राधाकृष्णयुगलस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण और राधा की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 18 श्लोकों में रचित है।
राधाकृष्णयुगलस्तुति की रचना 17वीं शताब्दी के कवि भक्तिविनोद ठाकुर ने की थी। यह स्तोत्र "राधाकृष्णयुगलगीत" के नाम से भी जाना जाता है।
राधाकृष्णयुगलस्तुति के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक इस प्रकार हैं:
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- श्लोक 1:
अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्णचन्द्रं निजभक्तवत्सलम् । स्वयं त्वसङ्ख्याण्डपतिं परात्परं राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् ॥
- अनुवाद:
अनंत काल से विद्यमान, पुरुषोत्तम, सर्वश्रेष्ठ, अपने भक्तों पर प्रेम करने वाले श्रीकृष्णचंद्र, स्वयं समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, परात्पर, राधा के पति, मैं आपको शरण में लेता हूं।
- श्लोक 2:
गोलोकनाथस्त्वमतीव लीलो लीलावतीयं निजलोकलीला । वैकुण्ठनाथोऽसि यदा त्वमेव लक्ष्मीस्तदेयं वृषभानुजा हि ॥
- अनुवाद:
गोलोक के नाथ, आपके खेल अत्यंत ही लीलामय हैं, आपके निज लोक की लीलाएं भी ऐसी ही लीलामय हैं। जब आप वैकुण्ठ के नाथ हैं, तो आप ही लक्ष्मी हैं, और वृषभानु की पुत्री राधा हैं।
- श्लोक 18:
सदा पठेद्यो युगलस्तवं परं गोलोकधामप्रवरं प्रयाति सः । इहैव सौन्दर्यसमृद्धिसिद्धयो भवन्ति तस्यापि निसर्गतः पुनः ॥
- अनुवाद:
जो इस युगल स्तुति का सदैव पाठ करता है, वह गोलोकधाम जाता है। यहां भी, उसके सौंदर्य और समृद्धि की सिद्धि होती है, और वह स्वभाव से ही पुनः प्राप्त होता है।
राधाकृष्णयुगलस्तुति एक सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम को दर्शाता है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान कृष्ण और राधा के प्रति भक्ति उत्पन्न करता है।
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