EKADASHI

शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा (Shukravar Santoshi Mata Vrat Katha)

शुक्रवार के दिन माँ संतोषी का व्रत-पूजन किया जाता है। इस पूजा के दौरान माता की आरती, पूजन तथा अंत में माता की कथा सुनी जाती है। आइए जानें! शुक्रवार के दिन की जाने वाली संतोषी माता व्रत कथा..संतोषी माता व्रत कथा-एक बुढ़िया थी, उसके सात बेटे थे। 6 कमाने वाले थे जबकि एक निक्कमा

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षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shat Tila Ekadashi Vrat Katha)

जय श्री हरि !पौष पुत्रदा एकादशी के उपरांत, माघ माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली इस एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है।1. तिल स्नान2. तिल का उबटन3. तिल का हवन4. तिल का तर्पण5. तिल का भोजन और6. तिलों का ‍दान, तिल के ये 6 प्रयोग इस व्रत मैं अवश्य करें। इनके प्रयोग के कारण यह षटतिला एकादशी

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सोमवती अमावस्या व्रत कथा (Somvati Amavasya Vrat Katha)

सोमवती अमावस्या व्रत कथा के अनुसार, एक गरीब ब्राह्मण परिवार था, उस परिवार में पति-पत्नी एवं उसकी एक पुत्री भी थी। उनकी पुत्री समय के गुजरने के साथ-साथ धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। उस पुत्री में बढ़ती उम्र के साथ सभी स्त्रियोचित सगुणों का विकास हो रहा था। वह कन्या सुंदर, संस्कारवान एवं गुणवान थी, परंतु गरीब

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सोमवार व्रत कथा (Somvar Vrat Katha)

किसी नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर के सभी लोग उस व्यापारी का सम्मान करते थे। इतना सब कुछ संपन्न होने के बाद भी वह व्यापारी बहुत दुःखी था, क्योंकि उसका कोई पुत्र नहीं था। जिस कारण अपने मृत्यु के पश्चात् व्यापार के उत्तराधिकारी की चिंता

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सफला एकादशी व्रत कथा,पूजन विधि

हिंदू पंचांग के अंतर्गत प्रत्येक माह की 11वीं तीथि को एकादशी कहा जाता है। एकादशी को भगवान विष्णु को समर्पित तिथि माना जाता है। एक महीने में दो पक्ष होने के कारण दो एकादशी होती हैं, एक शुक्ल पक्ष मे तथा दूसरी कृष्ण पक्ष मे। इस प्रकार वर्ष मे कम से कम 24 एकादशी हो सकती हैं,

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अध्यात्मरामायणमाहात्म्यम् ब्रह्माण्डपुराणे

रामं विश्वमयं वन्दे रामं वन्दे रघूद्वहम् । रामं विप्रवरं वन्दे रामं श्यामाग्रजं भजे ॥ यस्य वागंशुतश्च्युतं रम्यं रामायणामृतम् । शैलजासेवितं वन्दे तं शिवं सोमरूपिणम् ॥ सच्चिदानन्दसन्दोहं भक्तिभूतिविभूषणम् । पूर्णानन्दमहं वन्दे सद्गुरुं शङ्करं स्वयम् ॥ अज्ञानध्वान्तसंहर्त्री ज्ञानलोकविलासिनी । चन्द्रचूडवचश्चन्द्रचन्द्रिकेयं विराजते ॥ अप्रमेयत्रयातीतनिर्मलज्ञानमूर्तये । मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ १॥ सूत उवाच । कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया ।

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