Sri Aghorashtakam
श्री अघोराष्टकम् एक प्राचीन स्तोत्र है जो भगवान शिव के एक रूप, श्री अघोरनाथ की स्तुति में रचित है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में विभाजित है। प्रत्येक श्लोक में श्री अघोरनाथ के एक विशेष रूप या गुण का वर्णन किया गया है।
श्री अघोराष्टकम् के रचयिता अज्ञात हैं। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें उनके सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
श्री अघोराष्टकम् के कुछ प्रमुख श्लोक और उनके अर्थ निम्नलिखित हैं:
- प्रथम श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को अघोर रूप में दर्शाया गया है।
- द्वितीय श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को अनादि, अनंत और सर्वव्यापी बताया गया है।
- तृतीय श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को सृष्टिकर्ता, पालनहार और संहारक बताया गया है।
- चतुर्थ श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी और सर्वकल्याणकारी बताया गया है।
- पंचम श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को भक्तों के कष्टों को दूर करने वाला बताया गया है।
- षष्ठ श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ को भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है।
- सप्तम श्लोक: इस श्लोक में श्री अघोरनाथ की स्तुति की गई है।
श्री अघोराष्टकम् का पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और उन्हें उनके सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
श्री अघोराष्टकम् के कुछ प्रमुख श्लोकों का हिंदी अनुवाद निम्नलिखित है:
Sri Aghorashtakam
प्रथम श्लोक
घोरं तं घोररूपं घोरवर्णं घोरध्वजं घोरनादं घोरं चरं घोरं तं शिवं भजे।
अर्थ:
मैं उस घोर रूप, घोर वर्ण, घोर ध्वज, घोर नाद और घोर चाल वाले, शिव को भजता हूं।
द्वितीय श्लोक
अनादिं अनंतं सर्वव्यापीं सर्वदेवानां देवं शिवं। अघोरं तं भजे सदा भक्तानां हितं करणं।
अर्थ:
मैं अनादि, अनंत और सर्वव्यापी, सभी देवताओं के देवता, शिव को सदा भजता हूं। जो भक्तों के हित के लिए होता है, उस अघोर को मैं सदा भजता हूं।
तृतीय श्लोक
सृष्टिस्थितिसंहारकारकं सर्वशक्तिमानं सर्वज्ञं। सर्वकल्याणकारीं देवं अघोरं तं भजे सदा।
अर्थ:
सृष्टि, पालन और संहार के कर्ता, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणकारी देवता, अघोर को मैं सदा भजता हूं।
चतुर्थ श्लोक
कष्टनाशनं मोक्षप्रदं भक्तानां हितं करणं। अघोरं तं भजे सदा सर्वेषां हितं करणं।
अर्थ:
कष्टों को दूर करने वाला, मोक्ष प्रदान करने वाला, भक्तों के हित के लिए होता है, उस अघोर को मैं सदा भजता हूं, जो सभी के हित के लिए होता है।
पंचम श्लोक
नमस्ते नमस्ते अघोरे नमस्ते नमस्ते अघोरे। नमस्ते नमस्ते अघोरे सर्वदा नमस्ते नमस्ते।
अर्थ:
हे अघोर! तुम्हें बार-बार प्रणाम है। हे अघोर! तुम्हें बार-बार प्रणाम है। हे अघोर! तुम्हें बार-बार प्रणाम है। तुम्हें सदा प्रणाम है।
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