RISHIKESH

श्री भरत मंदिर: ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दिए थे दर्शन श्री भरत मंदिर उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में स्थित है। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। श्री भरत मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर से ही ऋषिकेश शहर का अस्तित्व सामने आया है। इस मंदिर में बहुत सी प्राचीन कलाकृतियों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। श्री भरत मंदिर का इतिहास श्री भरत मंदिर का उल्लेख हिन्दू धर्म के स्कन्द पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, नृसिंह पुराण और वराह पुराण में किया गया है। इसमें यह वह स्थान है जहाँ पर परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा था कि हृषीकेश नाम से मैं सदैव यहीं स्थित रहूँगा। इसलिए इस स्थान का नाम हृषीकेश भी है। इस मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है करीब 789 ई. में बसंत पंचमी के शुभ दिन पर, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने मंदिर में भगवान की प्रतिमा को स्थापित किया गया है। प्रत्येक वर्ष इस दिन शालिग्राम को मायाकुंड में पवित्र स्नान के लिए ले जाते और फिर पुनर्स्थापना हेतु शहर में एक भव्य जुलूस के साथ वापस मंदिर लाया जाता है। श्री भरत मंदिर का महत्व इस मंदिर से सम्बंधित यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन यदि कोई तीर्थयात्री इस मंदिर में भगवान श्री हृषिकेश नारायण की 108 परिक्रमा करता है और उनके चरणों में आशीर्वाद मांगता है तो उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। ऐसा करना बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा के बराबर माना गया है। भगवान विष्णु जी के इस स्थान पर दर्शन दिए जाने के कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र है जिस वजह से मंदिर के दर्शन मात्र से सभी भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्री भरत मंदिर की वास्तुकला श्री भरत मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह के भीतर इस मंदिर में भगवान विष्णुजी जी कि ऐसी प्रतिमा है जिसे एक ही काले रंग का एक पत्थर यानी कि शालिग्राम पत्थर को काटकर बनाया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक प्राचीन पेड़ है। वास्तव में यह तीन अलग-अलग पेड़ों का एक संयोजन है जिनकी जड़ें इस तरह से आपस में जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अलग अलग देखना लगभग असंभव है। इसमें बरगद के पेड़ यानी वट वृक्ष, पीपल के पेड़ और बेल के पेड़ शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि, ये तीन पेड़ त्रि देव, ब्रह्मा निर्माता, विष्णु, संरक्षक और महेश संहारक का प्रतिनिधित्व करते हैं। भक्त इन वृक्षों की अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करते हैं। इस पेड़ के नीचे बुद्ध की एक खंडित मूर्ति रखी हुई है जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह प्रतिमा अशोक काल की है जब बौद्ध धर्म पूरे देश में फैल रहा था। श्री भरत मंदिर का समय सुबह भरत मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 11:00 AM सांयकाल भरत मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान विष्णु को पीली चीजों का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा सूखे मेवे, फल, फूल भी भगवान को अर्पित किये जाते है।

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हनुमान मंदिर ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

यहाँ पर हनुमान जी ने ऋषि मणि राम दास जी को दिए थे दर्शन हनुमान मंदिर पवित्र शहर ऋषिकेश में अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा ही प्राचीन और धार्मिक मंदिर है ऋषिकेश में राम झूला पर स्थित हनुमान मंदिर। इस मंदिर को मनोकामना पूर्ण हनुमान मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि भगवान हनुमान जी यहाँ पर आने वाले सभी भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करते है। इस मंदिर में रोज संध्या काल के समय भजन कीर्तन का आयोजन किया जाता है। मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्तों की भीड़ ज्यादा रहती है। साथ ही इन दिनों में विशेष पूजा अर्चना भी की जाती है। मंदिर का इतिहास हनुमान मंदिर के इतिहास के विषय में कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है। परन्तु प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर के पीछे पौराणिक कथाये आज भी चली आ रही है। जिसके अनुसार इस मंदिर में ऋषि मणि राम दास जी ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने राम दास जी यहीं पर दर्शन दिए थे। उसके बाद ऋषि मणि राम दास जी ने इसी स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की और मंदिर का निर्माण भी किया। तभी से यह प्राचीन मंदिर हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर का महत्व हनुमान मंदिर के लिए भक्तों में विशेष आस्था है। इस प्राचीन मंदिर में सभी भक्त अपनी मनोकामना लेकर दरबार में आते है। और जब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यहाँ पर दोबारा आकर नारियल और चुनरी चढ़ाते है। ऐसा माना जाता है कि भगवान के इस दरबार में सभी इच्छाएं पूरी होती है। हनुमान जी के दर्शन से सभी कष्ट दूर हो जाते है। भक्तों को मंदिर में दर्शन कर परम शांति का अनुभव होता है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर के वास्तुकला की बात करें तो यह मंदिर अति प्राचीन होने के कारण प्राचीन कला को दर्शाता है। यह मंदिर अन्य मंदिरों की भांति ही बना हुआ है परन्तु भक्तों के लिए विशेष आस्था को संजोये हुए है। हनुमान मंदिर के मुख्य मंदिर में हनुमान जी की प्राचीन मूर्ति विराजित है। हनुमान जी के साथ भगवान राम और माता सीता कि भी मूर्ति यहाँ पर स्थापित है। इस मंदिर में भक्तो को हनुमान जी के साथ साथ भगवान भोलेनाथ के भी दर्शन होते है। मंदिर का समय हनुमान मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:00 PM संध्या काल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद हनुमान मंदिर में फल, मिठाई, चना चिरोंजी, गुड़ और रोट का भोग लगाया जाता है।

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नीलकंठ महादेव मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

हलाहल विष पान के बाद शिव जी ने इसी स्थान पर की थी साधना। नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के हिमालय पर्वतों के तल में पवित्र शहर ऋषिकेश बसा हुआ है और इस पवित्र व पावन शहर में स्थित है नीलकंठ महादेव मंदिर। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ऋषिकेश आने वाले भक्त इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने जरूर जाते है। विशेष अवसरों पर यहाँ पर भारी भीड़ भोलेनाथ के चरणों में माथा टेकने आती है। नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचना आसान नहीं है। यहाँ पहुंचने के लिए पहाड़ और नदियों से होकर जाना पड़ता है। नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास नीलकंठ महादेव मंदिर के इतिहास के पीछे के पौराणिक कथा प्रचलित है। जिसमे बताया जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमे कई वस्तुएँ बाहर आई, जो देवताओं और दानवों में बाँटी गई । फिर समुद्र में से हलाहल विष निकला। यह विष इतना जहरीला था कि कोई भी इसे नहीं चाहता था। यह विष पूरी सृष्टि का विनाश कर सकता था। सम्पूर्ण जगत में विष के कारण हाहाकार मच गया। तब भोलेनाथ ने इस विष का पान करने का निर्णय लिया। जब वह हलाहल विष को पी रहे थे तो माता पार्वती उनके पीछे खड़ी थी और उन्होंने शिव जी की गर्दन को अपने हाथों से पकड़ लिया। ताकि विष शरीर के अंदर ना जा सके और ना ही गले से बाहर आ सके। यह विष शंकर जी के गले में ही रह गया जिस कारण उनका गला नीला हो गया। इस वजह से भोलेनाथ ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने जाने लगे। परन्तु इस विष में गर्मी बहुत ज्यादा थी। शिव जी शीतलता की तलाश करने लगे और हिमालय की ओर चल दिए। वह मणिकूट पर्वत पर पहुंचे। वहां मधुमती नदी की शीतलता को देखते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। वह वहाँ समाधी में लीन हो गए। कई वर्ष होने के बाद माता पार्वती को चिंता होने लगी तो वह भी मणिकूट पर्वत पर जाकर शंकर जी के जगाने की प्रतीक्षा करने लगी। देवी-देवताओं की कई बार प्रार्थना करने के बाद भोलेनाथ ने आंख खोली और फिर उन्होंने कैलाश के लिए प्रस्थान किया। इस स्थान से जाने से पहले इसे नीलकंठ महादेव का नाम दिया। जिस वृक्ष के नीचे भगवान शिव समाधि में लीन थे, आज उस स्थान पर नीलकंठ महादेव मंदिर है। मंदिर का महत्व नीलकंठ महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने से सारी कामना पूर्ण होती है। ऐसी मान्यता है कि सावन सोमवार के दिनों में नीलकंठ महादेव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। नीलकंठ महादेव जी के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है। सभी भक्त भगवान शिव को जल चढ़ाते है। साथ ही मंदिर परिसर में धागा बांध कर अपनी कामना कहते है। फिर जब उनकी मन्नतें पूरी हो जाती है तो वह उस धागे को खोलने आते है। मंदिर की वास्तुकला नीलकंठ महादेव मंदिर का जितना महत्त्व है, मंदिर की नक़्क़ाशी भी उतनी ही आकर्षक है। इस मंदिर के शिखर के तल पर समुद्र मंथन के दृश्य को दर्शाया गया है। गर्भ गृह के प्रवेश-द्वार पर एक विशाल पेंटिंग निर्मित है जिसमे भगवान भोलेनाथ को विष पीते हुए भी दिखाया गया है। इस मंदिर के सामने की पहाड़ी पर एक मंदिर है जो की माता पार्वती का मंदिर है। इस मंदिर में पानी का एक झरना भी है। भक्त दर्शन करने से पहले इस झरने में स्नान करते हैं और फिर भोलेनाथ के दर्शन करते है। नीलकंठ महादेव मंदिर का समय नीलकंठ महादेव मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद नीलकंठ महादेव मंदिर में फल, फूल, शहद, दूध, जल, नारियल, बेलपत्र, मिठाई, सूखा प्रसाद आदि का भोग लगाया जाता है।

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त्रयंबकेश्वर मंदिर (तेरह मंजिल) :ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

13 मंजिला ईमारत में विभिन्न देवी देवताओं के साथ विराजित है भोलेनाथ त्रयंबकेश्वर मंदिर:उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में गंगा नदी के तट पर लक्ष्मण झूला के पार स्थित है त्रयंबकेश्वर मंदिर। यह बहुमंजिला मंदिर है जो कि एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। इस मंदिर को तेरह मंजिल के नाम से भी जानते है। क्योंकि इस मंदिर में 13 मंजिल है। इन 13 मंजिलों में हिंदू देवी-देवताओं की कई मूर्तियाँ स्थापित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। त्र्यंबकेश्वर का अर्थ है त्रिनेत्र। भगवान शिव को त्रिनेत्र भी कहते है। मंदिर का इतिहास Trimbakeshwar Temple:त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर के मूल इतिहास की कोई भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर भी मतभेद है। बताया जाता है कि लगभग तीन दशक पूर्व इस मंदिर को स्वामी कैलाशानंद महाराज ने बनवाया था। इसके अलावा लोगों का मानना है कि मंदिर की स्थापना 8वीं और 9वीं शताब्दी के बीच आदि शंकराचार्य ने की थी। मंदिर का महत्व त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में सावन के महीने और महाशिव रात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ रहती है। शिव भक्त यहाँ पर भोलेनाथ के दर्शन करने आते है साथ ही अपनी मन्नते भी भोले शम्भू के समक्ष रखते हैं। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियां है। इस कारण भक्त एक ही स्थान पर सभी देवी देवताओं के दर्शन आसानी से कर सकते हैं। लक्ष्मण झूला से इस मंदिर का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। जो लोग लक्ष्मण झूला देखने जाते है उन्हें यह मंदिर अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर में होने वाली गंगा आरती का मनोरम नजारा ऐसा होता है कि कोई भी भक्त इसे भूल ही नहीं सकता है। त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला देखते ही बनती है। जो भी भक्त ऋषिकेश दर्शन के लिए आते है वह इस मंदिर की भव्यता को देख कर यहाँ पर जरूर जाते है। यह मंदिर पिरामिड के आकार में तरह मंजिल ईमारत है। सबसे ऊपरी मंजिल पर भगवान शिव का मंदिर है। मंदिर को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आप ऊपर जाते समय अधिकांश भगवानों की परिक्रमा करते हुए जाते हैं। इस मंदिर में माता लक्ष्मी, देवी दुर्गा, देवी सरस्वती, हनुमान जी, भगवान कृष्ण और विष्णु भगवान के मंदिर भी स्थित हैं। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ यहाँ पर छोटी छोटी दुकानें भी है। जिसमें तुलसी – रुद्राक्ष से निर्मित मालाएं मिलती है। इसके अलावा विभिन्न धातुओं की अंगूठियां भी इन दुकानों पर मिलती है। जिन्हे भक्त खरीदकर अपने अपने घर ले जाते है। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में एक बड़ी लाइब्रेरी भी है जिसमे हिन्दू धर्म के वैदिक और धार्मिक ग्रन्थ रखे गए है जो पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं। हिन्दू देवी और देवताओं के आकृतियां मंदिर के दीवारों पर उकेरी गई हैं जो मंदिर की भव्यता को बढ़ाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर का समय त्रयंबकेश्वर मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में फल, फूल, नारियल, मिठाई, बेलपत्र, दूध, दही, घी आदि का भोग लगाया जाता है।

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गीता भवन:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

गीता भवन स्वर्गाश्रम जहाँ से दिखता है गंगा आरती का अद्भुत नज़ारा देवभूमि उत्तराखंड के ऋषिकेश में पावन गंगा नदी के किनारे स्थित है ‘गीता भवन स्वर्गाश्रम’। यह एक बहुत बड़ा परिसर है। यहाँ पर भक्तों को रखने के लिए निःशुल्क व्यवस्था की जाती है। गीता भवन में 1000 से भी ज्यादा कक्ष उपलब्ध है। गंगा नदी में स्नान करने और गंगा आरती में शामिल होने के लिए दूर- दूर से भक्त आते हैं और में रुकते है। यहाँ पर भक्तों के ध्यान और प्रवचन सुनने के लिए भी सुविधाएं दी जाती है। मंदिर का इतिहास गीता भवन की स्थापना आज़ादी से पूर्व सन 1944 में गंगा नदी के किनारे की गई थी। यह आश्रम यहाँ गीता प्रेस गोरखपुर की शाखा के रूप में कार्यरत है। गीता प्रेस द्वारा यहाँ पर पुस्तकों की भी सुविधा है। गीताभवन को ऋषिकेश आने वाले भक्तों को निशुल्क रहने,खाने ,ध्यान – साधना करने और प्रवचन के लिए अच्छी सुविधाएं मिल सके। इस उदेश्य से इस भवन की स्थापना की गई थी। मंदिर का महत्व गीताभवन में एक बार में 2000 से ज्यादा भक्तों को रहने की व्यवस्था है। यहाँ पर निशुल्क रहा जा सकता है। इस जगह पर वैसे तो साल भर ही भीड़ रहती है। परन्तु यहाँ गर्मियों के समय में ज्यादा सत्संग होते है जिस कारण भक्त ज्यादा संख्या में आते है। गीताभवन के ठीक सामने ही गंगा घाट है जिस कारण भक्त गंगा आरती का आनंद भी ले सकते है। आप परिसर में ध्यान लगा सकते हैं और संतों के प्रवचन भी सुन सकते हैं। गंगा घाट पर स्नान के लिए यहाँ पर समय को लेकर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। भक्त अपने समयानुसार स्नान के लिए जा सकते है। यहाँ पर चलने वाले प्रवचनों को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते है। और अपने साथ एक अत्याधमिक ऊर्जा लेकर ही जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला गीता भवन ऋषिकेश के सबसे प्राचीन तीर्थ परिसरों में से एक है। इस भवन की दीवारों पर सुप्रसिद्ध महाकाव्य श्री गीताजी और रामायण की रचनाएं अंकित हैं। इसके अलावा परिसर में एक ध्यान कक्ष है। यहाँ पर भक्त प्रार्थना करने के लिए एकत्रित होते है। परिसर में मिठाइयां, शाकाहारी भोजन, खाने के सामान की भी दुखने है। जहाँ पर सस्ती कीमतों पर सामान मिलता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक दवाएं भी यहाँ मिलती है। जो कि गंगा जल से बनाईं जाती है। परिसर में लक्ष्मी-नारायण मंदिर भी है। गीता भवन मंदिर का समय गीता भवन खुलने का समय 04:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद गीता भवन में लक्ष्मी नारायण का मंदिर है। इस मंदिर में फल, फूल ,मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है।

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शत्रुघ्न मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने यहाँ की थी मौन तपस्या देवभूमि ऋषिकेश के गंगा नदी के किनारे राम झूला के पास स्थित है शत्रुघ्न मंदिर। यह मंदिर प्राचीन और प्रसिद्ध है। यह मंदिर भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के नाम पर बनाया गया है। मंदिर शत्रुघ्न को समर्पित है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बद्री नारायण की मूर्ती विराजमान है। इस कारण इस मंदिर को “बद्री नारायण मंदिर” के नाम से भी जानते है। आपको बता दे कि भारत में केवल 2 ही स्थानों पर शत्रुघ्न के मंदिर हैं। एक तो केरल के थ्रिसूर जिले में है और दूसरा उत्तराखंड के ऋषिकेश में। शत्रुघ्न मंदिर का इतिहास शत्रुघ्न मंदिर को 8 वीं सदी में अदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। ऋषिकेश में मुनि के रेती को मुनियों की तपोभूमि कहते है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शत्रुघ्न ने इसी स्थान पर मौन तपस्या की थी। जिस कारण इस स्थान को मौन की रेती के नाम से जानते थे। और अब इस जगह को मुनी की रेती के नाम से जाना जाता है। रावण के परिवार के लवणासुर का वध भगवान शत्रुघ्न द्वारा हुआ था। जिससे शत्रुघ्न को ब्रह्म दोष लग गया था। इस ब्रह्म दोष के निवारण के लिए वह ऋषिकेश आए थे और ऋषिकेश के इस स्थल पर उन्होंने मौन तपस्या की। तभी से यह मंदिर शत्रुघ्न मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर का महत्व मंदिर में प्रत्येक पर्व को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। परन्तु जन्माष्टमी और रामनवमी दो मुख्य पर्व है जिसे इस मंदिर में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस विशेष अवसर पर लोग दूर दूर से मंदिर में दर्शनों के लिए आते है। शत्रुघ्न का मंदिर कम होने के कारण भी यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। इस मंदिर के दर्शन और यहाँ के शांत वातावरण का अनुभव करने के लिए भी भक्त इस मंदिर में आते है। मंदिर की वास्तुकला मुख्य मंदिर में शत्रुघ्न के रूप में बद्री नारायण जी विराजित है। उनके साथ भगवान राम – सीता और लक्ष्मण की परतिमएं भी स्थापित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जी भी विराजमान है। मंदिर के ठीक सामने ही गंगा घाट है। इस घाट को शत्रुघ्न घाट भी कहा जाता है। इस घाट की गंगा आरती अपने आप में बहुत अद्भुत है। यह घाट रामझूला और जानकी सेतु के मध्य स्थित है। गंगा आरती के समय ये ओर राम झूला रौशनी से जगमगाता है और इस घाट के दूसरी तरफ जानकी सेतु का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। मंदिर का समय शत्रुघ्न मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:30 AM मंदिर का प्रसाद शत्रुघ्न मंदिर में फल, फूल, सूखा मेवा, मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है।

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वीरभद्र मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान शिव के क्रोध से हुयी थी वीरभद्र की उत्पत्ति वीरभद्र मंदिर:उत्तराखंड के ऋषिकेश में स्थित है वीरभद्र मंदिर। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान शिव के अवतार वीरभद्र की पूजा अर्चना की जाती है। इस मंदिर में शिवरात्रि और सावन के अवसर पर रात्रि जागरण और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। जिसमे भक्तों की काफ़ी भीड़ रहती है। इन विशेष अवसरों पर यहाँ पर मेले का भी आयोजन किया जाता है। यह मंदिर ऋषिकेश राजमार्ग से 2 किमी दूर स्थित है। यह मंदिर प्राचीन सिद्धपीठ भी है। Veerabhadra Temple:मंदिर का इतिहास वीरभद्र मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो कि 1,300 साल पुराना है। वीरभद्र मंदिर के बारें में किद्वंती है कि वीरभद्र भगवान शिव के अवतार हैं। जो भोलेशंकर के क्रोध से उत्पन्न हुए है। स्कन्द पुराण में इसका उल्लेख है की एक बार राजा दक्ष प्रजापति ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन करवाया । इस भव्य यज्ञ में भगवान शिव को छोड़कर शेष सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया गया। जब यह बात माता सती को पता चला की मेरे पिता ने इस भव्य यज्ञ का आयोजन करवाया है और उसमे मेरे पति को आमंत्रित नहीं किया। तो वह अपने पिता के पास गईं। परन्तु वहां पर उन्हें अपमानित महसूस हुआ। पिता द्वारा पति का यह अपमान देख कर माता सती ने उसी यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब इस बात का पता भगवान शिव को लगा तो वह बहुत क्रोधित हो गए और अपने बालो की जटा को खींच कर जमीन पर गिरा दिया। जिससे वीरभद्र उत्पन्न हुए।वीरभद्र ने भव्य यज्ञ को नष्ट कर राजा दक्ष का सिर काट दिया। तब सभी देवताओं के भगवान शिव से राजा दक्ष को पुनः जीवित करने के लिए याचना की। शिव जी ने उन्हें जीवन दान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया। राजा दक्ष को अपनी गलतियों का पश्च्याताप भी हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी। भगवान शिव ने इसी स्थान पर वीरभद्र को अपने गले से लगा लिया। तभी वीरभद्र भगवान शिव के शरीर में समाहित हो गए और इसी स्थान पर एक शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। इस कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र और धार्मिक महत्त्व रखता है। मंदिर का महत्व सावन के महीने में इस मंदिर में पूजा अर्चना करने से विशेष फल मिलता है। इस लिए यहाँ पर भक्तों की भीड़ रहती है। कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भोलेनाथ से जो मांगता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसा माना जाता है कि विशेष अवसरों पर इस मंदिर में देवता भी भगवान का पूजन करने आते है। क्योंकि मंदिर में लगी घंटियां अपने आप ही बजने लगती है। मंदिर की वास्तुकला वीरभद्र मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। मंदिर का मुख्य द्वार लाल रंग से निर्मित है। जो देखने में बहुत ही सुन्दर दिखता है। मुख्य द्वार पर ॐ को बहुत ही शानदार तरीके से सुसज्जित किया गया है। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में वीरभद्र महादेव एक शिवलिंग के रूप में विराजित है। शिवलिंग के ठीक सामने मंदिर के प्रांगण में नंदी जी की विशाल प्रतिमा विराजित है। साथ ही माता का मंदिर है यहाँ स्थापित है। मंदिर का समय वीरभद्र मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान शिव को दूध, दही, घी, जल, शहद, पुष्प, फल आदि अर्पित किये जाते है।

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