श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के जन्मस्थान, मथुरा के कुण्डों की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 17वीं शताब्दी के कवि केवलराम द्वारा रचित है।
श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम् की कुछ पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
Sri Krishnakundashtakam
श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम्
अयोध्यापुरे यमुना गंगा तीर्थी काशी हरिद्वारे गंगा त्रिवेणी संगम ससी
अयोध्या में यमुना, काशी में गंगा, हरिद्वार में त्रिवेणी संगम, और मथुरा में श्रीकृष्ण कुण्ड,
ये सभी तीर्थों के राजा हैं। इन तीर्थों में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है।
श्रीकृष्ण कुण्ड में स्नान करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
हे श्रीकृष्ण कुण्ड, तुम भगवान कृष्ण के जन्मस्थान के समीप स्थित हो। तुम भगवान कृष्ण के प्रेम और अनुग्रह का स्रोत हो।
मैं तुम्हारी शरण में आता हूँ। कृपया मुझे अपने प्रेम और अनुग्रह से भर दो।
यह स्तोत्र मथुरा के कुण्डों के महत्व और पवित्रता का वर्णन करता है। यह स्तोत्र मथुरा के तीर्थों की यात्रा करने और भगवान कृष्ण के जन्मस्थान के समीप स्थित कुण्डों में स्नान करने के लिए प्रेरित करता है।
यहाँ स्तोत्र का एक और अनुवाद दिया गया है:
श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम्
इस स्तोत्र में, केवलराम मथुरा के कुण्डों के महत्व और पवित्रता का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि ये कुण्ड सभी पापों को नष्ट करते हैं, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करते हैं। वे भगवान कृष्ण कुण्ड को विशेष महत्व देते हैं, क्योंकि यह भगवान कृष्ण के जन्मस्थान के समीप स्थित है। केवलराम भगवान कृष्ण कुण्ड से भगवान कृष्ण के प्रेम और अनुग्रह की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं।
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