श्रीकृष्णाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में विभाजित है।
श्रीकृष्णाष्टकम् की रचना का श्रेय 12वीं शताब्दी के कवि और संत श्रीजयदेव को दिया जाता है। यह स्तोत्र श्रीकृष्ण की प्रेममय लीलाओं का वर्णन करता है।
श्रीकृष्णाष्टकम् के कुछ प्रमुख श्लोक निम्नलिखित हैं:
Srikrishnaashtakam
श्लोक 1:
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम् ॥
अर्थ:
हे स्वभक्तों के मन को प्रसन्न करने वाले! हे सदा नंदलाल! हे अनंगरंग सागर! हे कृष्णनगर के स्वामी! आपको नमस्कार है।
श्लोक 2:
विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥
अर्थ:
हे गोपियों की पीड़ा दूर करने वाले! हे कमललोचन! हे इंद्र को पराजित करने वाले! हे कृष्ण के रूप! आपको नमस्कार है।
श्लोक 3:
व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्ण दुर्लभम् । युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥
अर्थ:
हे वृंदावन की एकमात्र प्रियतम! हे दुर्लभ कृष्ण! हे सुख के एकमात्र दाता! हे गोपों के नेता! आपको नमस्कार है।
श्रीकृष्णाष्टकम् का पाठ करने से माना जाता है कि भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो भगवान कृष्ण की भक्ति करते हैं।
श्रीकृष्णाष्टकम् के कुछ अन्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- यह मानसिक शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।
- यह आध्यात्मिक विकास में मदद करता है।
- यह प्रेम और भक्ति की प्राप्ति में सहायक है।
श्रीकृष्णाष्टकम् एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का एक प्रभावी तरीका है।
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