Atmanathstuti: 2 (Rudrakrita Chaturvedapurishaya Shashwataayadimurtaye)
अत्मनाथस्तव: 2 (रुद्रकृता चतुर्वेदापुरुषया शाश्वतायदिमूर्तिये)
प्रथम श्लोक
हे स्वयंभू भगवान, आप ब्रह्मांड के सृष्टा, संहारक और संरक्षक हैं। आप चार वेदों के ज्ञाता हैं। आप शाश्वत हैं और आपका रूप अद्भुत है।
अर्थ
हे भगवान, आप स्वयंभू हैं, अर्थात आपका कोई जन्मदाता नहीं है। आप ब्रह्मांड के सृष्टा हैं, अर्थात आपने इस ब्रह्मांड की रचना की है। आप संहारक भी हैं, अर्थात आप ब्रह्मांड का संहार भी करते हैं। आप संरक्षक भी हैं, अर्थात आप ब्रह्मांड की रक्षा करते हैं। आप चार वेदों के ज्ञाता हैं, अर्थात आप सभी प्रकार के ज्ञान के स्वामी हैं। आप शाश्वत हैं, अर्थात आपका कोई जन्म और मृत्यु नहीं है। आपका रूप अद्भुत है, अर्थात आपका रूप सभी प्रकार के गुणों से परिपूर्ण है।
द्वितीय श्लोक
आपके त्रिनेत्र से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। आपके त्रिशूल से संहार हुआ है। आपके डमरू से सृष्टि की रक्षा होती है। आपके त्रिपुंड से भक्तों को मोक्ष प्राप्त होता है।
Atmanathstuti: 2 (Rudrakrita Chaturvedapurishaya Shashwataayadimurtaye)
अर्थ
आपके तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्मांड के तीन गुणों, सत्त्व, रज और तम का प्रतिनिधित्व करते हैं। आपके तीन नेत्र से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। आपके तीन शूल हैं, जो ब्रह्मांड के तीन गुणों का नाश करते हैं। आपके डमरू की ध्वनि से सृष्टि की रक्षा होती है। आपके माथे पर काला तिलक है, जो भक्तों को मोक्ष प्रदान करता है।
तृतीय श्लोक
आप अद्वितीय हैं, आप सर्वव्यापी हैं, आप सर्वशक्तिमान हैं, आप सर्वज्ञ हैं, आप सर्वकल्याणकारी हैं, आप सर्वोत्तम हैं। आप ही एकमात्र ईश्वर हैं, आप ही सभी प्राणियों के पालनहार हैं।
अर्थ
आप अद्वितीय हैं, अर्थात आपके समान कोई दूसरा नहीं है। आप सर्वव्यापी हैं, अर्थात आप सभी जगह मौजूद हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं, अर्थात आपके पास सभी शक्तियां हैं। आप सर्वज्ञ हैं, अर्थात आप सभी प्रकार के ज्ञान के स्वामी हैं। आप सर्वकल्याणकारी हैं, अर्थात आप सभी प्राणियों की भलाई चाहते हैं। आप सर्वोत्तम हैं, अर्थात आप सभी प्राणियों से श्रेष्ठ हैं। आप ही एकमात्र ईश्वर हैं, अर्थात आप ही सभी प्राणियों के ईश्वर हैं। आप ही सभी प्राणियों के पालनहार हैं, अर्थात आप सभी प्राणियों की रक्षा करते हैं।
अत्मनाथस्तव: 2 (रुद्रकृता चतुर्वेदापुरुषया शाश्वतायदिमूर्तिये) एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 2 श्लोकों में विभाजित है। प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के एक अलग गुण या रूप की स्तुति की जाती है।
यह स्तोत्र भगवान शिव की भक्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस स्तोत्र का पाठ करने से आपको भगवान शिव की कृपा प्राप्त हो सकती है।
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