DURGA

नवरात्रि के चौथे दिन होती है माता कूष्मांडा की पूजा, नोट कर लें पूजा-विधि,मंत्र……

नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जिन्हें सृष्टि की रचनाकार और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। कूष्मांडा देवी को उनके मुस्कान से अंड (ब्रह्मांड) की उत्पत्ति करने वाली शक्ति के रूप में जाना जाता है। इनकी उपासना से भक्तों को लंबी आयु, समृद्धि, स्वास्थ्य, और उन्नति का वरदान मिलता है। नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप: नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप आठ भुजाओं वाला होता है, इसीलिए इन्हें “अष्टभुजा देवी” भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है। इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। पूजा-विधि: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन पूजा करते समय निम्न विधि अपनाई जाती है: नवरात्रि माता कूष्मांडा का मंत्र: माता कूष्मांडा का जाप करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं। निम्न मंत्र का जाप करें: ॐ देवी कूष्मांडायै नमः। यह मंत्र कम से कम 108 बार जपना चाहिए। यदि संभव हो तो मंत्र जाप के साथ दीप जलाकर पूजा करें। शुभ रंग: नवरात्रि के चौथे दिन हरा रंग शुभ माना जाता है। इस दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करना या पूजा में हरे रंग का कपड़ा इस्तेमाल करना विशेष फलदायी होता है। हरा रंग जीवन में उन्नति, समृद्धि, और स्वास्थ्य का प्रतीक है। माता कूष्मांडा की महिमा: माता कूष्मांडा सृष्टि की रचयिता मानी जाती हैं। कहते हैं कि जब संसार में कुछ भी नहीं था, तब देवी कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान के द्वारा ब्रह्मांड की रचना की। इनकी उपासना से हमारे सभी प्रकार के कष्ट, रोग, और शोक समाप्त होते हैं। विशेष रूप से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। उनकी कृपा से जीवन में उत्साह और सकारात्मकता आती है। नवरात्रि के चौथे दिन क्या करें और क्या न करें: क्या करें: क्या न करें: निष्कर्ष: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन बेहद महत्वपूर्ण होती है। उनकी उपासना से व्यक्ति के जीवन में रोग, भय और कष्टों का नाश होता है। माता की कृपा से साधक को समृद्धि, यश, और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उनका सान्निध्य हमारे जीवन में नई ऊर्जा और उमंग का संचार करता है।

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नवरात्रि 2024: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और क्या करें और क्या न करें

नवरात्रि 2024: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और क्या करें और क्या न करें नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है, जो साहस, शक्ति और सौम्यता की देवी मानी जाती हैं। इनका रूप बहुत ही अद्भुत और शक्तिशाली है, जो भक्तों को जीवन में साहस और संतुलन बनाए रखने का आशीर्वाद देती हैं। अगर आप मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Puja Vidhi), मंत्र (Mantras), भोग (Offerings), और पूजा के दौरान क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts) के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह पोस्ट आपके लिए है। मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Maa Chandraghanta Puja Vidhi) मां चंद्रघंटा के मंत्र (Mantras for Worship) मंत्रों का जाप करते हुए मां का ध्यान करें और उनसे साहस और संतुलन की प्रार्थना करें। मां चंद्रघंटा को भोग (Prasad to Offer) मां को दूध, खीर, और शहद का भोग विशेष रूप से प्रिय है। इन वस्तुओं को मां को अर्पित करने से स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मां चंद्रघंटा की पूजा में क्या करें (What to Do) मां चंद्रघंटा की पूजा में क्या न करें (What Not to Do) निष्कर्ष (Conclusion) मां की पूजा साहस, शक्ति और मानसिक संतुलन का प्रतीक है। सही विधि से की गई पूजा जीवन में शांति, साहस और संतुलन लाती है। इस नवरात्रि, मां चंद्रघंटा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा विधि, मंत्र जाप, और पूजा के नियमों का पालन करना अति महत्वपूर्ण है। उनकी कृपा से आपके जीवन में समृद्धि, साहस, और शक्ति का संचार होगा। इस नवरात्रि, मां की पूजा से अपने जीवन में साहस और संतुलन लाएं। Tags: Navratri2024 #MaaChandraghanta #PujaVidhi #NavratriThirdDay #ChandraghantaMantra #NavratriBhog #NavratriDoAndDonts #PujaSteps #SpiritualWorship #MantraJap #HinduRituals #NavratriSpecial #ChandraghantaPuja

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Maa Chandraghanta Aarti Navratri नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की करें आरती

चंद्रघंटा नवरात्रि के तीसरे दिन मां के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मां दुर्गा का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। माता रानी के मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान हैं, इस वजह से मां का नाम चंद्रघंटा पड़ा। मां चंद्रघंटा की सवारी शेर है। दस हाथों में कमल और कमडंल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं। माथे पर अर्ध चंद्र ही इनकी पहचान है। इनके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और शीर्ष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है। माता युद्ध की मुद्रा में विराजमान रहती हैं। न्यता है कि मां की पूजा करने से मन को शांति प्राप्त होती है। मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप की अराधना करने से परम शक्ति का अनुभव होता है। मान्यता है कि मां की पूजा में दूध का प्रयोग करना परम कल्याणकारी होता है। मां की कृपा से जीवन सुखमय हो जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन पर देवी का आशीर्वाद पाने के लिए विधिवत पूजा करने के साथ माता की आरती जरूर करें। चंद्रघंटा जय मां चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समान तुम शीतल दाती।चंद्र तेज किरणों में समाती। क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली। मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो। सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली। हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं। मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योति जलाएं। शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटूं महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी।

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नवरात्रि 2024: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और पूजा में क्या करें और क्या न करें

नवरात्रि 2024: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और पूजा में क्या करें और क्या न करें नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप संयम, साधना, और आत्मनियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। अगर आप इस नवरात्रि पर सही पूजा विधि जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। यहां हम विस्तार से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि (Puja Vidhi), मंत्र (Mantras), भोग (Offerings), और पूजा के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं (Do’s and Don’ts) बताएंगे। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि (Puja Vidhi) मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र (Mantras for Worship) इन मंत्रों का जाप करते हुए मां ब्रह्मचारिणी की आराधना करें और आशीर्वाद प्राप्त करें। मां ब्रह्मचारिणी को भोग (Prasad to Offer) मां ब्रह्मचारिणी को सफेद रंग की मिठाइयां प्रिय होती हैं। इसलिए आप उन्हें खीर, मिश्री, या शक्कर का भोग अर्पित कर सकते हैं। ये शुद्धता और साधना का प्रतीक माने जाते हैं। क्या करें (What to Do) क्या न करें (What Not to Do) निष्कर्ष (Conclusion) मां की पूजा संयम, साधना, और तप का प्रतीक है। सही विधि से की गई पूजा जीवन में सकारात्मकता और शांति लाती है। इस नवरात्रि पर मां का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ध्यान, मंत्र जाप, और सही नियमों का पालन करना अनिवार्य है। मां की पूजा से जीवन में सुख-शांति, तप, और ध्यान का विकास होता है। इस नवरात्रि, मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से अपने जीवन को संयम, साधना और सकारात्मकता से भरें।

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Vinayak Chaturthi 2024: अक्टूबर महीने में कब है विनायक चतुर्थी? नोट करें शुभ मुहूर्त एवं योग

Chaturthi 2024:चतुर्थी 2024: अक्टूबर महीने में कब है? जानें शुभ मुहूर्त और विशेष योग Chaturthi 2024:चतुर्थी तिथि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। चतुर्थी भगवान गणेश की पूजा का दिन है, जिन्हें विघ्नहर्ता और शुभता के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। हर महीने में दो बार चतुर्थी आती है – एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। अक्टूबर 2024 में आने वाली चतुर्थी का शुभ मुहूर्त और योग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन दिनों की पूजा से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है। आइए विस्तार से जानते हैं अक्टूबर 2024 में आने वाली चतुर्थी की तिथि, शुभ मुहूर्त, विशेष योग और इसकी पूजा विधि। Chaturthi 2024:चतुर्थी 2024: अक्टूबर महीने में कब है? अक्टूबर 2024 में दो मुख्य चतुर्थी तिथियाँ हैं: Chaturthi 2024:संकष्टी गणेश चतुर्थी: 6 अक्टूबर 2024, रविवार Vinayak Chaturthi:विनायक चतुर्थी: 9 अक्टूबर 2024, बुधवार शुभ मुहूर्त संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से चंद्रमा के उदय होने पर समाप्त किया जाता है। इस दिन चंद्र दर्शन का विशेष महत्त्व है और भक्त गणपति की पूजा करके चंद्रमा का दर्शन करते हैं। 6 अक्टूबर 2024 को चंद्र दर्शन का समय: इस समय पर भगवान गणेश की पूजा और व्रत का उद्यापन किया जाएगा। इसके बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इस समय में पूजा और मंत्रोच्चार करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। Chaturthi 2024:चतुर्थी का महत्व चतुर्थी, विशेषकर संकष्टी गणेश चतुर्थी, भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। चतुर्थी के दिन व्रत रखने और गणपति की आराधना करने से जीवन की सभी समस्याएं और बाधाएं दूर होती हैं। इसे संकष्टी इसलिए कहा जाता है क्योंकि भगवान गणेश इस दिन सभी संकटनाशक विघ्नों को दूर करते हैं। गणेश चतुर्थी के व्रत और पूजा का उद्देश्य है भगवान गणेश से अपने जीवन में समृद्धि, सुख, शांति और समस्त संकटों से मुक्ति की कामना करना। गणेश जी को विघ्नहर्ता माना जाता है और उनका आशीर्वाद जीवन की सभी कठिनाइयों को सरल बना देता है। Chaturthi 2024:चतुर्थी की पूजा विधि संकष्टी गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा करने के लिए विशेष विधि होती है। इस दिन व्रत और पूजा निम्नलिखित विधि से की जाती है: Chaturthi 2024:व्रत का महत्त्व संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत बहुत ही कठोर होता है। व्रत के दौरान केवल फलाहार किया जाता है और अन्न का त्याग किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन की सभी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं और विशेष फल की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाले को चाहिए कि वह दिन भर संयमित जीवन शैली का पालन करें। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहकर भगवान गणेश की आराधना करें। साथ ही व्रत के दौरान भगवान गणेश के मंत्रों का जाप और उनकी कथा का श्रवण करना भी अति लाभकारी होता है। Chaturthi 2024:विशेष योग संकष्टी चतुर्थी 6 अक्टूबर 2024 को विशेष योगों का संयोग बन रहा है, जो इस दिन की पूजा और व्रत को और भी फलदायी बनाएंगे। Chaturthi 2024:अभिजीत मुहूर्त: Chaturthi 2024:रवि योग: निष्कर्ष संकष्टी गणेश चतुर्थी और विनायक चतुर्थी दोनों ही महत्वपूर्ण पर्व हैं, जिन्हें श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। 6 अक्टूबर 2024 को संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त और योग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों का नाश होता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Shri Kalikashtakam:श्री कालिकाष्टकम्

Shri Kalikashtakam:श्री कालिकाष्टकम् Shri Kalikashtakam:अनुवाद: Shri Kalikashtakam:श्लोका श्री कालिकाष्टकम् (Shri Kalikashtakam) गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमालामहोघोररावा सुदंष्ट्रा कराला।विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशीमहाकालकामाकुला कालिकेयम्॥1॥ भुजे वामयुग्मे शिरोऽसिं दधानावरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव।सुमध्याऽपि तुङ्गस्तनाभारनम्रालसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या॥2॥ शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशीलसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची।शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्-चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे॥3॥ विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणांस्त्रीन्समाराध्य कालीं प्रधाना बभूबुः।अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥4॥ जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयंसुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम्।वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥5॥ इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्लीमनोजांस्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात्।तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं-स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥6॥ सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्तालसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते।जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्कास्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥7॥ चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दंशरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम्।मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तंस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥8॥ महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्राकदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया।न बाला न वृद्धा न कामातुरापिस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥9॥ क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मयालोकमध्ये प्रकाशिकृतं यत्।तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥10॥ यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्तदासर्वलोके विशालो भवेच्च।गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिःस्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥11॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम

Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम: देवी के विभिन्न रूपों का मंत्र Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा, हिंदू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं, जिन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है। देवी दुर्गा के 108 नामों का जाप करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। Shri Durga 108 Name ये नाम देवी के विभिन्न रूपों और गुणों को दर्शाते हैं। Shri Durga 108 Name:108 नामों का महत्व Shri Durga 108 Name:जाप करने का तरीका नोट निष्कर्ष श्री दुर्गा के 108 नामों का जाप एक शक्तिशाली साधन है जो भक्तों को आध्यात्मिक विकास और जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। यदि आप देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप नियमित रूप से इन नामों का जाप कर सकते हैं। Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम 1. सती- अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली2. साध्वी- आशावादी3. भवप्रीता- भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली4. भवानी- ब्रह्मांड की निवास5. भवमोचनी- संसार बंधनों से मुक्त करने वाली6. आर्या- देवी7. दुर्गा- अपराजेय8. जया- विजयी9. आद्य- शुरूआत की वास्तविकता10. त्रिनेत्र- तीन आँखों वाली11. शूलधारिणी- शूल धारण करने वाली12. पिनाकधारिणी- शिव का त्रिशूल धारण करने वाली13. चित्रा- सुरम्य, सुंदर 14. चण्डघण्टा- प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली15. महातपा- भारी तपस्या करने वाली16. मन – मनन- शक्ति17. बुद्धि- सर्वज्ञाता18. अहंकारा- अभिमान करने वाली19. चित्तरूपा- वह जो सोच की अवस्था में है20. चिता- मृत्युशय्या21. चिति- चेतना22. सर्वमन्त्रमयी- सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली23. सत्ता- सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है24. सत्यानन्दस्वरूपिणी- अनन्त आनंद का रूप25. अनन्ता- जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं26. भाविनी- सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत27. भाव्या- भावना एवं ध्यान करने योग्य28. भव्या- कल्याणरूपा, भव्यता के साथ 29. अभव्या – जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं30. सदागति- हमेशा गति में, मोक्ष दान31. शाम्भवी- शिवप्रिया, शंभू की पत्नी32. देवमाता- देवगण की माता33. चिन्ता- चिन्ता34. रत्नप्रिया- गहने से प्यार35. सर्वविद्या- ज्ञान का निवास36. दक्षकन्या- दक्ष की बेटी37. दक्षयज्ञविनाशिनी- दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली38. अपर्णा- तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली39. अनेकवर्णा- अनेक रंगों वाली40. पाटला- लाल रंग वाली41. पाटलावती- गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली42. पट्टाम्बरपरीधाना- रेशमी वस्त्र पहनने वाली43. कलामंजीरारंजिनी- पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली44. अमेय- जिसकी कोई सीमा नहीं45. विक्रमा- असीम पराक्रमी46. क्रूरा- दैत्यों के प्रति कठोर 47. सुन्दरी- सुंदर रूप वाली48. सुरसुन्दरी- अत्यंत सुंदर49. वनदुर्गा- जंगलों की देवी50. मातंगी- मतंगा की देवी51. मातंगमुनिपूजिता- बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय52. ब्राह्मी- भगवान ब्रह्मा की शक्ति53. माहेश्वरी- प्रभु शिव की शक्ति54. इंद्री- इन्द्र की शक्ति55. कौमारी- किशोरी56. वैष्णवी- अजेय57. चामुण्डा- चंड और मुंड का नाश करने वाली58. वाराही- वराह पर सवार होने वाली59. लक्ष्मी- सौभाग्य की देवी60. पुरुषाकृति- वह जो पुरुष धारण कर ले61. विमिलौत्त्कार्शिनी- आनन्द प्रदान करने वाली62. ज्ञाना- ज्ञान से भरी हुई63. क्रिया- हर कार्य में होने वाली64. नित्या- अनन्त65. बुद्धिदा- ज्ञान देने वाली66. बहुला- विभिन्न रूपों वाली67. बहुलप्रेमा- सर्व प्रिय 68. सर्ववाहनवाहना- सभी वाहन पर विराजमान होने वाली69. निशुम्भशुम्भहननी- शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली70. महिषासुरमर्दिनि- महिषासुर का वध करने वाली71. मधुकैटभहंत्री- मधु व कैटभ का नाश करने वाली72. चण्डमुण्ड विनाशिनि- चंड और मुंड का नाश करने वाली73. सर्वासुरविनाशा- सभी राक्षसों का नाश करने वाली74. सर्वदानवघातिनी- संहार के लिए शक्ति रखने वाली75. सर्वशास्त्रमयी- सभी सिद्धांतों में निपुण76. सत्या- सच्चाई 77. सर्वास्त्रधारिणी- सभी हथियारों धारण करने वाली78. अनेकशस्त्रहस्ता- हाथों में कई हथियार धारण करने वाली79. अनेकास्त्रधारिणी- अनेक हथियारों को धारण करने वाली80. कुमारी- सुंदर किशोरी81. एककन्या- कन्या82. कैशोरी- जवान लड़की83. युवती- नारी84. यति- तपस्वी85. अप्रौढा- जो कभी पुराना ना हो86. प्रौढा- जो पुराना है87. वृद्धमाता- शिथिल 88. बलप्रदा- शक्ति देने वाली89. महोदरी- ब्रह्मांड को संभालने वाली90. मुक्तकेशी- खुले बाल वाली91. घोररूपा- एक भयंकर दृष्टिकोण वाली92. महाबला- अपार शक्ति वाली93. अग्निज्वाला- मार्मिक आग की तरह94. रौद्रमुखी- विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा95. कालरात्रि- काले रंग वाली96. तपस्विनी- तपस्या में लगे हुए97. नारायणी- भगवान नारायण की विनाशकारी रूप98. भद्रकाली- काली का भयंकर रूप99. विष्णुमाया- भगवान विष्णु का जादू100. जलोदरी- ब्रह्मांड में निवास करने वाली101. शिवदूती- भगवान शिव की राजदूत102. करली – हिंसक103. अनन्ता- विनाश रहित104. परमेश्वरी- प्रथम देवी105. कात्यायनी- ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय106. सावित्री- सूर्य की बेटी107. प्रत्यक्षा- वास्तविक108. ब्रह्मवादिनी- वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

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नवरात्रि पर कैसे करें घटस्थापना (Ghatasthapana) मंत्र सहित एवं वैदिक प्रमाण

नवरात्रि पर कैसे करें घटस्थापना (Ghatasthapana) मंत्र सहित एवं वैदिक प्रमाण नवरात्रि एक पावन पर्व है, जिसे माँ दुर्गा की आराधना और शक्ति की उपासना के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान घटस्थापना (Ghatasthapana) का विशेष महत्व है। इसे नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक किया जाता है। यहाँ हम जानेंगे कि नवरात्रि पर घटस्थापना कैसे करें, उससे जुड़े मंत्र, और वैदिक प्रमाण। घटस्थापना का महत्व घटस्थापना नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की उपस्थिति का प्रतीक मानी जाती है। इसे कलश स्थापना के नाम से भी जाना जाता है, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक है। इस विधि से माँ दुर्गा को आमंत्रित किया जाता है, ताकि वे नौ दिनों तक भक्तों के बीच विराजमान रहें। घटस्थापना सामग्री (Ghatasthapana Samagri) घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री: घटस्थापना विधि (Ghatasthapana Vidhi) घटस्थापना मंत्र (Ghatasthapana Mantra) घटस्थापना के दौरान निम्न मंत्र का जाप करें: इस मंत्र से माँ दुर्गा का आवाहन करते हुए घटस्थापना करें। वैदिक प्रमाण (Vedic Reference) घटस्थापना की विधि और महत्व वेदों और पुराणों में वर्णित है। इसे वैदिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती में नवरात्रि की पूजा और घटस्थापना की प्रक्रिया का विस्तार से उल्लेख किया गया है। नवरात्रि पूजा का विशेष महत्व नवरात्रि के दौरान घटस्थापना के साथ-साथ नौ दिनों तक माँ दुर्गा की नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व शक्ति, भक्ति, और समर्पण का प्रतीक है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभता लाता है। “Navratri Ghatasthapana”, “Navratri Puja Vidhi”, “Ghatasthapana Mantra in Hindi”, and “Vedic Rituals for Navratri”.

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पूजा विधि: माँ शैलपुत्री की पूजा विधि और मन्त्र

पूजा विधि: माँ शैलपुत्री की पूजा विधि और वैदिक प्रमाण माँ शैलपुत्री, देवी दुर्गा का पहला स्वरूप, नवरात्रि के पहले दिन की पूजा का केंद्र होती हैं। उनकी पूजा से शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम माँ की पूजा विधि को विस्तार से जानेंगे, जिसमें वैदिक प्रमाण और मन्त्र भी शामिल हैं। माँ शैलपुत्री का महत्व माँ शैलपुत्री का वर्णन देवी भागवत और नवरात्रि उपासन विधि में मिलता है। इन ग्रंथों में उनका स्वरूप, गुण और भक्ति का महत्व बताया गया है। पूजा सामग्री (Worship Items) पूजा विधि (Worship Procedure) वैदिक प्रमाण माँ शैलपुत्री के प्रति भक्ति और पूजा का महत्व वैदिक शास्त्रों में स्पष्ट है। ये ग्रंथ हमें यह सिखाते हैं कि शक्ति की पूजा से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है। निष्कर्ष (Conclusion) माँ शैलपुत्री की पूजा विधि सरल, लेकिन प्रभावी है। इस पूजा से व्यक्ति को मानसिक शांति, शक्ति और समृद्धि प्राप्त होती है। सही विधि और मन्त्रों के साथ की गई पूजा जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है। Keywords: माँ शैलपुत्री, पूजा विधि, नवरात्रि, देवी दुर्गा, Worship, Vedic Mantra

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Shri Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा

Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा: एक विस्तृत विवरण Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा एक विशेष प्रकार की पूजा है जो माता दुर्गा को समर्पित होती है। Durga Manasa Puja यह पूजा दुर्गा सप्तशती के पाठ और मनन पर आधारित होती है। ‘मानस’ शब्द का अर्थ है मन, इसलिए इस पूजा में भक्त माता दुर्गा को अपने मन से पूजते हैं। Durga Manasa Puja:क्यों की जाती है दुर्गा मानस पूजा? Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा कैसे की जाती है? Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा के लाभ Durga Manasa Puja:कब की जाती है दुर्गा मानस पूजा? यह पूजा नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से की जाती है, लेकिन इसे साल में किसी भी समय किया जा सकता है। Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा के दौरान क्या ध्यान रखना चाहिए? अंत में श्री दुर्गा मानस पूजा एक शक्तिशाली पूजा है जो भक्तों को माता दुर्गा के आशीर्वाद से भर देती है।Durga Manasa Puja यदि आप भी माता दुर्गा की भक्त हैं तो आप इस पूजा को नियमित रूप से कर सकते हैं। Shri Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा ॥ श्रीदुर्गामानस-पूजा ॥उद्यच्चन्दनकुङ्कुमारुणपयोधाराभिराप्लावितांनानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके।आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितोमातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात्॥1॥ देवेन्द्रादिभिरर्चितं सुरगणैरादाय सिंहासनंचञ्चत्काञ्चनसंचयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम्।एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलंगन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके॥2॥ पश्चाद्देवि गृहाण शम्भुगृहिणि श्रीसुन्दरि प्रायशोगन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम्।तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसिस्नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे॥3॥ सुराधिपतिकामिनीकरसरोजनालीधृतांसचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम्।महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकांगृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे॥4॥ गन्धर्वामरकिन्नरप्रियतमासंतानहस्ताम्बुज-प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम्।मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलंचैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम्॥5॥ स्वर्णाकल्पितकुण्डले श्रुतियुगे हस्ताम्बुजे मुद्रिकामध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये।हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वकेविन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम्॥6॥ ग्रीवायां धृतकान्तिकान्तपटलं ग्रैवेयकं सुन्दरंसिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम्।राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचनेतद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे॥7॥ अमन्दतरमन्दरोन्मथितदुग्धसिन्धूद्भवंनिशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे।गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै-र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम्॥8॥ कस्तूरीद्रवचन्दनागुरुसुधाधाराभिराप्लावितंचञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम्।देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्नादिकुम्भव्रजै-रम्भःशाम्भवि संभ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके॥9॥ कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती-मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वमारादिभिः।पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसाताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये॥10॥ मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै-र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः।सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतयेधूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥11॥ घृतद्रवपरिस्फुरद्रुचिररत्नयष्ट्यान्वितोमहातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः।सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित-स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे॥12॥ जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलंयुक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिद्रव्यान्वितैर्व्यञ्जनैः।पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितंनैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥13॥ लवङ्गकलिकोज्ज्वलं बहुलनागवल्लीदलंसजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम्।सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्नपात्रस्थितंगृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम्॥14॥ शरत्प्रभवचन्द्रमः स्फुरितचन्द्रिकासुन्दरंगलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम्।गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलंमहात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत्॥15॥ मातस्त्वन्मुदमातनोतु सुभगस्त्रीभिः सदाऽऽन्दोलितंशुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम्।सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिःस्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः॥16॥ स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्खभेरीनिनादैरुपगीयमाना।कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय॥17॥ देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते।तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकं जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम्॥18॥ एतैः षोडशभिः पद्यैरुपचारोपकल्पितैः।यः परां देवतां स्तौति स तेषां फलमाप्नुयात्॥19॥ ॥ इति दुर्गातन्त्रे दुर्गामानसपूजा समाप्ता ॥ Durga Manasa Puja:श्रीदुर्गामानस – पूजा माता त्रिपुरसुन्दरि! तुम भक्तजनोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेवाली कल्पलता हो। माँ! यह पादुका आदरपूर्वक तुम्हारे श्रीचरणों में समर्पित है, इसे ग्रहण करो। यह उत्तम चन्दन और कुङ्कुमसे मिली हुई लाल जलकी धारासे धोयी गयी है। भाँति-भाँतिकी बहुमूल्य मणियों तथा मँगोंसे इसका निर्माण हुआ है और बहुत-सी देवाङ्गनाओंने अपने कर-कमलोंद्वारा भक्तिपूर्वक इसे सब ओर से धो-पोछकर स्वच्छ बना दिया॥1॥ माँ! देवताओंने तुम्हारे बैठनेके लिये यह दिव्य सिंहासन लाकर रख दिया है, इसपर विराजो यह वह सिंहासन है, जिसकी देवराज इन्द्र आदि भी पूजा करते हैं। अपनी कान्तिसे दमकते हुए राशि – राशि सुवर्णसे इसका निर्माण किया गया है। यह अपनी मनोहर प्रभासे सदा प्रकाशमान रहता है। इसके सिवा, यह चम्पा और केतकीकी सुगन्धसे पूर्ण अत्यन्त निर्मल तेल और सुगन्धयुक्त उबटन है, जिसे दिव्य युवतियाँ आदरपूर्वक तुम्हारी सेवामें प्रस्तुत कर रही हैं, कृपया इसे स्वीकार करो॥2॥ देवि! इसके पश्चात् यह विशुद्ध आँवलेका फल ग्रहण करो। शिवप्रिये! त्रिपुरसुन्दरि! इस आँवलेमें प्रायः जितने भी सुगन्धित पदार्थ हैं, वे सभी डाले गये हैं; इससे यह परम सुगन्धित हो गया है। अतः इसको लगाकर बालोंको कंघीसे झाड़ लो और गङ्गाजी की पवित्र धारामें नहाओ। तदनन्तर यह दिव्य गन्ध सेवामें प्रस्तुत है, यह तुम्हारे आनन्दकी वृद्धि करनेवाला हो॥3॥ सम्पत्ति प्रदान करनेवाली वरदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! यह सरस शुद्ध कस्तूरी ग्रहण करो। इसे स्वयं देवराज इन्द्रकी पत्नी महारानी शची अपने कर-कमलोंमें लेकर सेवामें खड़ी हैं। इसमें चन्दन, कुङ्कम तथा अगुरुका मेल होनेसे और भी इसकी शोभा बढ़ गयी है। इससे बहुत अधिक गन्ध निकलनेके कारण यह बड़ी मनोहर प्रतीत होती है॥4॥ माँ श्रीसुन्दरि! यह परम उत्तम निर्मल वस्त्र सेवामें समर्पित है, यह तुम्हारे हर्षको बढ़ावे। माता! इसे गन्धर्व, देवता तथा किन्नरोंकी प्रेयसी सुन्दरियाँ अपने फैलाये हुए कर-कमलोंमें धारण किये खड़ी हैं। यह केसरमें रँगा हुआ पीताम्बर है। इससे परम प्रकाशमान सूर्यमण्डलकी शोभामयी दिव्य कान्ति निकल रही है, जिसके कारण यह बहुत ही सुशोभित हो रहा है॥5॥ तुम्हारे दोनों कानोंमें सोनेके बने हुए कुण्डल झिलमिलाते रहें, कर-कमलकी एक अङ्गुलीमें अँगूठी शोभा पावे, कटिभागमें नितम्बोंपर करधनी सुहाये, दोनों चरणोंमें मञ्जीर मुखरित होता रहे, वक्षःस्थलमें हार सुशोभित हो और दोनों कलाइयोंमें कंकन खनखनाते रहें। तुम्हारे मस्तकपर रखा हुआ दिव्य मुकुट प्रतिदिन आनन्द प्रदान करे।Durga Manasa Puja ये सब आभूषण प्रशंसाके योग्य हैं॥6॥ धन देनेवाली शिवप्रिया पार्वती! तुम गलेमें बहुत ही चमकीली सुन्दर हँसली पहन लो, ललाटके मध्यभागमें सौन्दर्यकी मुद्रा (चिह्न) धारण करनेवाले सिन्दूरकी बेंदी लगाओ तथा अत्यन्त सुन्दर पद्मपत्रकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले नेत्रोंमें यह काजल भी लगा लो, यह काजल दिव्य औषधियों से तैयार किया गया है॥7॥ पापोंका नाश करनेवाली सम्पत्तिदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! अपने मुखकी शोभा निहारनेके लिये यह दर्पण ग्रहण करो। इसे साक्षात् रति रानी अपने कर-कमलोंमें लेकर सेवामें उपस्थित हैं। इस दर्पणके चारों ओर मूँगे जड़े हैं। प्रचण्ड वेगसे घूमनेवाले मन्दराचलकी मथानीसे जब क्षीरसमुद्र मथा गया, उस समय यह दर्पण उसीसे प्रकट हुआ था। यह चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है॥8॥ भगवान् शंकरकी धर्मपत्नी पार्वतीदेवी! देवाङ्गनाओंके मस्तकपर रखे हुए बहुमूल्य रत्नमय कलशोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक दिया जानेवाला यह निर्मल जल ग्रहण करो। इसे चम्पा और गुलाल आदि सुगन्धित द्रव्योंसे सुवासित किया गया है तथा यह कस्तूरीरस, चन्दन, अगुरु और सुधाकी धारासे आप्लावित है॥9॥ मैं कह्लार, उत्पल, नागकेसर, कमल, मालती, मल्लिका, कुमुद, केतकी और लाल कनेर आदि फूलोंसे, सुगन्धित पुष्प-मालाओंसे तथा नाना प्रकारके रसोंकी धारासे लाल कमलके भीतर निवास करनेवाली श्रीचण्डिका देवीकी पूजा करता (करती) हूँ॥10॥ श्रीचण्डिका देवि! देववधुओंके द्वारा तैयार किया हुआ यह दिव्य धूप तुम्हारी प्रसन्नता बढ़ानेवाला हो। यह धूप रत्नमय पात्रमें, जो सुगन्धका निवासस्थान है, रखा हुआ है; यह तुम्हें सन्तोष प्रदान करे। इसमें जटामासी, गुग्गुल, चन्दन, अगुरु-चूर्ण, कपूर, शिलाजीत, मधु, कुङ्कुम तथा घी मिलाकर उत्तम रीतिसे बनाया गया है॥11॥ देवी त्रिपुरसुन्दरी! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यहाँ यह दीप प्रकाशित हो रहा है। यह घीसे जलता है; इसकी दीयटमें सुन्दर रत्नका डंडा लगा है, इसे देवाङ्गनाओंने बनाया है। यह दीपक सुवर्णके चषक- (पात्र-) में जलाया गया है। इसमें कपूरके साथ बत्ती रखी है। यह भारी – से- भारी अन्धकारका भी नाश करनेवाला है॥12॥ श्रीचण्डिका देवि! देववधुओंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यह दिव्य नैवेद्य तैयार किया है, इसमें अगहनीके चावलका स्वच्छ भात है, जो बहुत ही रुचिकर और

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Vindhyeshwari Stotram:श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम्

Vindhyeshwari Stotram:विंध्येश्वरी स्तोत्रम देवी विंध्येश्वरी की स्तुति में समर्पित एक शक्तिशाली मंत्र है। यह स्तोत्र नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय भक्ति के साथ किया जा सकता है। विंध्येश्वरी देवी को शक्ति की देवी माना जाता है और उनकी पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है। विंध्येश्वरी स्तोत्रम में देवी के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। यह माना जाता है कि विंध्येश्वरी स्तोत्रम का नियमित पाठ करने से भक्तों को शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। यह स्तोत्र देवी की कृपा को प्राप्त करने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करता है। यदि आप विंध्येश्वरी देवी की भक्त हैं और उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं, तो आप इस स्तोत्र का नियमित पाठ कर सकते हैं। इससे आपको आध्यात्मिक शक्ति और आनंद प्राप्त होगा। Vindhyeshwari Stotram: विंध्येश्वरी स्तोत्रम के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: Vindhyeshwari Stotram:श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।बनेरणे प्रकाशिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ त्रिशूल मुण्ड धारिणी,धरा विघात हारिणी ।गृहे-गृहे निवासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ दरिद्र दुःख हारिणी,सदा विभूति कारिणी ।वियोग शोक हारिणी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ लसत्सुलोल लोचनं,लतासनं वरप्रदं ।कपाल-शूल धारिणी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कराब्जदानदाधरां,शिवाशिवां प्रदायिनी ।वरा-वराननां शुभां,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कपीन्द्न जामिनीप्रदां,त्रिधा स्वरूप धारिणी ।जले-थले निवासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ विशिष्ट शिष्ट कारिणी,विशाल रूप धारिणी ।महोदरे विलासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ पुंरदरादि सेवितां,पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥

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Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri:जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी -आरती

आरती नवरात्रि, माता की चौकी, देवी जागरण, शुक्रवार, वट सावित्री व्रत, दुर्गा पूजा, गणगौर तथा करवा चौथ के दिन गाई जाने वाली दुर्गा माँ की प्रसिद्ध आरती। जय श्यामा गौरी -आरती जय अम्बे गौरी,मैया जय श्यामा गौरी ।तुमको निशदिन ध्यावत,हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ मांग सिंदूर विराजत,टीको मृगमद को ।उज्ज्वल से दोउ नैना,चंद्रवदन नीको ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कनक समान कलेवर,रक्ताम्बर राजै ।रक्तपुष्प गल माला,कंठन पर साजै ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ केहरि वाहन राजत,खड्ग खप्पर धारी ।सुर-नर-मुनिजन सेवत,तिनके दुखहारी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कानन कुण्डल शोभित,नासाग्रे मोती ।कोटिक चंद्र दिवाकर,सम राजत ज्योती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ शुंभ-निशुंभ बिदारे,महिषासुर घाती ।धूम्र विलोचन नैना,निशदिन मदमाती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चण्ड-मुण्ड संहारे,शोणित बीज हरे ।मधु-कैटभ दोउ मारे,सुर भयहीन करे ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ ब्रह्माणी, रूद्राणी,तुम कमला रानी ।आगम निगम बखानी,तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत,नृत्य करत भैरों ।बाजत ताल मृदंगा,अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ तुम ही जग की माता,तुम ही हो भरता,भक्तन की दुख हरता ।सुख संपति करता ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ भुजा चार अति शोभित,वर मुद्रा धारी । [खड्ग खप्पर धारी]मनवांछित फल पावत,सेवत नर नारी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कंचन थाल विराजत,अगर कपूर बाती ।श्रीमालकेतु में राजत,कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ श्री अंबेजी की आरति,जो कोइ नर गावे ।कहत शिवानंद स्वामी,सुख-संपति पावे ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ जय अम्बे गौरी,मैया जय श्यामा गौरी ।

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