CHALISA

Sharda Chalisa:शारदा चालीसा

Sharda Chalisa:श्री शारदा चालीसा: ज्ञान की देवी का स्तुतिगान Sharda Chalisa:श्री शारदा चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्तोत्र है जो ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। माँ सरस्वती को विद्या, बुद्धि और कला की देवी माना जाता है। यह चालीसा विद्यार्थियों, लेखकों, कलाकारों और सभी ज्ञान चाहने वालों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। Sharda Chalisa:चालीसा का महत्व Sharda Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Sharda Chalisa:शारदा चालीसा Sharda Chalisa:शारदा चालीसा एक भक्ति गीत है जो शारदा माता पर आधारित है। ॥ दोहा ॥मूर्ति स्वयंभू शारदा,मैहर आन विराज।माला, पुस्तक, धारिणी,वीणा कर में साज॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय शारदा महारानी।आदि शक्ति तुम जग कल्याणी॥रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता।तीन लोक महं तुम विख्याता॥ दो सहस्र बर्षहि अनुमाना।प्रगट भई शारद जग जाना॥मैहर नगर विश्व विख्याता।जहाँ बैठी शारद जग माता॥ त्रिकूट पर्वत शारदा वासा।मैहर नगरी परम प्रकाशा॥शरद इन्दु सम बदन तुम्हारो।रूप चतुर्भुज अतिशय प्यारो॥ कोटि सूर्य सम तन द्युति पावन।राज हंस तुम्हारो शचि वाहन॥कानन कुण्डल लोल सुहावहि।उरमणि भाल अनूप दिखावहिं॥ वीणा पुस्तक अभय धारिणी।जगत्मातु तुम जग विहारिणी॥ब्रह्म सुता अखंड अनूपा।शारद गुण गावत सुरभूपा॥ हरिहर करहिं शारदा बन्दन।बरुण कुबेर करहिं अभिनन्दन॥शारद रूप चण्डी अवतारा।चण्ड-मुण्ड असुरन संहारा॥ महिषा सुर वध कीन्हि भवानी।दुर्गा बन शारद कल्याणी॥धरा रूप शारद भई चण्डी।रक्त बीज काटा रण मुण्डी॥ तुलसी सूर्य आदि विद्वाना।शारद सुयश सदैव बखाना॥कालिदास भए अति विख्याता।तुम्हारी दया शारदा माता॥ वाल्मीक नारद मुनि देवा।पुनि-पुनि करहिं शारदा सेवा॥चरण-शरण देवहु जग माया।सब जग व्यापहिं शारद माया॥ अणु-परमाणु शारदा वासा।परम शक्तिमय परम प्रकाशा॥हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा।शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा॥ ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा।शारद के गुण गावहिं वेदा॥जय जग बन्दनि विश्व स्वरुपा।निर्गुण-सगुण शारदहिं रुपा॥ सुमिरहु शारद नाम अखंडा।व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा॥सूर्य चन्द्र नभ मण्डल तारे।शारद कृपा चमकते सारे॥ उद्भव स्थिति प्रलय कारिणी।बन्दउ शारद जगत तारिणी॥दु:ख दरिद्र सब जाहिं नसाई।तुम्हारी कृपा शारदा माई॥ परम पुनीति जगत अधारा।मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा॥विद्या बुद्धि मिलहिं सुखदानी।जय जय जय शारदा भवानी॥ शारदे पूजन जो जन करहीं।निश्चय ते भव सागर तरहीं॥शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना।होई सकल विधि अति कल्याणा॥ जग के विषय महा दु:ख दाई।भजहुँ शारदा अति सुख पाई॥परम प्रकाश शारदा तोरा।दिव्य किरण देवहुँ मम ओरा॥ परमानन्द मगन मन होई।मातु शारदा सुमिरई जोई॥चित्त शान्त होवहिं जप ध्याना।भजहुँ शारदा होवहिं ज्ञाना॥ रचना रचित शारदा केरी।पाठ करहिं भव छटई फेरी॥सत्–सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना।शारद मातु करहिं कल्याणा॥ शारद महिमा को जग जाना।नेति-नेति कह वेद बखाना॥सत्–सत् नमन शारदा तोरा।कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा॥ जो जन सेवा करहिं तुम्हारी।तिन कहँ कतहुँ नाहि दु:खभारी॥जो यह पाठ करै चालीसा।मातु शारदा देहुँ आशीषा॥ ॥ दोहा ॥बन्दउँ शारद चरण रज,भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।सकल अविद्या दूर कर,सदा बसहु उरगेहुँ॥ जय-जय माई शारदा,मैहर तेरौ धाम।शरण मातु मोहिं लीजिए,तोहि भजहुँ निष्काम॥

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Ravidas Chalisa:रविदास चालीसा

Ravidas Chalisa:श्री रविदास चालीसा: भक्ति और समता का प्रतीक Ravidas Chalisa:श्री रविदास चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्तोत्र है जो संत रविदास जी को समर्पित है। संत रविदास जी एक महान संत और कवि थे जिन्होंने भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। Ravidas Chalisa उनकी शिक्षाएं समता, भाईचारे और ईश्वर भक्ति पर केंद्रित थीं। Ravidas Chalisa:चालीसा का महत्व Ravidas Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Ravidas Chalisa:रविदास चालीसा ॥ दोहा ॥ बंदौं वीणा पाणि को,देहु आय मोहिं ज्ञान।पाय बुद्धि रविदास को,करौं चरित्र बखान॥ मातु की महिमा अमित है,लिखि न सकत है दास।ताते आयों शरण में,पुरवहु जन की आस॥ ॥ चौपाई ॥ जै होवै रविदास तुम्हारी।कृपा करहु हरिजन हितकारी॥राहू भक्त तुम्हारे ताता।कर्मा नाम तुम्हारी माता॥ काशी ढिंग माडुर स्थाना।वर्ण अछूत करत गुजराना॥द्वादश वर्ष उम्र जब आई।तुम्हरे मन हरि भक्ति समाई॥ रामानन्द के शिष्य कहाये।पाय ज्ञान निज नाम बढ़ाये॥शास्त्र तर्क काशी में कीन्हों।ज्ञानिन को उपदेश है दीन्हों॥ गंग मातु के भक्त अपारा।कौड़ी दीन्ह उनहिं उपहारा॥पंडित जन ताको लै जाई।गंग मातु को दीन्ह चढ़ाई॥ हाथ पसारि लीन्ह चौगानी।भक्त की महिमा अमित बखानी॥चकित भये पंडित काशी के।देखि चरित भव भय नाशी के॥ रल जटित कंगन तब दीन्हाँ।रविदास अधिकारी कीन्हाँ॥पंडित दीजौ भक्त को मेरे।आदि जन्म के जो हैं चेरे॥ पहुँचे पंडित ढिग रविदासा।दै कंगन पुरइ अभिलाषा॥तब रविदास कही यह बाता।दूसर कंगन लावहु ताता॥ पंडित जन तब कसम उठाई।दूसर दीन्ह न गंगा माई॥तब रविदास ने वचन उचारे।पडित जन सब भये सुखारे॥ जो सर्वदा रहै मन चंगा।तौ घर बसति मातु है गंगा॥हाथ कठौती में तब डारा।दूसर कंगन एक निकारा॥ चित संकोचित पंडित कीन्हें।अपने अपने मारग लीन्हें॥तब से प्रचलित एक प्रसंगा।मन चंगा तो कठौती में गंगा॥ एक बार फिरि परयो झमेला।मिलि पंडितजन कीन्हों खेला॥सालिग राम गंग उतरावै।सोई प्रबल भक्त कहलावै॥ सब जन गये गंग के तीरा।मूरति तैरावन बिच नीरा॥डूब गईं सबकी मझधारा।सबके मन भयो दुःख अपारा॥ पत्थर मूर्ति रही उतराई।सुर नर मिलि जयकार मचाई॥रह्यो नाम रविदास तुम्हारा।मच्यो नगर महँ हाहाकारा॥ चीरि देह तुम दुग्ध बहायो।जन्म जनेऊ आप दिखाओ॥देखि चकित भये सब नर नारी।विद्वानन सुधि बिसरी सारी॥ ज्ञान तर्क कबिरा संग कीन्हों।चकित उनहुँ का तुम करि दीन्हों॥गुरु गोरखहि दीन्ह उपदेशा।उन मान्यो तकि संत विशेषा॥ सदना पीर तर्क बहु कीन्हाँ।तुम ताको उपदेश है दीन्हाँ॥मन महँ हार्योो सदन कसाई।जो दिल्ली में खबरि सुनाई॥ मुस्लिम धर्म की सुनि कुबड़ाई।लोधि सिकन्दर गयो गुस्साई॥अपने गृह तब तुमहिं बुलावा।मुस्लिम होन हेतु समुझावा॥ मानी नाहिं तुम उसकी बानी।बंदीगृह काटी है रानी॥कृष्ण दरश पाये रविदासा।सफल भई तुम्हरी सब आशा॥ ताले टूटि खुल्यो है कारा।माम सिकन्दर के तुम मारा॥काशी पुर तुम कहँ पहुँचाई।दै प्रभुता अरुमान बड़ाई॥ मीरा योगावति गुरु कीन्हों।जिनको क्षत्रिय वंश प्रवीनो॥तिनको दै उपदेश अपारा।कीन्हों भव से तुम निस्तारा॥ ॥ दोहा ॥ ऐसे ही रविदास ने,कीन्हें चरित अपार।कोई कवि गावै कितै,तहूं न पावै पार॥ नियम सहित हरिजन अगर,ध्यान धरै चालीसा।ताकी रक्षा करेंगे,जगतपति जगदीशा॥

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Shri Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा

Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा: जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा जैन धर्म का एक प्रसिद्ध और भक्तिमय स्तोत्र है जो भगवान महावीर को समर्पित है। यह चालीसा भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है और उन्हें मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। Mahavir Chalisa:चालीसा का महत्व Mahavir Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? निष्कर्ष श्री Mahavir Chalisa महावीर चालीसा एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्रदान करता है। यदि आप जैन धर्म के अनुयायी हैं, तो आपको नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करना चाहिए। Shri Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा श्री महावीर चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री Mahavir Chalisa महावीर पर आधारित है। ॥ दोहा॥शीश नवा अरिहन्त को,सिद्धन करूँ प्रणाम।उपाध्याय आचार्य का,ले सुखकारी नाम॥ सर्व साधु और सरस्वती,जिन मन्दिर सुखकार।महावीर भगवान को,मन-मन्दिर में धार॥ ॥ चौपाई ॥जय महावीर दयालु स्वामी।वीर प्रभु तुम जग में नामी॥वर्धमान है नाम तुम्हारा।लगे हृदय को प्यारा प्यारा॥ शांति छवि और मोहनी मूरत।शान हँसीली सोहनी सूरत॥तुमने वेश दिगम्बर धारा।कर्म-शत्रु भी तुम से हारा॥ क्रोध मान अरु लोभ भगाया।महा-मोह तमसे डर खाया॥तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता।तुझको दुनिया से क्या नाता॥ तुझमें नहीं राग और द्वेश।वीर रण राग तू हितोपदेश॥तेरा नाम जगत में सच्चा।जिसको जाने बच्चा बच्चा॥ भूत प्रेत तुम से भय खावें।व्यन्तर राक्षस सब भग जावें॥महा व्याध मारी न सतावे।महा विकराल काल डर खावे॥ काला नाग होय फन-धारी।या हो शेर भयंकर भारी॥ना हो कोई बचाने वाला।स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला॥ अग्नि दावानल सुलग रही हो।तेज हवा से भड़क रही हो॥नाम तुम्हारा सब दुख खोवे।आग एकदम ठण्डी होवे॥ हिंसामय था भारत सारा।तब तुमने कीना निस्तारा॥जन्म लिया कुण्डलपुर नगरी।हुई सुखी तब प्रजा सगरी॥ सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे।त्रिशला के आँखों के तारे॥छोड़ सभी झंझट संसारी।स्वामी हुए बाल-ब्रह्मचारी॥ पंचम काल महा-दुखदाई।चाँदनपुर महिमा दिखलाई॥टीले में अतिशय दिखलाया।एक गाय का दूध गिराया॥ सोच हुआ मन में ग्वाले के।पहुँचा एक फावड़ा लेके॥सारा टीला खोद बगाया।तब तुमने दर्शन दिखलाया॥ जोधराज को दुख ने घेरा।उसने नाम जपा जब तेरा॥ठंडा हुआ तोप का गोला।तब सब ने जयकारा बोला॥ मन्त्री ने मन्दिर बनवाया।राजा ने भी द्रव्य लगाया॥बड़ी धर्मशाला बनवाई।तुमको लाने को ठहराई॥ तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी।पहिया खसका नहीं अगाड़ी॥ग्वाले ने जो हाथ लगाया।फिर तो रथ चलता ही पाया॥ पहिले दिन बैशाख वदी के।रथ जाता है तीर नदी के॥मीना गूजर सब ही आते।नाच-कूद सब चित उमगाते॥ स्वामी तुमने प्रेम निभाया।ग्वाले का बहु मान बढ़ाया॥हाथ लगे ग्वाले का जब ही।स्वामी रथ चलता है तब ही॥ मेरी है टूटी सी नैया।तुम बिन कोई नहीं खिवैया॥मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर।मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर॥ तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ।जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ॥चालीसे को चन्द्र बनावे।बीर प्रभु को शीश नवावे॥ ॥ सोरठा ॥नित चालीसहि बार,पाठ करे चालीस दिन।खेय सुगन्ध अपार,वर्धमान के सामने। होय कुबेर समान,जन्म दरिद्री होय जो।जिसके नहिं सन्तान,नाम वंश जग में चले।

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Shri Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा

Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा: भक्ति और आस्था का एक मंत्र Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक पाठ है, जिसे भक्तगण Baba Gangaram Chalisa बाबा गंगाराम जी की आराधना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं। यह चालीसा बाबा के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों का वर्णन करती है, जो भक्तों को प्रेरणा और मार्गदर्शन देती है। Baba Gangaram Chalisa:चालीसा का महत्व Baba Gangaram Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा श्री बाबा गंगाराम चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री बाबा गंगाराम पर आधारित है। ॥ दोहा ॥अलख निरंजन आप हैं,निरगुण सगुण हमेश।नाना विधि अवतार धर,हरते जगत कलेश॥ बाबा गंगारामजी,हुए विष्णु अवतार।चमत्कार लख आपका,गूँज उठी जयकार॥ ॥ चौपाई ॥गंगाराम देव हितकारी।वैश्य वंश प्रकटे अवतारी॥पूर्वजन्म फल अमित रहेऊ।धन्य-धन्य पितु मातु भयेउ॥ उत्तम कुल उत्तम सतसंगा।पावन नाम राम अरू गंगा॥बाबा नाम परम हितकारी।सत सत वर्ष सुमंगलकारी॥ बीतहिं जन्म देह सुध नाहीं।तपत तपत पुनि भयेऊ गुसाई॥जो जन बाबा में चित लावा।तेहिं परताप अमर पद पावा॥ नगर झुंझनूं धाम तिहारो।शरणागत के संकट टारो॥धरम हेतु सब सुख बिसराये।दीन हीन लखि हृदय लगाये॥ एहि विधि चालीस वर्ष बिताये।अन्त देह तजि देव कहाये॥देवलोक भई कंचन काया।तब जनहित संदेश पठाया॥ निज कुल जन को स्वप्न दिखावा।भावी करम जतन बतलावा॥आपन सुत को दर्शन दीन्हों।धरम हेतु सब कारज कीन्हों॥ नभ वाणी जब हुई निशा में।प्रकट भई छवि पूर्व दिशा में॥ब्रह्मा विष्णु शिव सहित गणेशा।जिमि जनहित प्रकटेउ सब ईशा॥ चमत्कार एहि भाँति दिखाया।अन्तरध्यान भई सब माया॥सत्य वचन सुनि करहिं विचारा।मन महँ गंगाराम पुकारा॥ जो जन करई मनौती मन में।बाबा पीर हरहिं पल छन में॥ज्यों निज रूप दिखावहिं सांचा।त्यों त्यों भक्तवृन्द तेहिं जांचा॥ उच्च मनोरथ शुचि आचारी।राम नाम के अटल पुजारी॥जो नित गंगाराम पुकारे।बाबा दुख से ताहिं उबारे॥ बाबा में जिन्ह चित्त लगावा।ते नर लोक सकल सुख पावा॥परहित बसहिं जाहिं मन मांही।बाबा बसहिं ताहिं तन मांही॥ धरहिं ध्यान रावरो मन में।सुखसंतोष लहै न मन में॥धर्म वृक्ष जेही तन मन सींचा।पार ब्रह्म तेहि निज में खींचा॥ गंगाराम नाम जो गावे।लहि बैकुंठ परम पद पावे॥बाबा पीर हरहिं सब भाँति।जो सुमरे निश्छल दिन राती॥ दीन बन्धु दीनन हितकारी।हरौ पाप हम शरण तिहारी॥पंचदेव तुम पूर्ण प्रकाशा।सदा करो संतन मँह बासा॥ तारण तरण गंग का पानी।गंगाराम उभय सुनिशानी॥कृपासिंधु तुम हो सुखसागर।सफल मनोरथ करहु कृपाकर॥ झुंझनूं नगर बड़ा बड़ भागी।जहँ जन्में बाबा अनुरागी॥पूरन ब्रह्म सकल घटवासी।गंगाराम अमर अविनाशी॥ ब्रह्म रूप देव अति भोला।कानन कुण्डल मुकुट अमोला॥नित्यानन्द तेज सुख रासी।हरहु निशातन करहु प्रकासी॥ गंगा दशहरा लागहिं मेला।नगर झुंझनूं मँह शुभ बेला॥जो नर कीर्तन करहिं तुम्हारा।छवि निरखि मन हरष अपारा॥ प्रात: काल ले नाम तुम्हारा।चौरासी का हो निस्तारा॥पंचदेव मन्दिर विख्याता।दरशन हित भगतन का तांता॥ जय श्री गंगाराम नाम की।भवतारण तरि परम धाम की॥‘महावीर’ धर ध्यान पुनीता।विरचेउ गंगाराम सुगीता॥ ॥ दोहा ॥सुने सुनावे प्रेम से,कीर्तन भजन सुनाम।मन इच्छा सब कामना,पुरई गंगाराम॥

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Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा

Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा: एक शक्तिशाली स्तुति Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा हिंदू धर्म में एक लोकप्रिय और शक्तिशाली स्तुति है जो जाहरवीर जी को समर्पित है। जाहरवीर जी को एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है Shri Jaharveer Chalisa कि वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, रोग मुक्ति और अन्य कई लाभ प्राप्त होते हैं। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का महत्व Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का पाठ करने का समय आप जाहरवीर चालीसा का पाठ दिन में किसी भी समय कर सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा के लाभ Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा ॥ दोहा ॥सुवन केहरी जेवर,सुत महाबली रनधीर।बन्दौं सुत रानी बाछला,विपत निवारण वीर॥ जय जय जय चौहान,वन्स गूगा वीर अनूप।अनंगपाल को जीतकर,आप बने सुर भूप॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय जाहर रणधीरा।पर दुख भंजन बागड़ वीरा॥गुरु गोरख का है वरदानी।जाहरवीर जोधा लासानी॥ गौरवरण मुख महा विशाला।माथे मुकट घुंघराले बाला॥कांधे धनुष गले तुलसी माला।कमर कृपान रक्षा को डाला॥ जन्में गूगावीर जग जाना।ईसवी सन हजार दरमियाना॥बल सागर गुण निधि कुमारा।दुखी जनों का बना सहारा॥ बागड़ पति बाछला नन्दन।जेवर सुत हरि भक्त निकन्दन॥जेवर राव का पुत्र कहाये।माता पिता के नाम बढ़ाये॥ पूरन हुई कामना सारी।जिसने विनती करी तुम्हारी॥सन्त उबारे असुर संहारे।भक्त जनों के काज संवारे॥ गूगावीर की अजब कहानी।जिसको ब्याही श्रीयल रानी॥बाछल रानी जेवर राना।महादुःखी थे बिन सन्ताना॥ भंगिन ने जब बोली मारी।जीवन हो गया उनको भारी॥सूखा बाग पड़ा नौलक्खा।देख-देख जग का मन दुक्खा॥ कुछ दिन पीछे साधू आये।चेला चेली संग में लाये॥जेवर राव ने कुआ बनवाया।उद्घाटन जब करना चाहा॥ खारी नीर कुए से निकला।राजा रानी का मन पिघला॥रानी तब ज्योतिषी बुलवाया।कौन पाप मैं पुत्र न पाया॥ कोई उपाय हमको बतलाओ।उन कहा गोरख गुरु मनाओ॥गुरु गोरख जो खुश हो जाई।सन्तान पाना मुश्किल नाई॥ बाछल रानी गोरख गुन गावे।नेम धर्म को न बिसरावे॥करे तपस्या दिन और राती।एक वक्त खाय रूखी चपाती॥ कार्तिक माघ में करे स्नाना।व्रत इकादसी नहीं भुलाना॥पूरनमासी व्रत नहीं छोड़े।दान पुण्य से मुख नहीं मोड़े॥ चेलों के संग गोरख आये।नौलखे में तम्बू तनवाये॥मीठा नीर कुए का कीना।सूखा बाग हरा कर दीना॥ मेवा फल सब साधु खाए।अपने गुरु के गुन को गाये॥औघड़ भिक्षा मांगने आए।बाछल रानी ने दुख सुनाये॥ औघड़ जान लियो मन माहीं।तप बल से कुछ मुश्किल नाहीं॥रानी होवे मनसा पूरी।गुरु शरण है बहुत जरूरी॥ बारह बरस जपा गुरु नामा।तब गोरख ने मन में जाना॥पुत्र देन की हामी भर ली।पूरनमासी निश्चय कर ली॥ काछल कपटिन गजब गुजारा।धोखा गुरु संग किया करारा॥बाछल बनकर पुत्र पाया।बहन का दरद जरा नहीं आया॥ औघड़ गुरु को भेद बताया।तब बाछल ने गूगल पाया॥कर परसादी दिया गूगल दाना।अब तुम पुत्र जनो मरदाना॥ लीली घोड़ी और पण्डतानी।लूना दासी ने भी जानी॥रानी गूगल बाट के खाई।सब बांझों को मिली दवाई॥ नरसिंह पंडित लीला घोड़ा।भज्जु कुतवाल जना रणधीरा॥रूप विकट धर सब ही डरावे।जाहरवीर के मन को भावे॥ भादों कृष्ण जब नौमी आई।जेवरराव के बजी बधाई॥विवाह हुआ गूगा भये राना।संगलदीप में बने मेहमाना॥ रानी श्रीयल संग परे फेरे।जाहर राज बागड़ का करे॥अरजन सरजन काछल जने।गूगा वीर से रहे वे तने॥ दिल्ली गए लड़ने के काजा।अनंग पाल चढ़े महाराजा॥उसने घेरी बागड़ सारी।जाहरवीर न हिम्मत हारी॥ अरजन सरजन जान से मारे।अनंगपाल ने शस्त्र डारे॥चरण पकड़कर पिण्ड छुड़ाया।सिंह भवन माड़ी बनवाया॥ उसीमें गूगावीर समाये।गोरख टीला धूनी रमाये॥पुण्य वान सेवक वहाँ आये।तन मन धन से सेवा लाए॥ मनसा पूरी उनकी होई।गूगावीर को सुमरे जोई॥चालीस दिन पढ़े जाहर चालीसा।सारे कष्ट हरे जगदीसा॥ दूध पूत उन्हें दे विधाता।कृपा करे गुरु गोरखनाथ॥

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Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा

Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा: एक पवित्र स्तुति Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तुति है जो तुलसी माता को समर्पित है। Tulasi Chalisa तुलसी को हिंदू धर्म में एक पवित्र पौधा माना जाता है और इसे घरों में लगाने का विशेष महत्व है। तुलसी चालीसा का पाठ करने से धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का महत्व Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का समय Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का कोई विशेष समय नहीं है। Tulasi Chalisa आप इसे दिन में किसी भी समय पढ़ सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा के लाभ Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी ।नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी ॥ श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब ।जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ॥ ॥ चौपाई ॥धन्य धन्य श्री तलसी माता ।महिमा अगम सदा श्रुति गाता ॥ हरि के प्राणहु से तुम प्यारी ।हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी ॥ जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो ।तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ॥ हे भगवन्त कन्त मम होहू ।दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ॥ ४ ॥ सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी ।दीन्हो श्राप कध पर आनी ॥ उस अयोग्य वर मांगन हारी ।होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ॥ सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा ।करहु वास तुहू नीचन धामा ॥ दियो वचन हरि तब तत्काला ।सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला ॥ ८ ॥ समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा ।पुजिहौ आस वचन सत मोरा ॥ तब गोकुल मह गोप सुदामा ।तासु भई तुलसी तू बामा ॥ कृष्ण रास लीला के माही ।राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ॥ दियो श्राप तुलसिह तत्काला ।नर लोकही तुम जन्महु बाला ॥ १२ ॥ यो गोप वह दानव राजा ।शङ्ख चुड नामक शिर ताजा ॥ तुलसी भई तासु की नारी ।परम सती गुण रूप अगारी ॥ अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ ।कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ॥ वृन्दा नाम भयो तुलसी को ।असुर जलन्धर नाम पति को ॥ १६ ॥ करि अति द्वन्द अतुल बलधामा ।लीन्हा शंकर से संग्राम ॥ जब निज सैन्य सहित शिव हारे ।मरही न तब हर हरिही पुकारे ॥ पतिव्रता वृन्दा थी नारी ।कोऊ न सके पतिहि संहारी ॥ तब जलन्धर ही भेष बनाई ।वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई ॥ २० ॥ शिव हित लही करि कपट प्रसंगा ।कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ॥ भयो जलन्धर कर संहारा ।सुनी उर शोक उपारा ॥ तिही क्षण दियो कपट हरि टारी ।लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी ॥ जलन्धर जस हत्यो अभीता ।सोई रावन तस हरिही सीता ॥ २४ ॥ अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा ।धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा ॥ यही कारण लही श्राप हमारा ।होवे तनु पाषाण तुम्हारा ॥ सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे ।दियो श्राप बिना विचारे ॥ लख्यो न निज करतूती पति को ।छलन चह्यो जब पारवती को ॥ २८ ॥ जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा ।जग मह तुलसी विटप अनूपा ॥ धग्व रूप हम शालिग्रामा ।नदी गण्डकी बीच ललामा ॥ जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं ।सब सुख भोगी परम पद पईहै ॥ बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा ।अतिशय उठत शीश उर पीरा ॥ ३२ ॥ जो तुलसी दल हरि शिर धारत ।सो सहस्त्र घट अमृत डारत ॥ तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी ।रोग दोष दुःख भंजनी हारी ॥ प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।तुलसी राधा में नाही अन्तर ॥ व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा ।बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ॥ ३६ ॥ सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही ।लहत मुक्ति जन संशय नाही ॥ कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत ।तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ॥ बसत निकट दुर्बासा धामा ।जो प्रयास ते पूर्व ललामा ॥ पाठ करहि जो नित नर नारी ।होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।दीपदान करि पुत्र फल पावही बन्ध्यहु नारी ॥ सकल दुःख दरिद्र हरि हार ह्वै परम प्रसन्न ।आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ॥ लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम ।जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ॥ तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम ।मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ॥

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Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा

Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और उनकी महानता का वर्णन करती है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के निर्माता और शिल्पकला, वास्तुकला, और निर्माण कार्यों के देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें सभी प्रकार के शिल्पकारों, इंजीनियरों, और वास्तुकारों के आराध्य देव माना जाता है। विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करने से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनके जीवन में सुख, समृद्धि, और सफलता लेकर आते हैं। Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा के लाभ: निष्कर्ष: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ न केवल शिल्पकारों और तकनीकी कर्मियों के लिए बल्कि हर व्यक्ति के लिए लाभकारी होता है। यह पाठ जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुरक्षा, और समृद्धि प्रदान करता है। विश्वकर्मा जी की कृपा से व्यक्ति के कार्य सुचारू रूप से संपन्न होते हैं और उसे जीवन में यश, कीर्ति, और सम्मान प्राप्त होता है। Vishwakarma Chalisa विश्वकर्मा चालीसा ॥ दोहा ॥श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं,चरणकमल धरिध्यान ।श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण,दीजै दया निधान ॥ ॥ चौपाई ॥जय श्री विश्वकर्म भगवाना ।जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥ शिल्पाचार्य परम उपकारी ।भुवना-पुत्र नाम छविकारी ॥ अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर ।शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर ॥ अद्‍भुत सकल सृष्टि के कर्ता ।सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता ॥ ४ ॥ अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं ।कोई विश्व मंह जानत नाही ॥ विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा ।अद्‍भुत वरण विराज सुवेशा ॥ एकानन पंचानन राजे ।द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे ॥ चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे ।वारि कमण्डल वर कर लीन्हे ॥ ८ ॥ शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा ।सोहत सूत्र माप अनुरूपा ॥ धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे ।नौवें हाथ कमल मन मोहे ॥ दसवां हस्त बरद जग हेतु ।अति भव सिंधु मांहि वर सेतु ॥ सूरज तेज हरण तुम कियऊ ।अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ ॥ १२ ॥ चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका ।दण्ड पालकी शस्त्र अनेका ॥ विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं ।अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं ॥ इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा ।तुम सबकी पूरण की आशा ॥ भांति-भांति के अस्त्र रचाए ।सतपथ को प्रभु सदा बचाए ॥ १६ ॥ अमृत घट के तुम निर्माता ।साधु संत भक्तन सुर त्राता ॥ लौह काष्ट ताम्र पाषाणा ।स्वर्ण शिल्प के परम सजाना ॥ विद्युत अग्नि पवन भू वारी ।इनसे अद्भुत काज सवारी ॥ खान-पान हित भाजन नाना ।भवन विभिषत विविध विधाना ॥ २० ॥ विविध व्सत हित यत्रं अपारा ।विरचेहु तुम समस्त संसारा ॥ द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका ।विविध महा औषधि सविवेका ॥ शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला ।वरुण कुबेर अग्नि यमकाला ॥ तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ ।करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ ॥ २४ ॥ भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका ।कियउ काज सब भये अशोका ॥ अद्भुत रचे यान मनहारी ।जल-थल-गगन मांहि-समचारी ॥ शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही ।विज्ञान कह अंतर नाही ॥ बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा ।सकल सृष्टि है तव विस्तारा ॥ २८ ॥ रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा ।तुम बिन हरै कौन भव हारी ॥ मंगल-मूल भगत भय हारी ।शोक रहित त्रैलोक विहारी ॥ चारो युग परताप तुम्हारा ।अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा ॥ ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता ।वर विज्ञान वेद के ज्ञाता ॥ ३२ ॥ मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा ।सबकी नित करतें हैं रक्षा ॥ पंच पुत्र नित जग हित धर्मा ।हवै निष्काम करै निज कर्मा ॥ प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई ।विपदा हरै जगत मंह जोई ॥ जै जै जै भौवन विश्वकर्मा ।करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा ॥ ३६ ॥ इक सौ आठ जाप कर जोई ।छीजै विपत्ति महासुख होई ॥ पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा ।होय सिद्ध साक्षी गौरीशा ॥ विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे ।हो प्रसन्न हम बालक तेरे ॥ मैं हूं सदा उमापति चेरा ।सदा करो प्रभु मन मंह डेरा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥करहु कृपा शंकर सरिस,विश्वकर्मा शिवरूप ।श्री शुभदा रचना सहित,ह्रदय बसहु सूर भूप ॥

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Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा

Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा भगवान परशुराम की स्तुति और उनके गुणों की महिमा का वर्णन करती है। भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, जिन्होंने पृथ्वी को पापियों और अत्याचारियों से मुक्त किया। परशुराम चालीसा का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और जीवन में सकारात्मक लाभ मिलते हैं। आइए जानते हैं परशुराम चालीसा के लाभ: Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा के लाभ Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा श्री परशुराम पर आधारित एक भक्ति गीत है। Parshuram Chalisa कई लोगों ने श्री परशुराम को समर्पित त्योहारों पर परशुराम चालीसा का पाठ किया। ॥ दोहा ॥श्री गुरु चरण सरोज छवि,निज मन मन्दिर धारि।सुमरि गजानन शारदा,गहि आशिष त्रिपुरारि॥ बुद्धिहीन जन जानिये,अवगुणों का भण्डार।बरणों परशुराम सुयश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय प्रभु परशुराम सुख सागर।जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर॥भृगुकुल मुकुट विकट रणधीरा।क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥ जमदग्नी सुत रेणुका जाया।तेज प्रताप सकल जग छाया॥मास बैसाख सित पच्छ उदारा।तृतीया पुनर्वसु मनुहारा॥ प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा।तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा॥तब ऋषि कुटीर रूदन शिशु कीन्हा।रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा॥ निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े।मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े॥तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा।जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा॥ धरा राम शिशु पावन नामा।नाम जपत जग लह विश्रामा॥भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर।कांधे मुंज जनेऊ मनहर॥ मंजु मेखला कटि मृगछाला।रूद्र माला बर वक्ष विशाला॥पीत बसन सुन्दर तनु सोहें।कंध तुणीर धनुष मन मोहें॥ वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता।क्रोध रूप तुम जग विख्याता॥दायें हाथ श्रीपरशु उठावा।वेद-संहिता बायें सुहावा॥ विद्यावान गुण ज्ञान अपारा।शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा॥भुवन चारिदस अरु नवखंडा।चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा॥ एक बार गणपति के संगा।जूझे भृगुकुल कमल पतंगा॥दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा।एक दंत गणपति भयो नामा॥ कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला।सहस्रबाहु दुर्जन विकराला॥सुरगऊ लखि जमदग्नी पांहीं।रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं॥ मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई।भयो पराजित जगत हंसाई॥तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी।रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी॥ ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना।तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा॥लगत शक्ति जमदग्नी निपाता।मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता॥ पितु-बध मातु-रूदन सुनि भारा।भा अति क्रोध मन शोक अपारा॥कर गहि तीक्षण परशु कराला।दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला॥ क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा।पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा॥इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी।छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी॥ जुग त्रेता कर चरित सुहाई।शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई॥गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना।तब समूल नाश ताहि ठाना॥ कर जोरि तब राम रघुराई।बिनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई॥भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता।भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता॥ शास्त्र विद्या देह सुयश कमावा।गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा॥चारों युग तव महिमा गाई।सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई॥ दे कश्यप सों संपदा भाई।तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई॥अब लौं लीन समाधि नाथा।सकल लोक नावइ नित माथा॥ चारों वर्ण एक सम जाना।समदर्शी प्रभु तुम भगवाना॥ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी।देव दनुज नर भूप भिखारी॥ जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा।तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा॥पृर्णेन्दु निसि बासर स्वामी।बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी॥ ॥ दोहा ॥परशुराम को चारू चरित,मेटत सकल अज्ञान।शरण पड़े को देत प्रभु,सदा सुयश सम्मान॥ ॥ श्लोक ॥भृगुदेव कुलं भानुं,सहस्रबाहुर्मर्दनम्।रेणुका नयना नंदं,परशुंवन्दे विप्रधनम्॥

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Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा 

Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा: धन और समृद्धि की देवी का स्तोत्र Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा हिंदू धर्म में धन, समृद्धि और सुख की देवी माता लक्ष्मी की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। माना जाता है कि इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, वैभव और सुख की वृद्धि होती है। Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का महत्व Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का पाठ कब करें? Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय श्री महालक्ष्मी,करूँ मात तव ध्यान।सिद्ध काज मम किजिये,निज शिशु सेवक जान॥ ॥ चौपाई ॥नमो महा लक्ष्मी जय माता।तेरो नाम जगत विख्याता॥आदि शक्ति हो मात भवानी।पूजत सब नर मुनि ज्ञानी॥ जगत पालिनी सब सुख करनी।निज जनहित भण्डारण भरनी॥श्वेत कमल दल पर तव आसन।मात सुशोभित है पद्मासन॥ श्वेताम्बर अरू श्वेता भूषण।श्वेतही श्वेत सुसज्जित पुष्पन॥शीश छत्र अति रूप विशाला।गल सोहे मुक्तन की माला॥ सुंदर सोहे कुंचित केशा।विमल नयन अरु अनुपम भेषा॥कमलनाल समभुज तवचारि।सुरनर मुनिजनहित सुखकारी॥ अद्भूत छटा मात तव बानी।सकलविश्व कीन्हो सुखखानी॥शांतिस्वभाव मृदुलतव भवानी।सकल विश्वकी हो सुखखानी॥ महालक्ष्मी धन्य हो माई।पंच तत्व में सृष्टि रचाई॥जीव चराचर तुम उपजाए।पशु पक्षी नर नारी बनाए॥ क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए।अमितरंग फल फूल सुहाए॥छवि विलोक सुरमुनि नरनारी।करे सदा तव जय-जय कारी॥ सुरपति औ नरपत सब ध्यावैं।तेरे सम्मुख शीश नवावैं॥चारहु वेदन तब यश गाया।महिमा अगम पार नहिं पाये॥ जापर करहु मातु तुम दाया।सोइ जग में धन्य कहाया॥पल में राजाहि रंक बनाओ।रंक राव कर बिमल न लाओ॥ जिन घर करहु माततुम बासा।उनका यश हो विश्व प्रकाशा॥जो ध्यावै से बहु सुख पावै।विमुख रहे हो दुख उठावै॥ महालक्ष्मी जन सुख दाई।ध्याऊं तुमको शीश नवाई॥निज जन जानीमोहीं अपनाओ।सुखसम्पति दे दुख नसाओ॥ ॐ श्री-श्री जयसुखकी खानी।रिद्धिसिद्ध देउ मात जनजानी॥ॐह्रीं-ॐह्रीं सब व्याधिहटाओ।जनउन विमल दृष्टिदर्शाओ॥ ॐक्लीं-ॐक्लीं शत्रुन क्षयकीजै।जनहित मात अभय वरदीजै॥ॐ जयजयति जयजननी।सकल काज भक्तन के सरनी॥ ॐ नमो-नमो भवनिधि तारनी।तरणि भंवर से पार उतारनी॥सुनहु मात यह विनय हमारी।पुरवहु आशन करहु अबारी॥ ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै।सो प्राणी सुख सम्पत्ति पावै॥रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई।ताकी निर्मल काया होई॥ विष्णु प्रिया जय-जय महारानी।महिमा अमित न जाय बखानी॥पुत्रहीन जो ध्यान लगावै।पाये सुत अतिहि हुलसावै॥ त्राहि त्राहि शरणागत तेरी।करहु मात अब नेक न देरी॥आवहु मात विलम्ब न कीजै।हृदय निवास भक्त बर दीजै॥ जानूं जप तप का नहिं भेवा।पार करो भवनिध वन खेवा॥बिनवों बार-बार कर जोरी।पूरण आशा करहु अब मोरी॥ जानि दास मम संकट टारौ।सकल व्याधि से मोहिं उबारौ॥जो तव सुरति रहै लव लाई।सो जग पावै सुयश बड़ाई॥ छायो यश तेरा संसारा।पावत शेष शम्भु नहिं पारा॥गोविंद निशदिन शरण तिहारी।करहु पूरण अभिलाष हमारी॥ ॥ दोहा ॥महालक्ष्मी चालीसा,पढ़ै सुनै चित लाय।ताहि पदारथ मिलै,अब कहै वेद अस गाय॥

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Surya Chalisa सूर्य चालीसा

Surya Chalisa:सूर्य चालीसा: सूर्य देव की भक्ति का एक अद्भुत स्तोत्र Surya Chalisa:सूर्य चालीसा हिंदू धर्म में सूर्य देव की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। सूर्य देव को सृष्टि का कारण माना जाता है और वे सभी जीवों को जीवन प्रदान करते हैं। सूर्य चालीसा में सूर्य देव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन किया गया है। Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का महत्व Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का पाठ कब करें? Surya Chalisa:सूर्य चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Surya Chalisa सूर्य चालीसा श्री सूर्य देव चालीसा ॥॥ दोहा ॥कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥ ॥ चौपाई ॥जय सविता जय जयति दिवाकर,सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥ भानु पतंग मरीची भास्कर,सविता हंस सुनूर विभाकर॥ विवस्वान आदित्य विकर्तन,मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥ अम्बरमणि खग रवि कहलाते,वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 4 सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥ अरुण सदृश सारथी मनोहर,हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥ मंडल की महिमा अति न्यारी,तेज रूप केरी बलिहारी॥ उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,देखि पुरन्दर लज्जित होते॥8 मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥ पूषा रवि आदित्य नाम लै,हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥ द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,मस्तक बारह बार नवावैं॥ चार पदारथ जन सो पावै,दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥12 नमस्कार को चमत्कार यह,विधि हरिहर को कृपासार यह॥ सेवै भानु तुमहिं मन लाई,अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥ बारह नाम उच्चारन करते,सहस जनम के पातक टरते॥ उपाख्यान जो करते तवजन,रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥16 धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,प्रबल मोह को फंद कटतु है॥ अर्क शीश को रक्षा करते,रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥ सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥ भानु नासिका वासकरहुनित,भास्कर करत सदा मुखको हित॥20 ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥ कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥ पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥ युगल हाथ पर रक्षा कारन,भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥24 बसत नाभि आदित्य मनोहर,कटिमंह, रहत मन मुदभर॥ जंघा गोपति सविता बासा,गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥ विवस्वान पद की रखवारी,बाहर बसते नित तम हारी॥ सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,रक्षा कवच विचित्र विचारे॥28 अस जोजन अपने मन माहीं,भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥ दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,जोजन याको मन मंह जापै॥ अंधकार जग का जो हरता,नव प्रकाश से आनन्द भरता॥ ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥32 मंद सदृश सुत जग में जाके,धर्मराज सम अद्भुत बांके॥ धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,किया करत सुरमुनि नर सेवा॥ भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥ परम धन्य सों नर तनधारी,हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥36 अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥ भानु उदय बैसाख गिनावै,ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥ यम भादों आश्विन हिमरेता,कातिक होत दिवाकर नेता॥ अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥40 ॥ दोहा ॥भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

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नवरात्रि का आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप, माँ महागौरी की पूजा की जाती है। माँ महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और उज्ज्वल है। उनके इस स्वरूप को पवित्रता, शुद्धता, और तप की देवी के रूप में जाना जाता है। माँ महागौरी की पूजा अष्टमी तिथि को की जाती है, जिसे “महाअष्टमी” भी कहते हैं। इस दिन को अत्यधिक शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह दिन भक्तों के लिए जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला और मनोवांछित फल देने वाला होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का स्वरूप नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का वर्ण अत्यंत गोरा और चमकदार है, जिसके कारण उन्हें ‘गौरी’ कहा जाता है। उनकी चार भुजाएँ हैं—एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरू और अन्य दो हाथ वरदान और अभय मुद्रा में हैं। वे सफेद रंग के वस्त्र धारण करती हैं और उनकी सवारी बैल है। उनका यह रूप शांति, पवित्रता और शक्ति का प्रतीक है। माँ महागौरी के इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों के जीवन से अज्ञान, अंधकार और अशांति का नाश होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का महत्व नवरात्रि माँ महागौरी की उपासना का महत्व अत्यधिक है। मान्यता है कि माँ महागौरी की पूजा करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। उनका यह स्वरूप भक्तों के मन की शांति, संयम, और संतोष को बढ़ाता है। जो व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों और दुखों से गुजर रहे होते हैं, वे माँ महागौरी की पूजा से समस्त संकटों का समाधान पाते हैं। माँ महागौरी को आठवीं तिथि पर पूजने से व्यक्ति की समृद्धि, ऐश्वर्य, और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। उनके भक्तों को धन, वैभव और सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, माँ महागौरी का आशीर्वाद विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है, खासकर उन कन्याओं के लिए जो विवाह योग्य हैं। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आ रही हों, वे भी माँ की कृपा से संतान सुख प्राप्त करते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन व्रत का महत्व माँ महागौरी के दिन व्रत रखना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस दिन उपवास करने से साधक के मन में शुद्धता और साधना में दृढ़ता आती है। अष्टमी का व्रत रखने से जीवन की सभी कठिनाइयों का अंत होता है और घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। जिन लोगों को आर्थिक समस्याएं हैं, वे इस व्रत को रखने से धन की प्राप्ति करते हैं। अष्टमी व्रत विशेष रूप से कन्या पूजन के लिए भी प्रसिद्ध है। इस दिन घर में कन्या पूजन करके उन्हें भोजन कराना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह पूजन न केवल नारी शक्ति का सम्मान है बल्कि माँ महागौरी की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम भी है। कन्या पूजन करने से घर में सुख और शांति का वास होता है और घर के सभी सदस्य निरोगी रहते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी पूजा विधि माँ महागौरी की पूजा करने के लिए भक्तों को शुद्ध मन और तन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन पूजा विधि इस प्रकार है: नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी को भोग माँ महागौरी को सफेद वस्त्र और सफेद मिठाइयों का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेष रूप से खीर, नारियल, और हलवे का भोग चढ़ाने से माँ प्रसन्न होती हैं। सफेद रंग की मिठाइयों का भोग उनकी शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। उपासना के विशेष लाभ माँ महागौरी की पूजा से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होते हैं: निष्कर्ष नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी की पूजा और व्रत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी उपासना से जीवन की सभी समस्याओं का अंत होता है और भक्तों को शांति, समृद्धि, और संतोष की प्राप्ति होती है। माँ महागौरी की कृपा से भक्तों का जीवन सुख-शांति से भर जाता है, और उनके सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

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Shiv Chalisa:शिव चालीसा

Shiv Chalisa:शिव चालीसा: भोलेनाथ की स्तुति Shiv Chalisa:शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। भक्तगण भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं। Shiv Chalisa:शिव चालीसा का महत्व Shiv Chalisa:शिव चालीसा का पाठ कैसे करें Shiv Chalisa:शिव चालीसा के लाभ शिव चालीसा (Shiv Chalisa) ॥ दोहा ॥जय गणेश गिरिजा सुवन,मंगल मूल सुजान ।कहत अयोध्यादास तुम,देहु अभय वरदान ॥ ॥ चौपाई ॥जय गिरिजा पति दीन दयाला ।सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।कानन कुण्डल नागफनी के ॥ अंग गौर शिर गंग बहाये ।मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4 मैना मातु की हवे दुलारी ।बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ ।या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8 देवन जबहीं जाय पुकारा ।तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥ किया उपद्रव तारक भारी ।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ तुरत षडानन आप पठायउ ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥ आप जलंधर असुर संहारा ।सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12 त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ किया तपहिं भागीरथ भारी ।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ वेद नाम महिमा तव गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16 प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।जरत सुरासुर भए विहाला ॥ कीन्ही दया तहं करी सहाई ।नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ सहस कमल में हो रहे धारी ।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20 एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।कमल नयन पूजन चहं सोई ॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥ जय जय जय अनन्त अविनाशी ।करत कृपा सब के घटवासी ॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24 त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।संकट से मोहि आन उबारो ॥ मात-पिता भ्राता सब होई ।संकट में पूछत नहिं कोई ॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी ।आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28 धन निर्धन को देत सदा हीं ।जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥ अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ शंकर हो संकट के नाशन ।मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32 नमो नमो जय नमः शिवाय ।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ जो यह पाठ करे मन लाई ।ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।पाठ करे सो पावन हारी ॥ पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36 पण्डित त्रयोदशी को लावे ।ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ जन्म जन्म के पाप नसावे ।अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40 कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥ ॥ दोहा ॥नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

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