भवेत् । तडागे स्थापयित्वा तु जलदारिद्यमाप्नुयात् ।।२२।। मारणं संप्रवक्ष्यामि तवाहं श्रृणु सुव्रते । नरास्थिलेखनीं कृत्वा चिताङ्गारं च कज्जलम् ।।२३।। प्रेतवस्त्रे लिखेदस्त्रं गर्त्त कृत्वा समुत्तमम् । श्मशाने निखनेत्सद्यः सहस्त्राद्रिपुमारणे ।।२४।। न कुर्याद्विप्रजातिभ्यो मारणं मुक्तिमिच्छता । देवानां ब्राह्मणानां च गवां चैव सुरेश्वरि ।।२५।। उपद्रवं न कुर्वीत द्वेषबुद्धया कदाचन । प्रयोक्तव्यं तथान्येषां न दोषो मुनिरब्रवीत् ।।२६।। ।। इति सुदर्शन-संहिताया आञ्नेयास्त्रम् ।।

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दशरथकृत शनि स्तोत्र (Dashratha Shani Sotra)

Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र: एक संक्षिप्त परिचय Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र एक प्राचीन और प्रभावशाली स्तोत्र है जो भगवान शनि को समर्पित है। माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना स्वयं राजा दशरथ ने की थी। इस स्तोत्र में भगवान शनि की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे आशीर्वाद मांगा गया है। Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र का महत्व Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करें? Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र के कुछ लाभ दशरथ उवाच:प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥ रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् ।सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥ याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं ।एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥ प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा ।पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥ Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र:नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥ नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥ नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥ नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥ नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥ अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥ तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥ ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥ देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥ प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥ दशरथ उवाच:प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥ हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले।कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।हे दीर्घ नेत्र वाले, शुष्कोदरा निराले॥भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे॥ अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी॥संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो।हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि।वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर।हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर॥देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।स्वीकारो नमन मेरे। हैं पूज्य चरण तेरे॥

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एक ऐसा भगवान सूर्य का अद्भुत स्तोत्र-जिसके जपने से हो जाता है सभी रोगों का नाश

भगवान सूर्य का अवतरण संसार के कल्याण के लिए हुआ है इसलिए पंचदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। शास्त्र कहते हैं कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए। सूर्य की उपासना से मनुष्य का तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है; मनुष्य दीर्घायु होता है। सूर्य समस्त नेत्र-रोग व चर्म-रोग को दूर करने वाले देवता हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने अपने कोढ़ के रोग को सूर्य की उपासना से दूर किया था। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब बलवान होने के साथ ही अत्यन्त रूपवान भी थे। अपनी सुन्दरता का अभिमान ही उनके पतन का कारण बना। एक बार रुद्रावतार दुर्वासामुनि द्वारकापुरी में आए। तप से अत्यन्त क्षीण हुए दुर्वासा को देखकर साम्ब ने उनका उपहास किया। इससे क्रोध में आकर दुर्वासामुनि ने साम्ब को शाप दे दिया कि ‘तुम कोढ़ी हो जाओ।’ उपहास बुरा होता है; और वही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब अत्यन्त भयंकर कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गए। रोग दूर करने के लिए अनेक उपचार किए पर उनका कुष्ठ नहीं मिटा। तब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से साम्ब चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य की आराधना में लग गए। रोग से मुक्ति के लिए साम्ब नित्य भगवान सूर्य के सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। एक दिन भगवान सूर्य ने साम्ब को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा–’तुम्हें सहस्त्रनाम से मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें अपने अत्यन्त प्रिय एवं पवित्र इक्कीस नाम बताता हूँ, उनके पाठ से सहस्त्रनाम के पाठ का फल प्राप्त होगा। जो मनुष्य दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, संतान आदि वांछित फल प्राप्त करेंगे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाएंगे।’ तब भगवान सूर्य ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को अपने 21 नाम बताये जो ‘स्तवराज’ के नाम से भी जाने जाते हैं। ये नाम भगवान सूर्य के सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्र के रूप में आज भी विद्यमान है –॥ सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्रम् ॥विनियोगः – ॐ श्री सूर्यस्तवराजस्तोत्रस्य श्रीवसिष्ठ ऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीसूर्यो देवता ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यासः – श्रीवसिष्ठऋषये नमः शिरसि ।अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीसूर्यदेवाय नमः हृदि ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगापशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ ।ध्यानं –ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं द्विभुजं रक्तवाससे ।दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्मादिभिः अलङ्कृतम् ॥मानस पूजनं एवं स्तोत्रपाठः –ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः ।लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षु ग्रहेश्वरः ॥लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा ।तपनः तापनः चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥गभस्तिहस्तो ब्रध्नश्च सर्वदेवनमस्कृतः ।एकविंशतिः इत्येष स्तव इष्टः सदा मम ॥॥ फलश्रुतिः ॥श्रीः आरोग्यकरः चैव धनवृद्धियशस्करः ।स्तवराज इति ख्यातः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥यः एतेन महाबहो द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये ।स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥कायिकं वाचिकं चैव मानसं यच्च दुष्कृतम् ।एकजप्येन तत् सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः ॥एकजप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च ।बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च ॥अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाति प्रदक्षिणे ।पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः ॥एवं उक्तवा तु भगवानः भास्करो जगदीश्वरः ।आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः ।पूतात्मा नीरुजः श्रीमान् तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान् ॥भगवान् सूर्यनामावली१. विकर्तन २. विवस्वान् ३. मार्तण्ड ४. भास्कर ५. रवि६. लोकप्रकाशक ७. श्रीमान् ८. लोकचक्षु ९. ग्रहेश्वर१०. लोकसाक्षी ११. त्रिलोकेश १२. कर्ता १३. हर्ता १४. तमिस्रहा१५. तपन १६. तापन १७. शुचि १८. सप्ताश्ववाहन१९. गभस्तिहस्त २०. ब्रघ्न ( ब्रह्मा ) २१. सर्वदेवनमस्कृतइति ।

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माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति हेतु अमोघ प्रयोग

आज मैं आपको माता महा लक्ष्मी के एक ऐसे स्तोत्र के बारे में बताने जा रहा हूँ जोकि अपने आप में अद्भुत है और जिसको केवल रोज एक बार पढ़ लेने से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इस स्तोत्र का नाम है महालक्ष्मी अष्टकम.. जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्तोत्र मात्र आठ छंद का है और यह स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली है जिससे सुनकर माता महा लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इसके पीछे एक कथा है- एक बार माता लक्ष्मी विष्णुलोक से रूठकर, पुष्कर में एक सरोवर के अन्दर एक कमल के फूल की नाल के अन्दर जाकर बैठ गयी. माता लक्ष्मी के रूठ जाने से और वहां से चले जाने से, पूरे देवलोक के साथ साथ समस्त संसार की कान्ति क्षय होने लगी. समस्त देवतागण परेशान हो गए. किसी भी देवता को माता लक्ष्मी का पता नहीं मिल रहा था. तब देवराज इन्द्र ने माता महालक्ष्मी को दूंढ़ निकाला और उस कमल के पुष्प के सामने खड़े होकर माता महा लक्ष्मी की स्तुति की और माता को प्रसन्न करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम नामक स्तोत्र की रचना की जिसे सुनकर माता अत्यंत प्रसन्न हुई और प्रकट हो गयी और दोबारा विष्णुलोक चली गयी. इस भगवान् इन्द्र द्वारा रचित महालक्ष्मी अष्टकम की इतनी महिमा है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य एक बार भी पाठ कर ले वहां माता लक्ष्मी का वास सदैव बना रहता है. महालक्ष्मी अष्टकम नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते.‌ शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते..१. नमस्ते गरुडारुढ़े कोलासुर भयंकरी. सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..२. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी. सर्वदुखहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..३. सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी. मन्त्रपूते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..४. आद्यंतरहिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी. योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते..५. स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे. महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..६. पद्मासनस्थिते देवी परब्रह्मस्वरूपिणी. परमेशी जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..७. श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते. जगतस्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..८. महालक्ष्मय्ष्ट्कम स्तोत्रं यः पठेदक्ति मान्नरः. सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा..९. एककाले पठेन्नित्यम महापापविनाशनम. द्विकालं यः पठेन्नित्यम धनधान्यसमन्वितः..१०. त्रिकालं यः पठेन्नित्यम महाशत्रुविनाशनम. महालक्ष्मीर्भवेंनित्यम प्रसन्ना वरदा शुभा..११.

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श्री राम रक्षा स्तोत्रम् (Shri Ram Raksha Stotram)

विनियोग:अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।श्री सीतारामचंद्रो देवता ।अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।श्रीमान हनुमान कीलकम ।श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः । अथ ध्यानम्‌:ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥ राम रक्षा स्तोत्रम्:चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥ सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥ रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥ कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥ जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥ करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥ सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥ जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥ एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥ पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥ रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥ जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥ वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥ आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥ आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥ फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥ शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥ आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥ सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥ रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥ वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥ इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥ रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥ रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥ श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥ माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी,रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,जाने नैव जाने न जाने ॥30॥ दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥ लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥ भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥ रामो राजमणिः सदा विजयते,रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।रामान्नास्ति परायणं परतरं,रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

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महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि (Mahishasura Mardini Stotram – Aigiri Nandini)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरतेदनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरतेशिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपतेरिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृतेचतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरेत्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटकेकनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥ जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरतेविरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपतेत्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललतेसकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचेजितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

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दत्तात्रेय स्तोत्रम् (Dattatreya Strotam)

॥ श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् ॥जटाधरं पाण्डुराङ्गं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ विनियोग –अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ स्तोत्रम् –जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १॥ जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ २॥ कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ३॥ र्हस्वदीर्घकृशस्थूल-नामगोत्र-विवर्जित ।पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ४॥ यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ५॥ आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ६॥ भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ७॥ दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपध्राय च ।सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ८॥ जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रमातापुरनिवासिने ।जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ९॥ भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १०॥ ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ११॥ अवधूतसदानन्दपरब्रह्मस्वरूपिणे ।विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १२॥ सत्यंरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १३॥ शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १४॥ क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १५॥ दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १६॥ शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १७॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ १८॥॥ इति श्रीनारदपुराणे नारदविरचितं दत्तात्रेयस्तोत्रं सुसम्पूर्णम् ॥

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पाशुपतास्त्र स्तोत्र

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे। ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट। हूंकारास्त्राय फट। वज्र हस्ताय फट। शक्तये फट। दण्डाय फट। यमाय फट। खडगाय फट। नैऋताय फट। वरुणाय फट। वज्राय फट। पाशाय फट। ध्वजाय फट। अंकुशाय फट। गदायै फट। कुबेराय फट। त्रिशूलाय फट। मुदगराय फट। चक्राय फट। पद्माय फट। नागास्त्राय फट। ईशानाय फट। खेटकास्त्राय फट। मुण्डाय फट। मुण्डास्त्राय फट। काड्कालास्त्राय फट। पिच्छिकास्त्राय फट। क्षुरिकास्त्राय फट। ब्रह्मास्त्राय फट। शक्त्यस्त्राय फट। गणास्त्राय फट। सिद्धास्त्राय फट। पिलिपिच्छास्त्राय फट। गंधर्वास्त्राय फट। पूर्वास्त्रायै फट। दक्षिणास्त्राय फट। वामास्त्राय फट। पश्चिमास्त्राय फट। मंत्रास्त्राय फट। शाकिन्यास्त्राय फट। योगिन्यस्त्राय फट। दण्डास्त्राय फट। महादण्डास्त्राय फट। नमोअस्त्राय फट। शिवास्त्राय फट। ईशानास्त्राय फट। पुरुषास्त्राय फट। अघोरास्त्राय फट। सद्योजातास्त्राय फट। हृदयास्त्राय फट। महास्त्राय फट। गरुडास्त्राय फट। राक्षसास्त्राय फट। दानवास्त्राय फट। क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट। त्वष्ट्रास्त्राय फट। सर्वास्त्राय फट। नः फट। वः फट। पः फट। फः फट। मः फट। श्रीः फट। पेः फट। भूः फट। भुवः फट। स्वः फट। महः फट। जनः फट। तपः फट। सत्यं फट। सर्वलोक फट। सर्वपाताल फट। सर्वतत्व फट। सर्वप्राण फट। सर्वनाड़ी फट। सर्वकारण फट। सर्वदेव फट। ह्रीं फट। श्रीं फट। डूं फट। स्त्रुं फट। स्वां फट। लां फट। वैराग्याय फट। मायास्त्राय फट। कामास्त्राय फट। क्षेत्रपालास्त्राय फट। हुंकरास्त्राय फट। भास्करास्त्राय फट। चंद्रास्त्राय फट। विघ्नेश्वरास्त्राय फट। गौः गां फट। स्त्रों स्त्रौं फट। हौं हों फट। भ्रामय भ्रामय फट। संतापय संतापय फट। छादय छादय फट। उन्मूलय उन्मूलय फट। त्रासय त्रासय फट। संजीवय संजीवय फट। विद्रावय विद्रावय फट। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट।

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श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ॐ अथ सकलसौभाग्यदायक श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् । शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १॥ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २॥ व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३॥ व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्रीवैशम्पायन उवाच — श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७॥ युधिष्ठिर उवाच — किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९॥ भीष्म उवाच — जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १०॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२॥ ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे श‍ृणु पापभयापहम् ॥ १८॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ॥ छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २०॥ अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥ २१॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥ अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं ॥ २२ ॥ पूर्वन्यासः । श्रीवेदव्यास उवाच — ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता । अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् । देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः । उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः । शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् । शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम् । त्रिसामा सामगः सामेति कवचम् । आनन्दं परब्रह्मेति योनिः । ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥ श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् । श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थे सहस्रनामस्तोत्रपाठे विनियोगः ॥ अथ न्यासः । ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः । मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः । हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः । गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः । पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः । सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः । करसम्पूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः ॥ इति ऋषयादिन्यासः ॥ अथ करन्यासः । ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः । अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः । ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः । सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः । अथ षडङ्गन्यासः । ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः । अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा । ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट् । सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम् । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट् । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट् । इति षडङ्गन्यासः ॥ श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं करिष्ये इति सङ्कल्पः । अथ ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १॥ भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २॥ ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३॥ मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं स्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६॥ छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७॥ स्तोत्रम् । हरिः ॐ । विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥ योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥ सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥ स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥ अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥ अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥ ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥ ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥ सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥ अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥ वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥ रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३॥ सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥ भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥ उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७॥ वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८॥ महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥ महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥ मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥ अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥ गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥ अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥ आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥ असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥ वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥ सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥ ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥ अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥ भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥ युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥ इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥ अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥ स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः

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नारायणस्तोत्रम्

श्री गणेशाय नमः । नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥ नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥ ध्रु ॥ करुणापारावार वरुणालयगम्भीर ॥ नारायण ॥ १॥ घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाश ॥ नारायण ॥ २॥ यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार ॥ नारायण ॥ ३॥ पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान ॥ नारायण ॥ ४॥ मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष ॥ नारायण ॥ ५॥ राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक ॥ नारायण ॥ ६॥ मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद ॥ नारायण ॥ ७॥ बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड ॥ नारायण ॥ ८॥ वारिजभूषाभरण राजिवरुक्मिणीरमण ॥ नारायण ॥ ९॥ जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र ॥ नारायण ॥ १०॥ पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर ॥ नारायण ॥ ११॥ अघबकक्षयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे ॥ नारायण ॥ १२॥ हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर ॥ नारायण ॥ १३॥ दशरथराजकुमार दानवमदसंहार ॥ नारायण ॥ १४॥ गोवर्धनगिरिरमण गोपीमानसहरण ॥ नारायण ॥ १५॥ शरयूतीरविहार सज्जनऋषिमन्दार ॥ नारायण ॥ १६॥ विश्वामित्रमखत्र विविधपरासुचरित्र ॥ नारायण ॥ १७॥ ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद ॥ नारायण ॥ १८॥ जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील ॥ नारायण ॥ १९॥ दशरथवाग्धृतिभार दण्डकवनसञ्चार ॥ नारायण ॥ २०॥ मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार ॥ नारायण ॥ २१॥ वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य ॥ नारायण ॥ २२॥ वालीनिग्रह मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर ॥ नारायण ॥ २३॥ जलनिधिबन्धनधीर रावणकण्ठविदार ॥ नारायण ॥ २४॥ ताटीमददलनाढ्य नटगुणविविधधनाढ्य ॥ नारायण ॥ २५॥ गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन ॥ नारायण ॥ २६॥ सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार ॥ नारायण ॥ २७॥ अचलोद्धृतिचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर ॥ नारायण ॥ २८॥ नैगमगानविनोद रक्षःसुतप्रह्लाद ॥ नारायण ॥ २९॥ रक्षित सुप्रह्लाद भारतीयतिवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर ॥ नारायण ॥ ३०॥ । इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं नारायणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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