श्री अष्टाक्षरी ध्यान एक संस्कृत ध्यान है जो भगवान कृष्ण की आठ अक्षरों वाले नाम "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" की स्तुति करता है। यह ध्यान 16वीं शताब्दी के कवि चैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित है।
श्री अष्टाक्षरी ध्यान की कुछ पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
Shri Ashtaksharidhyanam
श्री अष्टाक्षरी ध्यान
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
वसुधाधरं त्रिभुवननाथं वसुदेवसुतं नंदलालं वृंदावनविहारिं गोविन्दं वंशीधरं मधुसूदनं
सर्वाधीश्वरं सर्वव्यापीं सर्वशक्तिमानं सर्वज्ञं सर्वोत्तमं सर्वात्मभूतं सर्वेश्वरं सर्वेशं भजे
यह ध्यान भगवान कृष्ण की आठ विशेषताओं की स्तुति करता है। वे उन्हें वसुधाधर, त्रिभुवननाथ, वसुदेवसुत, नंदलाल, वृंदावनविहारी, गोविन्द, वंशीधर, मधुसूदन कहते हैं।
चैतन्य महाप्रभु भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे, और उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान किया है। श्री अष्टाक्षरी ध्यान चैतन्य महाप्रभु की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। यह ध्यान भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए एक प्रेरणा है।
यहाँ ध्यान का एक और अनुवाद दिया गया है:
श्री अष्टाक्षरी ध्यान
इस ध्यान में, चैतन्य महाप्रभु भगवान कृष्ण की आठ विशेषताओं की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण वसुधाधर हैं, जो पृथ्वी को धारण करते हैं। वे त्रिभुवननाथ हैं, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं। वे वसुदेवसुत हैं, जो वसुदेव के पुत्र हैं। वे नंदलाल हैं, जो नंद के प्रिय पुत्र हैं। वे वृंदावनविहारी हैं, जो वृंदावन में क्रीड़ा करते हैं। वे गोविन्द हैं, जो गोपियों के प्रेमी हैं। वे वंशीधर हैं, जो वंशी बजाने वाले हैं। वे मधुसूदन हैं, जो असुर मधु को मारने वाले हैं।
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि कृष्ण सर्वाधीश्वर हैं, जो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, और सर्वोत्तम हैं। वे सर्वेश्वर हैं, जो सभी देवताओं के स्वामी हैं। वे सर्वेश हैं, जो सभी प्राणियों के स्वामी हैं।
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भगवान कृष्ण की आराधना करने से भक्तों को शांति, आनंद, और मोक्ष प्राप्त होता है।
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