महाप्रभोराष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों में रचित है।
महाप्रभोराष्टकम् की रचना 16वीं शताब्दी के कवि श्रीनिवासाचार्य ने की थी। यह स्तोत्र "श्रीविष्णुष्टकम" के नाम से भी जाना जाता है।
महाप्रभोराष्टकम् के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक इस प्रकार हैं:
mahaaprabhoraashtakam
- श्लोक 1:
महाप्रभो! त्वमेव ब्रह्मा त्वमेव रुद्रः त्वमेव महेश्वरः त्वमेव वासुदेवः । त्वमेव विष्णुः त्वमेव शङ्करः त्वमेव सर्वेश्वरः त्वमेव चैतन्यम् ॥
- अनुवाद:
हे महाप्रभो! आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र हैं, आप ही महेश्वर हैं, आप ही वासुदेव हैं। आप ही विष्णु हैं, आप ही शंकर हैं, आप ही सर्वेश्वर हैं, आप ही चैतन्य हैं।
- श्लोक 8:
त्वमेव परमं ब्रह्मा त्वमेव परमं शिवम् त्वमेव परमं ज्ञानं त्वमेव परमं पदम् । त्वमेव परमं सत्यं त्वमेव परमं भक्तिः त्वमेव परमं मन्त्रं त्वमेव परमं धाम ॥
- अनुवाद:
आप ही परम ब्रह्म हैं, आप ही परम शिव हैं, आप ही परम ज्ञान हैं, आप ही परम पद हैं। आप ही परम सत्य हैं, आप ही परम भक्ति हैं, आप ही परम मन्त्र हैं, आप ही परम धाम हैं।
महाप्रभोराष्टकम् एक सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान विष्णु की महिमा को दर्शाता है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान विष्णु में भक्ति उत्पन्न करता है।
महाप्रभोराष्टकम् का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान विष्णु के प्रति भक्ति उत्पन्न करता है और उन्हें भगवान विष्णु के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
KARMASU