EKADASHI

Mokshada Ekadashi 2023: इस साल कब है मोक्षदा एकादशी? जानें पूजा विधि, मुहूर्त का सही समय

Mokshada Ekadashi 2023 मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) 2023 में 22 दिसंबर को मनाई जाएगी. यह एकादशी मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को पड़ती है. मोक्षदा एकादशी को मोक्ष की प्राप्ति देने वाली एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. दरअसल, सालभर में 24 एकादशी होती हैं. इसमें एक कृष्ण और दूसरी एकादशी शुक्ल पक्ष में होती है. लेकिन इस साल अधिकमास होने के कारण 26 एकादशी पड़ीं. मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है. साल 2023 में मोक्षदा एकादशी Mokshada Ekadashi का व्रत 22 और 23 दिसंबर दोनों दिन रखा जाएगा. मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने वाले जातकों का जीवन खुशियों से भर जाता है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है. क्यों मनाते है एकादशी व्रत, आइये जानते है Mokshada Ekadashi Kab hai मोक्षदा एकादशी 2023 कब है साल 2023 में मोक्षदा एकादशी का व्रत 22 और 23 दिसंबर दो दिन रखा जाएगा. 22 दिसंबर को गृहस्थ जन व्रत रखेंगे और 23 दिसंबर को वैष्णव जन व्रत रखेंगे. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की विधि विधान के साथ पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है. साथ ही जीवन में सभी तरह के कष्ट समाप्त हो जाते हैं. वहीं इस दिन पितरों को मोक्ष के लिए भी व्रत रखा जाता है. Mokshada Ekadashi Muhurt मोक्षदा एकादशी 2023 का मुहूर्त एकादशी तिथि प्रारम्भ – दिसम्बर 22, 2023 को सुबह 07:35 बजेएकादशी तिथि समाप्त – दिसम्बर 23, 2023 को सुबह 07:56 बजे Mokshada Ekadashi Muhurt मोक्षदा एकादशी 2023 का मुहूर्त एकादशी तिथि प्रारम्भ – दिसम्बर 22, 2023 को सुबह 07:35 बजेएकादशी तिथि समाप्त – दिसम्बर 23, 2023 को सुबह 07:56 बजे Mokshada Ekadashi puja Muhurt मोक्षदा एकादशी पर पूजा का मुहूर्त एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है. वहीं संध्या काल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भी पूजा का विधान है. ऐसे में एकादशी के दिन भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा करने का शुभ मुहूर्त संध्या 04:00 बजे से लेकर 05:00 बजे तक का है. Mokshada Ekadashi puja Vidhi मोक्षदा एकादशी की पूजा विधि एकादशी के 1 दिन पहले तामसिक भोजन बंद कर दें. इसके बाद एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान कर सूर्य देव की उपासना कर व्रत का संकल्प लें. घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें. ब्रह्मचर्य रखकर एकादशी व्रत का पालन करें. वहीं, संध्या के समय पीला वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने पीला पुष्प, पीला फल, धूप, दीप आदि से पूजन करें. फिर विष्णु भगवान के सामने ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का जाप करते हुए माता लक्ष्मी की भी पूजा करें. इसके बाद भगवान को भोग लगाएं. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है. भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें. ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं. तत्पश्चात आरती के साथ पूजा संपन्न करें. मोक्षदा एकादशी के दिन कुछ विशेष उपाय करने से व्रत का अधिक फल मिलता है. इन उपायों में शामिल हैं ? इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते अर्पित करना चाहिए. इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना चाहिए. इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना चाहिए.

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Dhanu Sankranti 2023: धनु संक्रांति कब है? जानें कब से शुरू होगा खरमास, इस दौरान क्या करें क्या नहीं

Dhanu Sankranti Date 2023: ग्रहों के राजा सूर्य देव दिसंबर माह में धनु राशि में गोचर करेंगे। सूर्य देव 16 दिसंबर 2023 को धनु राशि में गोचर करेंगे, इसलिए 16 दिसंबर को धनु संक्रांति Dhanu Sankranti के नाम से जाना जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार  जिस राशि में प्रवेश करते हैं, उसी के अनुसार संक्रांति का नामकरण किया जाता है। धनु संक्रांति का पुण्यकाल 16 दिसंबर को प्रातः 09 बजकर 58 मिनट से शाम 04 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। सूर्य की धनु संक्रांति में और खासकर संक्रांति के पुण्यकाल के दौरान गोदावरी नदी में स्नान-दान का बहुत महत्व है। संक्रांति के दिन पितृ तर्पण, दान, धर्म और स्नान आदि का बहुत महत्व माना जाता है।  कब है धनु संक्रांति Dhanu Sankranti ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियों का विशेष महत्व है। सभी ग्रह बारी-बारी से इन 12 राशियों में प्रवेश करते हैं। सूर्य ग्रह भी इन्हीं में से एक हैं। जब भी सूर्य देव किसी भी राशि में प्रवेश करते हैं तो उसे संक्रांति के नाम से जाना जाता है। धनु संक्रांति 16 दिसंबर, शनिवार को है। इस संक्रांति को हेमंत ऋतु शुरू होने पर मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हेमंत ऋतु का आरंभ 16 दिसंबर से होता है। इस दिन से मौसम में ठंड बढ़ने लगती है और पृथ्वी पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ने लगती हैं। इस दिन सूर्य देव वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करते हैं। धनु राशि को देवताओं की राशि माना जाता है। इस राशि का स्वामी गुरु ग्रह होता है। धनु संक्रांति को लोग बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं। इस दिन लोग नदी, तालाब या समुद्र में स्नान करते हैं और सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। धनु संक्रांति के दिन से खरमास शुरू हो जाते हैं। खरमास में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस बार धनु संक्रांति का पुण्यकाल 16 दिसंबर को प्रातः 09 बजकर 58 मिनट से शाम 04 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। Vivah Panchami 2023: कब है विवाह पंचमी? जानें इस दिन विवाह करना क्यों माना जाता है अशुभ धनु संक्रांति के दिन कुछ विशेष उपाय करने से शुभता आती है। इन उपायों में शामिल हैं: कब से शुरू होगा खरमास  कब से शुरू होगा खरमास जब धनु और मीन राशि में सूर्य देव गोचर करते हैं, तो इनके तेज प्रभाव से धनु और मीन राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव बहुत कमजोर हो जाता है।  इसके चलते एक महीने तक खरमास लगता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 16 दिसंबर को सूर्य देव सायं 03 बजकर 58 मिनट पर वृश्चिक राशि से निकलकर धनु राशि में प्रवेश करेंगे। इसलिए खरमास की शुरुआत इसी दिन से होगी। खरमास के दौरान क्या करें? खरमास के दौरान क्या न करें?

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Ekadashi:क्यों मनाते है एकादशी व्रत, आइये जानते है

हमारा देश आस्था श्रद्धा और विश्वास का प्रतिक माना जाता है। देश में हमारी आस्था ही है जो हमें मस्जिद और मंदिर जाने पर देवी देवता और भगवान के होने का एहसास दिलाता है ! हमारी आस्था के कारन ही आज सम्पूर्ण समाज पीपल के पेड़ में ब्रह्म देवता और नीम में देवी तथा बबूल के पेड़ में प्रेत नजर आता हैं। इसी आस्था श्रद्धा विश्वास के चलते ही रिश्तों का निर्धारण और अनुपालन होता है। एकादशी व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जैसे: एकादशी Ekadashi व्रत को दो भागों में बांटा जा सकता है: एकादशी Ekadashi व्रत की तिथि का निर्धारण चंद्र दर्शन के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। एकादशी व्रत रखने की विधि इस प्रकार है: एकादशी Ekadashi व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार एक राजा के पास एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। मंत्री ने राजा से कहा कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। राजा ने मंत्री की बात मानकर एकादशी व्रत रखा। व्रत रखने से राजा के सभी पाप धुल गए और वह सुखी और समृद्ध हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक ऋषि ने एकादशी व्रत रखा। ऋषि के व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने ऋषि को वरदान दिया। वरदान के अनुसार, ऋषि को मोक्ष की प्राप्ति हुई। इन पौराणिक कथाओं से स्पष्ट है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं: एकादशी Ekadashi व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए लाभकारी है। यह व्रत व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

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Utpanna Ekadashi 2023: उत्पन्ना एकादशी कब ? एकादशी व्रत शुरू करने वालों के लिए खास है ये दिन

Utpanna Ekadashi उत्पन्ना एकादशी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। उत्पन्ना एकादशी का महत्व उत्पन्ना एकादशी को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि “उत्पन्न एकादशी”, “उत्तम एकादशी”, “कल्याण एकादशी” और “अमृत एकादशी”। इस दिन व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा (Devshayani Ekadashi Vrat Katha) उत्पन्ना एकादशी की पूजा उत्पन्ना एकादशी की पूजा सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करके की जाती है। फिर, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित किया जाता है। प्रतिमा या तस्वीर को फूल, माला, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सजाया जाता है। फिर, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा में भगवान विष्णु के 108 नामों का जाप किया जाता है। पूजा के बाद, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को प्रसाद अर्पित किया जाता है। प्रसाद में खीर, दूध, फल, मिठाई आदि शामिल होते हैं। उत्पन्ना एकादशी 2023 मुहूर्त (Utpanna Ekadashi 2023 Muhurat) पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 8 दिसंबर 2023 को सुबह 05 बजकर 06 मिनट पर शुरू होगी और 9 दिसंबर 2023 को सुबह 06 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. श्रीहरि की पूजा का समय – सुबह 07.01 – सुबह 10.54 उत्पन्ना एकादशी 2023 व्रत पारण समय (Utpanna Ekadashi 2023 Vrat Parana Time) उत्पन्ना एकादशी का व्रत अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद खोला जाता है। व्रत पारण के समय भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। फिर, भगवान विष्णु की कथा सुनी जाती है। कथा सुनने के बाद, प्रसाद ग्रहण किया जाता है। उत्पन्ना एकादशी का व्रत पारण 9 दिसंबर 2023 को दोपहर 01 बजकर 15 मिनट से दोपहर 03 बजकर 20 मिनट पर किया जाएगा. इस दिन हरि वासर समाप्त होने का समय दोपहर 12.41 है. उत्पन्ना एकादशी 2023 डेट (Utpanna Ekadashi 2023 Date) Utpanna Ekadashi उत्पन्ना एकादशी 8 दिसंबर 2023 को है. इस दिन देवी एकादशी का प्राकट्य हुआ था. देवी एकादशी ने मुर नाम के राक्षस का इंद्रदेव को और समस्त स्वर्गवासियों को बचाया था. उत्पन्ना एकादशी की कथा उत्पन्ना एकादशी की कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने एक बार राजा त्रिविक्रम को एकादशी व्रत करने का उपदेश दिया। राजा त्रिविक्रम ने एकादशी व्रत किया और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें सभी पापों से मुक्ति प्राप्त हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। उत्पन्ना एकादशी का व्रत सभी के लिए फलदायी है। इस दिन व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

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Dev Uthani Ekadashi 2023:देवउठनी एकादशी इस बार बन रहे हैं ये तीन शुभ संयोग, भूलकर ना करें ये काम, विष्णु भगवान हो जायेंगे नाराज

सनातन परंपरा में जिस कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की देवोत्थान या फिर कहें देवउठनी एकादशी पर श्रीहरि अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसमें शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है, उसकी तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्री विष्णु की पूजा के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है, लेकिन इसका महत्व तब और ज्यादा बढ़ जाता है, जब यह कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में पड़ती है और देवउठनी या फिर देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है. हिंदू धर्म में देवउठनी को इसलिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है क्योंकि इसी भगवान श्री विष्णु चार महीने बाद अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसी के बाद शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. आइए देवोत्थान एकादशी तिथि की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम के बारे में विस्तार से जानते हैं. देवउठनी एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त देश की राजधानी दिल्ली के पंचांग के अनुसार इस साल कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी 22 नवंबर 2023 की रात्रि 11:03 बजे से प्रारंभ होकर 23 नवंबर 2023 की रात्रि 09:01 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल देवोत्थान एकादशी का पावन पर्व 23 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन 24 नवंबर 2023 को प्रात:काल 06:51 से 08:57 बजे के बीच किया जा सकेगा. गौरतलब है कि एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना जाता है. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि देवउठनी एकादशी पर भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए व्यक्ति को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए फिर उसके बाद उगते हुए सूर्य देवता को अर्घ्य देना चाहिए. इसके बाद भगवान श्री विष्णु के व्रत एवं पूजन का संकल्प करना चाहिए और अपने घर के ईशान कोण में उनकी विधि-विधान से फल-फूल, धूप-दीप, चंदन-भोग आदि अर्पित करके पूजा करनी चाहिए. देवउठनी एकादशी की पूजा में एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण जरूर करना चाहिए और सबसे अंत में श्रीहरि और माता लक्ष्मी की आरती करना चाहिए तथा अधिक से अधिक लोगों को इस व्रत एवं पूजा का प्रसाद बांटना चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना गया है, इसलिए व्रत के अगले दिन शुभ समय में पारण जरूर करें. देवउठनी पूजा का अचूक उपाय देवउठनी एकादशी वाले दिन व्यक्ति को भगवान श्री विष्णु के सामने घी का दीया जलाना चाहिए और उसके बाद पूरे घर-आंगन, छत और मुख्य द्वार पर दीया जरूर रखना चाहिए. हिंदू मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के दिन घर में देशी घी का दीया जलाने से घर में हमेशा सुख-शांति और सौभाग्य बना रहता है.

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Rama Ekadashi 2023:रमा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, जानिए महत्व

कार्तिक माह में 2 एकादशी आती है। रमा एकादशी और देवउठनी एकादशी। रमा एकादशी कृष्ण पक्ष में आती है और देवउठनी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार रमा एकादशी का व्रत 09 नवंबर 2023 को गुरुवार को रखी जाएगी। रमा एकादशी को रमा क्यों कहते हैं और क्या है इसका महत्व।  Rama Ekadashi kab hai:रामा एकादशी 2023 कब है रमा एकादशी गुरुवार, 09 नवंबर 2023 को है। एकादशी 08 नवंबर 2023 को सुबह 08:23 बजे से शुरू होकर 09 नवंबर 2023 को सुबह 10:40 बजे समाप्त होगी। माता लक्ष्मी और भगवान् श्री विष्णु की पूजा करने का विधान है, ऐसा माना जाता है की इस व्रत और पूजा के करने से माता लक्ष्मी अति प्रसन्न होती है,और वे अपने भक्तो की सभी मनोकामना को पूर्ण करती है। Rama Ekadashi:रमा एकादशी का महत्व रमा का एकादशी : माता लक्ष्मी के रमा स्वरूप को इस दिन पूजा जाता है। रमा के साथ ही श्री हरि विष्णु के पूर्णावता केशव स्वरूप की पूजा भी होती है। यह चातुर्मास की अंतिम एकादशी है। Rama Ekadashi 2023: कार्तिक माह में 2 एकादशी आती है। रमा एकादशी और देवउठनी एकादशी। रमा एकादशी कृष्ण पक्ष में आती है और देवउठनी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार रमा एकादशी का व्रत 09 नवंबर 2023 को गुरुवार को रखी जाएगी। रमा एकादशी को रमा क्यों कहते हैं और क्या है इसका महत्व। 

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Papankusha Ekadashi 2023: कब है पापांकुशा एकादशी? जानें सही तिथि, विष्णु पूजा का मुहूर्त, हरि कृपा से मिटेंगे सारे पाप

Papankusha Ekadashi 2023: पापांकुशा एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दिन श्रीहरि की पूजा करने से व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है. जानें पापांकुशा एकादशी की डेट, मुहूर्त और महत्व अक्टूबर में दो एकादशी पड़ेंगी इंदिरा एकादशी और पापांकुशा एकादशी. आश्विन शुक्ल एकादशी के दिन इच्छित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए. अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस दिन व्रत करने वालों को यमलोक की यातनाएं नहीं सेहनी पड़ती. आइए जानते हैं अक्टूबर में पापांकुशा एकादशी व्रत की डेट, मुहूर्त और महत्व Kab Hai Papankusha Ekadashi 2023 Kab Hai Papankusha Ekadashi 2023:  पापांकुशा एकादशी का व्रत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का प्रायश्चित होता है. हरि कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति पापांकुशा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे 100 सूर्य यज्ञ और 1 हजार अश्वमेध यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. भगवान विष्णु के आशीर्वाद से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती है.  इस साल पापांकुशा एकादशी व्रत कब है? पापांकुशा एकादशी व्रत का पूजा मुहूर्त और महत्व क्या है? कब है पापांकुशा एकादशी 2023पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 अक्टूबर दिन मंगलवार को दोपहर 03 बजकर 14 मिनट से प्रारंभ होगी. इस तिथि की समाप्ति 25 अक्टूबर दिन बुधवार को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर होगी. उदयातिथि के आधार पर इस साल पापांकुशा एकादशी व्रत 25 अक्टूबर को रखा जाना उत्तम है. 3 शुभ योग में है पापांकुशा एकादशी व्रतइस साल पापांकुशा एकादशी का व्रत 3 शुभ योग में है. पापांकुशा एकादशी के दिन रवि योग, वृद्धि योग और ध्रुव योग बन रहे हैं. उस दिन रवि योग सुबह 06 बजकर 28 मिनट से प्रारंभ हो रहा है और दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक मान्य रहेगा. वहीं वृद्धि योग प्रात:काल से प्रारंभ होगा और वह दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. उसके बाद से ध्रुव योग शुरू होगा, रात तक है. पापांकुशा एकादशी 2023 पूजा मुहूर्त25 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी व्रत की पूजा आप सूर्योदय के बाद से कर सकते हैं क्योंकि उस समय से रवि योग और वृद्धि योग रहेगा. ये दोनों ही शुभ योग हैं. वृद्धि योग में आप जो भी कार्य करते हैं, उसके फल में वृद्धि होती है. रवि योग सूर्य के प्रभाव वाला होता है. व्रत के दिन आप पूजा के लिए राहुकाल का त्याग करें. उस दिन राहुकाल दोपहर 12 बजकर 05 मिनट से दोपहर 01 बजकर 29 मिनट तक है. राहुकाल में एकादशी की पूजा न करें. पापांकुशा एकादशी पर भद्रा और पंचकपापांकुशा एकादशी के दिन भद्रा और पंचक भी है. उस​ दिन भद्रा सुबह 06 बजकर 28 मिनट से शुरू हो रही है और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक रहेगी. भद्रा का वास धरती पर है तो इस समय में कोई शुभ कार्य न करें. पापांकुशा एकादशी पर पूरे दिन पंचक है. पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्वपौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यदि आपने जाने या अनजाने में कोई भी पाप किया है तो उसके प्रायश्चित के लिए पापांकुशा एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करें. उनकी कृपा से आपके पाप मिट जाएंगे. इस दिन आप अपनी क्षमता के अनुसार दान करके पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं. पापांकुशा एकादशी पर अन्न, जल, तिल, गाय, भूमि, सोना आदि का दान करना चाहिए. पापांकुशा एकादशी 2023 व्रत पारण समय (Papankusha Ekadashi 2023 Vrat Parana Time) पापांकुशा एकादशी व्रत का पारण 26 अक्टूबर 2023 को सुबह 06 बजकर 28 मिनट पर से  सुबह 08 बजकर 43 मिनट तक शुभ मुहूर्त है. पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 09:44 तक रेहगी पापांकुशा एकादशी महत्व (Papankusha Ekadashi Significance) पापांकुशा एकादशी का व्रत अपने नाम स्वरूप जातक को पाप से मुक्ति दिलाता है. मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का निराहार व्रत करने से श्रीहरि भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न होते हैं और भक्तों को कभी धन-दौलत, सुख, सौभाग्य की कमी नहीं होने देते. पापांकुशा एकादशी पूजा विधि (Papankusha Ekadashi Puja Vidhi) एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का, संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को रात्रि में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए. इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि की सुबह ब्राह्मणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद होता है.

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एकादशी 2024 तारीखें, 2024 एकादशी व्रत के दिन, एकादशी 2024 कैलेंडर, 2024 में एकादशी list hindi mai

एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिन है। हिंदू कैलेंडर में प्रत्येक चंद्र पखवाड़े के ग्यारहवें दिन एकादशी आती है। हिंदू महीने में दो एकादशियां होती हैं एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। नीचे 2024 में एकादशी तिथियों की सूची दी गई है। सभी तिथियां भारत में अपनाए जाने वाले हिंदू कैलेंडर के अनुसार हैं। आपके स्थान और लोगों के संप्रदाय के अनुसार एकादशी का दिन एक दिन बदल सकता है। दिनांक त्यौहार रविवार, 07 जनवरी सफला एकादशी रविवार, 21 जनवरी पौष पुत्रदा एकादशी मंगलवार, 06 फरवरी षटतिला एकादशी मंगलवार, 20 फरवरी जया एकादशी बुधवार, 06 मार्च विजया एकादशी बुधवार, 20 मार्च आमलकी एकादशी शुक्रवार, 05 अप्रैल पापमोचिनी एकादशी शुक्रवार, 19 अप्रैल कामदा एकादशी शनिवार, 04 मई वरुथिनी एकादशी रविवार, 19 मई मोहिनी एकादशी रविवार, 02 जून अपरा एकादशी मंगलवार, 18 जून निर्जला एकादशी मंगलवार, 02 जुलाई योगिनी एकादशी बुधवार, 17 जुलाई देवशयनी एकादशी बुधवार, 31 जुलाई कामिका एकादशी शुक्रवार, 16 अगस्त श्रावण पुत्रदा एकादशी गुरुवार, 29 अगस्त अजा एकादशी शनिवार, 14 सितंबर परिवर्तिनी एकादशी शनिवार, 28 सितंबर इन्दिरा एकादशी सोमवार, 14 अक्टूबर पापांकुशा एकादशी सोमवार, 28 अक्टूबर रमा एकादशी मंगलवार, 12 नवंबर देवुत्थान एकादशी मंगलवार, 26 नवंबर उत्पन्ना एकादशी बुधवार, 11 दिसंबर मोक्षदा एकादशी गुरुवार, 26 दिसंबर सफला एकादशी एकादशी व्रत से जुड़ा यह पृष्ठ यह जानकारी तो देता ही है कि एकादशी कब है, लेकिन साथ ही इस पर्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं की भी विस्तार से विवेचना करता है। हिंदू धर्म में एकादशी या ग्यारस एक महत्वपूर्ण तिथि है। एकादशी व्रत की बड़ी महिमा है। एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य देव का पूजन व वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत ही एकादशी व्रत कहलाता है। पद्म पुराण के अनुसार स्वयं महादेव ने नारद जी को उपदेश देते हुए कहा था, एकादशी महान पुण्य देने वाली होती है। कहा जाता है कि जो मनुष्य एकादशी का व्रत रखता है उसके पितृ और पूर्वज कुयोनि को त्याग स्वर्ग लोक चले जाते हैं। आइए, एकादशी से जुड़े अनेकानेक आयामों को गहराई से देखते हैं क्या है एकादशी ? हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एकादशी संस्कृत भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘ग्यारह’। प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है–एक शुक्ल पक्ष के बाद और दूसरी कृष्ण पक्ष के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना अलग महत्व है। वैसे तो हिन्दू धर्म में ढेर सारे व्रत आदि किए जाते हैं लेकिन इन सब में एकादशी का व्रत सबसे पुराना माना जाता है। हिन्दू धर्म में इस व्रत की बहुत मान्यता है। एकादशी का महत्व पुराणों के अनुसार एकादशी को ‘हरी दिन’ और ‘हरी वासर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को वैष्णव और गैर-वैष्णव दोनों ही समुदायों द्वारा मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी व्रत हवन, यज्ञ , वैदिक कर्म-कांड आदि से भी अधिक फल देता है। इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है कि इससे पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण में भी एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उनके लिए एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां आदि का सेवन वर्जित होता है। भक्त एकादशी व्रत की तैयारी एक दिन पहले यानि कि दशमी से ही शुरू कर देते हैं। दशमी के दिन श्रद्धालु प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और इस दिन वे बिना नमक का भोजन ग्रहण करते हैं। एकादशी व्रत का नियम एकादशी व्रत करने का नियम बहुत ही सख्त होता है जिसमें व्रत करने वाले को एकादशी तिथि के पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी के अगले सूर्योदय तक उपवास रखना पड़ता है। यह व्रत किसी भी लिंग या किसी भी आयु का व्यक्ति स्वेच्छा से रख सकता है। एकादशी व्रत करने की चाह रखने वाले लोगों को दशमी (एकादशी से एक दिन पहले) के दिन से कुछ जरूरी नियमों को मानना पड़ता है। दशमी के दिन से ही श्रद्धालुओं को मांस-मछली, प्याज, दाल (मसूर की) और शहद जैसे खाद्य-पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। रात के समय भोग-विलास से दूर रहते हुए, पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह दांत साफ़ करने के लिए लकड़ी का दातून इस्तेमाल न करें। इसकी जगह आप नींबू, जामुन या फिर आम के पत्तों को लेकर चबा लें और अपनी उँगली से कंठ को साफ कर लें। इस दिन वृक्ष से पत्ते तोड़ना भी ‍वर्जित होता है इसीलिए आप स्वयं गिरे हुए पत्तों का इस्तेमाल करें और यदि आप पत्तों का इतज़ाम नहीं कर पा रहे तो आप सादे पानी से कुल्ला कर लें। स्नान आदि करने के बाद आप मंदिर में जाकर गीता का पाठ करें या फिर पंडितजी से गीता का पाठ सुनें। सच्चे मन से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जप करें। भगवान विष्णु का स्मरण और उनकी प्रार्थना करें। इस दिन दान-धर्म की भी बहुत मान्यता है इसीलिए अपनी यथाशक्ति दान करें। एकादशी के अगले दिन को द्वादशी के नाम से जाना जाता है। द्वादशी दशमी और बाक़ी दिनों की तरह ही आम दिन होता है। इस दिन सुबह जल्दी नहाकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और सामान्य भोजन को खाकर व्रत को पूरा करते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न और दक्षिणा आदि देने का रिवाज़ है। ध्यान रहे कि श्रद्धालु त्रयोदशी आने से पहले ही व्रत का पारण कर लें। इस दिन कोशिश करनी चाहिए कि एकादशी व्रत का नियम पालन करें और उसमें कोई चूक न हो। एकादशी व्रत का भोजन शास्त्रों के अनुसार श्रद्धालु एकादशी के दिन आप इन वस्तुओं और मसालों का प्रयोग अपने व्रत के भोजन में कर सकते हैं ताजे फलमेवे–  चीनी–  कुट्टू–  नारियल–  जैतून–  दूध–  अदरक–  काली मिर्च–  सेंधा नमक–  आलू–  साबूदाना–  शकरकंद एकादशी व्रत का भोजन सात्विक होना चाहिए। कुछ व्यक्ति यह व्रत बिना पानी पिए संपन्न करते हैं जिसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। एकादशी को क्या न करें ●  वृक्ष से पत्ते न तोड़ें।●  घर में झाड़ू न लगाएं। ऐसा इसीलिए किया जाता है क्यूंकि घर में झाड़ू आदि लगाने से चीटियों या छोटे-छोटे जीवों

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 Masik Kalashtami 2023- मासिक कालाष्टमी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और उपाय

महत्वपूर्ण जानकारी अश्विन, कृष्ण अष्टमी, अक्टूबर कालाष्टमी व्रत 2023 शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023 अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 06 अक्टूबर 2023 प्रातः 6:35 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 07 अक्टूबर 2023 को सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा करते हैं। कालाष्टमी, जिसे काला अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी, जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव उसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कालाष्टमी व्रत सप्तमी तीथ पर मनाया जा सकता है। धार्मिक पाठ के अनुसार व्रतराज कालाष्टमी का व्रत उस दिन मनाया जाना चाहिए जब अष्टमी तिथि रात्रि के समय रहती है। कालाष्टमी व्रत का महत्व काल-भैरव भगवान शिव का ही एक रूप हैं, ऐसे में कहा जाता है कि जो कोई भी भक्त इस दिन सच्ची निष्ठा और भक्ति से कालभैरव की पूजा करता है, भगवान शिव उस व्यक्ति के जीवन से सभी नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालकर उसे सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. काल भैरव पूजा विधि इस दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करके व्रत करना चाहिए और फिर किसी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव या भैरव के मंदिर में जा कर पूजा करनी चाहिए. शाम के समय शिव और पार्वती और भैरव जी की पूजा करें. क्योंकि भैरव को तांत्रिकों का देवता माना जाता है इसलिए इनकी पूजा रात में भी की जाती है.काल भैरव की पूजा में दीपक, काले तिल, उड़द और सरसों के तेल को अवश्य शामिल करें. व्रत पूरा करने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं. काल भैरव मंत्र- ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम: इन उपायों से करें काल भैरव को प्रसन्न काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की प्रतिमा के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाएं. इस दिन श्रीकालभैरवाष्टकम् का पाठ करें और 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ‘ॐ नम: शिवाय’ लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं. कालाष्टमी के दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाना काफी शुभ माना जाता है अगर आसपास कोई काला कुत्ता नहीं है तो किसी भी कुत्ते को मीठी रोटी खिला सकते हैं. इस दिन किसी गरीब, भिखारी या कोढ़ी को वस्त्र का दान करना काफी शुभ माना जाता है. कालाष्टमी व्रत तिथि 2023 इस प्रकार है :- कालाष्टमी व्रत दिनांक 2023 इस प्रकार है:- कालाष्टमी व्रत जनवरी में शनिवार, 14 जनवरी 2023माघ, कृष्ण अष्टमी14 जनवरी 2023 शाम 7:23 बजे – 15 जनवरी 2023 शाम 7:45 बजे कालाष्टमी व्रत फरवरी में सोमवार, 13 फरवरी 2023फाल्गुन, कृष्ण अष्टमी13 फरवरी 2023 सुबह 9:46 बजे – 14 फरवरी 2023 सुबह 9:04 बजे मार्च में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 14 मार्च 2023चैत्र, कृष्ण अष्टमी14 मार्च 2023 को रात 8:22 बजे – 15 मार्च 2023 को शाम 6:46 बजे कालाष्टमी व्रत अप्रैल में गुरुवार, 13 अप्रैल 2023वैशाख, कृष्ण अष्टमी13 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 3:44 – 14 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 1:34 बजे मई में कालाष्टमी व्रत शुक्रवार, 12 मई 2023ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी12 मई 2023 सुबह 9:07 बजे – 13 मई 2023 सुबह 6:51 बजे जून में कालाष्टमी व्रत शनिवार, 10 जून 2023आषाढ़, कृष्ण अष्टमी10 जून 2023 दोपहर 2:02 बजे – 11 जून 2023 दोपहर 12:06 बजे कालाष्टमी व्रत जुलाई में रविवार, 09 जुलाई 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी09 जुलाई 2023 रात 8:00 बजे – 10 जुलाई 2023 शाम 6:44 बजे अगस्त में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 08 अगस्त 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी08 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 4:14 बजे – 09 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 3:52 बजे कालाष्टमी व्रत सितंबर में बुधवार, 06 सितंबर 2023भाद्रपद, कृष्ण अष्टमी06 सितंबर 2023 अपराह्न 3:38 बजे – 07 सितंबर 2023 अपराह्न 4:14 बजे कालाष्टमी व्रत अक्टूबर में शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023अश्विना, कृष्ण अष्टमी06 अक्टूबर 2023 सुबह 6:35 बजे – 07 अक्टूबर 2023 सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत नवंबर में रविवार, 16 नवंबर 2023कार्तिका, कृष्ण अष्टमी05 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 1:00 बजे – 06 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 3:18 बजे दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे

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इंदिरा एकादशी व्रत : व्रत विधि और प्रचलित पौराणिक कथा

यह एकादशी हमेशा श्राद्ध पक्ष में आती है इसलिए इस व्रत का फल पितरों की शांति से जोड़ा गया है। लेकिन इसके अलावा भी इंदिरा एकादशी व्रत करने के अनेक पुण्य लाभ हैं।  प्रचलित पौराणिक कथा  महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहने लगे, भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? कृपया आप मुझे इसकी विधि तथा फल बताएं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली होती है और फिर आगे भगवान इसकी कथा सुनाते हैं। जिसके अनुसार प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। कहते हैं कि उस राजा को किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न वह राजा सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु जी का परम भक्त था। एक दिन राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था कि अचानक आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। उन्हें देखते ही राजा हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और उनका अपनी सभा में स्वागत किया। सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? नारद मुनि की ऐसी बातें सुनकर पहले तो राजा कुछ भौंचक्का रह गए लेकिन फिर विनम्रता से बताया। तभी राजा ने प्रश्न किया कि हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है। किसी को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है। हमारे यहां सभी धार्मिक कार्य भी सही तरीके से हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! जो दृश्य मैं देखकर आ रहा हूं उसे तुम्हें बताना बेहद आवश्यक है। ऋषि आगे बोले, मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहां श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। तुम्हारे जैसे विद्वान राजा के पिता को ऐसे स्थान पर देखकर मैं हैरान हो गया। मेरा यहां आने का यही कारण है राजन्। तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए इसी मान्यता के आधार आज तक पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं उनके उद्धार के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। संदेश पाने के बाद जिज्ञासु राजा ने नारद मुनि से इस एकादशी के व्रत को करने की विधि पूछी। Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त व्रत विधि उत्तर में नारद बोले, ‘आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल उठकर श्रद्धापूर्वक स्नान करें और फिर अपने पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा। शालिग्राम की मूर्ति की पूजा पूजा के लिए शालिग्राम की मूर्ति को स्थापित करें। शालिग्राम की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और फिर पूजा के दौरान भोग लगाना चाहिए। पूजा समाप्त होने पर शालिग्राम की मूर्ति की आरती भी करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराएं पूजा के दौरान कहें ‘हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए। पूजा के बाद नियमों का खास ध्यान रखते हुए ब्राह्मणों का भोजन तैयार करें और उन्हें भोजन कराएं, साथ ही दक्षिणा भी दें। ऐसा माना जाता है कि कोई भी मनुष्य यदि इंदिरा एकादशी की तिथि को आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करता है, उसके पितरों को अवश्य स्वर्गलोक प्राप्त होता है। इंदिरा एकादशी की व्रत कथा सतयुग में इंद्रसेन नाम के एक राजा माहिष्मती नामक क्षेत्र में शासन करते थे। इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त और धर्मपरायण राजा थे। वह सुचारू रूप से राज-काज कर रहे थे। एक दिन अचानक देवर्षि नारद का उनकी राज सभा में आगमन हुआ। राजा ने देवर्षि नारद का स्वागत सत्कार कर उनके आगमन का कारण पूछा। देवर्षि नारद जी ने बताया कि कुछ दिन पूर्व वो यमलोक गए थे वहां पर उनकी भेंट राजा इंद्रसेन के पिता से हुई। राजन आपके पिता ने आपके लिए संदेश भेजा है। उन्होंने कहा कि जीवन काल में एकादशी का व्रत भंग हो जाने के कारण उन्हें अभी तक मुक्ति नहीं मिली है और उन्हें यमलोक में ही रहना पड़ रहा है। मेरे पुत्र और संतान से कहिएगा कि यदि वो आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें तो उसके भाग से मुझे मुक्ति मिल जाएगी। नारद मुनि की बात सुनकर राजा इंद्रसेन ने व्रत का विधान पूछा और व्रत करने का संकल्प लिया। राजा ने पितृ पक्ष की एकादशी तिथि पर विधि पूर्वक व्रत का पालन किया। पितरों के निमित्त मौन रह कर ब्राह्मण भोज और गौ दान किया। इस प्रकार राजा इंद्रसेन के व्रत और पूजन के भाग से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति और बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई। उस दिन से ही इस व्रत का नाम इंदिरा एकादशी पड़ गया। पितृ पक्ष में पड़ने वाली इस इंदिरा एकादशी के व्रत से पितरों को अधोगति से मुक्ति मिलती है और आपको उनका आशीर्वाद।

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Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त

इंदिरा एकादशी श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार, अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी व्रत रखा जाता है। इस साल ये एकादशी मंगलवार, 10 अक्टूबर को पड़ रही है। हिंदू धर्म में इस व्रत का काफी अधिक महत्व है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली इंदिरा एकादशी को पितरों के उद्धार के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमारे पितरों के पाप धुलते हैं और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तिथि एवं मुहूर्त एकादशी की तिथि 9 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 36 मिनट से शुरू होगी और 10 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार एकादशी का व्रत 10 अक्टूबर को रखा जाएगा। 11 अक्टूबर को पारण होगा, जिसका मुहूर्त सुबह 06:19 बजे से 08:38 बजे तक है। व्रतियों को इस दो घंटों में पारण कर लेना चाहिए। कैसे करें व्रत? यह श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी के दिन नदी में तर्पण आदि कर ब्राह्मण भोज कराएं और उसके बाद स्वयं भी भोजन ग्रहण करें। दशमी पर सूर्यास्त के बाद भोजन न करें। एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का पूजन करने के बाद दोपहर में पुन: श्राद्ध-तर्पण कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। अगले दिन यानी द्वादशी को पूजन के बाद दान-दक्षिणा दें और पारण करें। इंदिरा एकादशी व्रत कथा जानिए इंदिरा एकादशी की व्रत कथा में क्या कहा गया है।  शास्त्रों के अनुसार महिष्मतिपुरी के राजा इन्द्रसेन एक धार्मिक व्यक्ति थे.वे हमेशा ही अपनी प्रजा के भले के बारे में सोचते थे और भले का कार्य ही करते थे। इसके साथ साथ उनकी ईश्वर में भी अटूट आस्था एवं श्रद्धा थी ,एक बार नारद मुनि भ्रमण  करते हुए उनके दरबार में पधारे ,राजा ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ कर उनका स्वागत किया और उनका पूजन किया।  राजा ने महर्षि के आने की वजह पूछी । तो नारद मुनि ने जवाब दिया ,हे राजन ! मेरे वचनो को ध्यान से सुनो, मैं एक समय ब्रह्म लोक से याम लोक गया। मैंने यमराज से सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की,उसी यमराज की सभा में धर्मात्मा एकादशी व्रत को भांग होने की वजह को देखा,उन्होंने संदेशा दिया पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मै यमराज के निकट रहा ,इसीलिए पुत्र इंदिरा एकादशी – Indira Ekadashi का व्रत करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और मुझे मोक्ष भी मिल जायेगा।  नारद की बात को सुन कर राजा ने अपने बांधवो तथा दासों से साथ इस व्रत को किया जिसके पुण्य प्रभाव से राजा के पिता विष्णु लोक को गए। राजा इन्द्रसेन भी एकादशी का व्रत कर अपने पुत्र को बैठा कर स्वर्ग लोक गए ,राजा इन्द्रसेन के नाम पर ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ा।  इंदिरा एकादशी का महत्व पितृ पक्ष  में पड़ने वाकई इस एकादशी का एक विशिष्ठ प्रकार का महत्त्व मन जाता है यह एकादशी का व्रत अश्विनी मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमरे पितरो को उनके पाप कर्मो से मुक्ति मिलती है और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है ,इस कृत के बारे में खुद भगवन श्री कृष्ण ने बतया की यह  व्रत धर्मराज युधिष्ठिर को बताया जाता है  इंदिरा एकादशी की पूजा विधि एकादशी व्रत में दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन करना होता है  इस व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है  व्रत करने के लिया स्नानं कर खुद को व्रत के लिए संकापित करे  विधि पूर्वक श्राद्ध सम्पन करे एवं प्रत्येक ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा प्रदान करे  पितरो के नाम से दान दिया हुआ अन्न पिंड गाय को खिलाएं  भगवन विष्णु को धुप ,फूल,मिठाई फल चढ़ाएं  एकादशी के अगले दिन द्वादशी के दिन पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन करवाएं  और अपने परिवार के साथ भोजन करते समय मौन रहे। 

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Chandra Darshan 2023: आज कब और कैसे करें चंद्र दर्शन, जानें चंद्रमा की पूजा विधि और उपाय

ज्येष्ठ मास की अमावस्या के बाद चंद्र देवता के दर्शन का सौभाग्य कब प्राप्त होगा और क्या है इसकी पूजा विधि, मंत्र और धार्मिक महत्व, विस्तार से जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में किसी भी मास की अमावस्या के बाद होने वाले चंद्र दर्शन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. यही कारण है कि जीवन में शुभता और सौभाग्य की कामना लिए लोग इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार करते हैं. ज्योतिष में जिस चंद्रमा को मन का कारक माना गया है, उसका दर्शन महीने की 20 तारीख को होगा. चंद्र दर्शन करना किस समय बहुत ज्यादा शुभ रहता है? चंद्र दर्शन की पूजा विधि और मंत्र क्या है? आइए इन सभी बातों के साथ चंद्र देवता की पूजा का पुण्य लाभ दिलाने वाला महाउपाय को विस्तार से जानते हैं. Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त चंद्र दर्शन की पूजा विधि हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन करने के लिए व्यक्ति को शाम के समय तन और मन से पवित्र होकर इस पूजा को करना चाहिए. यदि संभव हो तो चंद्र दर्शन करते समय व्यक्ति को सफेद कपड़े पहनना चाहिए. चंद्र दर्शन की पूजा में सबसे पहले दूध और उसके बाद शुद्ध जल चंद्र देवता को अर्पित करें. इसके बाद उन्हें खीर का भोग लगाकर धूप-दीप दिखाएं और चंद्र देवता के मंत्र ‘ॐ सों सोमाय नम:’ अथवा ‘ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम:’का जप करें. मान्यता है कि यह पूजा और मंत्र जप पति और पत्नी दोनों साथ मिलकर करें तो वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है. इसी तरह चंद्र दर्शन से व्यक्ति मन से जुड़ी चिंताएं दूर होती है और घर-परिवार में सुख-सौभाग्य बना रहता है. चंद्र दर्शन का महत्व चंद्र ग्रह को ज्ञान, बुद्धि और मन का स्वामी ग्रह माना जाता है. चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा के दर्शन से विशेष लाभ मिलते हैं. लोग भगवान की कृपा पाने के लिए कठोर व्रत और तपस्या करते हैं. चंद्र दर्शन और पूजा से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है. जीवन से नकारात्मकता को कम करने के लिए चंद्र यंत्र की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से लाभ मिलता है. इस दिन ब्रह्मणों को दान करने से भी लाभ मिलता है.

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