श्रीशुक प्रोक्त श्रीकृष्णस्तुति, श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का एक अंश है। यह स्तुति भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और उनकी महिमा का वर्णन करती है। इस स्तुति में भगवान श्रीकृष्ण को एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ देवता के रूप में वर्णित किया गया है।
श्रीशुक प्रोक्त श्रीकृष्णस्तुति के छंद निम्नलिखित हैं:
shreeshukaprokta shreekrshnastutih
जय देव जय देव जय देव कृष्णाय नमः नारायणाय नमः वासुदेवाय नमः
नमस्ते रुक्मिणीपते नमस्ते यशोदापते नमस्ते गोपिकाप्रिय नमस्ते मुरलीधर
नमस्ते गोपाल नमस्ते वासुदेव नमः नमस्ते नंदनंदन नमस्ते नंदगोप
नमस्ते नन्दनन्दन नमस्ते यशोदापते नमस्ते गोपिकाप्रिय नमस्ते मुरलीधर
नमस्ते रुक्मिणीपते नमस्ते यशोदापते नमस्ते गोपाल नमस्ते वासुदेव नमः
श्रीशुक प्रोक्त श्रीकृष्णस्तुति का अर्थ निम्नलिखित है:
हे देव, हे देव, हे देव, हे कृष्ण, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे नारायण, हे वासुदेव, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
हे रुक्मिणी के पति, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे यशोदा के पुत्र, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे गोपिकाओं के प्रिय, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे मुरलीधर, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
हे गोपाल, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे वासुदेव, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे नंद के पुत्र, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे नंदगोप, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
हे नंद के पुत्र, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे यशोदा के पुत्र, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे गोपिकाओं के प्रिय, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे मुरलीधर, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
हे रुक्मिणी के पति, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे यशोदा के पुत्र, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे गोपाल, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे वासुदेव, मैं आपको नमस्कार करता हूं।
श्रीशुक प्रोक्त श्रीकृष्णस्तुति एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण स्तुति है। यह स्तुति भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
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